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दूध को इंसानों के लिए एक पोषक और संतुलित आहार माना जाता है.
लेकिन अब लोग गाय, भैंस, बकरी के दूध की जगह वैकल्पिक दूध जैसे सोयाबीन का दूध, नारियल का दूध, जई का दूध या भांग के दूध का सेवन ज़्यादा करने लगे हैं. इन्हें पौधे से निकलने वाला दूध कहा जाता है. एक दौर था, जब इस तरह के दूध को कोई पूछता तक नहीं था.
लेकिन अब वेगन लोगों की एक बड़ी आबादी हो गई है, जो दूध की ज़रूरत पौधों से निकलने वाले दूध से ही पूरा करते हैं. इसीलिए पौधों से निकलने वाला हर तरह का दूध अब बाज़ार में उपलब्ध है.
अब से पहले भी कुछ लोग डेयरी दूध की जगह बादाम का दूध पीना पसंद करते थे. बहुत से लोग जानवरों के अधिकारों के लिए ऐसा करते थे, जबकि बहुत से लोग दूध में मौजूद शुगर लैक्टोज़ नहीं पचा पाने के चलते इस विकल्प को चुनते थे. लेकिन अब बढ़ते जलवायु संकट के चलते एक बड़ी आबादी ऐसा कर रही है.
क्या वाक़ई इससे वातावरण का भला होगा? और क्या इस तरह के दूध में डेयरी दूध से मिलने वाले तमाम पोषक तत्व मौजूद हैं?
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