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भारत-चीन तनाव: क्या गलवान घाटी में चीन, भारत से बेहतर स्थिति में है?


शी जिनपिंगइमेज कॉपीरइटDALE DE LA REY/AFP/GETTY IMAGES

भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में हुए विवाद के बीच कई लोग इसकी तुलना डोकलाम में 2017 में हुए विवाद से कर रहे है. डोकलाम में भारत और चीन की सेना 73 दिनों तक आमने-सामने थी. लेकिन तब संघर्ष हिंसक नहीं हुए.
उस वक़्त भी स्थिति को भी युद्ध के हालात जैसा बताया जा रहा था लेकिन बातचीत से दोनों देशों ने इसका हल निकाल लिया था.
लेकिन इस बार स्थिति सीमा पर हिंसक कैसे हुई?
यही वजह है कि लोग ये पूछ रहे हैं कि क्या दोनों विवादों में कोई समानता है और ये तुलना कितनी सही है?
सबसे पहले समझते हैं डोकलाम में क्या हुआ था.

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डोकलाम का मुद्दा

डोकलाम एक विवादित पहाड़ी इलाक़ा है जिस पर चीन और भूटान दोनों ही अपना दावा जताते हैं.
मई 2017 में भारत ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था. इसके बाद जून महीने में रॉयल भूटान आर्मी ने डाकोला के डोकलाम इलाक़े में सड़क बना रहे चीनी सैनिकों को रोका.
भूटान ने नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में इस पर प्रतिरोध जताया. इसके बाद चीन ने भारतीय सेना पर सड़क निर्माण में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाया, चीन ने कहा कि सड़क निर्माण का काम उसके अपने इलाक़े में हो रहा है.
भारत की दलील है कि चीन जिस सड़क का निर्माण करना चाहता है, उससे सुरक्षा समीकरण बदल सकते हैं.

सांकेतिक तस्वीरइमेज कॉपीरइटPAULA BRONSTEIN/GETTY IMAGES

रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल डी एस हुड्डा कहते हैं, “ये दोनों मामले बिल्कुल अलग हैं. डोकलाम एक लोकलाइज़ड मुद्दा था यानि ये सिर्फ़ एक इलाक़े तक ही सीमित था. चीनी चाहते थे कि वो रोड बनाएं, हम ऐसा नहीं चाहते थे, मुद्दा बहुत साफ़ था. 73 दिनों तक चलने के बाद भी कोई हिंसा नहीं हुई. इस बार सभी प्रोटोकॉल चीन की तरफ़ से तोड़ दिए गए, काफ़ी हिंसा हुई. जिस तरह की आक्रामकता चीन की तरफ़ से दिखी है, उससे साफ़ है कि ये कोई लोकल घटना नहीं है, इसे बड़े लेवल पर प्लान किया गया है.”
डोकलाम विवाद में भारत और चीन के अलावा भूटान की भी भूमिका थी. दिल्ली के जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, “डोकलाम और गलवान में सबसे बड़ा अंतर ये है कि डोकलाम में विवाद एक ट्राइजंक्शन को लेकर था. विवाद से भारत और चीन के अलावा भूटान भी जुड़ा था. उस वक़्त भारत को ये भी ध्यान रखना था कि भूटान भारत के नज़रिए को कैसे देखता है. लेकिन यहां सीधा आमना-सामना है.”

गलवान घाटी

क्या चीन गलवान में बेहतर पोज़िशन में है?

हुड्डा के मुताबिक़ डोकलाम में भारतीय सेना बेहतर पोज़ीशन में थी. वो कहते है, “लद्दाख के इलाक़े ऊंचाई पर तो हैं लेकिन ज़मीन डोकलाम के मुक़ाबले समतल है. मुझे नहीं लगता कि चीनी सैनिकों को ऊंचाई का कोई फ़ायदा मिला लेकिन ये ज़रूर है कि कुछ इलाक़ों में वो शुरुआत में भारी दबाव बनाने में कामयाब हो गए थे.”
हुड्डा आगे कहते हैं, “डोकलाम में जो हो रहा था, वो बिल्कुल हमारी नाक के नीचे था, हम देख सकते थे कि वो सड़क बना रहे हैं और हमने उन्हें रुकने को कहा. लेकिन वो इस बार प्लानिंग के साथ आए थे, ये कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्होंने हमें चौंका दिया. आमतौर पर ऐसा होता है कि टेंशन बढ़ती है फिर कूटनीति के स्तर पर बातें होने लगती हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.”
डोकलाम और लद्दाख में हुए विवादों को समझने के लिए दोनों विवादों के बैकग्राउंड को समझना ज़रूरी है. स्वर्ण सिंह बताते हैं, “डोकलाम का बैकग्राउंड अलग है, डोकलाम का बैकग्राउंड बहुत पॉज़ीटिव था, हमें ये पता था कि पहले भी विवाद हुए हैं जिसे बातचीत से सुलझाया जा चुका था.”
डोकलाम में परिपेक्ष्य अलग था क्योंकि उस वक़्त हम एक तीसरे देश भूटान का साथ दे रहे थे, उस ज़मीन पर निर्माण कार्य को लेकर जिसपर चीन और भूटान अपना दावा करते हैं.
भारत का पक्ष था कि अगर भविष्य में संघर्ष की कोई सूरत बनी तो चीनी सैनिक डोकलाम का इस्तेमाल भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर क़ब्ज़े के लिए कर सकते हैं.
सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के नक़्शे में मुर्गी के गर्दन जैसा इलाक़ा है और ये पूर्वोत्तर भारत को बाक़ी भारत से जोड़ता है. कुछ विशेषज्ञ ये कहते हैं कि ये डर काल्पनिक है.
चीन ने इसे 'डोकलाम में भारतीय सैनिकों की घुसपैठ क़रार' दिया था.

