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कृषि क़ानूनों की वापसी के बाद CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की तैयारी – प्रेस रिव्यू

 


महिला

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तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद एक बार फिर नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) को लेकर बहस शुरू हो गई है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के मुताबिक़, असम में CAA के ख़िलाफ़ कई समूह फिर से जाग उठे हैं और 12 दिसंबर को प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं.

CAA के तहत अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले ग़ैर मुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रावधान है जो 31 दिसंबर 2014 तक इन देशों को छोड़ चुके हैं.

कुछ संगठनों ने फिर से CAA के ख़िलाफ़ आंदोलन करने का फ़ैसला किया है, दिसंबर 2019 में इस आंदोलन में हुई पुलिस गोलीबारी में कम से कम पांच लोगों की जानें गई थीं.

महिलाएं

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इन प्रदर्शनों में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और सामाजिक कार्यकर्ता से विधायक बने अखिल गोगोई की कृषक मुक्ति संग्राम समिति (KMSS) और एक राजनीतिक दल असम जातीय परिषद भी शामिल होगा.

AASU के सलाहकार समुज्जल के. भट्टाचार्य ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों को लेकर किसानों की दृढ़ता उनके लिए सबक़ है जो CAA विरोधी प्रदर्शन कर रहे हैं जो कि कोविड-19 महामारी के कारण रुक गया था.

20 नवंबर को उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हम ज़रूर चाहेंगे कि CAA को केंद्र सरकार समाप्त कर दे क्योंकि यह संविधान के ख़िलाफ़ होने के अलावा उत्तर पूर्व में हमारे स्थानीय समुदायों की पहचान के लिए एक गंभीर ख़तरा है."

उत्तर भारत के किसानों की तारीफ़ करते हुए गोगोई ने सभी संगठनों से अपील की है कि वो साथ मिलकर CAA के ख़िलाफ़ आंदोलन को दोबारा शुरू करें.

2019 में आंदोलन के ख़िलाफ़ द कॉर्डिनेशन कमिटि अगेंस्ट CAA बनी थी जिसने 12 दिसंबर को CAA के ख़िलाफ़ आंदोलन के दो साल पूरे होने के मौक़े पर प्रदर्शन आयोजित किया है.

CAA को वापस लेने की गुहार सिर्फ़ असम के समूह ही नहीं लगा रहे हैं. जमियत उलेमा ए हिंद और अमरोहा से सांसद दानिश अली ने भी यही मांग की है.

इन मांगों पर बोलते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री मुख़्तार अब्बासी नक़वी ने कहा है कि फिर से 'सांप्रदायिक राजनीति' की शुरुआत हो चुकी है.

रामपुर में एक शादी समारोह में उन्होंने कहा कि इस क़ानून का उद्देश्य सिर्फ़ पड़ोसी देशों से आने वाले प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देना है न कि भारतीयों से नागरिकता छीनना.

मज़दूर

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प्रवासी मज़दूरों के आंकड़े के लिए ये कर रही है मोदी सरकार

देश में अनौपचारिक क्षेत्र के 8.43 करोड़ श्रमिक अपने आधार नंबर से ई-श्रम पोर्टल पर अपनी जानकारियां दर्ज करा चुके हैं.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, अब केंद्र सरकार राज्यों के साथ संपर्क में है और उसने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि इन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिले और नौकरी ढूंढने के मौक़े में मदद मिले.

इससे इन श्रमिकों का आंकड़ा 'उन्नति' वेबसाइट से लिंक किया जाएगा जो कि काम दिलाने का एक प्रस्तावित प्लेटफ़ॉर्म है.

एक अधिकारी ने वेबसाइट को यह भी बताया कि 38 करोड़ रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा जब पूरा हो जाएगा तो यह देश में प्रवासी मज़दूरों के आंकड़े को भी कुछ साफ़ करेगा और उनके बारे में भी बताया गया जो पहले संगठित क्षेत्र के साथ थे.

वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "शुरुआत में ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान एक सवाल था कि क्या श्रमिक प्रवासी मज़दूर हैं लेकिन इसे बाद में हटा दिया गया. अब जब रजिस्ट्रेशन अंतिम स्टेज में पहुंचेगा तो इस आंकड़े का विश्लेषण करते हुए इसमें अंतर घर के पते और काम के पते से लगाया जाएगा. अगर काम का पता गृह नगर से बाहर है तो उसे प्रवासी मज़दूर की श्रेणी में रखा जाएगा."

