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यहां तो बस अपनी फिक्र है , भारत में डॉक्टरों की सुनने वाला कोई है?

कोरोना वायरस: भारत में डॉक्टरों की सुनने वाला कोई है?


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भारत में कोरोनावायरस के मामले

4067

कुल मामले

292

जो स्वस्थ हो गए

109

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
11: 27 IST को अपडेट किया गया
दिल्ली का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स देश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में आता है.
लेकिन कोरोना वायरस को लेकर जारी जंग में एम्स के डॉक्टर बुनियादी सुविधाओं को लेकर ही चिंतित हैं. साथ ही उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर भी चिंता है.
गुरुवार, 2 अप्रैल को दिल्ली में एम्स के एक डॉक्टर कोरोना वायरस के टेस्ट में पॉज़िटिव पाए गए.
इसके बाद यह ख़बर आई कि उनकी नौ महीने की गर्भवती पत्नी भी इस वायरस की चपेट में हैं. उनकी पत्नी एम्स के ही इमर्जेंसी वार्ड में पोस्टेड हैं.
इस तरह से देश की राजधानी में कोरोना से पीड़ित डॉक्टरों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है.
मेडिकल सुपरिटेंडेंट डी के शर्मा के मुताबिक़, रेज़िडेंट डॉक्टर किसी भी पेशेंट केयर सर्विस में शामिल नहीं थे.
एम्स के एक रेज़िडेंट डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह एक ऐसे हालात की शुरुआत है जिसमें एम्स जैसे हॉस्पिटलों के हेल्थकेयर वर्कर्स का इस वायरस की चपेट में आना शुरू हो गया है. इसकी वजह यह है कि इनके पास प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स या सैनिटाइज़र्स नहीं हैं.

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एक डॉक्टर ने कहा, "हर दिन जब मैं ड्यूटी करने हॉस्पिटल जाता हूं तो मुझे अपने और दूसरों के लिए डर लगता है. हम इस अंदाज़े पर काम कर रहे हैं कि जो मरीज़ दूसरी बीमारियों के लिए हमारे पास आ रहे हैं वे कोरोना वायरस से पीड़ित नहीं हैं या वे इस वायरस के कैरियर नहीं हैं. इस तरह से हम फ्रंटलाइन वर्कर्स के तौर पर इस महामारी से लड़ रहे हैं."
पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) में मास्क, रेस्पिरेटर्स, आई शील्ड्स, गाउन और ग्लव्ज आते हैं. इन पीपीई की देश में भारी कमी है. इस कमी ने हेल्थ केयर वर्कर्स की कोविड-19 से लड़ने की क्षमता पर बुरा असर डाला है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.
राज्य या केंद्र शासित प्रदेशकुल मामलेजो स्वस्थ हो गएमौतें
महाराष्ट्र6904245
तमिलनाडु57185
दिल्ली503187
तेलंगाना321347
केरल314552
राजस्थान253210
उत्तर प्रदेश227192
आंध्र प्रदेश22613
मध्य प्रदेश16509
कर्नाटक151124
गुजरात1221811
जम्मू और कश्मीर10642
हरियाणा84251
पश्चिम बंगाल80103
पंजाब6846
बिहार3001
उत्तराखंड2640
असम2600
ओडिशा2120
चंडीगढ़1800
लद्दाख14100
हिमाचल प्रदेश1311
अंडमान निकोबार द्वीप समूह1000
छत्तीसगढ़930
गोवा700
पुडुचेरी510
झारखंड300
मणिपुर200
मिज़ोरम100


स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
11: 27 IST को अपडेट किया गया
आरडीए एम्स के जनरल सेक्रेटरी और एक वरिष्ठ रेज़िडेंट डॉक्टर टी श्रीनिवास राजकुमार के मुताबिक़, "हमें पीपीई के रीयूज़ (दोबारा इस्तेमाल) को लेकर हेल्थ मिनिस्ट्री की गाइडलाइंस का पालन करना चाहिए. एम्स प्रशासन ने मास्क और पीपीई किट्स के रीयूज़ का सुझाव दिया था."
राजकुमार श्रीनिवास ने कहा कि शुक्रवार की सुबह डॉक्टर और नर्सें ट्रेनिंग पर आए तो वे अपने मास्क लेकर आए थे. उन्होंने कहा, "यह अस्वीकार्य है."



