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कोरोना वायरस: मध्य प्रदेश में हालात बिगड़ने का ज़िम्मेदार कौन?


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भारत में कोरोनावायरस के मामले

13835

कुल मामले

1767

जो स्वस्थ हुए

452

मौतें

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
19: 0 IST को अपडेट किया गया
मध्यप्रदेश में कोरोना के लगातार बढ़ते मरीज़ों ने सरकार के लिये चिंता पैदा कर दी है. मध्यप्रदेश में कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों की संख्या 1408 पर पहुंच गई है. वही मरने वालों की तादाद 62 हो गई है.
प्रदेश का इंदौर शहर सबसे ज़्यादा प्रभावित है जहां पर संक्रमितों का आंकड़ा 892 पर पहुंच चुका है वहीं शहर में मरने वालों की तादाद 47 हो गई है. इंदौर के बाद दूसरा नंबर राजधानी भोपाल का है जहां पर 207 लोग प्रभावित हैं और मरने वालों की तादाद 6 है. हालांकि प्रशासन का मानना है कि भोपाल में मरने वाले लोग किसी न किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे.
लेकिन प्रदेश के हालात इस स्तर पर पहुंचने के लिये कौन ज़िम्मेदार है. हमने यही जानने के लिए इसकी पड़ताल की.
मध्यप्रदेश में अगर सरकार की बात की जायें तो पूरी सरकार एक व्यक्ति मतलब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ही चल रही है. न प्रदेश में स्वास्थ्य मंत्री है और न ही कोई अन्य मंत्री.
इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारी अपने स्तर पर निर्णय ले रहे हैं और अब तक जितने भी उनके प्रयास हैं वह विफल साबित हुए है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञ अमूल्य निधि इस पर कई सवाल खड़े करते है. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मध्यप्रदेश में हम सामूहिक ज़िम्मेदारी का अभाव देख रहे हैं. सारे कामों को इतना ज्यादा केंद्रीकृत कर दिया गया है कि उसके नतीज़े सामने नही आ पा रहे हैं."
सामूहिक ज़िम्मेदारी का अभाव या और भी कुछ
कोरोना वायरसइमेज कॉपीरइटS NIAZI
अमूल्य निधि का यह भी दावा है कि मध्यप्रदेश में फैल रहे कोरोना संक्रमण की वजह लंबित सैंपल भी है. अगर आंकड़ों को देखा जाए तो प्रदेश में 17 अप्रैल तक 20298 सैंपल लिये गये हैं जिनमें 15302 की रिपोर्ट आयी है. वही लंबित मामले 4996 हैं.
लंबित मामलों को देखा जाए तो यही दिक्क़त पैदा कर रहे हैं.
रिपोर्ट आने में इतना समय लग रहा है कि कई मामलों में वह व्यक्ति कई लोगों में वायरस को फैला चुका होता है. वहीं कई रिपोर्ट व्यक्ति की मौत के बाद आ रही है जिसकी वजह से लोग अंतिम संस्कार में वह सावधानी नहीं बरतते हैं जो कोरोना पीड़ित के लिए ज़रूरी होती है.
अमूल्य निधि का कहना है ,"सरकार को इसे देखना चाहिए और आंकड़ों में पारदर्शिता रखनी चाहिए तभी बीमारी को ख़त्म किया जा सकता है. वर्ना इससे लड़ाई आसान नहीं है."
प्रशासन जो बुलेटिन जारी कर रहा है उसमें कई जगह आंकड़े अलग अलग जारी किए जा रहे हैं और कई चीज़ों को छुपाने का प्रयास भी किया जा रहा है.
ग़ैर-सरकारी संगठन जन-स्वास्थ्य अभियान में राष्ट्रीय सह-संयोजक के तौर पर जुड़े अमूल्य निधि आगे बताते है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार बनाते ही ज़ोर इस बात पर दिया कि अपने क़रीबी अधिकारियों को वो मुख्य पदों पर ला सकें न कि ऐसे अधिकारियों के अनुभव का लाभ लिया जा सके जो इस संकट में विशेषता रखते हैं.