फेक न्यूज़

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आईटी पैनल की फर्ज़ी ख़बरों पर क़ानून बनाने की सिफ़ारिश

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
बीबीसी 70 एमएम
विवेचना

नई रिलीज़ हुई फ़िल्मों की समीक्षा करता साप्ताहिक कार्यक्रम

एपिसोड्स

समाप्त

सूचना और प्रौद्योगिकी (आईटी) को लेकर संसदीय पैनल ने पारंपरिक और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए कई सुधारों की सिफ़ारिश की है. इसके बाद संसद के शीतकालीन सत्र में सूचना एवं प्रोद्यौगिकी से जुड़ी एक ख़ास रिपोर्ट पेश हो सकती है.

हिंदी अख़बार 'अमर उजाला' के मुताबिक़, मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आइटी पैनल ने अपनी रिपोर्ट में 'राष्ट्र विरोधी' रवैये को परिभाषित करने से लेकर टेलीविज़न रेटिंग बिंदुओं का मूल्यांकन करने और नकली समाचारों से निपटने के लिए क़ानून पेश करने के लिए एक बेहतर प्रणाली को शामिल किया है.

एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पैनल ने अपनी रिपोर्ट में पेड न्यूज़, फेक न्यूज़, टीआरपी के साथ छेड़छाड़, मीडिया ट्रायल्स, पक्षपात रिपोर्टिंग जैसे मामलों का ज़िक्र किया है.

फेक न्यूज के मामलों के जानकार ने बताया कि फेक न्यूज़ ने मीडिया की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है, यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है और अगर स्वस्थ लोकतंत्र को सही से चलाना है तो यह केवल मीडिया की तरफ से सही जानकारी के प्रसार से ही संभव है.

खबरों के अनुसार, मीडिया सेक्टर के लिए बन रहे कानून में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को कवर किया जाएगा. कहा जा रहा है कि प्रस्तावित कानून, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, डिजिटल मीडिया, सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी लागू किया जाएगा.

मोदी

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कृषि क़ानूनों की वापसी पर बुधवार को लगेगी कैबिनेट में मुहर

कृषि क़ानूनों की वापसी की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए तैयार मसौदे पर आने वाले बुधवार को होने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मुहर लग सकती है.

'दैनिक जागरण' लिखता है कि इस बीच कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन की अगुवाई करने वाले किसान संगठनों के समूह संयुक्त किसान मोर्चा ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा और वार्ता बहाल करने के साथ छह मांगें रखीं.

केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में कृषि मंत्रालय की ओर से इस बारे में प्रस्ताव प्रस्ताव रखा जाएगा, जिस पर मंज़ूरी मिलने की संभावना है.

प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार क़ानून वापसी की बाकी प्रक्रिया 29 नवंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में पूरी हो जाएगी. सरकार की इस तैयारी के बावजूद आंदोलनकारी संगठनों ने क़ानूनों की संसद में वापसी तक आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है.

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असम NRC ! लफड़े अभी बाकी हैं , पढ़िए एक रिपोर्ट ।


'2019 की एनआरसी सूची 'अंतिम नहीं'; 4,700 नाम अयोग्य'

'2019 की एनआरसी सूची 'अंतिम नहीं'; 4,700 नाम अयोग्य'

असम में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) के कोऑर्डिनेटर हितेश सरमा ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय को बताया है कि भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआई) की ओर से एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित किया जाना अभी बाकी है.

3 दिसंबर के एक हलफनामे में, सरमा ने कहा कि आरजीआई ने "अंतिम एनआरसी" के प्रकाशन पर कुछ नहीं कहा है. 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित सूची पर उन्होंने कहा कि वो एक "पूरक एनआरसी" थी और उसमें 4,700 नाम अयोग्य हैं.

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार का दावा है कि उसे बुधवार को हलफ़नामे की कॉपी मिली है.

सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में पिछले साल अगस्त में प्रकाशित एनआरसी में 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया था जिसमें क़रीब 5.56 हिंदू और 11 लाख से ज़्यादा मुस्लिम शामिल थे. राज्य सरकार के मुताबिक़, एनआरसी के लिए क़रीब 3.3 करोड़ आवेदन मिले थे.

तब के एनआरसी स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला ने एक प्रेस वार्ता में इसे "अंतिम एनआरसी" बताया था.

हालाँकि, असम सरकार ने अगस्त 2019 की सूची को ग़लत माना था और एक त्रुटिपूर्ण एनआरसी बनाने के लिए हजेला को दोषी ठहराया था. सरकार से रिश्ते बिगड़ने के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल उन्हें राज्य के बाहर शिफ्ट कर दिया था.

