मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर गौरीहार थाना क्षेत्र के एक गांव में दो लोगों ने कथित तौर पर खाना छूने पर 25 साल के दलित युवक की कथित रूप से पिटाई की, जिसके बाद उसकी मौत हो गई.
जनसत्ता अख़बार ने देवराज अनुरागी (25) के परिवार के सदस्यों के हवाले से बताया कि गांव के ही दो अभियुक्तों ने देवराज को पास के एक खेत में पार्टी के लिए आमंत्रित किया था.
उन्होंने बताया कि देवराज जब दो घंटे बाद घर लौटा तो उसने परिवार को अपनी आपबीती बताई कि उसके खाना छूने पर अभियुक्तों ने उसकी जमकर पिटाई की.
उन्होंने बताया कि देवराज की पीठ पर चोट के निशान थे. घर पहुंचने के कुछ देर बाद उसने सीने में दर्द की शिकायत की और घर पर ही दम तोड़ दिया.
एसपी ने बताया कि दोनों अभियुक्त फरार हैं. पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए दल बनाए हैं और उनकी तलाश जारी है.
इमेज कॉपीरइटSAMIRATMAJ MISHRAImage captionपाँच दिन पहले दलितों और सवर्णों के बीच हुए संघर्ष में दलित समुदाय के 28 लोग बुरी तरह घायल हो गए.
कानपुर के उर्सला अस्पताल के वॉर्ड संख्या एक में क़रीब बीस महिलाएं अलग-अलग बिस्तरों पर लेटी हैं.
महिलाओं के हाथ-पैर में बँधे प्लास्टर, सिर पर बँधी पट्टी, पीठ और पैरों पर डंडों के निशान और रह-रहकर निकल रहीं उनकी सिसकियां बता रही हैं कि उनके साथ क्या हुआ है.
महिलाओं के साथ उनके परिजन भी हैं. कुछ लोग उनका हाल-चाल लेने आए हैं, कुछ पत्रकार ख़बर के मक़सद से वहां डटे हैं तो कुछ लोग संवेदना जताने भी पहुंचे हैं.
ये सभी महिलाएं पड़ोसी ज़िले कानपुर देहात के मंगटा गाँव की हैं जहां चार दिन पहले दलितों और सवर्णों के बीच हुए संघर्ष में दलित समुदाय के 28 लोग बुरी तरह घायल हो गए.
20 महिलाओं और चार पुरुषों को कानपुर के उर्सला अस्पताल में भर्ती कराया गया है जबकि कुछ को कानपुर देहात के ज़िला अस्पताल में. इस मामले में दलितों की ओर से दी गई तहरीर के आधार पर पुलिस ने तीस लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द और कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है.
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सबसे आगे साठ वर्षीया रजवंती देवी हैं. उनके दोनों हाथो में पट्टी बँधी है और दाहिने पैर में प्लास्टर बँधा है. पीठ पर चोट के इतने निशान हैं कि चमड़ी नीली पड़ गई है. अपनी आपबीती बयां करते-करते रजवंती देवी दर्द भूल जाती हैं और उनकी आंखों में ग़ुस्सा उतर आता है, "बाभन-ठाकुर जलन के मारे इतना पीट दिए हमें. हम लोग उनके भगवान को नहीं मानते. हम अपने यहां भीम भागवत कथा करा रहे थे और भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं, बस इसी बात से चिढ़ गए थे. पोस्टर फाड़ डाले, घरों में घुसकर मारने लगे और हमारे घरों में आग भी लगा दी."
कानपुर देहात ज़िला मुख्यालय से क़रीब दस किमी दूर गजनेरा थाने के मंगटा गांव में दलित समुदाय के लोगों ने सात दिवसीय भीम कथा का आयोजन किया था. कथा आठ फ़रवरी को समाप्त हुई और उसके बाद 13 फ़रवरी को शोभा यात्रा निकाली गई. इस बीच, किसी बच्चे ने भीम कथा का पोस्टर कथित तौर पर फाड़ दिया. बस यहीं से दोनों के बीच टकराव हुआ और यह टकराव एकाएक हिंसक हो गया.
कानपुर देहात के पुलिस अधीक्षक अनुराग वत्स बताते हैं, "दोनों समुदायों के बीच मन-मुटाव कथा के दौरान ही शुरू हो गया था लेकिन पुलिस को किसी ने कोई सूचना नहीं दी. पीड़ित पक्ष की शिकायत के आधार पर मुक़दमा दर्ज किया गया है. पीड़ितों को एक-एक लाख रुपए का मुआवाज़ा दिया गया है. हम लोगों ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की है कि किसी के बहकावे में न आएं."
