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लालू यादव की बेटी रख रही रोज़ा

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बड़े से बड़े शिक्षित और स्कॉलर इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मन तो सरेंडर कर जा रहे इस्लाम की असलियत जानने के बाद ।।

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Namaz E Ghousia Ka Quran aur Hadees ki bazaye Barailvi Connection? Aise Na Jane kitne Fitna Faila rakhe hain

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Magar Momino pe Kushada hain rahen || Parashtish karen Shauq se Jis ki chahein

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  करे गैर गर बूत की पूजा तो काफिर  जो ठहराए बेटा खुदा का तो काफिर  गिरे आग पर बहर सिजदा तो काफिर  कवाकिब में मानें करिश्मा तो काफिर  मगर मोमिनो पर कुशादा हैं राहें  परस्तिश करें शौक से जिस की चाहें  नबी को जो चाहें खुदा कर दिखाएं  इमामों का रुतबा नबी से बढ़ाएं  मज़ारों पे दिन रात नजरें चढ़ाएं  शहीदों से जा जा के मांगें दुआएं  न तौहीद में कुछ खलल इससे आये  न इस्लाम बिगड़े न ईमान जाए । ( मुसद्दस हाली ) __________________________________________________ Padhne k baad kya Samjhe ? Agar Gair Boot ki Puja , Murti Puja , Yani ek khuda k Awala ki kisi Dusre ki puja kare to Kafir  Eesha Alaihissalam ko manne wale Agar Ek Allah ki Parastish karne k sath Eesha Alaihissalam ko Khuda maan Liya to  Fir bhi Kaafir  Aag ki sijdah Jisne Kiya wah bhi kaafir ho gaya  Falkiyaat Aur chaand aur sitaron k Wajud ko Allah ka banaya hua n maan kar Sirf Karishma maan liya to bhi Kaafir ... Lekin Musalmano ki Rahen Aasan aur Wasi  kaise ho gai  Agar ussme Ye sab chijen hain aur wah karta ho Ebadat k naam par  Nabi ko

हागिया सोफिया में नमाज़ पढ़ने के लिए उमड़ी लोगों की भीड़

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इस पोस्ट को शेयर करें Facebook   इस पोस्ट को शेयर करें WhatsApp   इस पोस्ट को शेयर करें Messenger   इस पोस्ट को शेयर करें Twitter   साझा कीजिए इमेज कॉपीरइट BULENT KILIC/AFP VIA GETTY IMAGES तुर्की के इस्तांबुल में ऐतिहासिक हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलने के बाद वहाँ पहली बार शुक्रवार को नमाज़ अदा की गई. यहां हज़ारों की संख्या में लोग नमाज़ अदा करने आए. बीबीसी तुर्की सेवा की संवाददाता नेरान एल्डेन बताती हैं कि तुर्की के कई शहरों से लोग यहां नमाज़ पढ़ने आए थे और अज़ान का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. हागिया सोफिया के आसपास घास में मैदानों पर लोगों ने नमाज़ अदा की. इस दौरान हागिया सोफिया के आसपास के इलाक़े में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी. हालांकि कुछ लोग एक जगह पर पुलिस नाके को तोड़ते हुए हागिया सोफिया परिसर में घुस आए और वहां उन्होंने तुर्की का झंडा फहराया. तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन का इस्लामिक राष्ट्रवाद कैसे फैलाया जा रहा है? हागिया सोफ़िया को तुर्की में मस्जिद बनाने पर बोले पोप फ़्रांसिस इमेज कॉपीरइट EPA/TOLGA BOZOGLU इस्तांबुल के गवर्नर अली येर

اردو رسم الخط کی اہمیت اور افادیت

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اسلام و علیکم اردو رسم الخط کی اہمیت اور افادیت آج ہمارے بچے سوشل میڈیا اور موبائیل پر میسج انگلش رسم الخط میں لکھتے۔ ضرورت  اس بات کی ہے کے ہم اپنی آنے والی نسل کو اردو رسم الخط سےروشناس کرائیں کیوں کے دنیا کی کوئی بھی قوم اپنی زبان اور رسم الخط چھوڑ کرکبھی ترقی نہیں کر سکتی جس قوم کی بلندی کو زوال پر لانا ہو اور اس کے تابندہ ماضی سے اس قوم کا رشتہ توڑنا ہو تو اس قوم کا رسم الخط بدل دو،  ہمارا تعلق عربیت کے ساتھ ہے  اس لیے کہ حضرت محمد صلی اللہ علیہ وسلم کی زبان عربی ہے، قرآن و حدیث عربی میں ہے اور اہل جنت کی زبان عربی ہے! تو ہم مسلمان کے سیکھنے کی اصل زبان عربی ہے، پھر اس کے بعد دنیا کی تقریبًا دس کے قریب زبانیں ایسی تھیں جو عربی کے قریب تر تھیں لیکن غیروں نے ان اقوام کا رسم الخط بدل ڈالا، نتیجہ یہ ہے کہ وہ مسلمان قومیں آج قرآن کریم کے سیکھنے سے بھی قاصر ہوگئیں اسی طرح اردو زبان بانسبت اور زبانوں کے عربی کے قریب تر ہے، اور پھراب چوں کہ موجودہ دور میں اللہ تعالیٰ کے فضل سے قرآن و حدیث کے علوم کا بڑا ذخیرہ اردو میں منتقل ہوچکا، اس لیے دینی اسلامی اردو لٹریچ

मोहर्रम के महीने में ग़म और मातम का इतिहास

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10 सितंबर 2019 इस पोस्ट को शेयर करें Facebook   इस पोस्ट को शेयर करें WhatsApp   इस पोस्ट को शेयर करें Messenger   साझा कीजिए इमेज कॉपीरइट GETTY IMAGES Image caption तुर्की में एक शिया लड़की अशुरा का मातम मनाती हुई. इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार साल का पहला महीना मोहर्रम होता है. इसे 'ग़म का महीना' भी माना जाता है. 12वीं शताब्दी में ग़ुलाम वंश के पहले शासक क़ुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही दिल्ली में इस मौक़े पर ताज़िये (मोहर्रम का जुलूस) निकाले जाते रहे हैं. उनके बाद जिस भी सुल्तान ने भारत में राज किया, उन्होंने 'ताज़िये की परंपरा' को चलने दिया. हालांकि वो मुख्य रूप से सुन्नी थे, शिया नहीं थे. पैग़ंबर-ए-इस्‍लाम हज़रत मोहम्‍मद के नाती हज़रत इमाम हुसैन को इसी मोहर्रम के महीने में कर्बला की जंग (680 ईसवी) में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था. कर्बला की जंग हज़रत इमाम हुसैन और बादशाह यज़ीद की सेना के बीच हुई थी. null आपको ये भी रोचक लगेगा कश्मीर में हिंदू राज और ग़ज़नी की अपमानजनक हार की कहानी कश्मीर का सुल्तान जिसे बिहार मे