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रंजन गोगोईः भारतीय राजनीति के अयोध्या कांड का 'द एंड' लिखने वाले चीफ़ जस्टिस


जस्टिस रंजन गोगोईइमेज कॉपीरइटVIPIN KUMAR/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
तारीख 12 जनवरी, 2018. एक चिट्ठी और एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस ने उस रोज़ देश की राजनीति से लेकर न्यायपालिका तक में भूचाल ला दिया था. भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जज, प्रेस से मुख़ातिब थे.
तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा को 'बड़ी नाराज़गी और चिंता के साथ' लिखी गई इस चिट्ठी पर दस्तखत करने और इस बारे में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाने वाले सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायमूर्तियों में से एक जस्टिस रंजन गोगोई भी थे.
ये वो दौर था जब सुप्रीम कोर्ट अनचाही वजहों से सुर्खियों में था और ये संभावना भी जाहिर की जा रही थी कि केंद्र सरकार जस्टिस दीपक मिश्रा के उत्तराधिकारी के तौर पर वरिष्ठता की परंपरा को नज़रअंदाज़ करते हुए गोगोई की जगह कोई और नाम सामने रख सकती थी.
लेकिन 13 सितंबर, 2018 को राष्ट्रपति भवन से जारी हुई चिट्ठी ने ऐसे कयासों पर विराम लगा दिया.
जस्टिस दीपक मिश्रा की फेयरवेल पर दी गई स्पीच में तब जस्टिस गोगोई ने कहा था, "जस्टिस दीपक मिश्र ने नागरिक स्वतंत्रता के अधिकार को हमेशा बनाए रखा. उन्होंने महिलाओं के हक़ का समर्थन किया है. उनके कहे शब्दों से लोग प्रेरित हुए."
जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस दीपक मिश्रइमेज कॉपीरइटARVIND YADAV/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
Image captionजस्टिस दीपक मिश्रा के समय रोस्टर सिस्टम जिस तरह से चल रहा है, जस्टिस गोगोई के वक़्त भी ये व्यवस्था वैसे ही काम करती रही

रोस्टर विवाद

चीफ़ जस्टिस बनने से पहले रंजन गोगोई 12 जनवरी, 2018 की जिस प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद सुर्खियों में आए, उसके केंद्र में सुप्रीम कोर्ट का रोस्टर सिस्टम था. सुप्रीम कोर्ट में रोस्टर का मतलब वो लिस्ट होती है जिसमें ये दर्ज किया जाता है कि किस बेंच के पास कौन-सा केस जाएगा और उस पर कब सुनवाई होगी.
रोस्टर बनाने का अधिकार मुख्य न्यायाधीश के पास होता और उन्हें 'मास्टर ऑफ रोस्टर' कहते हैं. सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार मुख्य न्यायाधीश के आदेशानुसार रोस्टर बनाते हैं. नवंबर 2017 में तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक बेंच ने ये फ़ैसला सुनाया था कि मुख्य न्यायाधीश ही 'मास्टर ऑफ रोस्टर' हैं.
उस फ़ैसले में यह भी लिखा गया था कि कोई भी जज किसी भी मामले की सुनवाई तब तक नहीं कर सकता जब तक मुख्य न्यायाधीश उसे वो केस न सौंपे.
लेकिन जस्टिस गोगोई समेत सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के मीडिया के सामने आने के बाद रोस्टर का मुद्दा गर्मा गया. उन जजों ने कहा कि चीफ़ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का और केसों को जजों को सौंपने का अधिकार है लेकिन वो भी 'बराबरी वालों में पहले है और किसी से ज़्यादा या किसी से कम नहीं है.'
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पीबी सावंत ने बीबीसी मराठी से बातचीत में इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा था, "मुख्य न्यायाधीश को केस सौंपने का पूरा अधिकार है. किसी भी केस के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण होता है. अगर कोई अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल करना चाहता है तो वो कर सकता और कोई उस पर सवाल नहीं उठा सकता क्योंकि इससे जुड़ा कोई भी लिखित नियम नहीं है."
तब जस्टिस सावंत ने भी चीफ़ जस्टिस को एक चिट्ठी लिखकर कहा था, "हर केस एक रूटीन केस नहीं होता है लेकिन कई ऐसे संवेदनशील मुकदमे होते हैं जिन्हें देश के मुख्य न्यायाधीश समेत वरिष्ठ 5 जजों को सुनना चाहिए."
क्या जस्टिस गोगोई के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद रोस्टर सिस्टम में कुछ बदला?
लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे सुचित्र मोहंती कहते हैं, "जस्टिस गोगोई ने उस मुद्दे को पूरी तरह से भुला दिया. रोस्टर के मुद्दे को एक तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. जस्टिस दीपक मिश्रा के समय रोस्टर सिस्टम जिस तरह से चल रहा है, जस्टिस गोगोई के वक़्त भी ये व्यवस्था वैसे ही काम करती रही."
सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटSAJJAD HUSSAIN/AFP VIA GETTY IMAGES

