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SIR के बाद बिहार चुनाव तो देख ही था बंगाल चुनाव के बारे में गहराई से जान लीजिए ...?

30.04.2026


07.04.2026







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पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बंगाल के नवाब रहे मीर जाफ़र के परिवार के तीन सौ से ज़्यादा सदस्य रहते हैं.
मगर इस बार चुनाव की घोषणा से पहले हुई विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया के बाद इनमें से ज़्यादातर के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने पर मीर जाफ़र के परिवार वालों ने क्या कहा, सुनिए बीबीसी संवाददाता प्रेरणा की इस ग्राउंड रिपोर्ट में.
शूट और एडिटः रूबाइयत बिस्वास
सहयोग: सुकुमार महतो

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'मरने के बाद दो ग़ज़ ज़मीन मिल जाए': मीर जाफ़र के वंशजों का नाम वोटर लिस्ट से कटा

सैय्यद आमिर मिर्ज़ा
इमेज कैप्शन,सैय्यद आमिर मिर्ज़ा, मीर जाफ़र के वंशज हैं
    • Author,प्रेरणा
    • पदनाम,बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

भारत को आज़ाद हुए 79 साल होने वाले हैं और सैय्यद आमिर मिर्ज़ा की उम्र को 89 साल. उम्र के इस पड़ाव पर आकर अब मिर्ज़ा साहब को ये साबित करना है कि वो इसी देश के बाशिंदे हैं या नहीं.

देश, जिसके एक हिस्से पर कभी उनके पूर्वजों की हुकूमत रही.

इतिहास की किताब में हमने जिस 'मीर जाफ़र' को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के साथ विश्वासघात करने वाले एक शासक के रूप में पढ़ा, सैय्यद आमिर मिर्ज़ा उन्हीं के वंशज हैं.

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में मीर जाफ़र के परिवार के तीन सौ से ज़्यादा सदस्य रहते हैं.

इस बार चुनाव की घोषणा से पहले हुई विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया के बाद इनमें से ज़्यादातर के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.

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सैय्यद आमिर मिर्ज़ा इसे अपने लिए एक बड़ा दुख बताते हुए हमें वो काग़ज़ दिखाने लगते हैं, जो इस बात का सबूत हैं कि उन्हें केंद्र सरकार की तरफ़ से हर महीने रॉयल पेंशन दी जाती है.

वो कहते हैं, ''बहुत बड़ा दुख है. हम लोगों को कह दिया गया कि हम हिंदुस्तान के नागरिक नहीं हैं. हम सबसे बड़ा कौन होगा हिंदुस्तान का नागरिक? मेरे पास पेंशन का ये पेपर है. जब पैदा हुए थे तो सेंट्रल गवर्नमेंट की तरफ़ से ये काग़ज़ मिला था. हर महीने सौ रुपये की रॉयल पेंशन.''

''ये मुर्शिदाबाद हमारे ही पूर्वजों का था. हम यहीं के मूल निवासी हैं. हमलोगों ने ही इंडिया को चुना, इंडिया बनाया और हम लोगों के साथ ही ऐसा किया गया, क्या बुरा नहीं लगेगा?

आमिर मिर्ज़ा के बेटे बताते हैं कि इस उम्र में भी उनके पिता पोलिंग बूथ पर जाकर वोट देते हैं.

उनका कहना है, ''पिता जी बूथ पर सबसे पहले पहुंचने वाले लोगों में से होते हैं. वोट देना इनके लिए बहुत सम्मान की बात है. चाहे फिर वो म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हो, एमएलए का या पार्लियामेंट. अब वोटर लिस्ट से नाम कटना इनके सम्मान पर चोट लगने जैसा है. ''

'दो रात नींद नहीं आई'

सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा
इमेज कैप्शन,सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा की उम्र 82 साल है, वो कहते हैं कि वो सालों से वोट देते आ रहे हैं

सैय्यद आमिर मिर्ज़ा की तरह ही सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा भी मीर जाफ़र के वंशज हैं. उन्हें यहां लोग 'छोटे नवाब' के रूप में जानते हैं. परिवार के बाकी सदस्यों की तरह ही वो भी मुर्शिदाबाद के लालबाग स्थित निज़ामत क़िला परिसर में रहते हैं.

वो बताते हैं कि उन्हें जब इस बात की ख़बर लगी कि उनका और उनके परिवार के दूसरे लोगों का नाम इस बार की मतदाता सूची से हटा दिया गया है...तब उन्हें दो दिनों तक नींद नहीं आई.

सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा का कहना है, ''मैं दो रात नहीं सोया. मैं 82 साल का हो गया. सालों से वोट दे रहा हूं. कभी ऐसा वाकया नहीं हुआ."

