राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के होते हुए उद्धव ठाकरे को क्यों नहीं मना पाई बीजेपी


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शिव सेना नेता उद्धव ठाकरे का सपना सच होने पर, अब महाराष्ट्र विधानसभा ने भी उस पर मुहर लगा दी है.
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सदन में बहुमत साबित कर दिया. राजनीति के इस खेल में उन्होंने दो नए दोस्त हासिल किए तो एक पुराना विश्वस्त दोस्त खो भी दिया.
राजनीति ना केवल संभावनाओं का खेल है बल्कि बॉलीवुड के शंहशाह शाहरुख ख़ान के फिल्मी संवाद की तरह "हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं" भी हैं.
अब आप उद्धव ठाकरे को 'बाजीगर' कहें, ' डार्क हॉर्स' कहें या फिर महाराष्ट्र का गौरव माने जाने वाले 'शिवाजी महाराज' से तुलना करने की कोशिश करें.
कुछ लोग इसे राजनीतिक चतुराई मानते हैं तो कुछ विश्वासघात, लेकिन इन सब उपमाओं और उदाहरणों से सच फिलहाल बदलने वाला नहीं लगता. बहुत से लोगों ने अभी से सरकार को लेकर उलटी गिनती भी शुरु कर दी होगी, लेकिन अक्सर कहा जाता है कि कौओं के कोसने से बैल नहीं मरा करते.
हो सकता है कि कुछ लोगों के दिल में मलाल हो, तकलीफ़ हो, लेकिन साथ ही यह दिखावा भी कि सत्ता के लिए हम सिद्धांतों से समझौता नहीं करते.
कुछ लोग हैं जो अब भी मानते होंगे कि उन्होंने चुप रह कर, दख़ल नहीं देकर ठीक ही किया है क्योंकि उनका मक़सद 'राजनीति' करना नहीं है. इन सब बातों में बहुत कुछ सच हो सकता है, बहुत कुछ आप सच नहीं मानने का दावा कर सकते हैं.
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बॉलीवुड के मशहूर नाम नितिन देसाई की सोच से शिवाजी पार्क पर बना शपथ ग्रहण मंच, मैदान और समारोह शानदार था, लेकिन ना जाने क्यों उसमें शोले के फिल्मी गाने "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" से शुरु होकर "दोस्त दोस्त ना रहा…" पर ख़त्म होता महसूस हो रहा था.
एक अहम सवाल मेरे मित्र ने पूछा कि इस बार महाराष्ट्र की राजनीति में नागपुर के महाल की क्या कोई भूमिका नहीं रही?
नागपुर का महाल इलाका यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय,जहां आरएसएस का हाईकमान है, जहां सरसंघचालक बैठते हैं और दिल्ली में बैठने वाले लोग ख़ास तौर से पत्रकार उसे बीजेपी का रिमोट कंट्रोल कहते हैं. यानी नागपुर से ही बीजेपी की राजनीति चलती है.
उससे उलट बीजेपी और संघ हमेशा कहते रहे कि संघ बीजेपी की राजनीति में कोई दख़ल नहीं देता.
संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर से लेकर अभी डॉ मोहन भागवत तक बहुत कम मौके आए होंगें, जब संघ ने बीजेपी-जनसंघ की राजनीति में सीधे दख़ल दिया हो.
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महाराष्ट्र फडनवीस को ज़िम्मेदारी बन गई

गुरुजी गोलवलकर तो सामान्यत राजनीतिक स्वभाव के ही नहीं थे लेकिन राजनीतिक स्वभाव वाले बालासाहेब देवरस ने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनाने में भूमिका के अलावा शायद ही कोई दखलन्दाजी की हो, जनसंघ से बीजेपी बनने के वक्त भी नहीं, हां, सुदर्शनजी का प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल से दो मंत्रियों के नाम कटवाना इसका बड़ा अपवाद माना जा सकता है.
खैर! बात अभी महाराष्ट्र में मौजूदा राजनीति की. आरएसएस के लोगों का कहना है कि संघ ने प्रदेश में सरकार बनाने में बीजेपी के फ़ैसले पर कोई दख़ल नहीं दिया.
