Showing posts with label अक्षरधाम हमले के बेक़सूर. Show all posts
Showing posts with label अक्षरधाम हमले के बेक़सूर. Show all posts

#आतंकवाद का सच ।। देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा' ।। मासूमों की हत्या दहशतगर्दी , ऐसे लोगों को सबक सिखाने की ज़रूरत ।। लेकिन सबसे बड़ा सवाल गुनाहगारों को सजा देने के नाम पर मासूमों की जिन्दगियों को बर्बाद कर देना ये कौन पुण्य ? देखें क्या हुआ था देश के चर्चित आतंकी घटना के जांच के बाद ? इतिहास के पन्नो दबा कला सच

 

देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा'

  • अंकुर जैन
  • अहमदाबाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आदम अजमेरी, अक्षरधाम हमला

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

शबाना आदम अजमेरी अहमदाबाद के दरियापुर इलाक़े की एक म्युनिसिपल स्कूल में छठी क्लास की छात्रा हैं. जहां देश और उसकी क्लास के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी या सीए बनने के सपने देखते हैं, वहीं शबाना वकील बनना चाहती है.

यह पूछने पर क्यों.... वह चुप हो जाती है. कुछ पल बाद अपने पिता की ओर देखती हैं और फिर रोने लगती हैं.

उसकी मां नसीम बानो कहती हैं, "इसका बचपन क़ानून, पुलिस और वकीलों के क़िस्से सुनकर बीता है. बस तभी से यह कहती है कि यह वकील बनेगी और हम सबको बचाएगी."

शबाना के पिता आदम सुलेमान अजमेरी 11 साल जेल में रहने के बाद 17 मई, 2014 को बाहर आए हैं. उन पर अक्षरधाम मंदिर हमले में शामिल चरमपंथियों का साथ देने का आरोप था और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन एक दशक तक जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोप ख़ारिज कर दिए और उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर दिया.

24 सितंबर, 2002 को दो हमलावरों ने अक्षरधाम मंदिर के भीतर एके-56 राइफल से गोलियां बरसाकर 30 लोगों की हत्या कर दी थी और क़रीब 80 को घायल कर दिया था.

इस मामले में आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया था जिनमें से छह को आरोपमुक्त कर दिया गया है जबकि दो पर अभी मुकदमा चल रहा है.

'ग़ैरक़ानूनी हिरासत और प्रताड़ना'

8 अगस्त, 2003 को रात के क़रीब डेढ़ बजे आदम अजमेरी अपने भाई के ऑटो गैराज के नज़दीक दोस्तों के साथ बातचीत कर रहे थे तभी एक मारुति ज़ेन कार, जिसमें चार लोग सवार थे, उनके सामने आकर रुकी.

गाड़ी में से एक आदमी बाहर आया और पूछा, "तुम से आदम कौन है? तुम्हें बड़े साहब ने बुलाया है."

मैं समझा नहीं कि कौन साहब. फिर वह बोला बड़े साहब ने क्राइम ब्रांच बुलाया है.

अजमेरी कहते हैं, "पुलिस से डर लगता है इसलिए थोड़ा घबराते हुए में उनके साथ चला गया. बस उस दिन के बाद ज़िन्दगी मानो नरक से बदतर हो गई."

आदम अजमेरी, परिवार, अक्षरधाम हमला,

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

"रात को ले जाकर मुझे एक अफ़सर के सामने बिठा दिया. अफ़सर ने पूछा क्या तुम मुझे जानते हो? मैंने कहा नहीं, तो बोले मेरा नाम डीजी वंज़ारा है. बोले तुम हरेन पंड्या के बारे में क्या जानते हो. मैंने कहा कि मैंने उनके क़त्ल के बारे में अख़बार में पढ़ा है. उन्होंने फिर पूछा कि तुम टिफ़िन बम ब्लास्ट के बारे में क्या जानते हो. मैंने कहा कुछ नहीं, तो बोले अक्षरधाम मंदिर हमले से तुम्हारा क्या ताल्लुक है? मैंने तो कभी अक्षरधाम मंदिर देखा भी नहीं था, तो मैंने कहा कुछ नहीं,"

अगस्त 8 को गिरफ़्तार हुए अजमेरी का दावा है कि अहमदाबाद पुलिस ने उन्हें क़रीबन 22 दिन बाद कोर्ट में पेश किया.