यौन उत्पीड़न के आरोप

चीफ़ जस्टिस की जिम्मेदारी संभालने के सात महीने के भीतर ही अप्रैल में जस्टिस गोगोई पर उनकी पूर्व जूनियर असिस्टेंट ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. तब जस्टिस गोगोई ने इसे न्यायापालिका की आज़ादी को एक गंभीर ख़तरा बताते हुए कहा कि यह जुडिशरी को अस्थिर करने की एक 'बड़ी साज़िश' है.
लेकिन बात इतनी सीधी-सादी भी नहीं थी.
मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोबडे के नेतृत्व वाली आंतरिक जांच समिति (इन हाउस कमेटी) के सामने पेश होने से इनकार कर दिया था.
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उन्हें 'इन हाउस कमेटी' के सामने अपने वकील को रखने की अनुमति नहीं मिली है, बिना वकील और सहायक के सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के सामने वह नर्वस महसूस कर रही हैं. उन्हें इस कमेटी से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है, लिहाज़ा वह कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगी.
जस्टिस बोबडे चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के बाद सबसे सीनियर जज थे और उनके उत्तराधिकारी भी.
ये मामला इसलिए भी ऐतिहासिक था कि देश में पहली बार एक जज अपने पर लगे आरोपों की खुद ही सुनवाई कर रहे थे और वकीलों के एक तबके का कहना था कि इस तरह की सुनवाई यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए तय प्रक्रिया का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटARVIND YADAV/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
Image caption12 जनवरी, 2018 की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जस्टिस कूरियन जोसफ़, जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन लोकुर (बाएं से दाएं)

अप्रैल, 2019 के बाद?

कुछ लोगों का ये मानना है कि यौन उत्पीड़न के इस मामले के सामने आने के बाद सरकार और न्यायपालिका के संबंधों की सूरत बदल गई. जस्टिस गोगोई अपना नाम साफ़ करने के लिए सरकार के वक़ीलों पर निर्भर हो गए.
सालों तक सुप्रीम कोर्ट कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिट्टा कहते हैं, "लोया केस को जिस तरह से हैंडल किया था, उस पर चिंता जाहिर करने के लिए बुलाई गई चार जजों की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भाग लेकर जस्टिस रंजन गोगोई ने लोगों की उम्मीदें बढ़ा दी थीं कि वे स्वतंत्र होकर काम करेंगे. लेकिन यौन उत्पीड़न वाले विवाद में फंसने के बाद वे भारत के मुख्य न्यायाधीश से की गई उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए."
लेकिन 'द ट्रिब्यून' अख़बार के लीगल एडिटर सत्य प्रकाश की राय इससे अलग है.
सत्य प्रकाश कहते हैं, "जुडिशरी में बड़े पदों पर बैठे लोगों को कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. ऐसे आरोप भी लगाए जाते हैं, जो पूरी तरह से निराधार होते हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के पास कोई विकल्प नहीं था. ये सुनवाई वे खुद नहीं करते तो और कौन करता? कोई और करता तो ये कहा जाता कि सुनवाई जुडिशरी के लोगों ने ही की थी. सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जज अगर इसकी सुनवाई करते तो कहा जाता कि ये ब्रदर जज हैं, हाई कोर्ट के जज करते तो ये कहा जाता कि उनके जूनियर जज हैं."