सांकेतिक तस्वीरइमेज कॉपीरइटYAWAR NAZIR/GETTY IMAGES

गलवान घाटी में तनाव की वजह

यहां दोनों ही देश एक-दूसरे पर अपने इलाक़ों के अतिक्रमण करने का आरोप लगा रहे हैं.
गलवान घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चिन में है. गलवान घाटी लद्दाख़ और अक्साई चिन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है. यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) अक्साई चिन को भारत से अलग करती है.
अक्साई चिन पर भारत और चीन दोनों अपना दावा करते हैं. ये घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली है. ये क्षेत्र भारत के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पाकिस्तान, चीन के शिनजियांग और लद्दाख़ की सीमा के साथ लगा हुआ है.
1962 की जंग के दौरान भी गलवान नदी का यह क्षेत्र जंग का प्रमुख केंद्र रहा था. इस घाटी के दोनों तरफ़ के पहाड़ रणनीतिक रूप से सेना को एडवांटेज देते हैं. यहां जून की गर्मी में भी तापमान शून्य डिग्री से कम होता है. इतिहासकारों की मानें तो इस जगह का नाम एक साधारण से लद्दाखी व्यक्ति ग़ुलाम रसूल गलवान के नाम पर पड़ा. ये ग़ुलाम रसूल ही थे जिन्होंने इस जगह की खोज की थी.
भारत की तरफ़ से दावा किया जाता है कि गलवान घाटी में अपने इलाक़े में भारत सड़क बना रहा है जिसे रोकने के लिए चीन ने यह हरकत की है. दारबुक-श्‍योक-दौलत बेग ओल्‍डी रोड भारत को इस पूरे इलाक़े में बड़ा एडवांटेज देगी. यह रोड काराकोरम पास के नज़दीक तैनात जवानों तक सप्‍लाई पहुंचाने के लिए बेहद अहम है.
जानकार मानते हैं कि मौजूदा विवाद के पीछे कोई एक कारण नहीं है.
गलवान घाटी को लेकर सरकार ने दावा किया है कि चीन एलएसी के पास निर्माण कार्य कर रहा था. प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान में कहा गया है कि जहां तक एलएसी के उल्लंघन की बात है, साफ़ तौर 15 जून को गलवान घाटी में हिंसा इसलिए हुई क्योंकि चीनी सैनिक एलएसी के पास कुछ निर्माण कार्य कर रहे थे और उन्होंने इसे रोकने से इनकार कर दिया.
बीबीसी से पिछले हफ़्ते बातचीत के दौरान पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बढ़ती कथित चीनी गतिविधियों का बड़ा कारण, "पुल और हवाई पट्टियों के निर्माण को बताया जिसकी वजह से भारतीय गश्तें बढ़ चुकी हैं."
उनके मुताबिक़ इस तनाव के पीछे कई आपस में एक दूसरे से जुड़े मामले हैं. वो कहते हैं, “हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जब भारत ने जम्मू-कश्मीर के ख़ास दर्जे को ख़त्म कर दो नए केंद्र शासित प्रदेशों के नक़्शे ज़ारी किए तो चीन इस बात से ख़ुश नहीं था. "

भारत-चीन सीमा पर भारतीय जवानइमेज कॉपीरइटYAWAR NAZIR/GETTY IMAGES

विवाद सुलझाना भी होगा मुश्किल?

डोकलाम में हुआ विवाद 73 दिनों तक चला था लेकिन कूटनीति के स्तर पर सुलझा लिया गया था, सीमा पर किसी तरह की हिंसा नहीं हुई थी.
मौजूदा हालात पर हुड्डा कहते हैं, “हम लोग उम्मीद कर रहे हैं कि ये मुद्दा बातचीत से सुलझा लिया जाएगा, लेकिन ये आसान नहीं होगा, जिस तरीक़े से चीन ने घुसपैठ की कोशिश की है, जिस तरह की तैयारी से वो आए हैं, ये कोई आसान समझौता नहीं दिख रहा. लेकिन मुझे ये भी नहीं लगता कि चीन किसी तरह की बड़ी लड़ाई चाहता है. अभी इस बारे में कुछ कहना मुश्किल है. हमें देखना होगा कि बातचीत किस दिशा में जाती है.”
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