उन्होंने कोर्ट में दिए अपने बयान में दावा किया, "जब मैंने कहा कि मेरा किसी केस से कोई ताल्लुक नहीं है तो वरिष्ठ अधिकारी ने कहा डंडा पार्टी को बुलाओ और फिर उन्होंने मुझे हैवानियत की हद तक पीटा. क़रीब 20 दिन तक रोज़ वह मुझे दिन-रात, जब तक मैं बेहोश न हो जाऊं, तब तक मारते थे."

वह कहते हैं जब उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था तब अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के कमरों 100 से 150 और लोग अलग-अलग कमरों में क़ैद थे.

अजमेरी के वकील ख़ालिद शेख कहते हैं, "सुनवाई के दौरान हमने अहमदाबाद क्राइम ब्रांच द्वारा अजमेरी की ग़ैरक़ानूनी हिरासत के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों की तस्वीरें पेश की थीं. हमने अदालत में गवाह भी पेश किए जिन्होंने कहा कि अजमेरी आठ अगस्त, 2003 से लापता था."

बदल गई दुनिया

अजमेरी कहते हैं, "एक आदमी पीछे पीठ पर बैठता था, दूसरा पाँव पकड़ता था और तीसरा एक बार में तलवे पर दो-तीन सौ डंडे मारता था."

शेख बताते हैं, "अजमेरी ने कोर्ट में दाखिल किए गए अपने बयान में बताया कि ग़ैरक़ानूनी हिरासत के दौरान उन्हें कितने अमानवीय ढंग से प्रताड़ित किया गया था."

आदम अजमेरी, अक्षरधाम हमला

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

अजमेरी के अनुसार, "कोर्ट ले जाने के दिन पहले मुझे धमकाया गया कि मैंने अगर कोर्ट में मुंह खोला या वकील करने की कोशिश की तो मेरे परिवार को मार देंगे. फिर मेरी बीवी और बच्चों को सीसीटीवी कैमरे में क्राइम ब्रांच में बैठे हुए दिखाया गया. मुझे कहा गया कि जहां कहा जाए हस्ताक्षर कर देना वरना कोर्ट से लौटते वक़्त रास्ते में कहीं भी गोली मार देंगे."

वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने सुप्रीम कोर्ट में अजमेरी का पक्ष रखा था. वह कहते हैं, "अजमेरी को रिहा करने वाली दो सदस्यीय पीठ ने माना कि उनका अपराध की स्वीकारोक्ति वाला बयान स्वेच्छा से नहीं दिया गया था और पुलिस ने बदमाशी की है."

दस बाई दस के एक कमरे में अपनी बीवी और पांच बच्चों के साथ रह रहे आदमभाई अब खुश हैं, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य को लेकर परेशान हैं.

कहते हैं, "11 साल जेल में आतंकवादी बनकर जिस कोठरी में रहा, वह इस घर से बड़ी थी लेकिन वहां मैं एक ज़िंदा लाश था और सिर्फ़ इस उम्मीद पर ज़िंदा था कि जिस देश का मैं नागरिक हूं, उसका क़ानून पूरी तरह अंधा नहीं है और मुझे इन्साफ मिलेगा."

अजमेरी बताते हैं, "इस केस ने मेरे और मेरी बीवी से ज़्यादा मेरे बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया. पुलिस के मुझे पकड़कर ले जाने के बाद मेरी बीवी के तो पांव तले ज़मीन ख़िसक गई. छह बच्चे (एक बेटी की अब शादी हो चुकी है), एक कमाने वाला और वह भी जेल में. मेरी बीवी और बच्चों ने ये 11 साल रो-रो कर निकाले हैं."

"बच्चों का स्कूल छूट गया. अखबारों में बड़े-बड़े फ़ोटो छपे थे मेरे, जिसके बाद बच्चों ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया, क्योंकि वे लोगों से नज़रें नहीं मिला पाते थे और आख़िर कितनों को कहते कि अब्बू बेकसूर हैं."