तभी से एनआरसी की प्रक्रिया में बाधा आई हुई है. एनआरसी कार्यालय ने अब तक सूची से बाहर किए गए 19 लाख लोगों को रिजेक्शन ऑर्डर जारी नहीं किए हैं.

रिजेक्शन ऑर्डर मिलने के बाद ही ये लोग सूची से बाहर किए जाने के ख़िलाफ़ विदेशी ट्राइब्यूनल में अपील कर सकते हैं.

हलफनामे में सरमा ने कहा है कि प्रकाशित एनआरसी में मिली विसंगतियों के बारे में उन्होंने इस साल फरवरी में आरजीआई को सूचित किया था.

इसके अलावा उन्होंने 'एक त्रुटि मुक्त एनआरसी के हित में सुधारात्मक उपायों के लिए ज़रूरी दिशानिर्देश मांगे थे जो बहुत अहम है क्योंकि एनआरसी सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता से जुड़ी है'.

उन्होंने कहा 'हालांकि आरजीआई ने विसंगतियों से निपटने के लिए कोई निर्देश नहीं दिया है'.

सरमा ने लिखा, "इसके बजाए रिजेक्शन स्लिप जारी करने और एनआरसी के अपडेशन के काम को ख़त्म करने का निर्देश मिला. भारत के रजिस्ट्रार जनरल एनआरसी के अंतिम प्रकाशन को लेकर भी चुप हैं, जबकि सिर्फ वही इसपर कोई कदम ले सकता है. अभी तक भारत के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से अंतिम एनआरसी का प्रकाशन किया जाना बाकी है."

कोरोना वायरस को लेकर शाहीन बाग़ ने क्या किया है?


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शाहीन बाग़ में लकड़ी की चौकियों पर उन महिलाओं की जूतियां और चप्पलें रखी हुई हैं, जो शाहीन बाग़ के धरना स्थल से अपने घरों को लौट गई हैं.
इन महिलाओं ने अपने घर जाने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि सरकार ने कोरोना वायरस की वजह से फैली महामारी की रोकथाम के लिए 123 साल पुराने एक क़ानून को लागू कर दिया है.
इस महामारी के चलते अब तक भारत में सात लोगों की मौत हो चुकी है. ये जूतियां-चप्पलें शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की प्रतीकात्मक नुमाइंदगी कर रही हैं. घर वापस जाने से पहले इन महिलाओं ने कहा कि उनका धरना आगे भी जारी रहेगा.

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भले ही इसके लिए पांच-पांच महिलाओं को अलग-अलग पाली में बैठ कर ही धरना क्यों न देना पड़े. शनिवार की रात को शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी महिलाओं ने तय किया था कि जनता कर्फ़्यू के दौरान भी वो धरना जारी रखेंगी.
लेकिन, इस दौरान केवल पांच महिलाएं ही वहां मौजूद रहेंगी. 36 साल की मरियम ख़ान 15 दिसंबर 2019 से ही इस धरने में शामिल हो रही हैं.
मरियम ने तय किया कि रविवार को जनता कर्फ़्यू के दौरान जो पांच महिलाएं शाहीन बाग़ में धरना जारी रखेंगी, उनमें वो भी शामिल होंगी. मरियम, कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बावजूद धरने पर बैठना चाहती थीं.

पीएम मोदी की अपील

जबकि इसी की रोकथाम के लिए ही सरकार ने रविवार को दिन भर के जनता कर्फ़्यू का एलान किया था.
गुरुवार को प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से अपील की थी कि कोरोना वायरस के संक्रमण की शृंखला रोकने के लिए लोग रविवार को अपने घरों में ही रहें.
रविवार सुबह पांच बजे, पांच महिलाएं धरना स्थल पर पहुंचीं और एक दूसरे से दूरी बना कर लकड़ी की चौकियों पर बैठ गईं.
धरने वाली जगह पर ऐसी 70 चौकियां एक दूसरे से दूरी बना कर रखी गई हैं.