जब सरकार स्वास्थ्य को लेकर आपातकालीन स्थिति का सामना कर रही है तो उस वक़्त अधिकारियों के तबादले किये जा रहे थे. इंदौर जैसे शहर में नई सरकार ने कलेक्टर बदल दिया जबकि स्थिति लगातार बिगड़ रही थी. नये कलेक्टर आने के बाद स्थिति बद से बदतर हो गई.
तबादलों को सिलसिला अभी भी जारी है. सरकार ने 16 तारीख़ को एक आदेश निकाल कर स्वास्थ्य संचालनालय में काम कर रहे 12 डाक्टरों को तत्काल इंदौर में पहुंचने के आदेश दिये हैं. ख़ास बात यह है कि इनमें वो लोग भी हैं जो क्वारंटीन में है. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि सरकार इस वक़्त मनमाने आदेश निकाल रही है.
जब क्वारंटीन वाले डाक्टर्स की ड्यूटी इंदौर जैसी जगह में लगाई जाएगी तो इससे अन्य स्टाफ़ में संक्रमण फैलने का ख़तरा है. जब इस बारे में प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो किसी ने भी फ़ोन नही उठाया.
अमूल्य निधि का यह भी कहना है कि सरकार को इस संकट के समय सभी की मदद लेकर आगे बढ़ना था ताकि स्थिति को आसानी से काबू किया जा सकता. उन्होंने कहा, "सरकार को सभी दलों और पूर्व मुख्यमंत्रियों, स्वास्थ्य मंत्रियों और विषय विशेषज्ञों से बात करके रणनीति बनानी चाहिए थी लेकिन ऐसा नही किया गया. जिसका नतीजा हम मालवा, निमाड़ और दूसरे स्थानों में फैल रहे कोरोना से समझ सकते हैं."
इंदौर में कोविड-19 मेडिकल टीम के डॉक्टर आनंद राय शहर में बन रही स्थिति के लिये उन 4400 लोगों को ज़िम्मेदार मानते हैं जो विदेश से आये और जिन्होंने सेल्फ क्वारंटीन का पालन नहीं किया. उन्होंने कहा, "थर्मल स्क्रीनिंग सही प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि उससे सिर्फ़ बुख़ार का पता चलता है. लेकिन जो लोग शहर में जाकर मिल गये उन्होंने स्थिति को बिगाड़ दिया और हालात यहां तक पहुंच गये."
वही उन्होंने यह मामला भी उठाया कि लोगों को राशन उपलब्ध नहीं हो रहा है तो वो मजबूरी में बाहर निकल रहे है. उन्होंने यह भी कहा कि ज़रुरत इस बात की है कि जो सीधे कोरोना के ख़िलाफ लड़ाई में जुड़े हुये हैं चाहें वो पुलिस वाले हों, सफ़ाई कर्मचारी हों या राशन सप्लाई के काम में लगे, उनकी रैडम सैंपलिंग की जानी चाहिए.
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और अधिक टेस्ट किये जाने की ज़रूरत
वहीं शहर के प्राइवेट डॉक्टर अब्दुल ग़नी अंसारी भी मानते हैं कि बीमारी को तभी ख़त्म किया जा सकता है जब ज़्यादा से ज़्यादा जांच की जा सके.
उन्होंने कहा, "सबसे ज़रूरी यही है कि लोग इस मामले में ख़ुद आ रहे हैं, अगर उनमें ज़रा सा भी सिंमटम दिख रहा है तो, लेकिन प्रशासन को भी व्यवस्था करनी चाहिए कि वो फौरन उनका टेस्ट कराएं और क्वारंटीन कराएं."
अंसारी भी सेल्फ क्वारंटीन में है और उनका डॉक्टर बेटा भी कई दिनों से बुख़ार में है लेकिन नोडल अधिकारी को बताने के बाद भी अभी तक कोई ख़बर लेने नहीं आया.
वही इंदौर आईआईएम के प्रोफेसर सायंतन बनर्जी ने भी प्रदेश में बढ़ रहे कोरोना मरीज़ पर एक शोध किया है. यह शोध मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वीरा बालदंडायुथानी, रूपम भट्टाचार्य, शारिक मोहम्मद और प्रोफेसर उपली चंदा के साथ मिलकर किया गया है.
