भारत में कोविड-19 वैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल की अनुमति के लिए मिले तीन आवेदनों पर विचार कर रही विशेषज्ञों की समिति ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया और भारत बायोटेक से और डेटा मांगा है.
समिति ने कंपनियों से कहा है कि वो अभी चल रहे अपने क्लीनिकल ट्रायल्स का लेट-स्टेज सेफ्टी और प्रभाव से जुड़ा अतिरिक्त डेटा भेजे.
वहीं अमरीकी की फार्मा कंपनी फाइज़र ने अपना डेटा पेश करने के लिए और वक़्त मांगा है.
सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस अख़बार को बताया कि बुधवार को पहली बार मिली सब्जेक्ट एक्सपर्स कमिटी (एसईसी) ने अगली बैठक तक विस्तृत जवाब मांगे हैं. अगली बैठक की तारीख़ अभी तय नहीं की गई है.
एसईसी ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया को सलाह देगी जिसके आधार पर वो वैक्सीन को लेकर कोई अंतिम निर्णय लेगा. इस पूरी प्रक्रिया में कुछ हफ़्तों का वक़्त लगेगा.
एसईसी ने पुणे स्थित जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स लिमिटेड की ओर से विकसित की गई वैक्सीन को भी कुछ शर्तों के साथ पहले और दूसरे चरण के ट्रायल करने की मंज़ूरी दे दी है.
रूस ने कोरोना के अपने टीके को लेकर उठी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को ख़ारिज करते हुए इसे 'बिल्कुल बेबुनियाद' बताया है.
रूस ने मंगलवार को दावा किया था कि उसने अपने यहाँ एक टीका बना लिया है जिसका इंसानों पर लगभग दो महीने परीक्षण किया गया और फिर इसे मंज़ूरी दे दी गई.
लेकिन जानकारों ने रूस के इतनी तेज़ी से टीका बना लेने के दावे पर संदेह जताया. जर्मनी, फ़्रांस, स्पेन और अमरीका में वैज्ञानिकों ने इसे लेकर सतर्क रहने के लिए कहा.
इसके बाद रूस के स्वास्थ्य मंत्री मिखाइल मुराश्को ने बुधवार को रूसी समाचार एजेंसी इंटरफ़ैक्स से कहा, "ऐसा लगता है जैसे हमारे विदेशी साथियों को रूसी दवा के प्रतियोगिता में आगे रहने के फ़ायदे का अंदाज़ा हो गया है और वो ऐसी बातें कर रहे हैं जो कि बिल्कुल ही बेबुनियाद हैं".
रूसी मंत्री ने कहा कि इस टीके की पहली खेप अगले दो हफ़्तों में आ जाएगी और पहले ये मुख्य तौर पर डॉक्टरों को दिया जाएगा.
रूसी अधिकारियों ने कहा है कि उनकी योजना है कि अक्तूबर महीने से बड़ी संख्या में लोगों का टीकाकरण शुरू हो जाएगा.
रूस की कोरोना वैक्सीन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने क्या कहा?
टीका बनाने का दावा
रूस के टीका बना लेने की घोषणा मंगलवार को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने की थी जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की ऐसी वैक्सीन तैयार कर ली है जो कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ कारगर है.
उन्होंने कहा था कि इस टीके का इंसानों पर दो महीने तक परीक्षण किया गया और ये सभी सुरक्षा मानकों पर खरा उतरा है.
पुतिन ने साथ ही ये भी कहा था कि ये टीका उनकी बेटी को भी दिया गया है.
टीके पर सवाल
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि वो रूसी अधिकारियों से इस टीके की समीक्षा करने के लिए संपर्क कर रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन अभी छह टीकों पर नज़र रखे हुए है जिनका विकास हो रहा है और उनमें रूस का ये टीका शामिल नहीं है जिसका नाम स्पूतनिक बताया गया है.
जिन छह टीकों पर काम चल रहा है उनका विकास तीसरे चरण में है जिसमें इंसानों पर बड़ी संख्या में परीक्षण किया जाता है.
रूस ने कोरोना वायरस की पहली वैक्सीन बनाने का दावा किया
रूसी टीके के दावे पर ख़ास तौर पर अमरीका और यूरोप में सवाल उठाए जा रहे हैं.
जर्मनी के स्वास्थ्य मंत्री जेन्स स्पान ने कहा, "लाखों लोगों को टीका देना शुरू कर देना एक ख़तरनाक बात है क्योंकि अगर गड़बड़ हुई तो फिर टीके पर से लोगों का भरोसा मर जाएगा."
उन्होंने कहा, "जितना हमें पता है, उससे लगता है कि इस टीके का समुचित परीक्षण नहीं हुआ है...बात केवल सबसे पहले टीका बना लेने की नहीं है, ज़रूरी ये है कि एक सुरक्षित टीका बनाया जाए."
वहीं फ़्रांस के नेशनल सेंटर फ़ॉर साइंटिफ़िक रिसर्च की रिसर्चर इसाबेल इम्बर्ट ने अख़बार ला पेरिसियों से कहा कि इतनी जल्दी इलाज का दावा कर देना "बहुत ही ख़तरनाक" हो सकता है.