अयोध्या पर ऐतिहासिक फ़ैसला

चीफ़ रंजन गोगोई ने अपने कार्यकाल के आख़िरी दिनों में पिछले कई दशकों से चले आ रहे अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर 9 नवंबर, 2019 को अंतिम फ़ैसला दे दिया.
भले ही जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने ये कहा कि 70 साल पहले 450 साल पुरानी बाबरी मस्जिद में मुसलमानों को इबादत करने से ग़लत तरीक़े से रोका गया था और 27 साल पहले बाबरी मस्जिद ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गिराई गई लेकिन फ़ैसला हिंदुओं के पक्ष में मंदिर निर्माण के लिए दिया गया.
क्या रामलला विवादित स्थल पर ही पैदा हुए थे? अयोध्या पर अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश भी की.
गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा, "साक्ष्यों से ये पता चलता है कि उस स्थान पर मस्जिद के अस्तित्व के बावजूद भगवान राम का जन्मस्थान माने जाने वाली उस जगह पर हिंदुओं को पूजा करने से नहीं रोका गया. मस्जिद का ढांचा हिंदुओं के उस विश्वास को डगमगा नहीं पाया कि भगवान राम उसी विवादित स्थल पर पैदा हुए थे."
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अशोक कुमार गांगुली ने इस फ़ैसले की टिप्पणी करते हुए बीबीसी से हुए कहा, "विवादित ज़मीन देने का आधार पुरातात्विक साक्ष्यों को बनाया गया है. लेकिन यह भी कहा गया है कि पुरातात्विक सबूतों से ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला नहीं हो सकता. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर किस आधार पर ज़मीन दी गई?"
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज गांगुली ने कहा, "यहां तो मस्जिद पिछले 500 सालों से थी और जब से भारत का संविधान अस्तित्व में आया तब से वहां मस्जिद थी. संविधान के आने के बाद से सभी भारतीयों का धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार मिला हुआ है. अल्पसंख्यकों को भी अपने धार्मिक आज़ादी मिली हुई है. अल्पसंख्यकों का यह अधिकार है कि वो अपने धर्म का पालन करें. उन्हें अधिकार है कि वो उस संरचना का बचाव करें. बाबरी मस्जिद विध्वंस का क्या हुआ?"

गोगोई की विरासत

लेकिन एक सच ये भी है कि भारत के मुख्य न्यायधीश के पद से रिटायर होने के बाद जस्टिस रंजन गोगोई इसी अयोध्या के फ़ैसले के लिए याद किया जाएगा.
सत्य प्रकाश कहते हैं, "बाक़ी चीज़ें लोग भूल जाएंगे. उन्हें अयोध्या के फ़ैसले के लिए याद रखा जाएगा. जो मामला इतने सालों से अटका हुआ था, उसका समाधान भी कुछ इस तरह से हुआ कि फ़ैसला जिसके ख़िलाफ़ भी आया, उसने भी फ़ैसले को स्वीकार किया."
गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस रंजन गोगोई के साथ प्रैक्टिस कर चुके सीनियर एडवोकेट केएन चौधरी की राय में, "हम किसी जज को एक व्यक्ति के तौर पर नहीं पहचानते बल्कि उन्हें उनके लिखे फ़ैसलों की वजह से जानते हैं. जैसे जस्टिस गोगोई को रामजन्मभूमि के फ़ैसला के लिए याद रखा जाएगा."
शायद कई लोग उन्हें 12 जनवरी 2018 की सुबह जस्टिस चेलमेश्वर के घर हुई एक अभूतपूर्व प्रेसवार्ता के लिए भी याद रखेंगे. ये बिल्कुल आम घटना नहीं थी कि देश का चार सबसे वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट जज, एक साथ प्रेसवार्ता बुलाकर, अपने बॉस यानी चीफ़ जस्टिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करें.
अयोध्या मामलाः फै़सले के बाद उठने वाले पांच ज़रूरी सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सुधार

