दिल्ली दंगों के आरोपी उमर ख़ालिद के खिलाफ UAPA जैसा बेहद सख्त कानून लगाया जाता है. हजारों पन्नों की चार्जशीट अदालत में रखी जाती है. पुलिस बार-बार कहती है कि हमारे पास इसके खिलाफ मजबूत सबूत हैं. इस दौरान बीते 6 सालों में चार्जशीट आती रही


 दिल्ली दंगों के आरोपी उमर ख़ालिद के खिलाफ UAPA जैसा बेहद सख्त कानून लगाया जाता है. हजारों पन्नों की चार्जशीट अदालत में रखी जाती है. पुलिस बार-बार कहती है कि हमारे पास इसके खिलाफ मजबूत सबूत हैं. इस दौरान बीते 6 सालों में चार्जशीट आती रही. सप्लीमेंट्री चार्जशीट आती रही. जमानत की अर्जियां लगती रहीं. अर्जी खारिज हुई तो ऊपर की अदालत में अपील होती रही. कभी सेशंस कोर्ट, कभी दिल्ली हाईकोर्ट तो कभी सुप्रीम कोर्ट. लेकिन जिस मुकदमे में ये तय होना है कि दिल्ली पुलिस के आरोप आखिर साबित होते हैं या नहीं, वो छह साल बाद भी चार्जेज तय करने की बहस के स्तर पर अटका हुआ बताया जा रहा है. यानी मामला अभी भी उस चौखट को पार करने की जद्दोजहद में है, जिसके बाद असली ट्रायल रफ्तार पकड़ता है. ऐसे में सवाल ये है कि अगर आरोप इतने संगीन हैं, सबूत इतने मजबूत हैं, तो छह साल में ट्रायल आगे क्यों नहीं बढ़ा ? देखिए हमारी पूरी रिपोर्ट. 

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