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#Corona Virus की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था ख़राब हो रही है?


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भारत की राजधानी दिल्ली में रह रहे हज़ारों ग़रीबों में से मोहम्मद आलम एक हैं. वो सरकार की ओर से मिलने वाले राशन के लिए लगने वाली कतार में खड़े हैं. अपने बच्चे को गोद में लिए मोहम्मद आलम सरकारी दाल-चावल मिलने के इंतज़ार में हैं.
जिस फ़ैक्ट्री में वो दैनिक मज़दूरी करते थे वो बंद हो गई है और उनकी आमदनी का ज़रिया भी ठप हो गया है. आने वाले वक़्त में आलम अपने परिवार का पेट कैसे भरेंगे इसकी चिंता उन्हें सता रही है. वो कहते हैं, ''मुझे नहीं पता मैं कैसे रहूंगा. परिवार का पेट भरने के लिए मुझे पैसे उधार लेने पड़ेंगे.''
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उसी दिन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहती हैं कि ''कोई भी भूखा न रहे सरकार इसका प्रयास कर रही है.'' लेकिन जिन कतारों में आलम जैसे लोग खड़े हैं वो बहुत लंबी हैं और खाने की मात्रा पर्याप्त नहीं है.
कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से जिस वक़्त देश में लाखों लोग घरों में हैं और वो ऑनलाइन डिलिवरी सिस्टम का भरपूर फायदा उठा रहे हैं और घर बैठे मनचाही चीज़ें भी हासिल कर पा रहे हैं, उसी वक़्त देश में हज़ारों लोग सड़कों पर हैं और उनके सामने रोज़ीरोटी का संकट है.
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यह विकट संकट की घड़ी है. 130 करोड़ आबादी वाले देश में तीन हफ़्तों के लिए लॉकडाउन घोषित किया गया है. लोगों को घरों में रहने के लिए कहा गया है और कारोबार पूरी तरह ठप हैं. बड़ी संख्या में लोग घरों से काम कर रहे हैं और प्रोडक्टिविटी में भारी गिरावट देखने को मिल रही है.
बीते सप्ताह भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आर्थिक उपायों की घोषणा करते हुए कहा था, ''दुनिया भर के देश एक अदृश्य हत्यारे से लड़ने के लिए लॉकडाउन कर रहे हैं.''

कोरोना से पहले ही कमज़ोर थी अर्थव्यवस्था

कोरोना वायरस के भारत में पहुंचने से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक थी.
कभी दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की विकास दर बीते साल 4.7 फ़ीसदी रही. यह छह सालों में विकास दर का सबसे निचला स्तर था.
साल 2019 में भारत में बेरोज़गारी 45 सालों के सबसे अधिकतम स्तर पर थी और पिछले साल के अंत में देश के आठ प्रमुख क्षेत्रों से औद्योगिक उत्पादन 5.2 फ़ीसदी तक गिर गया. यह बीते 14 वर्षों में सबसे खराब स्थिति थी. कम शब्दों में कहें तो भारत की आर्थिक स्थिति पहले से ही ख़राब हालत में थी.
विशेषज्ञों का मानना है कि अब कोरोना वायरस के प्रभाव की वजह से जहां एक ओर लोगों के स्वास्थ्य पर संकट छाया है तो दूसरी ओर पहले से कमज़ोर अर्थव्यवस्था को और बड़ा झटका मिल सकता है.
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सरकार के प्रयासों का रियलिटी चेक