लेकिन यह भी बताया गया कि दिल्ली की सेन्ट्रल लीडरशिप ने फोन करके संघ हाईकमान को कहा कि आप शिव सेना-फडणवीस मसले पर अपनी तरफ से शिव सेना से बात मत कीजिए और अगर उनका फ़ोन भी आता है तो फ़ोन मत उठाइए.
ख़बर यह भी है कि उद्धव ठाकरे ने संघ मुख्यालय में कोई फ़ोन नहीं किया.
हां, उद्धव ठाकरे और देवेन्द्र फडनवीस के बीच ज़रूर बातचीत हुई, कम से कम तीन बार.
बीजेपी आलाकमान ने संघ हाईकमान को कहा कि इस वक्त शिव सेना "राजनीतिक ब्लैकमेलिंग" कर रही है और यदि उनके दबाव में आ गए तो देश भर में बीजेपी की राजनीति पर इसका असर पड़ेगा, फिर हो सकता है कि हरियाणा में उप-मुख्यमंत्री बने दुष्यंत चौटाला भी मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगें.
बड़ी पार्टी का ही सीएम बनना चाहिए, इसमें कुछ गलत नहीं है, राजनीति का सिद्धान्त यही कहता है. फिर हो सकता है कि झारखंड के चुनावों में भी ऐसी ही मुश्किल का सामना करना पड़े.
इस बातचीत के बाद संघ हाईकमान ने महाराष्ट्र के मसले में कोई द़खल नहीं दिया.
महाराष्ट्र: बीजेपी ने कौन-कौन सी ग़लतियां की?
नागपुर में संघ विचारक दिलीप देवधर कहते हैं कि संघ आमतौर पर ना तो कोई निर्देश देता है और ना ही बीजेपी के लिए राजनीतिक फ़ैसले करता है, लेकिन उसकी नज़र ज़रूर रहती है और वो समीक्षा भी करता है इसलिए अब डॉ कृष्णगोपाल की अगुवाई में एक समन्वय समिति बनाई गई है जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों और उसके बाद हुए घटनाक्रम पर पूरी जांच करेगी और संघ हाईकमान को रिपोर्ट देगी.
देवधर की बात मानें तो संघ हाईकमान इस बात से ज़रुर नाराज़ रहा कि बीजेपी लीडरशिप ने विधानसभा चुनावों में एक दर्जन से ज़्यादा पुराने नेताओं के टिकट काट दिए और दूसरी तरफ बीस से ज़्यादा नेता दूसरी पार्टियों से शामिल किए.
इस दौरान बीजेपी नेता और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के बयानों और रवैये से भी संघ खुश नहीं रहा.
देवधर ने बताया कि 2014 के चुनावों के बाद संघ हाईकमान ने नागपुर से ही बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी को मुख्यमंत्री बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन बीजेपी लीडरशिप ने नहीं माना और फडनवीस को ज़िम्मेदारी दी गई.
इस बार भी गडकरी का नाम चल रहा था, लेकिन उन्होंनें खुद साफ़ कर दिया कि वे रेस में नहीं हैं.
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बीजेपी को था ख़ुद पर भरोसा

2019 के विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी को भरोसा था कि पिछली बार उसके पास 122 विधायक थे और दो दर्जन से ज़्यादा दूसरी पार्टियों के नेताओं को टिकट दिया है तो वो अकेले अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेगी.
इस भरोसे की एक वजह यह भी थी कि पिछला विधानसभा चुनाव बीजेपी ने अकेले लड़ा था जबकि इस बार शिव सेना भी साथ थी, तो उसे उम्मीद थी कि कुछ सीटें बढ़ेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
चुनाव नतीजों के बाद जब बीजेपी बहुमत से दूर थी तब शिव सेना को महसूस हुआ कि यह मौका है जब बीजेपी को दबाव में लाया जा सकता है.
इससे पहले शिवसेना के आदित्य ठाकरे को उप-मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात चल रही थी.
चुनाव के बाद सरकार में "फ़िफ्टी-फ़िफ्टी" के फ़ार्मूले का मतलब था कि मुख्यमंत्री तो बीजेपी के फडणवीस होंगें, लेकिन मंत्री बराबर-बराबर होगें.