उन्होंने कहा, "मैं इनसे कहता था कि मैं नहीं पढ़ पाया क्योंकि हमारे अब्बू के पास पैसे नहीं थे और यह अब अपने बच्चों से कहेंगे कि हम नहीं पढ़ पाए, क्योंकि इनके अब्बू आंतकवाद के झूठे केस में जेल में थे. अब में खुले आसमान के नीचे हूं लेकिन जेल की ज़िन्दगी और 11 साल पहले पड़ी मार नहीं भूल पाता,"

"मुझे हर पल लगता है कि मेरी आँखों के सामने अब भी सलाखें और जाली हैं. और इधर बाहर दुनिया इतनी बदल गई है कि मानो मैं 11 साल नहीं, 1100 साल बाद बाहर आया हूं."

बददुआ

आदम अजमेरी, अक्षरधाम हमला

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

अजमेरी अपने से मिलने आए लोगों को अब भी अपना पूरा नाम बताने से पहले अपना कैदी नंबर बोल जाते हैं. कहते हैं, "मैं ही जानता हूं कि जेल के अंदर ज़िंदगी कैसे बसर हुई. क्या था मेरा कसूर? मैं भी इस मुल्क का एक नागरिक हूँ, जितना हर हिंदुस्तानी को होता है, उतना ही गर्व है मुझे इस पर."

यह पूछे जाने पर कि उन्हें क्या लगता है कि उन पर ही मामला क्यों दर्ज किया गया?

अजमेरी कहते हैं कि उन्होंने 1998 में बीजेपी पर चुनाव के दौरान धांधली का आरोप लगाया था और कोर्ट में याचिका भी दायर की थी शायद इसका संबंध उसी से है.

वह कहते हैं, "कांग्रेस जीते या बीजेपी इससे मुझे कोई मतलब नहीं था, लेकिन जब मैंने अपने इलाक़े में बैलेट पेपर की धांधली होते देखी तो रिटर्निंग अफ़सर को शिकायत की और कोर्ट में एप्लीकेशन भी लगाई, लेकिन उस मामले में कुछ हुआ नहीं. मुझे लगता है तबसे मैं पुलिस के नज़र में था. बहरहाल कुछ भी हो मेरी ज़िन्दगी तबाह करने वालों को मेरे बच्चों और बीवी की आह ज़रूर लगेगी."

अजमेरी और अन्य कई आरोपियों को पोटा में अंदर करने वाले और फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में सज़ा काट रहे वंजारा भी उसी जेल में थे, जहां अजमेरी को रखा गया था.

वह कहते हैं आज भी जब उनका या घर के किसी भी सदस्य का दुआ के लिए हाथ उठता है तो वे वंजारा के जेल में रहने की दुआ करते हैं.

अपने आंसू पोंछते हुए अजमेरी कहते हैं, "बददुआ तो वंज़ारा को लगी है और हम दुआ कर रहे हैं कि वह कभी बाहर न आएं. मेरी बूढ़ी माँ मेरे इंतज़ार में अल्लाह को प्यारी हो गई. खून के आंसू रोए हैं हम सब."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

#आतंकवाद की हक़ीक़त || अक्षरधाम: 'मेरा नाम सुरेश, रमेश या ... होता तो ये नहीं होता' || निर्दोषों की हत्या बिल्कुल माफी के काबिल नहीं और दहशतगर्दी लेकिन सबसे बड़ा सवाल आतंकी घटनाओं के जांच के नाम पर मासूमों की जिंदगियों को बर्बाद करने को दुनिया किस नाम से पुकारेगी ?

 

अक्षरधाम: 'मेरा नाम सुरेश, रमेश या ... होता तो ये नहीं होता'

  • अंकुर जैन
  • अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अपने परिवार के साथ सलीम

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

मुमताज़ बानो अब कभी नहीं मुस्कराती हैं. घरवालों ने उनको पिछले 11 सालों में कभी हँसते हुए नहीं देखा और उन्हें मुमताज़ का एक ही भाव समझ आता है. वो रो रही हैं ये बात घरवालों को उनके आंसू से ही पता लगती है क्योंकि उन्हें लकवा मार गया है.

अहमदाबाद के दरियापुर इलाक़े में कभी वह अपने बड़े बेटे सलीम शेख की प्रशंसा करते नहीं थकती थीं. आख़िर उसने सऊदी अरब जाकर दर्ज़ी का काम करके पैसा कमाया और अपनी दो बहनों की शादी करवाई, अहमदाबाद में मकान ख़रीदा, अपने बच्चे ज़ैद को इंग्लिश स्कूल में डाला और फिर वह हर महीने घर पैसा भी भेजते थे.