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बताया जा रहा है कि घटना के दौरान दोनों पक्षों की ओर से पथराव हुआ और लाठी-डंडे चले. चोटिल ठाकुर समुदाय के लोग भी हैं लेकिन उनके परिजनों के मुताबिक़, वे सभी किसी 'सुरक्षित' जगह इलाज करा रहे हैं ताकि पुलिस उन्हें पकड़ न सके.
अभियुक्तों के ख़िलाफ़ एससी-एसटी ऐक्ट समेत कई धाराओं में केस दर्ज किया गया है. एसपी अनुराग वत्स के मुताबिक, 14 लोग गिरफ़्तार करके जेल भेजे जा चुके हैं.
घटना के पाँच दिन बाद भी गांव में तनाव बना हुआ है और गांव में जगह-जगह पुलिस बल तैनात हैं. प्रशासनिक अधिकारी हर दिन सुबह से शाम तक दोनों पक्षों को यह समझाने में लगे हैं कि विवाद से कुछ हासिल नहीं होगा.
पुलिस अधीक्षक अनुराग वत्स बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "दोनों पक्षों से बातचीत में ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि इनमें इस क़दर विवाद हुआ होगा. अभी भी दोनों एक-दूसरे से हमदर्दी रखते हैं और प्रेम से रहने की बात करते हैं. हम लोग यही समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि मिलजुल कर रहिए."
मंगलवार को दोपहर में हम जब मंगटा गांव पहुंचे तो गद्दी यानी बड़े से मंदिर प्रांगण में कुछ स्थानीय नेता ठाकुर परिवारों के साथ बातचीत कर रहे थे जबकि वहां से कुछ दूर भैयालाल के घर पर एसडीएम आनंद कुमार और कुछ पुलिस अधिकारी पीड़ितों की बात सुन रहे थे और उन्हें मिले मुआवज़े की जानकारी दे रहे थे. उनके साथ कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों के लोग भी वहां मौजूद थे. भैयालाल के घर के एक हिस्से को कथित तौर पर ठाकुरों ने आग लगा दी थी.
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ठाकुर परिवार के लोगों का आरोप है कि दलितों ने उनके घर की महिलाओं को मारा-पीटा और कई युवकों को भी घायल कर दिया. हालांकि वहां कोई भी घायल महिला नहीं मिली जबकि युवकों के बारे में बताया गया कि वो गिरफ़्तारी के डर से भाग गए हैं.
बचोले सिंह का बेटा सचिन सिंह भी गिरफ़्तार लोगों में शामिल है. बचोले सिंह कहते हैं, "लड़ाई हो रही थी तो वो था भी नहीं लेकिन उसका नाम लिखा दिया गया और पुलिस उसे भी ले गई. सेना में भर्ती की तैयारी कर रहा था. बेटे की तो ज़िंदग़ी ही ख़राब हो जाएगी."
पास में ही खड़े जयबीर सिंह घटना की मूल वजह बताने लगे, "भीम कथा से हमें कोई आपत्ति क्यों होगी लेकिन उस कथा के दौरान हिन्दू देवी-देवताओं के लिए जिस तरह के अपशब्दों और गंदे उदाहरणों को पेश किया जा रहा था वो बहुत आपत्तिजनक था."
इमेज कॉपीरइटSAMIRATMAJ MISHRAImage captionगांव के प्रधान बदलू राम
गांव के प्रधान बदलू राम भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि आपत्तिजनक बातें कथा के दौरान हुई थीं लेकिन उनके मुताबिक, यह कथा कहने वाले महाराज ने नहीं बल्कि उस दौरान चलने वाले एक गाने में कहा जा रहा था. बदलू राम कहते हैं, "कथा के पांचवें दिन ठाकुरों के यहां शादी थी. वो लोग बोले कि लाउड स्पीकर की आवाज़ कम करा दो. आवाज़ कम भी करा दी गई लेकिन कुछ देर बाद आवाज़ फिर बढ़ा दी गई. इसी बात से वो लोग नाराज़ थे."
भीम कथा मंगटा गांव में पहली बार हो रही थी लेकिन आस-पास के कई गांवों में यह पिछले कई साल से हो रही है. मंगटा गांव में भीम कथा कहने के लिए आचार्य सीतापुर से आए थे. दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर पहले हमला करने का आरोप लगा रहे हैं और दोनों की शिकायत है कि पुलिस उस वक़्त मौजूद थी और मूकदर्शक बनी थी.
गांव के कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि भीम कथा के नाम पर कुछ बाहरी लोग दलित समुदाय को कथित तौर पर अगड़ी जातियों के ख़िलाफ़ भड़का रहे हैं. मामले में बाहरी तत्वों की भूमिका से एसपी और दूसरे प्रशासनिक अधिकारी भी इनकार नहीं करते हैं.