जब शिव सेना को भी मुख्यमंत्री पद देने की बात आई तो दिल्ली में बैठी बीजेपी लीडरशिप ने शिव सेना से कहा कि मुम्बई, कल्याण, उल्लास नगर, डोंबिवली और कई जगहों पर बीजेपी के पार्षद और शिव सेना के पार्षदों की संख्या में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है तो फिर वहां भी बीजेपी के मेयर आधे समय के लिए बनने चाहिए, लेकिन शिव सेना लीडरशिप इसके लिए तैयार नहीं हुई तब बीजेपी ने कहा कि फिर सीएम की कुर्सी के लिए यह सवाल कैसे आता है.
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जब कम सीटों के बावजूद मायावती बनीं मुख्यमंत्री

मुझे 1989 के चुनाव याद आ रहे हैं जब एक प्रेस कान्फ्रेंस में विश्वनाथ प्रताप सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी साथ बैठे थे.
मैंने सवाल पूछा- यदि चुनाव में बीजेपी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलती हैं तो फिर कौन प्रधानमंत्री बनेगा? प्रेस कान्फ्रेंस में पल भर को सन्नाटा.
वी पी सिंह ने वाजपेयी की तरफ देखा. वाजपेयी ने मेरी तरफ़ मुस्करा कर देखा और बोले, "इस बारात के दूल्हा तो वी पी सिंह ही हैं."
यूं तो नब्बे के दशक में यूपी में भी वाजपेयी जी ने कम सीटों के बावजूद मायावती जी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था.
इसके अलावा एक और अहम बात कि उद्धव ठाकरे को लगता था कि अगर प्रधानमंत्री उन्हें रिक्वेस्ट करेंगें तो वे मान जाएंगें और फिर 50-50 मंत्री पद को लेकर बीजेपी पर मेहरबानी कर देंगें, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
दूसरी बात खुद उद्धव ठाकरे को इस बात की उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी उनके नाम पर तैयार हो जाएंगी, लेकिन सोनिया गांधी पर महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायकों का दवाब था सरकार में बैठने के लिए.
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शरद पवार को कम आंकने की ग़लती कर दी
शिव सेना के साम्प्रदायिक होने के मसले पर इन विधायकों ने तर्क दिया कि जब राहुल गांधी को केरल में चुनाव जिताने के लिए कांग्रेस मुस्लिम लीग से सहयोग ले सकती है तो यहां शिव सेना को लेकर आपत्ति क्यों?
फिर विधायकों का कहना था कि यह चुनाव उन्होंने अपने दम पर लड़ा है और जीता है, केन्द्रीय पार्टी ने तो किसी भी तरह की मदद उन्हे नहीं की.
इसके बाद कांग्रेस हाईकमान को विधायकों के टूटने का डर भी सताने लगा था.
शिव सेना के इंकार के बाद बीजेपी ने एनसीपी से रिश्ते बनाने की तैयारी कर ली थी. खुद शरद पवार की प्रधानमंत्री से बात हो गई.
दूसरी तरफ बीजेपी आलाकमान को लगा कि अजित पवार विधायक दल के नेता हैं और उन्हीं के पास विधायकों की ताक़त है तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता भूपेन्द्र यादव और खुद अमित शाह ने अजित पवार के साथ बातचीत करके सरकार बनाने की रणनीति को अंजाम दिया, लेकिन शरद पवार आसानी से बाजी हारने वालों में से नहीं रहे.
23 नवम्बर को सवेरे में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद राजभवन में गर्मागर्म चाय की महक आ रही थी.
टेबल पर सुनहरी कपों मे चाय उड़ेली जा रही थी, लेकिन किसे पता था कि कहावतें ज़िंदगी में कभी-कभी इतनी सच हो जाती हैं -
"देयर आर सो मेनी स्लिप्स, बिटविन कप एंड लिप्स. वो चाय ठंडी हो गई....."

उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन सरकार चला पाएंगे?

  • 30 नवंबर 2019


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उद्धव ठाकरे ने अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कार्यभार संभाल लिया है. लेकिन, इससे पहले उन्होंने कभी कोई प्रशासनिक दायित्व नहीं संभाला है. इसलिए ये सवाल उठ रहा है कि क्या वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना काम सही ढंग से कर पाएंगे.