लेकिन उस दिन, क़रीब 11 साल पहले, मुमताज़ ने बेटे के लिए खीर बनाई थी. सलीम छुटियां ख़त्म कर सऊदी अरब वापस जाने की तैयारियां कर रहे थे. तभी घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई और सलीम को कोई बुलाने आया.

लेकिन सलीम जब गए तो वापस लगभग 11 सालों बाद लौटे. वो 17 मई को घर वापस लौटे हैं.

इतने दिनों में बहुत कुछ बदल चुका है. अब घर फिर से किराये का है, ज़ैद अब उर्दू स्कूल में जाता है. मुमताज़ नहीं जानती कि यह सब उनके साथ क्यों हुआ, लेकिन सलीम कहते हैं कि शायद इस देश में मुसलमान होकर जन्म लेना कभी-कभी गुनाह हो जाता है.

प्रताड़ना

वो कहते हैं, "मेरा नाम अगर सुरेश, रमेश या महेश होता तो मेरे साथ यह कभी होता?" सलीम को अक्षरधाम मंदिर हमले मामले में गुजरात पुलिस ने पकड़ा था और उन्हें लश्कर-ए-तैयबा और जैशे मोहम्मद का सदस्य बताया गया था.

सलीम की मां मुमताज़ बानो

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

24 सितंबर, 2002 को दो हमलावरों ने अक्षरधाम मंदिर के भीतर एके-56 राइफ़ल से गोलियां बरसाकर 30 से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी और क़रीब 80 को घायल कर दिया था. इस मामले में आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें से छह को आरोप मुक्त कर दिया गया है जबकि दो पर अभी मुकदमा चल रहा है.

सलीम शेख सऊदी अरब के रियाद शहर में एक शोरूम में दर्ज़ी का काम किया करते थे. उन्होंने कहा, "पुलिस ने मुझे 29 दिन अवैध तरीक़े से हिरासत में रखा और इस दौरान इतना पीटा कि आज भी मेरे पाँव कांपते हैं. जैसे कोई धूप में चलकर आया हो उस तरह की जलन होती है. अहमदाबाद क्राइम ब्रांच में 400-500 डंडे एक साथ मेरे पाँव के तलवे पर मरते थे. उस वक़्त मेरी पाँव की इन उंगली फ्रैक्चर भी हो गयी."

सलीम को इस मामले में पोटा कोर्ट ने आजीवन कारवास की सज़ा सुनाई थी जिससे गुजरात उच्च न्यायालय ने बरक़रार रखा.

उन्होंने कहा, "मेरे कूल्हे पर आज भी 11 साल पुरानी मार के निशान मौजूद है. वह मंज़र याद आता है तो दिल दहल जाता है कि वापसी में भी हमारे साथ ऐसा न हो."

'कौन से केस में जेल जाएगा'

सलीम ने कहा, "मुझे क्राइम ब्रांच ले जाने के बाद पुलिस ने मेरे बारे से पूछा कि मैं सऊदी अरब में क्या करता हूँ और मेरे दोस्त कौन है? मुझे कहा गया की यह जाँच मेरे पासपोर्ट की कोई ख़राबी की वजह से है. पर फिर मुझे मारना शुरू किया. मुझे कोई इल्म ही नहीं था कि वे मुझे क्यों मार रहे हैं."

वो आगे बताते हैं, "फिर एक सीनियर अफ़सर ने मुझे बुलाया और पूछा सलीम कौन से केस में जेल जाएगा, हरेन पंड्या, अक्षरधाम या 2002 दंगे. मुझे तो इन तीन के बारे में कुछ ज़्यादा पता भी नहीं था. मैं 1990 से सऊदी में था और जब घर आता तब बस इनके बारे कभी बात होती. मेरे पास मार खाने की बिलकुल ताक़त नहीं बची थी और मैं जैसा वह कहते वैसा करता था."

उन्होंने कहा, "मैंने तो बाक़ी अभियुक्तों को भी पहली बार जेल में देखा."

