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पूरी वीडियो जरूर देखें , देखेंगे तो समझ में आयेगा ....

15/6/2026
मुझे धमकी दी..मर जाऊंगा लेकिन..' | 'Modi को 398 करोड़..' | कीर्ति आजाद ने 100% सच बता दिया
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14/06/2026

 

बीजेपी ने तमाम प्रलोभन देकर पार्टी में शामिल किया था. वह धोखेबाज़ पार्टी है. यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कोई विकल्प नहीं है. हम उनकी विकास योजनाओं में शरीक होना चाहते हैं. हमने टीएमसी को बदनाम किया है. हम टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन अब घर लौटना चाहते हैं."

 

पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक रूप से माफ़ी क्यों मांग रहे हैं बीजेपी के कुछ कार्यकर्ता?

  • प्रभाकर मणि तिवारी
  • बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से
सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकर पर माफ़ी मांग कर टीएमसी में वापसी की गुहार लगाते बीजेपी नेता

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सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकर पर माफ़ी मांग कर टीएमसी में वापसी की गुहार लगाते बीजेपी नेता

मुकुल राय की टीएमसी में वापसी के बाद ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ गई है जो बीजेपी से टीएमसी में वापस लौटना चाहते हैं. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बीजेपी के कुछ कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगते हुए टीएमसी में वापसी की गुहार लगा रहे हैं.

ऐसी स्थिति क्यों हैं, इस पर बीजेपी के राज्य यूनिट के लोगों का कहना है कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आतंक. लेकिन टीएमसी का जवाब है कि लोगों को अब अपनी ग़लती का अहसास हो गया है.

बीजेपी के बड़े नेताओं की वापसी या ऐसा करने के इच्छुक नेताओं की सूची लगातार लंबी होने के बीच ही राज्य के विभिन्न इलाकों में बीजेपी के ज़मीनी कार्यकर्ता भी टीएमसी में लौटने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए वो सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के अलावा टीएमसी के प्रति निष्ठा की शपथ ले रहे हैं.

अनुब्रत मंडल, बीरभूम टीएमसी अध्यक्ष

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अनुब्रत मंडल, बीरभूम टीएमसी अध्यक्ष

बीरभूम ज़िले के सैंथिया में लोग उस समय हैरत में पड़ गए जब बीजेपी कार्यकर्ताओं का समूह अलग-अलग बैटरी-चालित रिक्शे (टोटो) पर सवार होकर सड़कों पर अपनी ग़लतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगते नजर आए. वह ग़लती थी चुनाव से पहले टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होना.

अब चुनाव नतीजों के बाद उपजी परिस्थिति में उनको अपने इलाके में रहने के लिए माफ़ी मांग कर घर वापसी करना ही एकमात्र उपाय नज़र आ रहा है. हाल में इस इलाके में क़रीब तीन सौ कार्यकर्ता शपथ लेकर टीएमसी में दोबारा शामिल हो गए हैं.

दुकानदार बाप्पा कर

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दुकानदार बाप्पा कर

कारोबारियों को धमकी

इसी तरह हुगली ज़िले के धनियाखाली इलाके में एक दुकानदार बाप्पा कर की दुकान बीते दो मई से ही बंद थी. वह भी चुनाव के कुछ दिनों पहले टीएमसी से बीजेपी में गए थे. लेकिन दुकान आख़िर बंद क्यों थी?

बीजेपी नेताओं का आरोप है कि उन्हें धमकी दी गई थी कि बीजेपी के साथ रहने पर दुकान नहीं खोलने दी जाएगी.

आख़िर बाप्पा ने सार्वजनिक रूप से माफ़ीनामा पढ़ा और टीएमसी के प्रति निष्ठा बरतने की शपथ ली. उसके बाद उसे दुकान खोलने की अनुमति मिल गई है. ज़िला प्रशासन या पुलिस ने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

लेकिन राज्यपाल जगदीप धनखड़ और बीजेपी के स्थानीय नेता इसे टीएमसी के बढ़ते आतंक का सबूत बता रहे हैं.