पेट्रोल बम

सुबह के क़रीब नौ बजे मरियम ख़ान ने धरना स्थल से क़रीब 500 मीटर की दूरी पर एक हल्के से धमाके की आवाज़ सुनी.
मरियम ने मुझे फ़ोन पर बात करते हुए कहा, "हम यहां एक मक़सद से धरने पर बैठे हैं. लेकिन हम सरकार के आदेश का भी पालन कर रहे हैं. लेकिन जिन लोगों ने यहां पेट्रोल बम फेंके, उन्होंने प्रधानमंत्री के आदेश को नहीं माना है. हम पर पहले भी हमले हुए हैं. और सरकार को चाहिए कि वो हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करें.''
एक और धमाका जामिया मिलिया इस्लामिया के पास भी सुना गया. जहां पर रविवार की सुबह कुछ कारतूस भी बरामद हुए थे. हमें ये जानकारी एक प्रदर्शनकारी साजिद माजिद ने दी, जो रविवार की सुबह एक वॉलिंटियर के तौर पर शाहीन बाग़ के धरना स्थल पर मौजूद थे.
साजिद माजिद ने बताया, ''पेट्रोल बम, धरना स्थल के पीछे लगे बैरीकेड के पास फेंका गया था और पुलिस ने वहां की सीसीटीवी फुटेज ले ली है. और पुलिस कह रही है कि वो इसकी जांच कर रही है. उन्हें बम फेंकने वाली जगह के पास पेट्रोल बम के सुबूत भी मिले हैं.''
साजिद ने कहा कि दो अज्ञात लोग मोहल्ले में स्थित सेंट्रल बैंक की शाखा के बगल वाली गली से धरना स्थल की तरफ़ आए और उन्होंने पेट्रोल बम फेंके.
मरियम के मुताबिक़, "पेट्रोल बम फेंकने वाले वो दो लोग इस करतूत को अंजाम देने के बाद भाग निकले. हालांकि धरना स्थल पर मौजूद वॉलिंटियर्स और स्थानीय लोगों ने उनका पीछा भी किया."
मरियम का आरोप है कि उन लोगों ने पेट्रोल बम इसलिए फेंके ताकि भारत में महिलाओं के सबसे लंबे समय से चल रहे इस विरोध प्रदर्शन को ख़त्म करा सकें. मरियम आगे कहती हैं- हम पीछे हटने वाले नहीं हैं.

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विरोध प्रदर्शन

शाहीन बाग़ में महिलाएं 15 दिसंबर 2019 से नागरिकता संशोधन क़ानून, नागरिकता के नेशनल रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी हुई हैं. प्रदर्शनकारियों का दावा है कि वो सरकार के हर दिशा-निर्देश का पालन कर रही हैं.

कोरोना वायरस


कोरोना वायरस

प्रदर्शनकारी नियमित रूप से हाथ धो रहे हैं और एक-दूसरे से निश्चित दूरी बना कर रहते हैं. धरना स्थल पर 200 लीटर पानी की टंकी रखी गई है, ताकि वहां मौजूद महिलाएं अपने हाथ नियमित रूप से धो सकें.
एक अन्य प्रदर्शनकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि धरना स्थल को पूरी तरह से साफ़-सुथरा कर दिया गया है. और यहां होने वाले सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं. मंच पर कोई भी भाषण नहीं हो रहा है.
शनिवार की रात को, प्रदर्शनकारियों की एक बैठक में शाहीन बाग़ में धरना जारी रखने या इसे टालने को लेकर मतभेद पैदा हो गए थे. कुछ लोग चाहते थे कि जिस तरह कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण जामिया संयोजक समिति या फिर पुरानी दिल्ली के ईदगाह के प्रदर्शनकारियों ने अपने धरने रद्द कर दिए हैं, उसी तरह, शाहीन बाग़ का धरना भी फिलहाल स्थगित कर दिया जाए.
वहीं, कुछ लोग इस धरने को जारी रखने के पक्ष में थे. जबकि, कई अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी सरकार ने धारा 144 लगा दी है, ताकि कोरोना वायरस के प्रकोप को बढ़ने से रोका जा सके.