सलीम पर आरोप लगा था कि वह सऊदी में भारतीय मुसलमानों को इकट्ठा करके उन्हें 2002 गोधरा दंगे और अन्य भारत विरोधी वीडियो दिखाते थे और फिर उनसे पैसा लेकर भारत में आंतकवादी गतिविधियों के तहत अक्षरधाम हमले को फाइनेंस करते थे.

'पुलिस की मनगढंत स्टोरी'

वो कहते हैं, "मैं पुलिस की मनगढंत स्टोरी में फिट बैठ रहा था. सऊदी में रहने वाला था और अहमदाबाद पैसे भेजा करता था. मैंने 2002 दंगों के बाद एक रिलीफ कैंप में अनाज और पानी की मदद करने के लिए 13,000 रूपए ज़कात के तौर पर दिए थे. बस उसी से शायद में पुलिस की नज़र में आया. वर्ना मैंने जो कभी सिग्नल तोड़ने का भी गुनाह नहीं किया तो फिर इतने सारे लोगों को मारने का आरोप. पिछले 11 साल इस कलंक के साथ मैंने हर पल दिल पर पत्थर रखकर बिताए."

अपने परिवार की तकलीफ़ों के बारे में सलीम कहते हैं, "हमारा मकान बिक गया, छोटे भाई को परिवार चलाने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी, मेरे बच्चे अंग्रेजी स्कूल से उर्दू स्कूल में आ गए. अब गुजरात में उर्दू का कोई उपयोग नहीं. मेरी बेटी जो उस वक़्त चार महीने की थी आज छठी कक्षा में है और मुझसे अभी थोड़ा डरती है और अब अम्मी बिस्तर पर है."

सलीम हनीफ

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

वो बताते हैं, "यह सब इसलिए कि मैं मुसलमान हूँ. कुछ लोग हमारी कौम में ख़राब होंगे और कुछ लोग किसी और कौम में. मैं तो ख़ुद टेररिज़्म के ख़िलाफ़ हूँ और इस देश पर उतना ही गर्व करता हूँ जितना कोई और. मैं मानता हूँ कि भारत देश का ही क़ानून ऐसा है कि देर से सही आपको इंसाफ़ ज़रूर मिलता है. हाँ पर मैंने इसकी बड़ी क़ीमत चुकाई है."

सलीम के छोटे भाई इरफ़ान कहते हैं, "भाई को हिरासत में लेने के कुछ ही महीनों के बाद माँ को हार्ट अटैक आया और उन्हें लकवा मार गया. फिर वह जब भी भाई की तस्वीर देखती या अख़बार में उसके नाम के साथ आंतकवादी शब्द देखती तो पूरे दिन रोती रहती. उसने कई दिनों तक तो खाना छोड़ दिया था और रोजे रखती थीं."

इरफ़ान उस वक़्त 18 साल के थे.

'कोई है जो हमें आगे नहीं आने दे रहा'

जेल से निकलने के बाद सलीम इन दिनों अपने लिए एक दुकान ढूंढ रहे हैं. उन्होंने कहा, "मेरे पास वक़्त बहुत कम है कि मैं अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी भी समेट सकूं. अहमदाबाद में अब एक छोटी सी दुकान किराये पर लेकर वापस सिलाई का काम शुरू करूँगा. दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है. मैं और मेरे बच्चे बहुत पीछे रह गए."

सलीम अब अहमदाबाद के जूहापुरा इलाक़े में रहते हैं.

वो कहते हैं, "भारत को अब बदलना चाहिए. मैंने एक मुसलमान परिवार में जन्म अपनी पसंद से नहीं लिया था. तो फिर भेदभाव क्यों. अब हमें भी मुख्यधारा में शामिल करना चाहिए. भारत आगे बढ़े उसकी ख़ुशी हमें भी उतनी ही होती है. पर कोई है जो हमें नज़र नहीं आ रहा और वह हमें पीछे रखना चाहता है."

सलीम अपने पिता के साथ

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

सलीम कहते हैं, "जैसे मेरे पिछले साल गए, ऐसे और किसी के न जाए. हमें जेल में शाम को छह बजे कोठरी में बंद कर दिया जाता था इसलिए मैंने आकाश में तारे पिछले 11 साल से नहीं देखे थे. अब खुले आकाश के नीचे दिल की धड़कन फिर सुनाई दे रही है और मैं आंतकवादी नहीं हूँ इस बात का सुकून है वरना इतनी मार और जेल की कोठरी के भीतर खुद पर से यकीन उठ गया था."

