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मैं हर इक चौक पे छली जाती हूँ , तंज कसते हैं लोग जिस भी गली जाती हूँ

मैं भी लड़की हूँ यही खौफ है दहशत है मुझे
माँ अभी तेरी और जरुरत है मुझे

मैं हर इक चौक , पे छली जाती हूँ
तंज कसते हैं लोग जिस भी गली जाती हूँ

रात तो भेड़ियों से डरके गुजरती है मेरी
तू ये कहती है क्यों ऐ लाडली डरती है मेरी

मैं भी लड़की हूँ यही खौफ है दहशत है मुझे
माँ अभी और तेरी और जरुरत है मुझे

तू नहीं आयी तो ये भेड़िये आ जायेंगे
जिस्म को नोचके माँ खा जायेंगे

ये दरिदों का शहर है मैं नहीं रह सकती
चोट पे चोट मैं अब और नहीं सह सकती

मैं भी लड़की हूँ यही खौफ है दहशत है मुझे
माँ अभी तेरी और जरुरत है मुझे

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