हालांकि, उन्होंने पिछले कुछ सालों में जिस तरह से शिव सेना का नेतृत्व किया है और जिस तरह से शिव सेना के ज़रिए उन्होंने मुंबई नगर निगम को चलाया है, उससे उनके कामकाजी स्टाइल का आकलन किया जा सकता है.
पिछले कुछ सालों से, शिव सेना ही मुंबई नगर निगम चला रही है. इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश अकोलकर कहते हैं, "उद्धव ठाकरे की प्रशासन पर पकड़ रही है. लेकिन कोई ये नहीं कह सकता है कि बीएमसी से मुंबई के निवासियों को फायदा हुआ है. उनका किसी प्रशासन से सीधा कनेक्शन नहीं रहा है. उन्होंने केवल अपनी पार्टी को चलाया है लेकिन वे कभी किसी पद पर नहीं रहे."
"मुख्यमंत्री बनने से पहले शिवाजी पार्क और मातोश्री का हाल ही उनके लिए खेल का मैदान रहा है. उन्होंने इन दोनों खेल के मैदान पर काफी अच्छा किया है. लेकिन इन मैदानों पर बल्ला भी उनका था, गेंद भी उनकी थी और अंपायर भी उनके थे. लेकिन अब उन्हें विधानसभा में बल्लेबाजी करनी होगी, जहां बीजेपी के 105 गेंदबाज मौजूद होंगे. इसलिए वे मुख्यमंत्री या प्रशासक के तौर पर किस तरह से काम करेंगे, इसका आकलन लगाना मुश्किल है. उनका अपनी पार्टी पर नियंत्रण हो सकता है, लेकिन उन्होंने कभी मुंबई नगर निगम के काम काज में हिस्सा नहीं लिया."
शिव सेना ने हमेशा भावनाओं की राजनीति की है. चाहे वो नगरनिगम का चुनाव रहा हो य फिर राज्य की राजनीति रही हो,शिव सेना हमेशा भावनात्मक मुद्दों के आधार पर राजनीति करती रही, यही वजह है कि माना जा रहा था कि बाला साहेब के निधन के बाद शिव सेना को चलाना चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन आकोलकर के मुताबिक उद्धव ठाकरे ने इस चुनौती को बहुत आसानी से निभाया.




वरिष्ठ पत्रकार अकोलकर कहते हैं, "बीजेपी ने 2014 में एलायंस आख़िरी मिनट में ठुकराया था. उद्धव ठाकरे ने पांच पार्टियों के ख़िलाफ़ अकेले चुनाव लड़ने का साहस दिखाया और उस चुनाव में शिव सेना 63 सीटें जीतनी में कामयाब रही. यह काफी मुश्किल था. बाला साहेब का करिश्मा भी नहीं था, उनके निधन के बाद ये पहला चुनाव था. गठबंधन तोड़ने के चलते बीजेपी से मराठी मानुष थोड़ा नाराज़ था. लेकिन चुनाव में कामयाबी का श्रेय उद्धव ठाकरे को गया. उस वक्त उनके साथ वरिष्ठ नेता नहीं थे. बाल ठाकरे के सहयोगी रहे मनोहर जोशी, सुधीर जोशी, दत्ता जी नालावाडे, वारामराव महादिक और दत्ताजी साल्वे उनके साथ थे. ऐसे में यह उद्धव ठाकरे के लिए वास्तविक इम्तिहान था."
किसी भी मुख्यमंत्री को प्रशासनिक स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत रखनी होती है. लेखक एवं पत्रकार धवल कुलकर्णी बताते हैं, "कांग्रेस, एनसीपी और बीजेपी, सबके अपने अपने प्रतिबद्ध ब्यूरोक्रेट्स या फिर प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो खास पार्टी से नजदीकी रखते हैं. लेकिन शिवसेना के साथ ऐसा नहीं है. इसलिए वो नौकरशाहों के बीच अपना नेटवर्क बनाएंगे. आखिर में ये तीन पार्टियों की मिली जुली सरकार है. ऐसे में उद्धव ठाकरे को राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर आगे आकर यह साबित करना होगा कि सरकार वे ही चला रहे हैं."
ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट सुधीर बदामी बताते हैं, "उद्धव ठाकरे किसी दूसरे राजनेता की तरह नहीं हैं. कई बार तो वे शिव सैनिक की तरह आक्रामक हो जाते हैं लेकिन ये उनका अपना टेम्पारमेंट नहीं है. मेरा ख्याल है कि वे अगले पांच साल तक तीनों राजनीतिक दलों के गठबंधन को बनाए रखेंगे. ये बात सही है कि उनके पास प्रशासनिक अनुभव नहीं है लेकिन उनके पास लोग हैं जो उन्हें सलाह मशविरा देंगे. उन्होंने पहले सरकार नहीं चलाई है लेकिन उनके पास एक पार्टी को चलाने का अनुभव है, वो पार्टी भी ऐसी है जिसमें विभिन्न विचारधारा के लोग शामिल हैं. इसलिए मुझे लगता है कि वे इसे सफलतापूर्वक कर पाएंगे. "
"फडणवीस नरेंद्र मोदी की तरह अपनी ताकत प्रदर्शित करने में यकीन रखते थे. लेकिन उद्धव ठाकरे का रवैया काफी नरमी भरा है. यह शिव सेना के अस्तित्व का भी सवाल है. जहां तक मुंबई नगर निगम की बात है, उसका कामकाज तो आयुक्त ही देखते हैं. नगर निगम की स्टैंडिंग कमेटी प्रस्तावों को आगे बढ़ाती है. कारपोरेटरों ने ज्यादा कुछ नहीं है. लेकिन चूंकि इस सरकार को तीन पार्टियां मिलकर चलाएंगी तो मुझे सुधार की उम्मीद लग रही है. तीनों पार्टियां एक दूसरे को चेक करके ही अपना अपना अस्तित्व कायम रख सकती हैं, ऐसे में उन्हें कोई ना कोई बीच का रास्ता निकालना होगा. कोई भी पार्टी अब सत्ता खोना नहीं चाहेगी. इसलिए भी ये तीनों पार्टियां कुछ ज्यादा साल तक एकजुट रहने की कोशिश करेंगी."
उद्धव ठाकरे की राजनीति का अंदाज बाल ठाकरे की राजनीति से बेहद अलग है. शिव सेना का भविष्य क्या होगा, इसको लेकर भी तमाम तरह की आशंका उठ रही हैं, क्योंकि शिव सेना की कमान आक्रामक बाल ठाकरे के हाथों से निकलकर अपेक्षाकृत मॉडरेट दिखने वाले उद्धव ठाकरे के हाथों में है.




मुंबई मिरर के अस्सिटेंट एडिटर अल्का धूपकर बताती हैं, "उद्धव ठाकरे की कमजोरी ही उनकी मजबूती साबित हुई है. उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे नरम लहजे वाले राजनेता हैं. उन्होंने जिस तरह से आदित्य ठाकरे को राजनेता के तौर पर अब तक उभारा है, उससे भी यह जाहिर होता है."
मुंबई मिरर को दिए एक इंटरव्यू में आदित्य ठाकरे ने कहा है कि आज की शिव सेना में हिंसा की कोई जगह नहीं है. उद्धव ठाकरे ने विरासत में मिली शिव सेना को 2005 में संभाला था. इसके बाद से ही शिव सेना के हिंसक प्रदर्शनों में कमी देखने को मिली है. हालांकि उन्होंने आक्रामक रास्ता पूरी तरह से छोड़ा नहीं है.
उद्धव ठाकरे अभी अभी एक हाथ से भय का डंडा चलाते हैं. हालांकि उन्होंने भी कहा है कि उनकी पार्टी किसी के खिलाफ कोई प्रतिशोध नहीं रखते लेकिन वे चेतावनी भी देते हैं कि अगर कोई उनके रास्ते में आता है तो वे उसे हटा देंगे. इस तरह से उन्होंने शिव सेना के अनिश्चित रवैय को बरकरार रखा है.
दूसरी ओर शिव सेना की महिला कैडर भी उद्धव ठाकरे के साथ है. अल्का धूपकर के मुताबिक, "शिव सेना की महिला विधायक बाल ठाकरे में पिता का रूप देखते हैं, जबकि उद्धव ठाकरे जरूरत के हर वक्त उनके साथ खड़े रहते हैं."