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पक्ष-विपक्ष

धरना स्थल पर शुरुआत से ही सक्रिय एक महिला ने कहा कि उन्होंने धरना दे रही महिलाओं से अपील की थी कि वो फ़िलहाल इसे स्थगित कर दें. लेकिन, वो अड़ी हुई थीं कि धरना जारी रखेंगी, क्योंकि देश भर में सैकड़ों ऐसे धरने हैं जो शाहीन बाग़ का अनुसरण कर रहे हैं.
अगर शाहीन बाग़ का धरना ख़त्म होता है तो उनका साहस टूट जाएगा. शाहीन बाग़ की महिलाओं ने तब भी यही तर्क दिया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को धरना ख़त्म करने के लिए राज़ी करने के लिए वार्ताकार नियुक्त किए थे.
पुरानी दिल्ली की ईदगाह में चल रहे धरने को 31 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. वहां पर एक व्यक्ति धरने पर बैठता है और उसका इंटरनेट पर लाइव प्रसारण होता है. पर, शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वो 31 मार्च तक अपना धरना नहीं स्थगित करेंगे.
इसके बाद तय ये हुआ कि धरना तो जारी रहेगा. पांच-पांच महिलाएं दो-दो घंटे की पाली में बैठ कर धरने को जारी रखेंगी. धरने के दौरान महिलाएं बहुत सावधानी बरतेंगी और अपनी सुरक्षा का ख़्याल रखेंगी. एक-दूसरे से दूर रहेंगी और मास्क पहनकर बैठेंगी.
साथ ही वो अपने हाथ को लगातार साफ़ करती रहेंगी. साजिद माजिद कहते हैं, ''हम देखते हैं कि 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है.''
सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ में चल रहे धरने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 23 मार्च तक के लिए टाल दी थी.
हालांकि, रविवार को हुई वारदात में कोई घायल तो नहीं हुआ. लेकिन, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुलिस की टीम को घटना स्थल से पांच-छह पेट्रोल बम मिले हैं. ये आरोप भी लगे हैं कि वहां सिगरेट और पान बेचने वाली छोटी सी दुकान को भी बम हमले में नुक़सान पहुंचा है. हालांकि, साजिद माजिद का कहना था कि बैरीकेड के पास रखा थोड़ा सा सामान ज़रूर जल गया था. बाक़ी किसी दुकान को कोई नुक़सान नहीं हुआ.

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पाबंदियाँ

इससे पहले दिल्ली सरकार ने घोषणा की थी कि राजधानी में 31 मार्च तक ऐसा कोई धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक आयोजन नहीं हो सकता, जिसमें 50 से ज़्यादा लोग शामिल हों. ये ख़बर लिखे जाने तक भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 400 के क़रीब पहुंच चुकी थी. दिल्ली को पूरी तरह से लॉकडाउन किया जा चुका है.
केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस की महामारी से निपटने के लिए 1897 के एपिडेमिक डिज़ीज़ एक्ट को लागू कर दिया है. इस क़ानून के लागू होने से सरकार को ये ताक़त हासिल हो गई है कि वो महामारी को फैलने से रोकने के लिए अस्थायी नियम और क़ायदे लागू कर सकती है.
इसके अंतर्गत महामारी फैलने से रोकने के लिए बनाए गए नियम-क़ायदे तोड़ने वालों पर जुर्माना लगाया जा सकता है. या फिर उन्हें जेल में भी बंद किया जा सकता है. इस क़ानून की धारा तीन के अनुसार इसका उल्लंघन करना, भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत ऐसा अपराध है, जिसके लिए सज़ा दी जा सकती है.
ये क़ानून भारत में पहली बार, प्लेग की महामारी रोकने के लिए लागू किया गया था. तब यानी उन्नीसवीं सदी के अंत में प्लेग की वजह से भारत में हज़ारों लोगों की जान चली गई थी.
मरियम ने कहा कि जो महिलाएं 70 बरस या इससे ज़्यादा उम्र की हैं, उन्हें अब धरना स्थल पर नहीं आने दिया जा रहा है. इसी तरह, 10 साल से कम उम्र के बच्चों को भी नहीं आने दिया जा रहा है.
शाहीन बाग़ में धरने पर बैठे लोगों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाख़िल की गई हैं. ताकि, कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सके. लेकिन, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें धरना स्थल की साफ़-सफ़ाई का पूरा ख़्याल है और इस बारे में हर ज़रूरी एहतियात बरता जा रहा है.
इसीलिए, स्थानीय महिलाओं को कहा गया है कि वो किसी बाहरी व्यक्ति को धरना स्थल पर लेकर न आएं. और, धरने वाली जगह पर आने वालों की जांच भी की जा रही है कि उन्हें बुख़ार तो नहीं है. महिलाएं बुर्क़ा भी पहन रही हैं और ख़ुद को पॉलीथीन से भी ढंक रही हैं, ताकि वायरस से ख़ुद की हिफ़ाज़त कर सकें.
इसके अलावा, किसी इमरजेंसी से निपटने के लिए दो डॉक्टर भी धरना स्थल पर मौजूद रहते हैं.
मरियम ने कहा, ''हम यहां संविधान बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. और सरकार को इस बात को देखना चाहिए. हम ने हर उस बात का पालन किया है, जो उन्होंने करने को कहा. लेकिन, हम धरना जारी रखेंगे. फिर चाहे चार महिलाएं बैठें या केवल एक.''

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कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

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