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#Kashmiri_Journalists कार्रवाई मामले पर अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं रिपोर्टर्स सांस फ़्रंतिए और एमनेस्टी इंटरनेशल ने भारत सरकार से आरोपों को वापस लेने और प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने की माँग की है.

क्यों हो रही है कश्मीरी पत्रकारों पर कार्रवाई


मोसर्रत ज़हरा

भारत प्रशासित कश्मीर में सरकार ने सख़्त क़ानून यूएपीए (ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम) के तहत एक महिला फ़ोटो-पत्रकार समेत तीन पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है जिसकी दुनिया भर के पत्रकारों के संगठन ने भर्त्सना की है.
26 वर्षीया मसरत ज़हरा पर राष्ट्रविरोधी फ़ेसबुक पोस्ट्स लिखने का आरोप है जिसे लेकर सोशल मीडिया पर काफ़ी आक्रोश देखा गया.
ज़हरा पिछले चार वर्षों से वाशिंगटन पोस्ट और गेटी इमेजेज़ के लिए कश्मीर कवर कर रही थीं.
राष्ट्रीय समाचार पत्र द हिंदू के संवाददाता आशिक़ पीरज़ादा को एक पुलिस हैंडआउट के अनुसार “फ़ेक न्यूज़” लिखने के आरोप में थाने तलब किया गया.
उन्हें इसके लिए लॉकडाउन के बीच श्रीनगर से लगभग 100 किलोमीटर दूर अपने घर से लंबा सफ़र करना पड़ा.
आशिक़ ने एक मारे गए चरमपंथी के परिवार वालों को ये कहते बताया था कि प्रशासन ने उन्हें बारामुला में उनके घर से लगभग 160 किलोमीटर दूर दफ़न चरमपंथी की लाश को निकालने की अनुमति दी है.
आशिक़ पीरज़ादा ने बीबीसी से कहा,”जाँचकर्ताओं ने सरकारी आदेश की प्रति नहीं होने को लेकर आपत्ति की पर मैंने उन्हें डिप्टी कमिश्नर के साथ हुए कॉल और टेक्स्ट रिकॉर्ड दिखाए. वो कहते रहे कि वो मुझे कॉल करेंगे पर उन्होंने किया नहीं. आख़िर में बात सुलझी और मैं आधी रात के बाद घर लौट सका. “
मसरत के ख़िलाफ़ एफ़आईआर और आशिक़ को सम्मन भेजने को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध हो ही रहा था, और एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया को अधिकारों का दुरुपयोग बता ही रही थी कि एक और जाने-माने पत्रकार, लेखक और टीवी बहसों में दिखने वाले गौहर गिलानी के ख़िलाफ़ भी यूएपीए क़ानून के तहत कार्रवाई की गई.
पुलिस हैंडआउट में कहा गया कि उनके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट लिखने पर मामला दर्ज किया गया जो भड़काऊ और शांति-व्यवस्था के लिए ख़तरा थे.

कश्मीर में पत्रकारों पर हमला

सोशल मीडिया पर विरोध
पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाने वाले कश्मीर साइबर पुलिस सेल के प्रमुख ताहिर अशरफ़ को सोशल मीडिया पर काफ़ी ट्रोल किया गया और उन्हें “मौक़ापरस्त” बताया गया.
उनके पुराने ट्वीट्स सामने लाए गए जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को 2002 के गुजरात दंगों के पीड़ितों की तुलना पिल्लों से करने के लिए उन्हें निष्ठुर बताया था. सरकारी सूत्रों ने बताया कि इस घटना के बाद उन्हें तलब किया गया था.
मसरत ज़हरा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी जिसे उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के इस भरोसे के बाद वापस ले लिया है कि उनके ख़िलाफ़ लगे आरोप वापस ले लिए जाएँगे.
वहीं आशिक़ पीरज़ादा ने कहा,”मुझे पहले ताहिर अशरफ़ के दफ़्तर अनंतनाग बुलाया गया. तब देर शाम हो रही थी, मगर फिर भी ये यूएपीए के तहत कार्रवाई से आसान था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि बात इससे ज़्यादा नहीं बढ़ी.“
तीनों पत्रकारों के बारे में पुलिस के बयानों में आपत्तिजनक बताए गए लेखों का कोई ब्यौरा नहीं है मगर ज़हरा बताती हैं कि उनसे 2018 में मुहर्रम के जुलूस की तस्वीर दोबारा छापने के बारे में पूछा गया जिसमें मातमी लोगों के हाथ में बुरहान वानी की तस्वीर थी. इस लोकप्रिय चरमपंथी को 2016 में मार डाला गया था.
कश्मीरी पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर इन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज आरोपों को वापस लेने की माँग की है.
वहीं अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं रिपोर्टर्स सांस फ़्रंतिए और एमनेस्टी इंटरनेशल ने भारत सरकार से आरोपों को वापस लेने और प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करने की माँग की है.
पाबंदियों के बीच पत्रकारिता
कश्मीर पिछले वर्ष अगस्त से ही अनिश्चितता के दौर से गुज़र रहा है जब भारत सरकार ने उसका विशेष दर्जा समाप्त कर दिया और कई तरह की पाबंदियाँ लगा दीं.
अब हालाँकि फ़ोन सेवाएँ और 2-जी इंटरनेट बहाल हो गया है मगर पत्रकारों की शिकायत है कि वो ख़ुद को पूरी तरह स्वतंत्र नहीं महसूस करते.
श्रीनगर स्थित पत्रकार रियाज़ मलिक कहते हैं,”आधिकारिक तौर पर कोई पाबंदी नहीं है, मगर जब कुछ लिखने पर सज़ा मिल सकती है, तो ये पाबंदी की ही तरह है .“
पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि इन पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई उनकी रिपोर्टिंग के लिए नहीं की गई.
अधिकारी ने कहा,”जब कोई सोशल मीडिया पर लोगों को भड़काता है तो क़ानून को कार्रवाई करनी ही पड़ेगी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता शांति और सुरक्षा के हिसाब से ही दी जाती है, हम केवल क़ानून का पालन कर रहे हैं.”
कई पत्रकारो से पूछताछ, कुछ गिरफ़्तार
पिछले आठ महीनों में कश्मीर में कई पत्रकारों को पूछताछ के लिए बुलाया गया है.
कामरान यूसुफ़ नामक फ़्रीलांस पत्रकार को अनुच्छेद 370 हटाने के पहले कई महीनों तक हिरासत में रखा गया था और पिछले साल अगस्त के बाद तनाव भड़कने पर फिर तलब किया गया.
बांदीपोरा के शेख़ सलीम और तारिक़ मीर को कई महीनों तक क़ैद रखा गया.
आसिफ़ सुल्तान नामक पत्रकार को चरमपंथियों को पनाह देने के आरोप में दो साल से भी ज़्यादा वक्त से क़ैद रखा गया है.
आउटलुक पत्रिका के संवाददाता नसीर गनाइ को पिछले साल बुलाया गया था.
नसीर कहते हैं,”कश्मीरी पत्रकार केवल पत्रकार नहीं हैं, वो कश्मीरी भी हैं और उन्हें अपनी ख़बर बतानी है. उससे उनके ऊपर जोखिम बढ़ जाता है .”
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