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इन सभी में इंजीनियरिंग से लेकर लॉ के कॉलेज चलते हैं। हज़ारों छात्र यहाँ पढ़ते हैं। आज़म ख़ान से सियासी प्रतिस्पर्धा ठीक है लेकिन क्या उनसे नफ़रत अब इस मुकाम पर पहुंच गई है कि नियमों का हवाला कर पूरी यूनिवर्सिटी ही मिट्टी में मिला दी जाएगी? क्या संदेश जाएगा समाज और दुनिया में?
इन सभी में इंजीनियरिंग से लेकर लॉ के कॉलेज चलते हैं। हज़ारों छात्र यहाँ पढ़ते हैं। आज़म ख़ान से सियासी प्रतिस्पर्धा ठीक है लेकिन क्या उनसे नफ़रत अब इस मुकाम पर पहुंच गई है कि नियमों का हवाला कर पूरी यूनिवर्सिटी ही मिट्टी में मिला दी जाएगी? क्या संदेश जाएगा समाज और दुनिया में?
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