इसके मुताबिक़, यदि यही दर रही तो अप्रैल के आख़िर तक कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या ढाई हज़ार और मई के आख़िर तक 50 हज़ार हो सकती है. इसलिए ज़रूरी है कि सरकार इस स्थिति से बचने के लिये टेस्ट में तेज़ी लाए, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए और पॉजिटिव मरीज़ो के संपर्क में आए लोगों को क्वारंटीन किया जाए.
लेकिन प्रशासन की बात की जाए तो वो इंदौर शहर की स्थिति के लिए भी विदेश से आये लोगों की ही ज़िम्मेदार मान रहा है.
कलेक्टर मनीष सिंह ने कहा, "शहर में पांच- छह हज़ार लोग विदेश से आए. इन लोगों ने इसे फैलाने में मदद की. इनकी स्क्रिनिंग सही तरह से की जाती और इन्हें क्वारंटीन कर दिया जाता तो यह स्थिति नहीं बनती."
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जांच करने वालों के लिए भी बड़ा है ख़तरा
वहीं इस वक़्त इंदौर शहर में स्क्रीनिंग का काम टीचर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सौंप गया है. यह घर-घर जाकर हर परिवार से यह पूछ रहे हैं कि उनके परिवार के सदस्य को सर्दी, खांसी या बुख़ार की शिकायत तो नहीं है. लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि कलेक्टर के आदेश के तहत इस काम में लगे टीचर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास खुद को वायरस से बचाने के लिए लिए पीपीई किट नहीं है.
उनको सस्ते किस्म के मास्क, दस्ताने और कैप दी गई हैं. इस काम के लिए 14 कैप, 14 मास्क और 14 दास्ताने और सैनिटाइजर दिया गया है. सर्वे करने का आदेश खुद कलेक्टर इंदौर ने दिया है और आदेश का पालन नहीं करने पर बर्ख़ास्तगी की चेतावनी है. मालूम हो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के मुताबिक संक्रमित इलाकों में स्वास्थ्य दल कार्यकर्ता के रूप में कार्य करने वाले लोगों को पीपीई किट पहनना होता है.
यदि पीपीई किट नहीं है तो कम से कम N65 मास्क तो उन्हें उपयोग के लिये दिये जाने चाहिए. सर्वे करने वालों ने जब पीपीई किट और N65 मास्क की मांग की तो उनको प्रशासन ने कहा कि आपको जो सामान दिया गया है आप उसी से सर्वे करें. बिना हथियार के कोरोनावायरस की रोकथाम में लगे टीचर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपनी जान बचाने के साथ-साथ नौकरी बचाने की मुहिम में जुटे हैं.
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सर्वे करने वाली एक महिला ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि 2 लोगों को 200 परिवार का सर्वे करना है. पहले 50 घर करने के बाद दूसरे 50 घर करना है फिर पहले 50 घरों के परिवार के लोगों का फॉलोअप करना है. इस दौरान ऐप में यह जानकारी भरी जानी है कि परिवार के सदस्यों को सर्दी,खांसी या बुख़ार की शिकायत तो नहीं है. सर्वे की रिपोर्ट एक सुपरवाइजर और दो डॉक्टरों को दी जा रही है जो उसी मोहल्ले में तैनात हैं. यह जानकारी भी इस ऐप में दी जा रही है जो कभी-कभी बंद भी हो जाता है जिससे सर्वे करने वाले परेशान हैं.
सर्वे करते वक्त उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग भी रखनी पड़ रही है और इस दौरान संक्रमित इलाकों में रहते हुए खुद को वायरस से दूर भी रखना पड़ रहा है. काम पूरा करके घर लौटने के बाद इन्हें इस बात की भी सावधानी बरतनी पड़ रही है कि उनके घर में उनके जरिए यह संक्रमण ना आ जायें. प्रदेश के इंदौर शहर को देखा जाए तो कोरोना के ख़िलाफ यहां पर अभी लंबी जंग लड़ी जानी है.
कोरोना वायरस

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