कोरोना से जंग में जो हैं सबसे आगे

आरडीए डॉक्टरों और नर्सों की सुरक्षा की कर रहा मांग

एम्स डायरेक्टर को 16 मार्च को रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने कहा कि एक दिन पहले एग्ज़िक्यूटिव्स की एक टीम ने कहा कि वार्ड्स में सावधानी वाले उपकरण नहीं हैं.
लेटर में उन्होंने अनुरोध किया कि आरडीए को कोरोना वायरस एक्शन टीम में एक स्टेकहोल्डर बनाया जाए ताकि इस स्थिति को बेहतर बनाया जाए.
पूरे देश के डॉक्टर पीपीई, एन95 मास्क और दूसरे प्रोटेक्टिव गियर उन्हें मुहैया कराए जाने की मांग कर रहे हैं.
एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया को लिखी चिट्ठी में आरडीए के प्रेसिडेंट डॉ. आदर्श प्रताप सिंह ने कहा, "हमने प्रशासन से मांग की है कि वह हर वक़्त पीपीई की उपलब्धता को तय करे ताकि डॉक्टर और नर्सों को सुरक्षा मुहैया कराई जा सके."
एम्स के मेडिकल एक्सपर्ट्स को हैंड सैनिटाइज़र्स और प्लास्टिक फ़ेस शील्ड्स का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. इन गियर्स को इन लोगों ने ख़ुद तैयार किया है क्योंकि इन्हें कोविड-19 के मरीज़ों के इलाज के लिए तैनात किया गया है.
श्रीनिवास राजकुमार ने कहा कि आरडीए ने यह भी कहा था कि डॉक्टरों के ठहरने की व्यवस्था नहीं की गई है, हालांकि इस बात के निर्देश दिए गए थे कि डॉक्टरों का ट्रैवल टाइम कम कर दिया जाए. डॉक्टरों की स्क्रीनिंग नहीं हो रही है और हालात एक टाइम बम जैसे हो गए हैं.
हॉस्टल वार्डन संदीप अग्रवाल ने फ़ोन पर बताया कि सभी प्रिवेंटिव उपाय अपनाए जा रहे हैं. इसके बाद उन्होंने फ़ोन काट दिया.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा था कि महामारी से जूझ रहे डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ़ को डब्ल्यूएचओ ग्रेड वाले प्रोटेक्टिव गियर मुहैया कराने की मांग को लेकर नागपुर के एक डॉक्टर की याचिका पर ग़ौर करें.
इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि हॉस्पिटलों के पास 3.34 लाख पीपीई मौजूद हैं और 60,000 पीपीई को ख़रीदा जा चुका है और 10,000 पीपीई रेड क्रॉस ने डोनेट किए हैं.
कोविड-19 पर नेशनल प्रीपेर्यडनेस सर्वे 410 ज़िलाधिकारियों पर कराया गया. इसमें 266 पूरे भरे फ़ॉर्म्स में 23 सवाल शामिल थे. इनसे पता चला कि ज़्यादातर राज्यों को लगता है कि उनके पास पीपीई किट्स, मास्क और सैनिटाइज़र्स की कमी है.
सर्वे में शामिल क़रीब 47 फ़ीसदी अफ़सरों ने कहा कि उन्हें लगता है कि उनके ज़िले के हॉस्पिटलों में पीपीई की कमी है.
मिनिस्ट्री ऑफ़ पर्सनल के तहत डिपार्टमेंट ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स एंड पब्लिक ग्रीवांसेज़ के कराए इस सर्वे में 2014-18 के बैच के आईएएस अफ़सर शामिल किए गए थे जो केंद्रीय मंत्रालयों में असिस्टेंट सेक्रेटरीज़ के तौर पर काम कर चुके थे और उसके बाद उन्हें उनके संबंधित कैडर में भेज दिया गया.
सर्वे में क़रीब 34 फ़ीसदी रेस्पॉन्डेंट्स ने कहा कि लोकल हॉस्पिटल इस महामारी से लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.



कोरोना वायरस के ख़तरे से बचने के लिए लोग मास्क ख़रीद रहे हैं. पर क्या ये कारगर है?

3.8 करोड़ मास्क की ज़रूरत
रॉयटर्स ने रिपोर्ट की है कि इनवेस्ट इंडिया के मुताबिक़, भारत को कम से कम 3.8 करोड़ मास्क और 62 लाख पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट की ज़रूरत है. साथ ही सरकार ने सैंकड़ों कंपनियों से जल्द से जल्द इनकी सप्लाई के लिए संपर्क किया है.
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के दिए गए आंकड़ों के मुताबिक़, पूरे देश में अलग-अलग हॉस्पिटलों के पास 3.34 लाख पीपीई उपलब्ध हैं. क़रीब 60,000 पीपीई किट्स ख़रीदी जा चुकी हैं और इनकी सप्लाई की जा चुकी है. भारतीय रेड क्रॉस ने भी चीन से 10,000 पीपीई की व्यवस्था की है.
पीपीई बनाने वाली 11 घरेलू कंपनियों को योग्य माना गया है. साथ ही इन कंपनियों को 21 लाख पीपीई के ऑर्डर दिए जा चुके हैं.
डब्ल्यूएचओ ने 27 फरवरी को सभी देशों को गाइडलाइंस जारी कीं और कहा कि देशों को बड़े पैमाने पर पीपीई का स्टॉक कर लेना चाहिए. डब्ल्यूएचओ ने इंडस्ट्री बॉडीज़ और सरकारों से इन इक्विपमेंट्स का उत्पादन 40 फ़ीसदी बढ़ाने के लिए भी कहा था.
बीबीसी ने स्वास्थ्य मंत्रालय से उनका कमेंट लेने की कोशिश की, लेकिन हेल्थ मिनिस्टर के पीए को किए गए टेक्स्ट्स का कोई जवाब नहीं आया.

रेनकोट पहनकर इलाज कर रहे डॉक्टर

कई ख़बरों में भारत में डॉक्टरों और नर्सों के बारे में बताया गया है कि वे रेनकोट पहनने या पीपीई को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. यहां तक कई जगहों पर वे बिना किसी पीपीई के लोगों का इलाज कर रहे हैं.
इटली जैसे दूसरे देशों में हज़ारों हेल्थकेयर वर्कर्स इस वजह से वायरस की चपेट में आ गए क्योंकि उन्हें प्रोटेक्टिव गियर नहीं मिल पा रहे थे.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, कोलकाता की बेलीयाघाटा इनफ़ेक्शियस डिज़ीज़ हॉस्पिटल में पिछले हफ़्ते जूनियर डॉक्टरों को प्लास्टिक रेनकोट पहनकर मरीज़ों को देखना पड़ा. हरियाणा में डॉक्टरों को मोटरबाइक हेलमेट पहनकर अपनी सुरक्षा करनी पड़ी.

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दूसरे राज्यों में भी हालत ख़राब
हक़ीक़त यह है कि दूसरे राज्यों में भी हॉस्पिटलों ने पीपीई किट्स की कमी को दोहराया है. उनका कहना है कि उन्हें एचआईवी किट्स दी गई हैं जो कि इस वायरस से लड़ने के लिए नाकाफ़ी हैं क्योंकि यह वायरस लिपिड (फ़ैट या वसा) की कोटिंग वाला है.
बिहार के पटना मेडिकल कॉलेज के एक डॉक्टर के मुताबिक़, राज्य सरकार ने गुरुवार को केंद्र सरकार से 5 लाख पीपीई की मांग की थी, जबकि उसे केवल 4,000 किट्स ही मिलीं. बिहार के सीएम ख़ुद 10 लाख एन95 मास्क की मांग कर चुके हैं लेकिन उन्हें केवल 50,000 मास्क ही मिले हैं.
पटना मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "बलिदान और आत्महत्या में अंतर होता है. लेकिन, हमारे लिए दोनों चीज़ें मिल गई हैं. मरना कौन चाहता है? लेकिन, अगर आप किसी को हॉस्पिटल में रखते हो तो आपको उसकी केयर करनी पड़ती है. हमसे कहा गया है कि एचआईवी किट्स का इस्तेमाल किया जाए. कम से कम हमें किट्स दी जाएं. हम सरकार की आलोचना नहीं कर रहे, लेकिन हम चाहते हैं कि दोनों पक्ष एकसाथ मिलकर काम करें. हम भी जुगाड़ कर रहे हैं."
सोशल मीडिया पर #GiveMePPE ट्रेंड कर चुका है. हेल्थ वर्कर्स का कहना है कि उनकी ज़िंदगियां जोखिम में हैं और कोई उन्हें सुन नहीं रहा है.
29 मार्च को उन रिपोर्ट्स को लेकर विवाद पैदा हो गया जिनमें कहा गया था कि भारत ने सर्बिया को 90 टन मेडिकल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट भेजे हैं जबकि देश में स्वास्थ्यकर्मी प्रोटेक्टिव गियर की कमी के चलते कोरोना मरीज़ों का इलाज करने में मुश्किलें झेल रहे हैं.
देशभर में 50 मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स कोरोना की चपेट में
आरडीए एम्स के पूर्व प्रेसिडेंट और प्रोग्रेसिव मेडिकोज़ एंड साइंटिस्ट्स फ़ोरम (पीएमएसएफ) के नेशनल प्रेसिडेंट डॉ. हरजीत सिंह ने कहा कि पूरे देश में क़रीब 50 हेल्थकेयर प्रोफ़ेशनल कोविड-19 की चपेट में आ गए हैं.
इससे देश में पीपीई की कमी का पता चलता है और साथ ही मेडिकल प्रोफ़ेशन में लगे लोगों में इंफ़ेक्शन का भी जोखिम पैदा हो रहा है.
उन्होंने कहा, "मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स स्किल्ड वर्कर्स होते हैं जिन्हें आप रातों-रात तैयार नहीं कर सकते. अगर ज़्यादातर मेडिकल प्रोफ़ेशनल बीमार हो जाएंगे या क्वारंटाइन में चले जाएंगे तो हमारा हेल्थकेयर सिस्टम पूरी तरह से बैठ जाएगा. इससे लाखों लोग जोखिम में आ जाएंगे. अगर सरकार हमें पूरी सुरक्षा और प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट दे जाएं तो भारतीय हेल्थकेयर वर्कर्स चमत्कार करने की ताक़त रखते हैं."

