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आदर्नीये
            ADHYAKCH राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग/अध्यक्छ राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग/अध्यक्छ बिहार राज्यामानवाधिकार आयोग 
            दिल्ली हाई कोर्ट ब्लास्ट मामले में जाँच एजेंसियां निम्नलिखित कारणों से खुद जाँच के दाएरे में आगई हैं
hindustan times ने दिनांक २२/९/२०११ ख़ुफ़िया bureau के हवाले से खबर परकाशित की थी के हमलावर हुजी थे ,काम को ५ लोगों ने अंजाम दिया ,हमलावर सारे के सारे बंगलादेशी थे,५ में से दो को जाँच एजेंसियां 1.मद alla-ur- rahman 32, एवं मौलाना सैफुल शेख ४० के रूप में पहचान की थी, hindustan times में छापी कबर के अनुसार,खबर में यह भी कहा गया था के हमलावर देश से बहार भागने में भी सफल हो गए,वही दूसरी तरफ ईमेल  को बुनियाद बनाकर कश्मीर के कुछ नौजवानों के गिरफतारी से जूरी खबर दिनांक २३/९/२०११ के hindustan times में खबर छापी थी,वहीँ  तीसरी तरफ २६/११/२०११ को हिंदुस्तान  हिंदी २६/११/२०११ को हिंदी में  दिल्ली हाई कोर्ट  ब्लास्ट मामले में मधुबनी से दो गिरफ्तार सुर्खी से खबर  पर्काशित  थी,उपरोक्त तथ्यों क्र आलोक में बहुत सारे सवाल उठने शुरू हो गए हैं जिसका जवाब पूरा देश जानना चाहता है. 
   जब  हमलावर बंगलादेशी थे तो फिर जम्मू कश्मीर के युवको की गिरफ़्तारी क्यों?जब ईमेल ही गिरफ़्तारी का आधार बाकि ईमेल भेजने वालों को किस बुनियाद पर झट पट clean cheat दे दिया गया यहाँ यह भी प्रश्न उठाना सवाभाविक है के दिल्ली ब्लास्ट मामले में कुल कितने ईमेल आये थे अनेक ईमेल आने के बावजूद कश्मीरी नौजवानों में जाँच एजेंसियां ने क्या लिया के कश्मीरी नौजवानों को दिल्ली ब्लास्ट से जोर दिया गया सवाल यहभी उठता है के कश्मीरी नौजवानों को अगर कुछ देर के लिए गुनाहगार मान लेने की esthiti  में बिहार के युवकों की गिरफ़्तारी कहाँ तक जायज है?दिल्ली  ब्लास्ट से जूरी गिरफ्तारियों सम्बंधित एक और मजेदार और हास्यास्पद बात times of  india ने दिनांक ९/१२/२०११ को same पेज पर  दो खबर पर्काशित किये एक खबर जो बिहार से छापी थी दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार आफताब आलम को हिन्दुस्तानी बताया वहीँ दूसरी खबर जो दिल्ली से छपी थी आफताब आलम को पाकिस्तानी करार देते हुए भारत में कैसे आफताब आलम ने परवेश किया पूरी दास्ताँ पर्काशित की थी ,अब जरा सोंचा जाये जब एक हिन्दुस्तानी को साजिशपूर्ण तरीके से पाकिस्तानी बनाया जा सकता तो क्या एक सरीफ को सैतान (आतंकवादी)नहीं बनाया जा सकता?
       दैनिक जागरण दिनांक ११.१२.११ ने- मधुबनी से निर्गत हुआ था विवेक का द्रिविंग licence  सुर्खी से एक छोटी सी खबर पर्काशित की थी जिसमे लिखा था के दिल्ली पुलिसे ने विवेक मिश्रा को दिनांक २२/११/११ को  २ लाख  के जली नोट ,फर्जी  DL  जिसपे  किसी कातिल  उर्फ़ सज्जन की फोटो लगी बताई गई है, साथ ही खबर में यह भी लिखा था के दिल्ली पुलिसे ने उसके पास से मोहम्मद seraj  नाम के युवक का पासपोर्ट भी बरामद होने की बात खबर में लिख्खा है अब जरा सोंचिये के आखिर क्यों इस विवेक मिश्रा को मीडिया एवं दिल्ली पुलिसे ने दुनिया छुपा कर रख्खा?आखिर क्यों मीडिया विवेक की कहानी को छुपा कर रख्खा ?सवाल यह भी है के आखिर  विवेक मिश्रा के पहचान से जूरी खबर को दुनिया के सामने  न पेश करने का मकसद क्या था?यह सवाल सबसे महापूर्ण है.विवेक मिश्रा के DL पे किसी मुस्लिम युवक का फोटो होना  और साथ ही मुस्लिम युवक के नाम का ही  बना पासपोर्ट विवेक मिश्रा के पास से बरामद होना साथ उसके पास से जाली नोट का बरामद होने के बावजूद विवेक की कलि करतूत से दुनिया से रूबरू न करना क्या पाप नहीं ?साथ विवेक को हाई लाइट न करने के पीछे विवेक के पास से बरामदमुस्लिम युवको के  कागजात को बुनियाद बनाकर कही दिल्ली पुलिस झूठी क्रेडिट  लेने के चक्कर में जानबूझकर मामले  को कहीं आतंकवाद से तो नहीं न जोर दी,माजी की कहानियां और तजरबे इस मामले में तल्ख़ रहे हैं,इसलिए भरोसा नहीं होता,और सवाल यह भी के दुनिया का ४२०  आदमी किसी माशूम आदमी के नाम पर DL और पासपोर्ट बना ले ऐसी इस्थिति में जो बनाया वह गुनाहगार होगा या वह आदमी जिसने फर्जी तरीके से दुसरे का बना लिया ? अब देखना होगा  कही माशूम मुसलमानों को फँसाने के गरज से तो कही विवेक मिश्रा मुस्लिम युवको के दस्तावेज अपने पास तो नहीं रखते थे , हमारे देश के सविधान  निर्माताओ ने सविधान बनाते समय इस बात का खेयाल रख्खा था के दोषी बच जाये  पर किसी माशूम को सजा न मिल पाए मगर अफ्शोश तब होता है जब दोषी तो बच निकलते हैं लेकिन माशूम बेचारा सूली पे चढ़ जाता है,मनवाधिकार  आयोगों को एक और काम जरुर करना होगा जिस मामले में माशूम लोग  बरी हो गएं हो उन मामलों में उन अफसरों पे उसी धारा के तहत मुकदमा चलवाना चाहिए जिसके के तहत आरोपी आदमी पर दोष साबित होने के बाद चलता,साथ ही उन दागियों का NHRC  के साईट पर दोषियों को बचाने वालों, मशुमों को फँसाने वालों का  उनके पद नाम ,नाम और करतूतों का पूरा बेयोरा डालना होगा,अगर ऐसा होने लगा तो मेरे खेयाल से इस देश में आतंकवादी गतिविधियाँ खुद बा खुद लगाम लग जायेंगी  सवाल पैदा होता है के मशुमो के अधिकारों का हनन देश में और न हो क्या मानवाधिकारों की रक्छा के नाम पर रोटियां तोरने वाले लोग क्या इसके लिए तैयार हैं ?
                                                                                             मोहम्मद  कौशर नदीम 
                                                                                 सवतंत्र  पत्रकार  एवं  मानवाधिकार कार्यकर्ता  

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