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नागरिकता संशोधन विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती



सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इंडियन मुस्लिम लीग ने नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. गुरुवार को उसकी ओर से एक याचिका दायर की गई है.
सोमवार को लोकसभा ने और बुधवार को राज्यसभा ने इस बिल को बहुमत से मंज़ूर किया है, यह बिल 1955 के नागरिकता क़ानून में बदलाव के लिए लाया गया है.
इस बदलाव के बाद भारत के तीन पड़ोसी देशों- पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध और सिखों को भारत की नागरिकता दिए जाने का रास्ता खुल गया है.
मुस्लिम लीग के सांसदों पीके कुन्हालिकुट्टी, ईटी मोहम्मद बशीर, अब्दुल वहाब और केएन कनी ने सामूहिक तौर पर यह याचिका दायर की है.


नागरिकता संशोधन विधेयकइमेज कॉपीरइटPTI

मुसलमानों के साथ भेदभाव

याचिका दायर करने वालों का कहना है कि वे किसी को शरण दिए जाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन इस सूची से मुसलमानों को अलग रखना उनके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव है जिसकी अनुमति भारत का संविधान नहीं देता.
याचिका दायर करने वाले के वकीलों का कहना है कि यह संशोधन संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है, संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है कि भारत एक सेकुलर देश है नागरिकता को धर्म से जोड़ा जा रहा है जो सही नहीं है.


अमित शाहइमेज कॉपीरइटPTI

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और सरकार से जुड़े लोगों ने बार-बार दावा किया है कि इसका भारत के अल्पसंख्यकों से कोई संबंध नहीं है, इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, यह संशोधन तीन देशों में बसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए है और मुसलमान इन तीन देशों में अल्पसंख्यक नहीं हैं.
याचिका में श्रीलंका के तमिल हिंदुओं और बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों को शामिल न किए जाने पर एतराज़ किया गया है और इसे भेदभाव बताया गया है.
याचिका दायर करने वालों की मांग है कि इस संशोधन विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया जाए.

मुस्लिम लीग ने बिल का विरोध किया

लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद अब इस बिल को क़ानून का रूप देने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाना है.

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