ऐसा नहीं है कि जस्टिस गोगोई के चीफ़ जस्टिस बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में कुछ नहीं बदला.
सत्य प्रकाश कहते हैं, "जस्टिस गोगोई ने जो कुछ सुधार किए, उनमें सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री एक है. रजिस्ट्री में मुक़दमे दायर करने की प्रक्रिया पूरी की जाती है. जस्टिस गोगोई ने इसमें कई सुधार किए. केस लिस्टिंग की प्रक्रिया सरल की गई. उस दौरान कुछ लोगों की नौकरियां भी गईं. कुछ मामलों में ऐसा होता था कि जिनकी तारीख कल पड़नी है, उसे देर से तारीख मिलती थी तो किसी का केस देर से आना है पर उसे पहले तारीख मिल जाती थी. उन्होंने इस प्रक्रिया को सरल किया."
सुचित्र मोहंती एक और बात की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं, "जस्टिस गोगोई कई मामलों के निपटारे में कम वक़्त लेते थे. इनमें जनहित याचिकाएं और संविधानिक मामलों से जुड़े मुक़दमे भी होते थे. हालांकि अदालत आने वाले लोगों की इसे लेकर शिकायत भी रहती थी कि वे उनकी बात ठीक से नहीं सुनते हैं."
जस्टिस रंजन गोगोई और क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसादइमेज कॉपीरइटARVIND YADAV/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES

सरकार और न्यायपालिका के रिश्ते

जस्टिस दीपक मिश्रा के ज़माने में सरकार और न्यायपालिका के रिश्तों को लेकर काफी कुछ कहा सुना जाता रहा था. वो बातें अभी बहुत पुरानी नहीं हुई हैं, जब विपक्ष के एक तबके की तरफ़ से तत्कालीन चीफ़ जस्टिस पर महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की तैयारी हो रही थी और सरकार इस प्रस्ताव का विरोध कर रही थी.
इससे कुछ अरसा पहले केंद्र नेशनल जुडिशल एप्वॉयंटमेंट कमीशन क़ानून के ज़रिये न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में कटौती की नाकाम कोशिश कर चुकी थी.
सत्य प्रकाश कहते हैं, "सरकार के साथ न्यायपालिका के संबंध जैसे पहले थे, उसमें ज़्यादा फर्क नहीं आया. जस्टिस गोगोई के कार्यकाल में भी इसमें कुछ ख़ास बदलाव नहीं आया. जो बदलाव दिखते भी हैं, वो बहुत सतही किस्म की छोटी-छोटी चीज़ें हैं. जो प्रमुख मुद्दे हैं, जहां न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका को किनारे कर रखा है, वहां कोई बदलाव नहीं हुआ है. आम तौर पर लोग कहते हैं कि इनका रिश्ता ठीक हो गया है या कई बार ये भी कहा जाता है कि जुडिशरी ने सरेंडर कर दिया है. मेरा मानना है कि जुडिशरी ने सरकार के अधिकार क्षेत्र में जो घुसपैठ कर रखी है, उसे उन्होंने खाली नहीं किया है. सरकारें एक तरह से मजबूर हैं. कुछ कर नहीं पातीं."
सुचित्र मोहंती भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि जस्टिस दीपक मिश्रा के समय सरकार और न्यापालिका के बीच जैसे रिश्ते थे, जस्टिस गोगोई के कार्यकाल में भी वही स्थिति बनी रही.

रफ़ाल और सबरीमाला

क्या जस्टिस गोगोई केवल अयोध्या के फ़ैसले के लिए याद किया जाएंगे? इसका जवाब इनकार में देने में कोई ज़्यादा परेशानी शायद ही किसी को हो. कार्यकाल के आख़िरी दिनों में उन्होंने अयोध्या केस के बाद एक और बड़ा फ़ैसला दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने रफ़ाल पर सारी पुनर्विचार याचिकाएं ख़ारिज कर दी हैं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रफ़ाल सौदे में किसी भी तरह के भ्रष्टाचार होने की बात को ख़ारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रफ़ाल मामले में जांच की ज़रूरत नहीं है. कोर्ट ने कहा कि इन याचिकाओं में दम नहीं है.
हालांकि राजनीतिक रूप से संवेदनशील सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के फ़ैसले के ख़िलाफ़ दाख़िल की गई पुनर्विचार याचिका को पाँच जजों की बेंच ने बड़ी बेंच के पास भेज दिया. अदालत ने पुराने फ़ैसले पर कोई स्टे नहीं लगाया है, इसका मतलब ये हुआ कि पुराना फ़ैसला बरकरार रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी हटा दी थी.
सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटPRAFUL GANGURDE/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES

आरटीआई जजमेंट

इसी नवंबर की 13 तारीख़ को गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने कहा है कि मुख्य न्यायाधीश का दफ़्तर अब आरटीआई के दायरे में होगा.
सुप्रीम कोर्ट में ये मामला एक दशक से लंबित था, क्योंकि पिछले नौ चीफ़ जस्टिस ने इस मामले की सुनवाई के लिए संविधान बेंच का ही गठन नहीं किया. सुनवाई के बाद रिज़र्व रखे मामलों में 3 महीने के भीतर फैसला देने की नज़ीर है, पर इस मामले की सुनवाई के बाद फैसला आने में 7 महीने का लंबा वक्त लग गया.
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, "देरी के बावजूद इस फ़ैसले के कई अच्छे पहलू हैं. आरटीआई एक्ट की धारा 2-एफ़ के तहत अब मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर भी सार्वजनिक प्राधिकार यानी पब्लिक अथॉरिटी बन गया है. लेकिन जजों की प्राइवेसी और प्रिविलेज के नाम पर इस फ़ैसले के क्रियान्वयन में अभी भी गड़बड़ हो सकती है."
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार देश के नेताओं और अफ़सरों को अपनी संपत्ति का सार्वजनिक विवरण देना होता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बारे में वर्ष 1997 में एक संकल्प पारित किया था, इसके बावजूद सभी जजों द्वारा अभी तक संपत्ति की घोषणा नहीं हो रही.
विराग गुप्ता आगे कहते हैं, "लोकसभा और राज्यसभा के विशेषाधिकार के बावजूद, दोनों सदनों की कार्रवाई का सीधा प्रसारण होता है. दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट जनता के लिए खुली अदालत है, फिर भी अदालतों की कार्रवाई की ना तो रिकॉर्डिंग होती है और न ही प्रसारण."
जस्टिस मार्कंडेय काटजूइमेज कॉपीरइटKUNAL PATIL/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
Image captionजस्टिस रंजन गोगोई की अदालत में जस्टिस काटजू को अपने ब्लॉग के लिए माफी मांगनी पड़ी थी
जब एक रिटायर्ड जज गोगोई की अदालत में तलब हुए
केरल में हुए सौम्या मर्डर केस में त्रिशूर के फास्ट ट्रैक अदालत ने गोविंदास्‍वामी को मौत की सजा सुनाई थी. केरल हाई कोर्ट ने भी उनकी मौत की सजा को बहाल रखा था.
बाद में जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि गोविंदास्वामी का इरादा लड़की की हत्या का नहीं था. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उसे हत्या का दोषी नहीं मानते हुए उसकी मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दिया था.
इस पर जस्टिस (रिटायर्ड) मार्कंडेय काटजू ने 15 सितंबर, 2016 को अपने ब्लॉग में सौम्या हत्याकांड के फैसले की आलोचना की थी. काटजू ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि सौम्या दुष्कर्म और हत्या मामले में कोर्ट का फैसला गंभीर ग़लती था. उन्होंने लिखा था कि लंबे समय से क़ानूनी जगत में रह रहे न्यायाधीशों से ऐसे फैसले की उम्मीद नहीं थी.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस काटजू व्यक्तिगत रूप से अदालत में आएं और बहस करें कि कानूनी तौर पर वह सही हैं या अदालत. ये पहला मामला था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को फैसलों की आलोचना करने के लिए तलब किया था.
बाद में जस्टिस काटजू को अपनी टिप्पणी के लिए माफी मांगनी पड़ी थी.
जस्टिस रंजन गोगोईइमेज कॉपीरइटSONU MEHTA/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES
Image captionअपनी पत्नी के साथ जस्टिस रंजन गोगोई