बीरभूम ज़िले के ही बोलपुर में लाउडस्पीकर के जरिए माफ़ी मांग रह बीजेपी कार्यकर्ताओं का कहना था, "हमें बीजेपी ने तमाम प्रलोभन देकर पार्टी में शामिल किया था. वह धोखेबाज़ पार्टी है. यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कोई विकल्प नहीं है. हम उनकी विकास योजनाओं में शरीक होना चाहते हैं. हमने टीएमसी को बदनाम किया है. हम टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन अब घर लौटना चाहते हैं."

बीजेपी, टीएमसी

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उन लोगों का कहना था कि हम ग़लती से बीजेपी में शामिल हुए थे. अब इस ग़लती को सुधारना चाहते हैं. उन कार्यकर्ताओं में शामिल मुकुल मंडल कहते हैं, "हमने बीजेपी का चरित्र समझने में ग़लती की थी. ममता बनर्जी के विकास कार्यों के समर्थन के लिए हम टीएमसी में लौट रहे हैं."

घर वापसी के लिए आयोजित समारोह में टीएमसी नेता तुषार कांति मंडल ने पहले उन 67 परिवारों को शपथ दिलाई और उसके बाद शुद्धिकरण समारोह आयोजित किया गया. उस शपथ पत्र में लिखा था, "बीजेपी में जाकर हमने ग़लती की थी. अब से टीएमसी में ही रहेंगे."

इस मौके पर टीएमसी में लौटने वाले वनग्राम पंचायत के प्रसेनजित साहा का कहना था, "वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले लाभपुर इलाके के तत्कालीन टीएमसी विधायक मनीरुल इस्लाम समेत कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए थे. मैं भी उसी समय बीजेपी में चला गया था. लेकिन अब वहां रहना मुश्किल है."

बीजेपी कार्यकर्ता

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बीजेपी कार्यकर्ता

आरोप-प्रत्यारोप

बीजेपी के बीरभूम ज़िला अध्यक्ष ध्रुव साहा कहते हैं, "इन लोगों को बीजेपी में शामिल होने की सजा भुगतनी पड़ रही थी. उनको तमाम सरकारी सुविधाओं और योजनाओं से वंचित कर दिया गया था. उनलोगों ने स्वेच्छा से नहीं बल्कि मजबूरी और दबाव में ही टीएमसी में शामिल होने का फ़ैसला लिया है."

साहा कहते हैं कि इस घटना से साफ़ है कि लाभपुर में लोकतंत्र की कैसे हत्या की जा रही है. बीजेपी कार्यकर्ताओं को डरा-धमका कर टीएमसी में शामिल होने पर मजबूर किया जा रहा है. पुलिस और प्रशासन इन आरोपों पर कोई जवाब नहीं देती.

बीरभूम ज़िले के एक पुलिस अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "हमारे पास ज़ोर-जबरदस्ती की कोई शिकायत नहीं आई है. ऐसे में अगर कोई पार्टी बदलता है तो पुलिस क्या कर सकती है?"

पश्चिम बंगाल राजनीति

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उधर, लाभपुर के टीएमसी विधायक अभिजीत सिंह साहा के आरोपों को निराधार बताते हैं.

वे कहते हैं, "हमने किसी पर कोई दबाव नहीं डाला है. बीजेपी ही दबाव और प्रलोभन के सहारे लोगों को ग़लत रास्ते पर ले जाती है. बीजेपी कार्यकर्ता अपनी ग़लती पर पश्चाताप की वजह से माफ़ी मांग कर टीएमसी में लौटे हैं."

टीएमसी के बीरभूम ज़िला अध्यक्ष अणुब्रत मंडल कहते हैं, "हमें किसी को जबरन बुलाने की ज़रूरत ही नहीं है. बीजेपी और उसकी नीतियों से मोहभंग होने की वजह से लोग ख़ुद लौटना चाहते हैं."

BJP vs TMC

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हुगली का मामला

हुगली ज़िले में धनियाखाली के बेलमुड़ी ग्राम पंचायत के फीडर रोड पर दुकान चलाने वाले बाप्पा कर ने चुनाव से पहले भगवा पार्टी का दामन थामा था. लेकिन जिस दिन चुनाव का नतीजा निकला उसी दिन से उनकी मोबाइल की दुकान बंद थी.

आख़िर में बीते शुक्रवार को टीएमसी नेताओं-कार्यकर्ताओं की मौजदूगी में भरे बाजार में उन्होंने माफ़ीनामा पढ़ा और दोबारा टीएमसी में शामिल हो गए. उसके बाद उनकी दुकान खुल गई है.