दिलचस्प बात ये है कि जिस भीम कथा को लेकर दलितों और ठाकुरों के बीच इतना विवाद हुआ है, उसके लिए ठाकुरों ने भी चंदा दिया है. गांव के ही एक ठाकुर दीनानाथ तो ये तक कहते हैं, "प्रधानी के चुनाव में दलितों का वोट लेने के लिए ख़ुद ठाकुरों ने ही कथा कराई ताकि दलित उन्हें वोट दें. इस काम में गाँव के ही कुछ ठाकुर लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि ये मामला इतना बढ़ जाएगा और ख़ुद अपने लोग ही फँस जाएंगे."
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क़रीब पांच हज़ार की आबादी वाले मंगटा गांव में दलितों और ठाकुरों की आबादी लगभग बराबर यानी क़रीब चालीस-चालीस फ़ीसद है. बाक़ी बीस फ़ीसद में ब्राह्मण, अति पिछड़ा वर्ग और अन्य लोग हैं.
मौजूदा समय में यह पंचायत आरक्षित है लेकिन उम्मीद है कि अगली पंचवर्षीय योजना में यह अनारक्षित हो जाए. उसी को देखते हुए चुनावी तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं. एसपी अनुराग वत्स और एसडीएम आनंद कुमार भी विवाद के पीछे चुनावी कारण को नकारते नहीं हैं.
पुलिस और प्रशासन के लोग दोनों पक्षों में सुलह-समझौते की भी कोशिश कर रहे हैं ताकि गांव में शांति बहाल हो सके. पुलिस का कहना है कि मामले की जांच पड़ताल की जा रही है, दोषियों को सज़ा दिलाई जाएगी और निर्दोष लोगों को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा.
लेकिन अभी पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह दबाव से कैसे निबटे? दबाव दोनों ओर से है. एक पक्ष का दबाव यह है कि जिन लोगों को इस मामले में ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें छोड़ दिया जाए जबकि दूसरा पक्ष इस बात का दबाव डाल रहा है कि बचे लोगों की गिरफ़्तारी जल्द हो.
क्या है भीम कथा
भीम कथा दलित समुदाय के बीच मुख्य रूप से भागवत कथा की तर्ज पर शुरू की गई है. यही वजह है कि गांव वाले इसे भागवत कथा भी कहते हैं.
भागवत कथा की ही तरह इसका व्यापक पैमाने पर सात दिवसीय आयोजन किया जाता है और कथावाचक हर रोज़ तीन घंटे भीमराव आंबेडकर, महात्मा बुद्ध और दलित समुदाय से जुड़े दूसरे महापुरुषों की कहानियां और उनके जीवन संघर्षों की कथा कहते हैं.
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धनीराम मंगटा गांव में हुई भीम कथा के प्रमुख आयोजकों में से एक थे. वो बताते हैं, "भगवान बुद्ध और महापुरुषों की कथा कहते हैं महराज जी इसमें. सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले, शाहूजी महराज, बाबा साहब, संत कबीर, भगवान रविदास, भगवान वाल्मीकि की कथा सुनाते हैं. समाज के लोग जो इनके बारे में कम जानते हैं, वो भी इनसे परिचित होते हैं. चूंकि हम इन महापुरुषों को भगवान मानते हैं तो इनकी आरती-पूजा भी करते हैं."
कथा के दौरान इन्हीं महापुरुषों के जीवन-चरित पर आधारित कई गीत भी संगीत की धुनों पर गाए जाते हैं. कथावाचक कुछ गीत ख़ुद भी सुनाते हैं और कुछ रिकॉर्डेड गीत भी इस दौरान चलते रहते हैं.
गांव वालों के मुताबिक, कथा के दौरान मुख्य रूप से गौतम बुद्ध और बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा या तस्वीरें रखी रहती हैं जिन पर फूल चढ़ाए जाते हैं और कभी-कभी उनकी आरती भी होती है. कथा के दौरान कुछ कथावाचक संविधान के बारे में भी जानकारी देते हैं.
ऐसा नहीं है कि सभी जगह कथा के दौरान एक ही तरह की रीति-रिवाज़ का पालन किया जाता है. देश भर में अब तक सैकड़ों जगह कथा सुना चुके कथावाचक प्रवीण भाई कहते हैं, "भीम कथा नाम से भ्रम होता है और इसे आडंबर से अलग करने के लिए हम लोग कथा के दौरान संगीत इत्यादि से दूर रहने पर ज़ोर दे रहे हैं. हम चाहते हैं कि समाज के लोगों के बीच पांच हज़ार साल से सताए गए दलितों के महापुरुषों का जीवन और उनका संघर्ष लोगों के सामने आए और लोग उनसे प्रेरणा लें और जागरूक बनें. लेकिन कुछ लोग इसमें उसी तरह आडंबर और प्रदर्शन करने लगे हैं जैसा कि भागवत कथा या फिर हिन्दू धर्म की अन्य कथाओं में होता है."
