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दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट के दौरान प्रदर्शनकारियों को खाना बांटने वाले जुनेद के परिवार के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार की घटना के बाद मानवाधिकार संगठनों और वकीलों ने मोर्चा संभाल लिया है।

जान जोखिम में डालकर बचाने कूदे Muslim

इंसानियत अभी भी जिंदा है ....

Waah ! Muhabbat ki Dukan par Nafrat hua Fail ....

धर्मान्तरण का मुद्दा असल में क्या है ?

देखा न मुसलमानों का बर्ताव ? दरअसल इस्लाम यही सबक देता है अपने मानने वालों को ।। जो देखते हैं , सुनते हैं #TV चैनलों पर वह तो नफरत के सौदागरों की करतूत है

हिंदुत्व - मुल हिंदुत्व - मुल्क के लिए खतरा । # अंग्रेजों ने बंगाल में अपने मौकूफ को मजबूत बनाने के बाद और खसूसन नवाब सेराज़ुद दौला को 1756 में पलासी में शिकस्त देने के बाद जहाँ मीर जाफर ने गद्दारी की । और राजा मोहन राय ने नवाब के साथ खरे रहे । अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने महसूस किया की ......... अंग्रेज हिन्दुस्तान पर उस वक़्त तक हुकूमत कर सकते हैं जब तक मुसलमान और हिन्दूओं के दरमियान एखतेलाफ (नफरत, दुश्मनी ) रहेंगे । और जब ये दोनों मुत्तहिद हो जायेंगे तो इस बड़े मुल्क हिन्दुस्तान को छोड़ना पड़ेगा । इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान की तारीख को इस अंदाज़ में दुबारा लिखवाया और केकई झूठे घटनाओं का इजाफा किया के हिंदुस्तान के उन दोनों मजहबी गिरोहों के दरमियान बेगानगी और एक्तेलाफ और दुश्मनी के बीज बो दिए जाएँ । आज़ादी की पहली जंग 1857 में अंग्रेजों ने देख लिया के हिन्दुओं और मुसलमानों के दरमियाँ दरार पैदा करने का काम उनकी आरज़ू के मुताबिक़ नहीं हुआ । मेरठ के उन सिपाहियों की जुबानों पर जिन्होंने अंग्रेज आकाओं से बगावत की थी ,दिन - दिन का नारा था । अंग्रेजों के एक्तेदार के खेलाफ जो भी उठ खड़ा हुआ ,चाहे वह हिन्दू हो कि मुसलमान उसने यही एलान किया की मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र हमारा शहंशाह है । इसका एतराफ़ (स्वीकार ) वी.डी सावरकर ने अपनी किताब " The indian war of independence "में किया है के बहादुर शाह ज़फर ने हिन्दुओं और मुसलमानों के दिलों में और हमारे मुल्क से अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की आरज़ू पैदा की । # अब अंग्रेजों ने अपनी कोशिशों को दुगुना कर दिया । अब उनकी कोशिश रही के मुस्लिम हुक्मरानों को मंदिर तोड़ने वाला ,और हिन्दू औरतों की इज्ज़त लूटने वाला ज़ालिम और खूंखार और जब्र और जुल्म के जरिये हिन्दुओं का मजहब तब्दील करवाने वाला बनाकर पेश किया जाए । और बताया जाए की अंग्रेजों ने ऐसे बुरे हालात में हिन्दुनों की रक्षा की । अंग्रेज हिन्दुओं के मोहसीन ( यानी दोस्त ,हमदर्द ) हैं ।इसलिए हिन्दुओं का काम है हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की हुकूमत के केयाम और इस्तेहकाम ( अस्थापना और मजबूती ) में मदद करें । इस पश्मंजर में और अंग्रेजों के मकसद को बढाने के लिए बंकिम चंद्र चट्टो पाध्याये (1837- 1894 ) ने जिस को चटर्जी भी कहा जाता है । अपने अँगरेज़ आकाओं को खुश करने के लिए नॉवेल " आनंद मठ " लिखी ये कंपनी की हुकूमत में एक मुलाजिम था ।और deputy magistrate के ओहदे पर फाएज था । सितम जरिफी ये है की चंद्र ने बंगाल के मशहुर अवामी फायेदा पहुंचाने वाली शख्सियत मोहम्मद मोहसीन से रकमी वजीफा पाकर आला तालीम हासिल की और उसी ने मुस्लिम दुश्मन नॉवेल "आनंद मठ" लिखी । जिसने हिन्दू और मुसलमानों के दरमियान नफरत को बढ़ावा दिया और अंग्रेजों की हुकूमत को मजबूती प्रदान की । इस नॉवेल में बंगाल के मुस्लिम हुक्मरानों और म्य्सल्मानों के खेलाफ साधुओं के सरदार "सत्यानंद " को जब मालुम होता है और बताया जाता है कि मुसल्नानों की हुकूमत ख़त्म हो गयी और अंग्रेजों ने अपना राज़ कायेम कर लिया है तो अपनी तहरीक खत्म कर देता है ।