सलीम के वकील खालिद शेख कहते हैं, "सलीम को 29 दिन तक ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखा था और उनके शरीर पर आज भी मार के निशान मौजूद हैं. उसे मारकर और धमकाकर उसका कबूलनामा लिया गया था और यह बात सुप्रीम कोर्ट ने मानी."

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

#आतंकवाद की हकीकत ।। #अक्षरधामः 'वह देखकर मुझ पर क़यामत टूट पड़ी

 

अक्षरधामः 'वह देखकर मुझ पर क़यामत टूट पड़ी । 

  • अंकुर जैन
  • अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अब्दुल मियां

इमेज स्रोत,ANKUR JAIN

अहमदाबाद का दरियापुर इलाक़ा. साबरमती नदी और अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के बीच में बसा यह इलाक़ा पुराने शहर में है. मौलाना अब्दुल मियां कादरी अक्षरधाम मामले में पकड़े अन्य अभियुक्त आदम अजमेरी, सलीम शेख और अब्दुल कयूम की तरह दरियापुर के निवासी हैं.

गुजरात में 2002 दंगों के बाद हुआ अक्षरधाम मंदिर हमला हो या टिफ़िन बम धमाका या हरेन पंड्या का कत्ल, इन सभी मामलों में पकड़े गए लोगों में सबसे ज़्यादा, इसी इलाक़े से हैं.

अब्दुल मियां को अदालत ने 10 साल की सज़ा सुनाई थी. सात साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें 2010 में ज़मानत दी और 16 मई, 2014 को उन्हें अन्य लोगों के साथ सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.

'मानो ज़मीन फट गई'

मौलाना अब्दुल मियां कहते हैं, "मुझे भी अन्य लोगों की तरह कोर्ट में पेश करने के 13 दिन पहले 17 अगस्त 2003 को पुलिस ने बुलाया. एक कमरे में बिठाए रखा और फिर कुछ देर बाद एक बड़े अधिकारी मुझसे इधर-उधर की बात करने लगे. मुझे लगा कि वह शायद मुझसे कोई जानकारी चाहते हैं. फिर उन्होंने मुझसे पूछा अक्षरधाम हमले के बारे में क्या जानते हो? उस समय ऐसा लगा मानो मेरे पाँव के नीचे ज़मीन फट गई."

अब्दुल मियां दरियापुर इलाक़े की एक मस्ज़िद में मौलाना हैं. जब पुलिस उन्हें पकड़ कर ले गई, तब उनकी उम्र 41 साल थी.

वह बताते हैं, "फिर उन्होंने मुझे कई मनगढ़ंत कहानियां सुनाईं और उन्हें मनवाने के लिए मुझे कई दिनों तक थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया. दिन भर मारने के बाद रात को मेरे हाथ पीछे कर हथकड़ी बांध देते. मुझे 40 सालों में इतना दर्द नहीं मिला, जितना कुछ दिनों में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच में मिला."

वह कहते हैं, "मार खा-खा के हमारा हाल बेहाल था. फिर 29 अगस्त 2003 जुमे का दिन आया. उस दिन हमारे मुँह पर काले कपड़े बांधकर कई लोगों के बीच खड़ा कर दिया. थोड़ी देर में पता लगा हम सब पत्रकारों के बीच में हैं और सभी हमारे फोटो ले रहे थे, वह मंज़र देख कर तो मुझ पर क़यामत ही टूट पड़ी. घर वालों पर इसके बाद क्या बीतेगी इस ख़्याल से मेरे रोंगटे खड़े हो गए."

'अक्षरधाम मंदिर आज तक नहीं देखा'

अब्दुल मियां पर अहमदाबाद पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षरधाम हमले में मारे गए दो फिदायीन के पास से जो चिट्टी मिली थी वह उन्होंने उन तक पहुंचाई थी.

वह कहते हैं, "उनकी कहानी में मेरा किरदार कहीं भी फिट नहीं हो रहा था तब उन्होंने यह आरोप लगाया कि इस हमले की साज़िश के लिए जो बैठकें हुई थीं, उनमें मैं हाज़िर था और कय्यूम भाई की लिखी चिट्टी मैंने उन फ़िदायीन तक पहुंचाई थी."

