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पाकिस्तान से बंटवारे के बाद आए सिंधी लोगों ने कैसे नया शहर बसा डाला

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  जान्हवी मुले बीबीसी मराठी संवाददता 20 जून 2021 इमेज स्रोत, RISHIKESH CHOUDHARY/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAG इमेज कैप्शन, त्योहार मनाती सिंधी समुदाय की महिलाएं साल 1947 में भारत के विभाजन ने आज़ादी के जश्न को फीका कर दिया था. नई खींची गई सीमा की लकीर के दोनों तरफ़ दो नए राष्ट्र थे जो सांप्रदायिक दंगों में झुलस रहे थे. पंजाब और पश्चिम बंगाल के लोग ख़तरनाक यात्राएं करके इधर से उधर हो रहे थे. कभी ट्रेन से कभी वाहनों से और जिन्हें कुछ नहीं मिल रहा था वो पैदल ही सफ़र कर रहे थे. वहीं, सिंध से हज़ारों लोग नावों के जरिए मुंबई पहुंचे थे. सिंधी हिंदू कराची बंदरगाह पर इकट्ठा होते और जहाज़ों में सवार होकर भारत पहुंचते. इनमें से कई जहाज गुजरात के तटों पर भी रुके. नानिक मंगलानी  और उनका परिवार ऐसे ही प्रवासियों में शामिल था. 75 साल के नानिक उस समय को याद करके भावुक हो जाते हैं. वो कहते हैं, ''मैं 1945 में पैदा हुआ था. उस वक्त मैं ढाई साल का था. उस दौर की यादें आज भी मेरे ज़हन में साफ हैं.'' विज्ञापन उन दिनों मंगलानी परिवार सिंध के लरकाना ज़िले में रहता था. छोड़कर और ये भी पढ़ें आग