एक और बात है, जो ध्यान आकर्षित करता है. उद्धव ठाकरे ने कभी अपने कजिन राज ठाकरे के खिलाफ कोई कटु बयान जारी नहीं किया है. राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाई लेकिन उद्धव ठाकरे ने कभी अपने भाई के खिलाफ कुछ नहीं बोला.
पर्यावरण मामलों पर काम करने वाले एक्टिविस्ट स्टालिन के मुताबिक उद्धव ठाकरे अपने टेंपारमेंट के चलते ही पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर को समझ पाते हैं. मुंबई के आरे में पेड़ को बचाने के लिए स्टालिन का संगठन वन शक्ति सबसे आगे खड़ा था.




शिव सेना ने आरे के मुद्दे पर अपनी राय स्पष्ट रखी थी. उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने पर स्टालिन बताते हैं, "उद्धव ठाकरे पर्यावरण प्रेमी के तौर पर जाने जाते हैं, हमें उम्मीद है कि पर्यावरण को बचाने के लिए कदम उठाएंगे. वे पर्यावरण संबंधी फोटोग्राफी भी करते रहे हैं. वे दूसरे राजनेताओं की तुलना में प्रकृति के ज्यादा करीब हैं,उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था आरे के जंगलों को बचाया जाएगा. मुझे उम्मीद है कि वे अपने शब्दों पर बने रहेंगे."
स्टालिन का ये भरोसा कोई हवा नहीं था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री बनने के 24 घंटों के भीतर उद्धव ठाकरे ने आरे में बनने वाले मेट्रो कार शेड कंस्ट्रक्शन के काम पर रोक लगा दी.
इस लिहाज से देखें तो महराष्ट्र में नेतृत्व का बदलना लोगों के लिए अच्छा है. अब उम्मीद की जा सकती है कि वन और प्रकृति को बचाने की कोशिश होगी. शिव सेना का पॉलिटिकल एजेंडा चाहे जो हो, वे लोगों की इच्छाओं के विपरीत नहीं जाते हैं, ये सच्चाई है.
स्टालिन बताते हैं, "किसी भी खास प्रोजेक्ट के खिलाफ जब लोग विरोध करने पर उतर आते हैं तो शिव सेना उस प्रोजेक्ट का समर्थन कभी नहीं करता है और प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाता है. शिव सेना में एक और अहम बात है, ये लोग हमेशा बातचीत और बहस के लिए तैयार रहते हैं. पिछली सरकार में काफी अहंकार था, उन्होंने लोगों से बातचीत के सभी दरवाजे बंद कर दिए थे. दोनों सरकारों में यह एक मूलभूत अंतर होगा. इस सरकार में आपके सामने मुद्दों पर बातचीत का विकल्प मिलेगा. आप सरकार में बैठे लोगों से बात कर पाएंगे. उन्हें अपना पक्ष समझा सकते हैं. यह पिछली सरकार में संभव नहीं था."
कोंकण के ननार प्रोजेक्ट पर शिव सेना और बीजेपी में मतभेद था. स्थानीय लोग इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे थे, शिव सेना भी स्थानीय लोगों के साथ और उसने इसका विरोध किया था. जिसके चलते बीजेपी को इस प्रोजेक्ट को किसी दूसरी जगह ले जाने का फैसला करना पड़ा था लेकिन बीजेपी के नेताओं ने इस प्रोजेक्ट के पूरा कराने पर काफी जोर दिया था.
इसके बारे में स्टालिन बताते हैं, "हमें उम्मीद थी कि शिव सेना इस प्रोजेक्ट के लिए कोई और जमीन देखेगी. कोंकण एक तरह से शिव सेना का किला है. मुझे नहीं लगता है कि वे लोग ऐसा कोई काम करेंगे जिससे इलाके की संस्कृति या पर्यावरण पर कोई असर पड़े."