वह आगे कहते हैं, "लेकिन बिना किसी सबूत के एक झूठे केस की बिना पर मुझे 10 साल की सज़ा सुना दी गई. इस मामले में जो बाकी लोग पकड़े गए थे उनमें से कय्यूम भाई के अलावा तो मैं किसी को जानता भी नहीं था. पर मुझे यकीन था कि ऊपरी कोर्ट से बरी हो जाऊंगा. लेकिन जब हाईकोर्ट में भी सज़ा बरक़रार रही तब मुझे बहुत बड़ा धक्का लगा."

अक्षरधाम मामले में बरी होने वाले लोग

इमेज स्रोत,PTI

अब्दुल मियां कहते हैं, "हमको सुप्रीम कोर्ट से आशा की किरण दिखी. आज हम बेक़सूर करार हो चुके हैं लेकिन हमारा गुज़रा वक्त कौन लौटा सकता है. मैंने आज तक अक्षरधाम मंदिर नहीं देखा. अपने ऊपर बैठे लोगों को ख़ुश करने या उनके आदेश से पुलिस वालों ने हमारी और हमारे घर वालों की ज़िंदगी की ख़ुशियां लूट लीं."

उनके वकील खालिद शेख कहते हैं, "अब्दुल मियां की भूमिका पुलिस कहानी में कहीं ठीक तरह से नहीं बैठ पाई. इस वजह से उन पर वह आरोप नहीं लगे जो अन्य पर लगाए गए थे. लेकिन उन्हें भी उसी प्रताड़ना और दर्द से गुज़रना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी उम्र और आरोप को देखकर उन्हें ज़मानत दे दी थी."

'हुकूमत पर भरोसा नहीं'

पिछले 14 सालों में अहमदाबाद में कई ऐसे हादसे हुए हैं जो यहां के लोगों के ज़ेहन से आज तक नहीं निकल पाए. फिर चाहे वो साल 2001 का भूकंप हो या साल 2002 में गोधरा ट्रेन में जलकर मरने वाले लोग, 2002 के दंगे, हरेन पंड्या का कत्ल, 'फ़र्ज़ी' एनकाउंटर और कई बम धमाके.

अब्दुल मियां कहते हैं, "इतने ग़लत केस करके लोगो को अंदर कर देने से दहशतगर्दी बढ़ती है. हिंदू हो या मुसलमान अगर कोई भी ग़लत फंसा हो तो कार्रवाई करके उसे तुरंत बाहर निकालना चाहिए. मैं जेल में देख कर आया हूँ. कई मासूम आज भी जेल में क़ैद हैं. हम गुमराह नहीं हुए पर अन्याय होने पर कोई नादानी भी कर सकता है."

वह बताते हैं, "हम वतन के वफ़ादार आज भी हैं और हमेशा रहेंगे. हमें भारत के क़ानून पर यक़ीन था. हाई कोर्ट से इंसाफ़ नहीं मिला पर सुप्रीम कोर्ट से मिलेगा यह यक़ीन था. हाँ, लेकिन मेरा हुकूमत से भरोसा उठ गया है क्योंकि यहाँ 100 में से 90 फ़ीसदी मामलों में बेगुनाहों को अंदर कर दिया है."

हालांकि अब्दुल मियां ने, बाकियों की तरह, उनकी हिरासत के वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी, के बारे में कुछ भी कहने से मना कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट से बरी यह छह लोग उन्हें ग़लत तरीके से फंसाने के लिए गुजरात सरकार से मुआवजा मांगने की बात कर रहे हैं. यह लोग अब उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं, जिन्होंने उन पर मामला दर्ज किया था.

गुजरात के डीजीपी पीसी ठाकुर कहते है, "मैंने अभी तक अक्षरधाम मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर देखा नहीं है. अगर उसमें इस केस से जुड़े पुलिस अधिकारियों पर उंगली उठाई गई है, तो इसकी जाँच की जाएगी."

https://www.bbc.com/hindi/india/2014/06/140531_akshardham_case_4moulvi_abdulmiyan_sayed_vs

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)