वो पूछते हैं, ''हमने क्या अपराध किया है कि तुम भारतीय नागरिक नहीं मान रहे हो, मेरा वोटर लिस्ट से नाम क्यों काट दिए हो भाई? मेरे बाप-दादा तीन सौ साल हुकूमत कर के गए, सिराजुद्दौला, उनके बाप-दादा सब हुकूमत कर के गए, मेरे नाना ने मुर्शिदाबाद ज़िले को आज़ादी दिलाई, भारत में शामिल करवाया...तो फिर मेरा नाम और हमारी पीढ़ी का नाम क्यों हटाया भाई?"

'नवाब ख़ानदान कहीं भी जा सकता था लेकिन भारत में रहा'

वासिफ़ अली मिर्ज़ा
इमेज कैप्शन,वासिफ़ अली मिर्ज़ा
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कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

प्रोफ़ेसर फ़ारूक अब्दुल्लाह मुर्शिदाबाद के लालबाग कॉलेज में इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं. वह नवाब परिवार पर शोध कर रहे हैं.

साल 1947 में मुर्शिदाबाद के नवाब थे वासिफ़ अली मिर्ज़ा. प्रोफ़ेसर फ़ारूक अब्दुल्लाह बताते हैं कि जब भारत का बंटवारा हुआ, तब मुस्लिम बहुल आबादी होने के कारण मुर्शिदाबाद पाकिस्तान के हिस्से चला गया.

आमिर मिर्ज़ा याद करते हैं कि उस वक़्त यहां के कुछ सरकारी दफ़्तरों में पाकिस्तान के झंडे भी लग गए थे, लेकिन ठीक दो दिन बाद मुर्शिदाबाद वापस से भारत में शामिल हो गया और इसमें अहम भूमिका निभाई तब के नवाब वासिफ़ अली मिर्ज़ा ने.

प्रोफ़ेसर फ़ारूक़ अब्दुल्लाह बताते हैं, ''मुर्शिदाबाद को 15 अगस्त की बजाय 18 अगस्त को आज़ादी मिली, उसमें वासिफ़ अली मिर्ज़ा का बहुत योगदान था. नवाब ख़ानदान के जो लोग यहां रहते हैं, वो चाहते तो पाकिस्तान, इंग्लैंड या दुनिया के दूसरे हिस्से में जा सकते थे, उनके पास इन जगहों पर जाने के विकल्प थे... पर भारत से मोहब्बत होने के कारण वो इंडिया में रह गए.''

हालांकि मीर जाफ़र का नाम भारतीय इतिहास के सबसे विवादित किरदारों में लिया जाता है. 1757 की प्लासी की जंग में, मीर जाफ़र ने बतौर सेनापति सिराजुद्दौला का साथ छोड़ दिया था, जिससे सिराज की हार तो हुई ही, ये घटना भारत में अंग्रेज़ी सत्ता की शुरुआत का बड़ा कारण भी बनी.

पर फ़ारूक अब्दुल्लाह कहते हैं कि मीर जाफ़र की बाद की पीढ़ी का बंगाल में काफ़ी योगदान रहा है.

वो कहते हैं, ''बाहर के लोगों को लगता होगा कि मीर जाफ़र के परिवार के लोगों को यहां गद्दार के रूप में देखा जाता होगा लेकिन मुर्शिदाबाद में ही नहीं, पूरे बंगाल में इनका बहुत योगदान है. संगीत में, साहित्य में, कला के क्षेत्र में और इन सबसे बढ़कर यहां सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखने में. "

"यहां पर अगर आप ढूंढने जाएंगी तो ऐसे कई मस्जिद मिलेंगे, जिनसे ठीक सटे मंदिर बनी होंगे. अभी भी निज़ामत परिवार के लोग, दुर्गा पूजा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. जब मुहर्रम का समय होता है, तो उसमें सिर्फ़ मुस्लिम नहीं, हिंदू भी हिस्सा लेते हैं. इतना मिला-जुला माहौल होता है कि आप ढूंढ नहीं पाएंगे कि कौन मुस्लिम है और कौन हिंदू.''

सदर दरवाज़ा लालबाग मुर्शिदाबाद
इमेज कैप्शन,सदर दरवाज़ा लालबाग मुर्शिदाबाद

सैय्यद आमिर मिर्ज़ा कहते हैं, ''मुर्शिदाबाद में बहुत मेल-मिलाप है. यहां हिंदू-मुसलमान सब एक साथ रहते हैं. सामने देखिए जुमा मस्जिद है और वहीं पूजा भी होती है. तो ये जगहें हमने ही तो दी और अब हमलोगों को बाहरी बता रहे हैं. ये क्या है? ये पॉलिटिकल खेल है. इसकी जगह कुछ नहीं है.''

