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एक बेगुनाह महिला को 87 दिन जेल में बिताने पड़े ...

 

#आतंकवाद का सच ।। देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा' ।। मासूमों की हत्या दहशतगर्दी , ऐसे लोगों को सबक सिखाने की ज़रूरत ।। लेकिन सबसे बड़ा सवाल गुनाहगारों को सजा देने के नाम पर मासूमों की जिन्दगियों को बर्बाद कर देना ये कौन पुण्य ? देखें क्या हुआ था देश के चर्चित आतंकी घटना के जांच के बाद ? इतिहास के पन्नो दबा कला सच

  देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा' अंकुर जैन अहमदाबाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए 28 मई 2014 इमेज स्रोत, ANKUR JAIN शबाना आदम अजमेरी अहमदाबाद के दरियापुर इलाक़े की एक म्युनिसिपल स्कूल में छठी क्लास की छात्रा हैं. जहां देश और उसकी क्लास के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी या सीए बनने के सपने देखते हैं, वहीं शबाना वकील बनना चाहती है. यह पूछने पर क्यों.... वह चुप हो जाती है. कुछ पल बाद अपने पिता की ओर देखती हैं और फिर रोने लगती हैं. उसकी मां नसीम बानो कहती हैं, "इसका बचपन क़ानून, पुलिस और वकीलों के क़िस्से सुनकर बीता है. बस तभी से यह कहती है कि यह वकील बनेगी और हम सबको बचाएगी." शबाना के पिता आदम सुलेमान अजमेरी 11 साल जेल में रहने के बाद 17 मई, 2014 को बाहर आए हैं. उन पर अक्षरधाम मंदिर हमले में शामिल चरमपंथियों का साथ देने का आरोप था और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन एक दशक तक जेल में रहने के बाद  सुप्रीम कोर्ट  ने उन पर लगे सभी आरोप ख़ारिज कर दिए और उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर दिया. 24 सितंबर, 2002 को दो हमलावरों ने अक्षरधाम मंदिर के भीतर एके-56 राइफल से गोलिया...

#आतंकवाद की हक़ीक़त || अक्षरधाम: 'मेरा नाम सुरेश, रमेश या ... होता तो ये नहीं होता' || निर्दोषों की हत्या बिल्कुल माफी के काबिल नहीं और दहशतगर्दी लेकिन सबसे बड़ा सवाल आतंकी घटनाओं के जांच के नाम पर मासूमों की जिंदगियों को बर्बाद करने को दुनिया किस नाम से पुकारेगी ?

  अक्षरधाम: 'मेरा नाम सुरेश, रमेश या ... होता तो ये नहीं होता' अंकुर जैन अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए 29 मई 2014 इमेज स्रोत, ANKUR JAIN मुमताज़ बानो अब कभी नहीं मुस्कराती हैं. घरवालों ने उनको पिछले 11 सालों में कभी हँसते हुए नहीं देखा और उन्हें मुमताज़ का एक ही भाव समझ आता है. वो रो रही हैं ये बात घरवालों को उनके आंसू से ही पता लगती है क्योंकि उन्हें लकवा मार गया है. अहमदाबाद के दरियापुर इलाक़े में कभी वह अपने बड़े बेटे सलीम शेख की प्रशंसा करते नहीं थकती थीं. आख़िर उसने सऊदी अरब जाकर दर्ज़ी का काम करके पैसा कमाया और अपनी दो बहनों की शादी करवाई, अहमदाबाद में मकान ख़रीदा, अपने बच्चे ज़ैद को इंग्लिश स्कूल में डाला और फिर वह हर महीने घर पैसा भी भेजते थे. लेकिन उस दिन, क़रीब 11 साल पहले, मुमताज़ ने बेटे के लिए खीर बनाई थी. सलीम छुटियां ख़त्म कर सऊदी अरब वापस जाने की तैयारियां कर रहे थे. तभी घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई और सलीम को कोई बुलाने आया. ('देश के क़ानून के भरोसे रहा जेल में ज़िंदा') लेकिन सलीम जब गए तो वापस लगभग 11 सालों बाद लौटे. वो 17 मई को घर वापस लौटे है...

#आतंकवाद की हकीकत ।। #अक्षरधामः 'वह देखकर मुझ पर क़यामत टूट पड़ी

  अक्षरधामः 'वह देखकर मुझ पर क़यामत टूट पड़ी ।  अंकुर जैन अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए 1 जून 2014 इमेज स्रोत, ANKUR JAIN अहमदाबाद का दरियापुर इलाक़ा. साबरमती नदी और अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के बीच में बसा यह इलाक़ा पुराने शहर में है. मौलाना अब्दुल मियां कादरी अक्षरधाम मामले में पकड़े अन्य अभियुक्त आदम अजमेरी, सलीम शेख और अब्दुल कयूम की तरह दरियापुर के निवासी हैं. गुजरात में 2002 दंगों के बाद हुआ अक्षरधाम मंदिर हमला हो या टिफ़िन बम धमाका या हरेन पंड्या का कत्ल, इन सभी मामलों में पकड़े गए लोगों में सबसे ज़्यादा, इसी इलाक़े से हैं. अब्दुल मियां को अदालत ने 10 साल की सज़ा सुनाई थी. सात साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें 2010 में ज़मानत दी और 16 मई, 2014 को उन्हें अन्य लोगों के साथ सभी आरोपों से बरी कर दिया गया. 'मानो ज़मीन फट गई' मौलाना अब्दुल मियां कहते हैं, "मुझे भी अन्य लोगों की तरह कोर्ट में पेश करने के 13 दिन पहले 17 अगस्त 2003 को पुलिस ने बुलाया. एक कमरे में बिठाए रखा और फिर कुछ देर बाद एक बड़े अधिकारी मुझसे इधर-उधर की बात करने लगे. मुझे लगा कि व...