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पंजाब के संगरूर में एक दलित युवक से हुई मारपीट के बाद उस युवक की पीजीआई चंडीगढ़ में मौत हो गई है. पिटाई के बाद युवक को पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती करवाया गया था.
शुक्रवार को मृतक जगमेल सिंह की टागें इन्फ़ैक्शन फैलने के कारण काटनी पड़ी थीं लेकिन इसके बावजूद उनकी ज़िंदगी नहीं बचाई जा सकी.
जगमेल सिंह संगरूर ज़िले के लहरा के नज़दीक गांव चंगालीवाला के रहने वाले थे. जगमेल सिंह मज़दूरी करते थे. मृतक के परिवार में उनकी पत्नी के इलावा दो बेटियां और एक बेटा है.
थाना लहरा में बीती 13 नवंबर को दर्ज की गई एफ़आईआर के अनुसार मृतक के बयानों पर गांव के चार लोगों के ख़िलाफ़ अलग-अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया. पुलिस ने चारों अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है.
जगमेल सिंह के साथ मारपीट की ये घटना 7 नवंबर की है. एफ़आईआर के अनुसार, जब जगमेल सिंह घायल अवस्था में थे तब उन्होंने पुलिस को अस्पताल में बताया था कि चार लोगों ने उन्हें बुरी तरीक़े से मारा-पीटा था. उसके पैरों पर कई वार किए गए थे.
एफ़आईआर के अनुसार, "मृतक का दोषियों के साथ पहले किसी बात पर झगड़ा हुआ था. घटना वाले दिन मृतक गांव में ही किसी के घर बैठा था जहां बहाने से आरोपी उसको ले गए और बंधक बना के मारपीट की."
"मृतक के बयानों में लिखा गया है कि मारपीट के दौरान पानी मांगने पर उसको इंसानी पेशाब पिलाया गया था."
पहले मृतक को इलाज के लिए संगरूर के सरकारी अस्पताल लाया गया था जहां से उन्हें रजिंदर अस्पताल, पटियाला रैफ़र कर दिया गया था.
इसके बाद बीते कुछ दिनों से उनका इलाज पीजीआई चंडीगढ़ में चल रहा था जहां शनिवार सवेरे उनकी मौत हो गई.
संगरूर पुलिस के एसपी गुरमीत सिंह (पंजाब ब्यूरो ऑफ़ इनवेस्टिगेशन) ने बताया, "बीती 13 नवंबर को चार आरोपियों के ख़िलाफ़ अगवा करने और मारपीट करने के लिए अलग-अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था. पीड़ित की इलाज के दौरान मौत होने के बाद अपराध की साज़िश रचने और क़त्ल की धाराओं को जोड़ा गया है. चारों आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है."
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क्या हैं मौजूदा हालात?
मृतक के रिश्तेदारों में इस घटना को लेकर रोष है. मृतक के भांजे गुरदीप सिंह ने मीडिया के साथ बात करते हुए कहा, "परिवार के लिए ये एक असहनीय घटना है. हम सरकार से सख़्त कार्रवाई और परिवार की आर्थिक मदद करने की मांग करते हैं. जब तक हमारी मांगों पर ग़ौर नहीं किया जाता हम अंतिम संस्कार नहीं करेंगे."
पीड़ित की मौत हो जाने के बाद कई सामाजिक संगठन इस मामले में सामने आए हैं. मृतक के परिवार वालों और अलग-अलग संगठनों ने एसडीएम के दफ़्तर के सामने धरना दिया.
ज़मीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के नेता गुरमुख सिंह ने कहा, "ये घटना दलितों पर ज़ुल्म का एक और दर्दनाक उदाहरण है. पुलिस चाहे सभी आरोपियों को गिरफ़्तार करने की बात कर रही है लेकिन हमारी मांग है कि पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये मुआवज़ा दिया जाए."
ज़मीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के नेता गुरमुख सिंह ने मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी दिए जाने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो संघर्ष तेज़ किया जाएगा.
संगरूर के डिप्टी कमिशनर घनश्याम थोरी ने मीडिया से बातचीत में कहा, "क़ानूनी तौर पर ऐसे मामलों में 8.25 लाख रुपए मुआवज़ा ही मिल सकता है."
"इसके इलावा पांच हज़ार रुपये की पेंशन की सहूलियत भी दी जा सकती है. सरकारी नौकरी की परिवार की मांग को पंजाब सरकार के पास भेज दिया जाएगा."