क्या उन्होंने टीएमसी की धमकी की वजह से दुकान बंद रखी थी?

बाप्पा बताते हैं, "मैंने ख़ुद डर के मारे दुकान बंद कर दी थी. लेकिन रोजी-रोटी की दिक़्क़त होने लगी तो मैंने टीएमसी से इसे खोलने की अनुमति मांगी." वे इससे ज़्यादा बोलने को तैयार नहीं हैं.

टीएमसी के स्थानीय नेता और बेलमूड़ी के अंचल प्रमुख सुब्रत साहा कहते हैं, "हमने न तो जबरन किसी की दुकान बंद कराई है और न ही किसी को टीएमसी में लौटने पर मजबूर किया है. बाप्पा ने ख़ुद ही दुकान बंद रखी थी. वे पहले टीएमसी में ही थे. अपनी ग़लती मान कर लौटना चाहते थे. इसलिए हमने उनको पार्टी में शामिल कर लिया."

लेकिन धनियाखाली विधानसभा सीट पर बीजेपी उम्मीदवार रहे तुषार मजूमदार आरोप लगाते हैं, "ज़िले में हर जगह यही चल रहा है. कई दुकानें बंद करा दी गई हैं. टीएमसी करने वालों को ही व्यापार करने की अनुमति दी जा रही है. बाप्पा का मामला भी अपवाद नहीं है. इलाके में बीजेपी के सैकड़ों समर्थक अब भी घर छोड़ कर दूसरी जगहों पर रह रहे हैं."

बीजेपी की युवा मोर्चा के हुगली जिला अध्यक्ष सुरेश साव

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बीजेपी की युवा मोर्चा के हुगली जिला अध्यक्ष सुरेश साव

बीजेपी की युवा मोर्चा के हुगली जिला अध्यक्ष सुरेश साव भी यही आरोप लगाते हैं.

वह कहते हैं, "इलाके में टीएमसी वाला ही दुकान चला सकता है. टीएमसी ने कई लोगों के सामाजिक बायकाट की अपील की है. पुलिस का एक गुट भी इसे समर्थन दे रहा है."

वैसे हाईकोर्ट के निर्देश पर इलाक़े में 130 परिवार रविवार को ही लौटे हैं. यह लोग चुनाव नतीजों के बाद से ही टीएमसी के कथित आतंक और अत्याचार की वजह से घर छोड़ कर भाग गए थे.

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष का कहना है, "जो जिस पार्टी में चाहे जाने के लिए स्वतंत्र है. यह लोग कोई गाय-भैंस तो हैं नहीं जिनको बांध कर रखा जाए. किसी के रहने या जाने से ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता."

घोष का यह बयान हालांकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल राय समेत कई अन्य नेताओं के टीएमसी के शामिल होने के संदर्भ में है, लेकिन यह पार्टी के मौजूदा रवैए का भी संकेत है. पार्टी के सामने कुनबा बचाने की चुनौती है.

पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल की ओर से मुंह मोड़ लिया है. प्रदेश के नेता फ़िलहाल असंतोष की चौतरफ़ा आवाज़ों से निपटने में ही व्यस्त हैं.

दिलीप घोष

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दिलीप घोष

इस बीच, दिलीप घोष को यहां से हटा कर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने और यहां विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के लिए मैदान खुला छोड़ने की चर्चा भी जोर पकड़ रही है. हालांकि घोष ने इसकी पुष्टि करने से इनकार कर दिया है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ख़ासकर मुकुल राय जैसे बड़े नेताओं के टीएमसी में लौटने और कई अन्य नेताओं के नाम लौटने वालों की सूची में होने की वजह से ज़मीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल तेज़ी से गिर रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "बंगाल में जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर राजनीतिक हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है. गांव वालों को आख़िर रहना तो वहीं है. ऐसे में पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर लेने का दुस्साहस भला कौन करेगा?"