अमरीका में देश के सबसे बड़े वायरस वैज्ञानिक डॉक्टर एंथनी फ़ाउची ने भी रूसी दावे पर शक जताया है.
डॉक्टर फ़ाउची ने नेशनल जियोग्राफ़िक से कहा, "मैं उम्मीद करता हूँ कि रूसी लोगों ने निश्चित तौर पर परखा है कि ये टीका सुरक्षित और असरकारी है. मुझे पूरा संदेह है कि उन्होंने ये किया है."
अमरीका और ब्रिटेन के कुछ शोधकर्ताओं ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बताया है कि 'ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में कोरोना वायरस की जिस वैक्सीन पर काम चल रहा है, उसके शुरुआती निष्कर्ष आशाजनक हैं. 'शोधकर्ताओं ने छह बंदरों के एक समूह पर इस वैक्सीन को आज़माया और पाया कि ये काम कर रही है.
बताया गया है कि 'अब इस वैक्सीन का ट्रायल इंसानों पर चल रहा है. साथ ही कुछ अन्य वैज्ञानिकों से आने वाले दिनों में इस वैक्सीन का रिव्यू करवाया जाएगा.'ब्रिटेन के दवा निर्माता AZN.L ने पिछले महीने घोषणा की थी कि उसने ऑक्सफ़र्ड वैक्सीन ग्रुप और जेनर इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर कोरोना वायरस के टीके पर काम शुरू किया है.
बंदरों पर ट्रायल
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 'छह बंदरों को कोरोना वायरस की भारी डोज़ देने से पहले, उन्हें यह टीका लगाया गया था. हमने पाया कि कुछ बंदरों के शरीर में इस टीके से 14 दिनों में एंटीबॉडी विकसित हो गईं और कुछ को 28 दिन लगे.'
शोधकर्ताओं के अनुसार, "कोरोना वायरस के संपर्क में आने के बाद, इस वैक्सीन ने उन बंदरों के फ़ेफड़ों को नुक़सान से बचाया और वायरस को शरीर में ख़ुद की कॉपियाँ बनाने और बढ़ने से रोका. लेकिन वायरस अभी भी नाक में सक्रिय दिखाई दे रहा था."
लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसन के एक प्रोफ़ेसर, डॉक्टर स्टीफ़न इवांस ने कहा कि 'बंदरों पर शोध के बाद जो नतीजे आए हैं, वो निश्चित रूप से एक अच्छी ख़बर है.' उन्होंने कहा, "यह ऑक्सफ़र्ड वैक्सीन के लिए एक बड़ी बाधा की तरह था जिसे उन्होंने बहुत अच्छी तरह से पार कर लिया है."
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सफल होने की संभावना?
टीका विकसित करने की प्रक्रिया में उसका बंदरों पर सफल होना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. लेकिन वैज्ञानिकों की जानकारी के अनुसार कई टीके जो लैब में बंदरों की रक्षा कर पाते हैं, वो अंतत: मनुष्यों की रक्षा करने में विफल रहते हैं.
प्रोफ़ेसर इवांस कहते हैं, "इस मामले में एक चीज़ जो अच्छी है, वो ये कि जो टीके काम नहीं करते, वो सुरक्षा देने की बजाय, कई बार बीमारी को बदतर बनाते हैं. SARS-CoV-2 का टीका विकसित करने में एक सैद्धांतिक चिंता तो निश्चित रूप से रहेगी और इस अध्ययन में कोई नकारात्मक सबूत ना मिलना, बहुत उत्साहजनक है."
शोधकर्ताओं ने बताया है कि 13 मई तक इस शोध के लिए स्वेच्छा से सामने आए क़रीब एक हज़ार लोगों को ट्रायल के तौर पर यह टीका लगाया जा चुका है.शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अगले एक महीने में वो कुछ स्पष्ट निष्कर्षों तक पहुँच पाएंगे.
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कई और जगह भी काम जारी
दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी कोरोना वायरस वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं जो मानव परीक्षण की स्टेज तक पहुँच चुके हैं. मॉडर्ना कंपनी का MRNA.O, फ़ाइज़र कंपनी का PFE.N, बायोएन.टेक कंपनी का 22UAy.F और चीन की कानसिंनो बायोलॉजिक्स कंपनी का 6185.HK टीका इसमें शामिल हैं. वैश्विक रूप से कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 100 से अधिक टीकों पर काम चल रहा है.
लेकिन 40 लाख से ज़्यादा लोगों को संक्रमित कर चुके और तीन लाख से ज़्यादा लोगों की जान ले चुके इस वायरस का टीका तैयार करने वालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि अगर टीका बना, तो कितनी बड़ी मात्रा में इसकी डोज़ तैयार करनी होगी.
आम तौर पर, एक कामकाजी टीका विकसित करने में 10 साल तक का समय लग सकता है. लेकिन महामारी की तात्कालिकता में आई तेज़ी को देखते हुए और मरने वालों की संख्या को देखते हुए, बड़े शोधकर्ता कोरोना वायरस का टीका जल्द से जल्द विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं.