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क्या CAA पर स्टे नहीं लगा सकता था सुप्रीम कोर्ट?


बीबीसीइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionसांकेतिक तस्वीर

बुधवार को देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) से जुड़ी 144 याचिकाओं पर सुनवाई हुई जिसके बाद अदालत ने कहा कि 'सीएए पर बिना सुनवाई के रोक नहीं लगाई जा सकती'.
सीएए के ख़िलाफ़ कोर्ट में 141 याचिकाएं दायर की गयी थीं, जबकि इसके पक्ष में तीन.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर वो संवैधानिक पीठ बनाएंगे तो वही पीठ अंतरिम आदेश देगी.
पर इस क़ानून को लेकर लोगों में जो बेचैनी और विरोध है, उसे देखते हुए क्या सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून के लागू किए जाने पर स्टे नहीं लगा सकता था?

सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

इस बारे में संविधान विशेषज्ञ और हैदराबाद की नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा कि देश में मची अफ़रा-तफ़री को देखते हुए बेहतर तो ये होता कि ख़ुद सरकार ही अदालत से यह कहती कि हमें एतराज़ नहीं है कि आप इस पर स्टे लगा दें, पर सरकार ने स्टे का विरोध किया इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसपर स्टे नहीं लगाया.
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा,"अगर आज सरकार ख़ुद स्टे पर राज़ी हो जाती तो आज ही सारा प्रोटेस्ट और विरोध प्रदर्शन ख़त्म हो जाता."
लेकिन सवाल ये है कि सरकार स्टे के लिए ख़ुद क्यों सामने आती? फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "स्टे का मतलब होता कि जब तक अदालत इसको सुनकर फ़ैसला नहीं कर देती तब तक इसे लागू नहीं किया जाएगा"
वे आगे कहते हैं, "ऐसे मामले जहाँ संविधान की व्याख्या का मामला होता है, स्टे कम ही मिलता है."

Modi Governmentइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

'मामला अब थोड़ा बड़ा हो गया है'

वहीं क़ानून विशेषज्ञ आलोक प्रसन्ना का कहना है किआज अदालत में जो बातें कही गईं, इसका मतलब ये नहीं निकालना चाहिए कि सरकार को राहत मिली है और क़ानून के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वालों को मायूसी हाथ लगी है.
उन्होंने कहा, "अभी नतीजा कुछ नहीं आया है. सरकार को चार सप्ताह में जवाब देना होगा."
"पहले जो 60 याचिकाएं दायर की गयी थीं वो सीएए के ख़िलाफ़ थीं. बाद में 80 याचिकाएं दायर की गयीं जिनमें से कई एनपीआर के ख़िलाफ़ हैं और कुछ असम में सीएए को लागू होने से रोकने के लिए हैं. मामला अब थोड़ा बड़ा हो गया है. इसलिए सरकार का जवाब दूसरे उठाये गए मुद्दों पर भी आना चाहिए."
आलोक प्रसन्ना के मुताबिक़ अदालत के आज के बयान से किसी को ख़ुश या किसी को मायूस नहीं होना चाहिए.
वे कहते हैं,"अगर किसी को आज ही राहत मिलने की उम्मीद थी तो वैसा सोचना ग़लत था. अभी तो मामला शुरू हुआ है."

मोदी सरकारइमेज कॉपीरइटPTI

असम पर अलग से सुनवाई

असम के हवाले से दायर की गईं याचिकाओं को अलग करने के अदालत के फ़ैसले पर आलोक प्रसन्ना कहते हैं, "इसका कोई गहरा मतलब निकालने की ज़रुरत नहीं है. असम के लोगों की नाराज़गी इस बात पर है कि सीएए की समयसीमा 2014 है जो असम समझौते के ख़िलाफ़ है, जहाँ समयसीमा 1971 रखी गई है."
विशेषज्ञों का कहना है कि असम में एनआरसी लागू है इसलिए भी इसकी याचिकाओं की अलग से सुनवाई सही फ़ैसला है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन ओवैसी समेत कई अन्य लोगों और संगठनों ने ये याचिकाएं दायर की हैं.
9 जनवरी को अदालत ने नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान हो रहीं हिंसक घटनाओं पर नाराज़गी जताते हुए कहा था कि इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं पर सुनवाई तभी होगी जब हिंसक घटनाएं बंद हो जाएंगी.
इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस संजीव खन्ना की तीन सदस्यीय पीठ ने नौ जनवरी को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था.
याचिकाकर्ताओं ने इस क़ानून को संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ और विभाजनकारी बताते हुए रद्द करने का आग्रह किया है.
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