लेकिन शिव सेना ने जिस तरह से मुंबई नगर निगम को चलाया है वहां उनके काम को देखकर किसी को भी शिव सेना सरकार के कामकाज को लेकर आशंका हो सकती है. मुंबई मिरर की अस्सिटेंट एडिटर अल्का धूपकर बताती हैं, "नई और पुरानी शिव सेना में तालमेल बिठाना होगा, मातोश्री या उद्धव क्या आतंरिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाएगा. मातोश्री पहले इसमें कामयाब नहीं रहा है. अब ये देखना होगा कि मुख्यमंत्री निवास वर्षा से कहीं ज्यादा अंकुश लग पाता है या नहीं."
अल्का धूपकर बताती हैं, "शिव सेना को मुंबई नगरनिगम में राजनीतिक कामयाबी मिली थी लेकिन क्या वे अपना काम ठीक ढंग से कर पाए? इन लोगों का चुनावी स्लोगन हम करेंगे, इसी वजह से नाकाम रहा. लोगों ने उन्हें ट्रोल किया. सड़कों पर गड्ढों का मसला हो या फिर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का मामला हो, ये सब मुद्दे गंभीर समस्याओं में बदल गए थे. शिव सेना इन मुद्दों पर कुछ भी करने में कामयाब नहीं हुई. सरकारी अस्पताल बदतर स्थिति में पहुंच गए. बीएमसी संचालित स्कूलों की विश्वसनीयता खत्म हो गई. अगर इन मानकों पर देखें तो बीएमसी के अधीन शिव सेना के कामकाज की काफी आलोचना हुई. इसलिए शिव सेना के सामने इस सरकार को चलाने की चुनौती काफी बड़ी साबित होने वाली है."
शिव सेना का बृहनमुबंई नगरनिगम (बीएमसी) पर शासन है, लेकिन उसे हमेशा सड़कों और स्कूलों की खराब स्थिति के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है. मेयर और पार्टी के विधायकों ने दावा किया था सड़कों पर कहीं भी कोई गड्ढा नहीं है. इसको लेकर उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है. बीएमसी के स्कूलों की बदतर स्थिति को लेकर काफी नाराजगी भी है.
मुंबई नगर निगम में शिव सेना के शासन पर एजुकेशनल एक्सपर्ट रमेश जोशी भी नाराजगी जाहिर करते हुए बीबीसी मराठी से कहते हैं, "नगरपालिका मराठी भाषा और मराठी शिक्षा को दबाने में लगी है. उद्धव ठाकरे को सबसे पहले इसे रोकना चाहिए. एक प्रस्ताव पास किया गया था जिसके मुताबिक सभी जगहों पर सीबीएससी से संबंद्ध स्कूलों को खोले जाने की बात है. इस पर उन्हें शर्म भी महसूस नहीं हो रही है? नगरपालिका एक्ट की धारा 61 के मुताबिक कहा गया है कि स्थानीय स्तर पर प्राथमिक शिक्षा स्थानीय भाषा में मुहैया करानी चाहिए. लेकिन ये लोग मराठी स्कूलों को बंद कर रहे हैं. इस गलती का उन्हें कोई एहसास भी नहीं है. मुझे उम्मीद है कि उद्धव ठाकरे कम से कम इस नीति को रोकेंगे."
रमेश जोशी ये भी बताते हैं, "बीएमसी पर जब से शिव सेना का शासन शुरू हुआ है तब से बीएमसी स्कूलों की स्थिति बिगड़ी है. बीएमसी स्कूल संयुक्त महाराष्ट्र कमिटी के तहत अच्छे ढंग से चला करते थे. उद्धव ठाकरे ने इन स्कूलों के लिए वर्चुअल एजुकेशन की स्कीम लागू की थी. वह तमाशा साबित हुआ था. क्या किसी ने उसकी समीक्षा की? वह स्कीम कितनी कामयाब रही? क्या इससे शिक्षा का स्तर सुधरा है? किसी ने उसका आकलन नहीं किया है. उन्होंने अभी वो बाते कहीं हैं जो उन्हें बेहतर लगी हैं. मुझे लगता है कि किसी भी स्कीम की घोषणा करने से पहले उद्धव ठाकरे को उस क्षेत्र विशेष के बारे में मूलभूत जानकारी लेनी चाहिए. मैं उनसे ऐसा करने का अनुरोध करता हूं."