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आंबेडकर को जब रामनवमी के रथ में हाथ नहीं लगाने दिया गया


आंबेडकरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
रामनवमी का दिन था. राम का रथ खींचने के लिए कुछ युवक बेसब्र थे. तभी हल्ला हुआ कि कुछ लोग रथ ही चुरा ले गए.
वहां खड़े युवक उस रथ के पीछे दौड़ने लगे. लोगों ने उन युवकों और उनके नेताओं पर पत्थरबाजी शुरू कर दी.
यह घटना 89 साल पुरानी है. नासिक के कालाराम मंदिर का यह रथ था और युवकों के नेता के रूप मे खड़े थे डॉ. बाबासाहब आंबेडकर.
डॉ आंबेडकर ने छुआछूत ख़त्म करने के लिए काफ़ी संघर्ष किया था. कालाराम मंदिर का उनका आंदोलन काफ़ी अहम माना जाता है.
इस आंदोलन का लक्ष्य केवल सवर्ण हिंदुओं को आगाह करना नहीं था बल्कि अंग्रेज़ों को जगाने के लिए भी था.
आंबेडकर की यह लड़ाई दलितों और शोषितों को हक़ दिलाने के लिए थी. दो मार्च 1930 को यह लड़ाई शुरू हुई और पांच सालों तक चली.
गोदावरी नदी के किनारे बसा नासिक सनातनी हिंदुओं का गढ़ माना जाता था. उसी नासिक के कालाराम मंदिर मे हज़ारों 'अछूतों' के साथ आंबेडकर के प्रवेश का इरादा था. डॉ. आंबेडकर की जीवनी लिखने वाले धनंजय कीर लिखते हैं, "आंबेडकर ने महाराष्ट्र के ब्राह्मणों को साहस के साथ चुनौती दी थी.''
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उस समय अंग्रेज़ों का भारत पर राज था. कांग्रेस अंग्रेज़ों से लड़ रही थी. दूसरी तरफ़ आंबेडकर हिन्दू धर्म के भीतर दलितों से भेदभाव और शोषण के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे.
आंबेडकर हिन्दू धर्म में सवर्णों के विशेषाधिकार को चुनौती दे रहे थे. कीर का कहना है "अंबेडकर का संघर्ष शक्तिशाली ब्राह्मणों से था जो दलितों को मनुष्य का अधिकार देने को राज़ी नहीं थे.''
दो मार्च 1930 को नासिक शहर मे एक जुलूस निकला था. ऐसा जुलूस इस शहर ने पहले कभी नहीं देखा था.
आंबेडकर की अध्यक्षता मे एक सभा का आयोजन किया गया था. उसी सभी में ये जुलूस निकालने का निर्णय लिया गया था. जुलूस लगभग एक किलोमीटर तक जाना था जिसमें क़रीब 15 हज़ार लोग शामिल थे.
लेखक धनंजय कीर बताते हैं कि श्रीराम का नारा लगाते हुए यह जुलूस निकला था. जुलूस मंदिर के पास पहुंचा. मंदिर के सारे दरवाज़े बंद थे. इसलिए जुलूस गोदावरी नदी के किनारे गया. वहां एक भव्य सभा हुई.
दुसरे दिन मंदिर में प्रवेश करने का निर्णय हुआ. आंदोलनरत पहली टुकड़ी में 125 पुरुष और 25 औरतें थीं.
आंबेडकरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अगला पूरा महीना यह आंदोलन चलता रहा. नौ अप्रैल 1930 को रामनवमी का दिन था. सनातनी हिंदुओं और आंबेडकर के नेतृत्व वाले आंदोलनकारियों में एक समझौता हुआ.
राम के रथ खींचने में 'अछूतों को भी शामिल करने का निर्णय हुआ. अपने कार्यकर्ताओं के साथ आंबेडकर मंदिर के पास आए.
पर आंबेडकर के समर्थकों के हाथ लगाने से पहले ही सनातनी हिन्दू रथ ले उड़े. आंबेडकर ने सारी बातें बॉम्बे प्रांत के ब्रिटिश गवर्नर फ्रेडरिक साइक्सको को लिख पत्र में बताई है.
उनके अनुयायियों पर पत्थरबाजी हुई. आंबेडकर पर कोई पत्थर ना गिरे इसलिए उनके सिर पर लोगों ने छतरी लगा रखी थी.
हालांकि इसके बावजूद लोग ज़ख़्मी हो गए थे. इस घटना में एक युवक की मौत हो गई थी. ब्रिटिश गवर्नर को लिखे पत्र में इसका ज़िक्र मिलता है.
बाबासाहेब आंबेडकर की जीवनी लिखने वाले धनंनजय कीर ने लिखा है, ''सत्याग्रह के बाद नासिक में 'अछूतों' को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उनके बच्चों के स्कूल बंद हो गए. रास्ते बंद कर दिए गए. दुकानों से उन्हें सामान मिलने बंद हो गए. सनातनी हिन्दू उन पर ज़ोर ज़बर्दस्ती करने लगे. इसके बावजूद उन्होंने आंदोलन चालू रखा.''
आंदोलन के दौरान ही आंबेडकर को गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाना पड़ा. उनकी ग़ैर-मौजूदगी में भाऊराव गायकवाड़ ने यह संघर्ष जारी रखा. यह संघर्ष पाँच सालों तक चला. हालांकि इसके बावजूद 'अछूतों' को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला.
भारत को आज़ादी मिलने के बाद इस मंदिर में अछूतों को प्रवेश मिला.
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इस लड़ाई से क्या हासिल हुआ?

आंबेडकर की इस लड़ाई से क्या हासिल हुआ? इस सवाल के जवाब में अखिल भारतीय दलित नाट्य परिषद के अध्यक्ष मधुसूदन गायकवाड़ बताते हैं कि आंबेडकर का आंदोलन प्रतीकात्मक था. जो समाज जातिवाद से ग्रस्त है उस समाज को अंधकार से बाहर निकालने के लिए और अंग्रेज़ों को संदेश देने के लिए उन्होंने यह आंदोलन किया था.
मधुसूदन गायकवाड़ कहते हैं, ''आंबेडकर का यह संघर्ष सिर्फ़ नासिक तक ही सीमित नहीं था. इससे पहले अमरावती में भी उन्होंने मंदिर में प्रवेश के लिए कोशिश की थी. इस तरह के सवाल खड़े किए जा रहे थे कि राम के सच्चे भक्त को मंदिर में प्रवेश क्यों चाहिए?''
इस सवाल का जवाब आंबेडकर ने अमरावती की एक सभा में दिया था. लेखक रमेश पतंगे ने आंबेडकर के जवाब का ज़िक्र अपनी किताब 'महामानव का संघर्ष' में किया है.
आंबेडकर ने अपने जवाब में कहा था, ''प्रार्थना के कई प्रकार हैं. साकार और निराकर दोनों तरीक़ों से भगवान के प्रति श्रद्धा रखी जा सकती है. हालांकि उनको यह साबित करना था कि अछूत लोगों की वजह से कोई मंदिर अपवित्र नहीं होता है या उनके छूने से किसी मूर्ति की महिमा कम नहीं होती.''
'भारत में लोकतंत्र कामयाब नहीं होगा'
आंबेडकर ने कहा था, ''हिन्दू धर्म में सभी वर्गों को समान अधिकार है. यहां हम किसी को अछूत नहीं मान सकते. हिन्दू धर्म में जितना योगदान ब्राह्मण वशिष्ठ, क्षत्रिय कृष्ण, वैश्य तुकाराम उसी तरह बाल्मीकि और रोहिदास जैसे 'अछूतों' का भी रहा है.''
आंबेडकर के आंदोलन में अहिंसा एक प्रमुख हथियार थी. आंबेडकर किसी क़ानून को तोड़ने के पक्षधर नहीं थे. इस आंदोलन को देखते हुए नासिक के डीएम ने निषेधाग्या लागू कर दिया था.
मंदिर में प्रवेश में के लिए आंबेडकर ने ब्रिटिश गवर्नर से भी अनुरोध किया था. हालांकि इसका कोई फ़ायदा नहीं मिला था. आंबेडकर को पूरा आंदोलन ही स्थगित करना पड़ा था.
साप्ताहिक विवेक के सहायक संपादक रवि गोड़े कहते हैं, ''समाज में बदलाव की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है. इस चीज़ को आंबेडकर बख़ूबी समझते थे. इसके लिए वो अलग-अलग तरीक़ों से लड़ते भी रहे. मंदिर में प्रवेश में सामाजिक बदलावों को आगे बढ़ाने का एक छोटा सा हिस्सा था.''
भारतीय विदेश मंत्रालय ने आंबेडकर के भाषणों और पत्रों का संग्रह प्रकाशित किया है. इसमें आबंडेकर के बयान का ज़िक्र है जिसमें उन्होंने लिखा है, ''शोषितों की लड़ाई सिर्फ़ मंदिरों में प्रवेश तक ही सीमित नहीं है. 1933 में महात्मा गांधी और आंबेडकर की यरवडा जेल में मुलाक़ात हुई थी. उस समय गांधी ने डॉ सुब्बारायन के विधेयक पर आंबेडकर से समर्थन मांगा था. हालांकि आंबेडकर ने इसे नकार दिया था. आंबेडकर की आपत्ति थी इस विधेयक में मंदिर में प्रवेश के बारे में तो लिखा है पर अछूतों को पूजा का जो अधिकार मिलना चाहिए उसके बारे में कोई ज़िक्र नहीं है.''
दलितों के गीतों में ज़िंदा हैं अंबेडकर
डॉ आंबेडकर ने महात्मा गांधी को मंदिर में प्रवेश के बारे में अपनी राय बताई थी. उन्होंने गांधी से कहा था कि शोषित वर्ग के मंदिर में जाने भर से अधिकार नहीं मिल जाएगा.
इस तबके का सामाजिक और सांस्कृतिक सशक्तीकरण ज़रूरी है. इसके लिए शिक्षा सबसे अहम है. अंततः जाति व्यवस्था भी ख़त्म होनी चाहिए. जब तक जाति व्यवस्था ख़त्म नहीं होती है तब तक उनका कायपलट नहीं हो सकता है.

हिन्दू धर्म में शोषितों को इंसान के तौर पर देखा जाना चाहिए

कालाराम मंदिर का आंदोलन में आंबेडकर ने सवर्णों को चुनौती दी थी. दो मार्च, 1930 को आंबेडकर ने जो भाषण दिया वो काफ़ी प्रभावी और लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था.
आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा था, ''आज हम मंदिर में प्रवेश करने वाले हैं. मंदिर में जाने से हमारी सारी समस्याएं ख़त्म नहीं हो जाएंगी. हमारी समस्याएं सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और शैक्षिणिक हैं.''
आंबेडकर ने कहा था, ''कालाराम मंदिर में प्रवेश करना सवर्ण हिन्दुओं के लिए चुनौती से कम नहीं थी. सवर्णों ने हमारी पीढ़ियों के हक़ मारे हैं. हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं. क्या सवर्ण हिन्दू हमें एक मनुष्य के तौर पर स्वीकार करेंगे या नहीं? कालाराम मंदिर में आंदोलन से यह साफ़ हो जाएगा.''

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