मुर्शिदाबाद के विधायक और बीजेपी के नेता गौरी शंकर घोष एसआईआर प्रक्रिया में हुई इस त्रुटि के लिए तृणमूल कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

उनके मुताबिक़, ''टीएमसी सरकार ने इस प्रक्रिया में जिन बीएलओ, बीडीओ और एसडीओ को लगाया है, उन्हीं के कहने पर ये हुआ है. टीएमसी यही चाहती है कि दो चार लोगों के नाम हटा दो, दो चार संप्रदाय के नाम हटा दो. ममता बनर्जी ने सबके साथ मिलकर कुछ भारतीय लोगों के नाम भी वोटर लिस्ट से हटवा दिए ताकि परिस्थिति बीजेपी के ख़िलाफ़ जा सके.''

तृणमूल नेता
इमेज कैप्शन,तृणमूल कांग्रेस के विधायक मोहम्मद अली का कहना है कि एसआईआर ऐसी कोई एक्सरसाइज़ नहीं है, जिसका मकसद इलेक्टोरल रोल्स को साफ़ सुथरा करना है

स्थानीय प्रशासन का क्या है कहना?

वहीं, तृणमूल कांग्रेस के नेता एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं.

मुर्शिदाबाद में लालगोला से तृणमूल कांग्रेस के विधायक मोहम्मद अली का कहना है, ''लोगों को मिसगाइड करने के लिए ये कहा जा रहा है. एसआईआर ऐसी कोई एक्सरसाइज़ नहीं है, जिसका मकसद ये था कि इलेक्टोरल रोल्स को साफ़ सुथरा किया जाए."

"सुप्रीम कोर्ट के ऑब्ज़र्वेशन में आया है कि अगर किसी का नाम इस वोटर लिस्ट में न रहे तो ऐसा न सोच कर बैठ जाए कि उसका नाम ज़िंदगीभर के लिए निकाला जा रहा है, मतलब ये हुआ कि इस इलेक्शन में नहीं आ रहा है तो अगले चुनाव में आ जाएगा...इसका मतलब ये हुआ कि अब कोर्ट भी मानने लगे हैं कि जो लिस्ट बन रही है...वो ग़लत है...ग़लत लिस्ट बन रहा है, सही लिस्ट नहीं बन रही."

स्थानीय प्रशासन का कहना है कि वैसे लोग जिनके नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं और जिनके पास तमाम दस्तावेज़ हैं, वह ट्राइब्यूनल में अपील कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें पर्याप्त सहयोग किया जा रहा है.

मुर्शिदाबाद के ज़िलाधिकारी आर अर्जुन कहते हैं, ''हम सिर्फ़ नवाब परिवार ही नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद की पूरी आबादी की मदद कर रहे हैं. ज़िला प्रशासन की ओर से लोगों को यह बताया जा रहा है कि अपील के क्या-क्या विकल्प मौजूद हैं और वे कैसे अपील कर सकते हैं."

"अगर लोग अपने दस्तावेज़ लेकर आते हैं, तो वे खुद भी व्यक्तिगत रूप से अपील कर सकते हैं, या फिर एसडीओ कार्यालय या डीएम कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं...जहां हम उनकी ऑनलाइन अपील दर्ज कराने या उसे डिजिटाइज़ करने में मदद कर रहे हैं.''

49 लाख मामले विचाराधीन

एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से अब तक 63 लाख से ज़्यादा नाम हटाए जा चुके हैं. वहीं क़रीब 49 लाख मामले अब भी विचाराधीन हैं, जिनके निपटारे के बाद ये संख्या और बढ़ सकती है.

आशंका है कि कई लोग इस बार वोट देने के अपने अधिकार से भी वंचित रह सकते हैं. पर मीर जाफ़र के वंशजों के लिए...ये केवल अधिकार का मसला भर नहीं है, बल्कि उनके आत्मसम्मान और उनकी पहचान पर उठते सवाल का भी है.

सैय्यद रेज़ा अली मिर्ज़ा नम आंखों के साथ कहते हैं, ''आज अगर हम वोट देते हैं, तो मेरा एक वजूद होता है कि मैं एक भारतीय नागरिक हूं. अब जब मैं मरूंगा तो मेरे बाप-दादा की जहां क़ब्र है जाफ़रागंज में, वहीं मिट्टी पाऊंगा. लेकिन जब मैं भारतीय नागरिक ही नहीं रहूंगा तो लोग गुस्सा नहीं करेंगे कि नवाब की मिट्टी यहां क्यों होगी? इनको बांग्लादेश भेजो."

"तो मेरी जो आख़िरी ख़्वाहिश है, वो ये है कि मरने के बाद दो ग़ज़ ज़मीन हमें मिल जाए. बहादुर शाह ज़फ़र की तरह रंगून में रहकर तड़पे न...कि मैं हिंदुस्तान नहीं जा पाया. मेरी रूह भटकती रहेगी.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित




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