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पश्चिम बंगाल ! सत्ता हथियाने का हथियार बनी दुर्गा पूजा ? पढ़ें पूरी रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा के सहारे अपनी राजनीति चमका रही हैं पार्टियां

दुर्गापूजाइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा पर इस साल सियासी रंग कुछ ज़्यादा ही चटख नजर आ रहे हैं. बीते लोकसभा चुनावों में भारी कामयाबी हासिल करने वाली बीजेपी इस मामले में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के एकाधिकार को कड़ी चुनौती दे रही है.
इसके तहत पार्टी ने पूरे राज्य में 3,000 से ज्यादा स्टॉल लगाए हैं. पूजा के दौरान वहां से पार्टी की नीतियों और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस यानी एनआरसी की ख़ूबियों के अलावा तृणमूल कांग्रेस सरकार की कथित हिंसा और नाकामियों का प्रचार किया जा रहा है.
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के स्टॉलों पर एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रचार के अलावा राज्य सरकार की उपलब्धियों के पर्चे बांटे जा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि पूजा के बहाने सियासत में जुटे यह दोनों दल एक-दूसरे पर सियासत के आरोप लगा रहे हैं.
बंगाल में वाममोर्चा सरकार के 34 वर्षों के शासनकाल में दुर्गापूजा राजनीति से काफ़ी हद तक परे थी. पूजा में वामपंथी नेता सक्रिय हिस्सेदारी से दूर रहते थे. हां, आयोजन समितियों में सुभाष चक्रवर्ती जैसे कुछ नेता ज़रूर शामिल थे. लेकिन उनका मक़सद चंदा और विज्ञापन दिलाना ही था.
वर्ष 2011 में तृणमूल के भारी बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में आने के बाद इस त्योहार पर सियासत का रंग चढ़ने लगा. धीरे-धीरे महानगर समेत राज्य की तमाम प्रमुख आयोजन समितियों पर तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता काबिज़ हो गए.
अब हालत यह है कि करोड़ों के बजट वाली ऐसी कोई पूजा समिति नहीं है जिसमें अध्यक्ष या संरक्षक के तौर पर पार्टी का कोई बड़ा नेता या मंत्री न हो.
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पंडालों का उद्घाटन करने में जुटीं ममता

पार्टी के लिए इस त्योहार की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर साल सैकड़ों पूजा पंडालों का उद्घाटन करती हैं. यह साल भी अपवाद नहीं है. ममता महालया के दिन से ही लगातार पंडालों का उद्घाटन करने में जुटी हैं.
पूजा को सियासी फायदे के लिए भुनाने की तृणमूल की यह रणनीति काफ़ी कामयाब रही है. हालांकि पार्टी के नेता इसे महज जनसंपर्क अभियान बताते हैं. अब यही सोच कर बीजेपी ने भी पूजा समितियों पर क़ब्ज़े का अभियान शुरू कर दिया है.
अपनी इसी रणनीति के तहत इस सप्ताह बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी कोलकाता में एक पूजा पंडाल का उद्घाटन किया. बीजेपी ने महीनों पहले से कई प्रमुख आयोजन समितियों के साथ संपर्क शुरू कर दिया था.
इस पर विवाद भी हुआ. मिसाल के तौर पर महानगर की एक समिति ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को पूजा पंडाल के उद्घाटन का न्योता दिया था. लेकिन विवाद बढ़ने पर वह न्योता वापस ले लिया गया.
प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि आम लोगों के बीच पैठ बढ़ाने के लिए पूजा से बेहतर कोई दूसरा मौका नहीं हो सकता. उनका कहना है कि बंगाल में लोकसभा चुनावों में सियासी कामयाबी के बाद पार्टी अब अपनी सांस्कृतिक जमीन मजबूत करना चाहती है.
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बंगालियों के करीब आना चाहती है बीजेपी

अब आम लोगों से जुड़ने के लिए पूजा समितियों पर क़ब्जे के जरिए बीजेपी अब खुद को बंगालियों की पार्टी के तौर पर छवि बनाना चाहती है. अब तक यहां उसकी छवि ग़ैर-बंगाली हिंदीभाषियों की पार्टी की है. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि पार्टी दुर्गा पूजा में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहती है.
दिलीप घोष कहते हैं, "हमने इस साल पूजा के दौरान रिकॉर्ड स्टॉल लगाए हैं. पहले हमारी स्थिति मज़बूत नहीं थी लेकिन अब भारी तादाद में हमें आम लोगों का समर्थन मिल रहा है."
दुर्गा पूजा में सीपीएम भले प्रत्यक्ष रूप से कभी शामिल नहीं रही, लेकिन इस त्योहार के दौरान वह भी हज़ारों की तादाद में स्टॉल लगाकर पार्टी की नीतियों औऱ उसकी अगुवाई वाली सरकार की उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करती थी. वैसे, अब वह इस मामले में काफी पिछड़ गई है. उसकी जगह अब बीजेपी ने ले ली है.
वर्ष 2011 में सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर स्टॉल लगाना शुरू किया. शुरुआत में वहां पार्टी की नीतियों से सम्बन्धित पर्चे बांटे जाते थे और ममता बनर्जी की किताबें बेची जाती थीं.
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कितनी राजनीति, कितना धर्म?

तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "हमारे लिए दुर्गा पूजा बांग्ला संस्कृति, विरासत और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है. पार्टी इसे उत्सव के तौर पर मनाती है. लेकिन बीजेपी धर्म के नाम पर आम लोगों को बांटने का प्रयास करती है."
दूसरी ओर, बीजेपी भी अब अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दुर्गा पूजा का ठीक उसी तरह इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है जैसा तृणमूल ने सत्ता में आने के बाद किया था.
प्रदेश बीजेपी के नेता प्रताप बनर्जी कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस के लोग पूजा समितियों में दूसरे राजनीतिक दलों के लोगों को शामिल नहीं होने देते. इसकी वजह सियासी भी है और वित्तीय भी. बावजूद इसके कई पूजा समितियों ने बीजेपी के शीर्ष नेताओं को पंडालों के उद्घाटन का न्योता दिया था."
संघ के प्रवक्ता जिष्णु बसु कहते हैं, "दुर्गापूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है. ऐसे में पार्टी ख़ुद को इससे दूर कैसे रखे?''
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'दुर्गापूजा का सियासी इस्तेमाल'
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ख़ुद कोलकाता की प्रमुख आयोजन समिति एकडालिया एवरग्रीन के अध्यक्ष हैं. उनका आरोप है कि बीजेपी दुर्गा पूजा का सियासी इस्तेमाल करना चाहती है. लेकिन त्योहारों को राजनीति से परे रखना चाहिए.
वो कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस दुर्गा पूजा के नाम पर राजनीति नहीं करती. लेकिन बीजेपी ने अब धर्म और दुर्गा पूजा के नाम पर सियासत शुरू कर दी है."
दूसरी ओर, बीजेपी ने उल्टे तृणमूल पर पूजा को सियासी रंग में रंगने का आरोप लगाया है. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस ने ही इस उत्सव को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बदल दिया है. अमित शाह बीजेपी प्रमुख के रूप में नहीं, बल्कि केन्द्रीय गृह मंत्री के रूप में दुर्गा पूजा का उद्घाटन किया था."
उनका कहना है कि ममता बनर्जी के सत्ता में आने से पहले तक दुर्गा पूजा महज एक धार्मिक और सामाजिक उत्सव था. लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे एक राजनीतिक मंच में बदल दिया है.
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बदली-बदली सी ममता बनर्जी

ममता बनर्जी सरकार ने बीते साल राज्य की 28 हज़ार दुर्गा पूजा समितियों को 10-10 हज़ार रुपये की सहायता दी थी. इस साल यह रकम बढ़ा कर 25 हज़ार कर दी गई है. इसके अलावा स्थानीय क्लबों को दो-दो लाख रुपए का अनुदान भी दिया गया है.
राज्य सरकार ने दो साल पहले मुहर्रम की वजह से दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन पर पाबंदी लगा दी थी. उस समय पर इस पर काफ़ी विवाद हुआ था और आख़िर में कलकत्ता हाईकोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था.
बीजेपी बीते साल पंचायत चुनावों के समय से ही सरकार की ओर से लागू की गई उस पाबंदी को मुद्दा बनाती रही है.
वाममोर्चा के अध्यक्ष विमान बोस मौजूदा परिदृश्य को प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता की बेहतरीन मिसाल बताते हैं.
वह कहते हैं, "बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस राज्य में धार्मिक कट्टरता का माहौल पैदा कर लोगों के धुव्रीकरण का प्रयास कर रही हैं. अपने इस प्रयास के दौरान दोनों ने राज्य के सबसे बड़े त्योहार को भी अपना हथियार बना लिया है."