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2 अप्रैल को टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दिल्ली के हिंदूराव हॉस्पिटल के जिन डॉक्टरों और नर्सों ने पीपीई की कमी के चलते इस्तीफ़े दे दिए थे उन्हें 1 अप्रैल 2020 को जारी किए गए नोटिफ़िकेशन में उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की चेतावनी दी गई है.
29 मार्च को एक प्रैक्टिसिंग ऑनकोलॉजिस्ट डॉ. इंद्रनील ख़ान को गिरफ्तार कर लिया गया.
उन्होंने एक दिन पहले ही नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के उनके पूर्व सहयोगी डॉक्टरों और नर्सों के हॉस्पिटल में बिना पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट पहने कोरोना मरीज़ों का इलाज करते हुए फोटोग्राफ्स पोस्ट की थीं.
बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया. कई डॉक्टर और नर्सें केवल नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि वे डरे हुए हैं.
28 साल के इस डॉक्टर ने कहा कि इस महामारी में मृत्यु दर बेहद कम है, लेकिन यह महामारी है और इसमें पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है.
डॉक्टरों में बड़े पैमाने पर संक्रमण फैलने का ख़तरा
उन्होंने कहा, "हमारे पास पीपीई नहीं हैं और हमें ये मिल भी नहीं पा रहे हैं. इसके लिए डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस हैं. लोग पैनिक में ख़रीदारी कर रहे हैं, लेकिन जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है उन्हें ये नहीं मिल पा रहे हैं. जूनियर और सीनियर डॉक्टर एक जगह पर खाते हैं और हॉस्टल साझा करते हैं. एक हॉस्टल में 200-300 डॉक्टर एकसाथ रहते हैं. अगर मैं मरीज़ देखने जाता हूं तो मुझे संक्रमण हो सकता है. मैं यह बीमारी अपने साथ लाऊंगा और मुझसे यह दूसरों में फैल सकता है. पीएम केयर्स का फ़ंड जिसमें 38,000 करोड़ रुपए हैं, वह कब रिलीज़ किया जाएगा."
कई डॉक्टरों का कहना है कि यह कोई फ़िज़िकल फ़ाइट नहीं है, बल्कि यह टेक्नोलॉजी फ़ाइट है और जोश और हीरो बनने की कोशिशों से कोई फ़ायदा नहीं होगा.



कोरोना वायरस : जिनके लिए ज़िंदगी बन गई है एक जंग

नालंदा बिहार के गांधी फ़ैलो सौरभ राज बिहार में डॉक्टरों के लिए पीपीई किट्स जुटाने के लिए फ़ंड इकट्ठा कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस मार्केट में बिचौलिए दाख़िल हो गए हैं और ये लोग किट्स की जमाखोरी कर रहे हैं ताकि बाद में इन्हें मोटी कीमत पर बेच सकें.
उन्होंने कहा कि इनके चार स्लैब हैं. ये हैं- 600 रुपये, 900 रुपये, 1,100 और 1,300 रुपये.
उन्होंने कहा, "पीपीई उपलब्ध तो हैं लेकिन ये तकरीबन दोगुनी कीमत पर बेची जा रही हैं. आदर्श रूप में एक किट 700 रुपये की होनी चाहिए. मास्क तो मिल ही नहीं रहे हैं."
पटना के पीएमसीएच की एक युवा डॉक्टर ने कहा कि पूरी स्थिति काफ़ी गंभीर है. उन्होंने कहा, "कोई भी मरना नहीं चाहता. हम नहीं चाहते कि हमें सुसाइड मिशन पर भेजा जाए."

बीबीसी के सवाल

बीबीसी रिपोर्टर ने एम्स डायरेक्टर और मीडिया कोऑर्डिनेटर को सवालों की एक लिस्ट भेजी. उन्हें की गई कॉल्स का कोई जवाब नहीं आया. वो सवाल कुछ इस तरह से हैं..
  1. डॉक्टर्स पीपीई और सैनिटाइज़र्स जैसी दूसरी चीज़ों को लेकर चिंतित हैं. क्या आप बताएंगे कि कितनी किट्स, मास्क, ग्लव्ज और सैनिटाइज़र्स उपलब्ध हैं, क्या इनके ऑर्डर दिए गए हैं?
  2. क्या डॉक्टरों से पीपीई को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए कहा जा रहा है और क्या इसके लिए कोई प्रक्रिया है?
  3. एम्स में कितने डॉक्टर, नर्स और दूसरे हेल्थकेयर स्टाफ़ हैं और क्या उनके लिए पर्याप्त प्रोटेक्शन हैं?
  4. यह संक्रामक बीमारी है और ऐसे में सावधानी बरतनी ज़रूरी है ताकि लोगों को संक्रमण न हो. इसके लिए क्या प्रक्रियाएं हैं?
  5. क्या सरकार ने पीपीई और दूसरी चीज़ों के बारे में कुछ कहा है?

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