इतिहास के छात्र से चीफ़ जस्टिस तक

बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस (सेवानिवृत्त) चंद्रशेखर धर्माधिकारी ने एक बार बीबीसी से कहा था कि वो जस्टिस गोगोई को चीफ़ जस्टिस के रूप में देखकर खुश हुए क्योंकि वह इस पद के लिए सबसे सक्षम व्यक्ति थे.
साल 2001 में जस्टिस गोगोई गुवाहाटी हाई कोर्ट में एक जज के रूप में नियुक्त किए गए. इसके बाद 2010 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में उनका तबादला हो गया. साल भर बाद, उन्हें वहां का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. अप्रैल, 2012 में वे सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में प्रमोट हुए.
3 अक्टूबर, 2018 को देश के 46वें चीफ़ जस्टिस बने रंजन गोगोई इस पद तक पहुंचने वाले उत्तर पूर्व भारत के पहले व्यक्ति हैं.
उनकी शुरुआती परवरिश डिब्रूगढ़ में, फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से इतिहास में ग्रैजुएशन और लॉ फ़ैकल्टी से क़ानून की पढ़ाई हुई.
पिछले साल जारी हुई किताब 'गुवाहाटी हाईकोर्ट, इतिहास और विरासत' में जस्टिस गोगोई के बारे में एक ख़ास किस्से का ज़िक्र है. एक बार जस्टिस गोगोई के पिता केशब चंद्र गोगोई (असम के पूर्व मुख्यमंत्री) से उनके एक दोस्त ने पूछा कि क्या उनका बेटा भी उनकी ही तरह राजनीति में आएगा?
इस सवाल पर जस्टिस गोगोई के पिता ने कहा कि उनका बेटा एक शानदार वकील है और उसके अंदर इस देश के मुख्य न्यायाधीश बनने की क्षमता है.

कोर्ट नंबर एक

दिल्ली में आयोजित तीसरे रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान के दौरान जस्टिस गोगोई ने कभी न्यायपालिका को उम्मीद का आख़िरी गढ़ बताया था और कहा था कि न्यायपालिका को पवित्र, स्वतंत्र और क्रांतिकारी होना चाहिए.
जस्टिस गोगोई को पारदर्शिता के पक्षधर जजों में गिना जाता है. उनकी संपत्ति, जेवर और नकदी से जुड़ी जानकारी बताती है कि वो कितना साधारण जीवन जीते हैं. उनके पास एक कार भी नहीं है. उनकी मां और असम की मशहूर समाजसेवी शांति गोगोई ने उन्हें कुछ संपत्ति मिली है जो कि उनके पास मौजूद हैं. इसके साथ ही संपत्ति से जुड़ी जानकारी में कोई भी बदलाव आने के बाद वे उसे घोषित भी करते रहे हैं.
चीफ़ जस्टिस के कार्यालय को आरटीआई क़ानून के दायरे में लाकर उन्होंने इसकी पुष्टि एक बार फिर से कर दी है.
इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यायमूर्तियों को इतिहास उनके फ़ैसलों की वजह से ही याद रखता है. देश की सबसे बड़ी अदालत के कोर्ट नंबर एक से आए फ़ैसले भी इसी कसौटी पर कसे जाएंगे. अयोध्या का फ़ैसला यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा.

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