भारत में असंगठित क्षेत्र देश की करीब 94 फ़ीसदी आबादी को रोज़गार देता है और अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 45 फ़ीसदी है. लॉकडाउन की वजह से असंगठित क्षेत्र पर बुरी मार पड़ी है क्योंकि रातोंरात हज़ारों लोगों का रोज़गार छिन गया. इसीलिए सरकार की ओर से जो पहले राहत पैकेज की घोषणा की गई वो ग़रीबों पर आर्थिक बोझ कम करने के उद्देश्य से हुई.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1.70 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की जिससे भारत के गरीब 80 करोड़ लोगों को आर्थिक बोझ से राहत मिलेगी और उनकी रोज़ीरोटी चल सके. खातों में पैसे डालकर और खाद्य सुरक्षा का बंदोबस्त करके सरकार गरीबों, दैनिक मज़दूरी करने वालों, किसानों और मूलभूत सुविधाओं से वंचित लोगों की मदद कर रही है.
विशेषज्ञ सरकार के इन प्रयासों की सराहना कर रहे हैं लेकिन वो यह भी मानते हैं कि अर्थव्यवस्था को इस संकट के बुरे असर बचाने के लिए और भी प्रयास किए जाने की ज़रूरत है.
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आप्रवासी मज़दूर

अर्थशास्त्री अरुण कुमार का मानना है कि इन घोषणा को ज़मीनी स्तर पर लागू करना सबसे बड़ी चुनौती है.
वो कहते हैं, ''लॉकडाउन के वक़्त जब अतिरिक्त मुफ़्त राशन देने की घोषणा की गई है, गरीब लोग उस तक कैसे पहुंच पाएंगे. सरकार को सेना और राज्यों की मशीनरी की मदद से सीधे ग़रीबों तक खाने की चीज़ें पहुंचानी चाहिए.''
अरुण कुमार कहते हैं कि इस वक़्त हज़ारों लोग अपने घरों से दूर फंसे हुए हैं, ऐसे में सरकार को चाहिए कि वो खातों में पैसे डालने का काम तेज़ी से करे और खाने की चीज़ों की सप्लाई को भी प्राथमिकता पर रखे.
दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर अपने गांव के लिए पैदल निकले नीरज कुमार जैसे हज़ारों आप्रवासी मज़दूर सड़कों पर हैं. दिल्ली से करीब 40 किलोमीटर दूर हमारी मुलाक़ात नीरज से हुई अपनी पत्नी और बेटी के साथ पैदल ही गांव के लिए निकल पड़े. वो कहते हैं, ''यहां अब कोई काम नहीं है इसलिए हम यहां से जा रहे हैं. बसें नहीं चल रहीं इसलिए अपने गांव पहुंचने के लिए हमें 260 किलोमीटर और पैदल चलना पड़ेगा.''
नीरज जैसे हज़ारों लोग अपना गांव घर छोड़कर दिल्ली आकर यहां दैनिक मज़दूरी और दूसरे कई काम करते हैं. जो लोग वक़्त पर घर के लिए नहीं निकल पाए वो अब सरकारी शेल्टर में रह रहे हैं.
अर्थशास्त्री जयति घोष के मुताबिक, ''ये वो लोग हैं जिनके खातों में तत्काल कैश ट्रांसफर किए जाने की ज़रूरत है. उन्हें किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं मिली है. सरकार को राजकोषीय घाटे की चिंता नहीं करनी चाहिए. वो आरबीआई से उधार ले और इस विपदा की घड़ी में लोगों पर खर्च करे.''
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कोविड-19 का संक्रमण ऐसे वक़्त में फैला है जब भारत की अर्थव्यवस्था मोदी सरकार के साल 2016 के नोटबंदी के फ़ैसले की वजह से आई सुस्ती से उबरने की कोशिश कर रही है. नोटबंदी के ज़रिए सरकार कालाधन सामने लाने की कोशिश कर रही थी लेकिन भारत जैसी अर्थव्यवस्था जहां छोटो-छोटे कारोबार कैश पेमेंट पर ही निर्भर थे, इस फैसले से उनकी कमर टूट गई. अधिकतर धंधे नोटबंदी के असर से उबर ही रहे थे कि कोरोना वायरस की मार पड़ गई.

कृषि क्षेत्र

सरकार ने राहत पैकेज में किसानों के लिए अलग से घोषणा की है. सरकार अप्रैल से तीन महीने तक किसानों के खातों में हर महीने 2000 रुपये डालेगी. सरकार किसानों को सालाना 6000 रुपये पहले ही देती थी.
अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं, ''दो हज़ार रुपये की मदद पर्याप्त नहीं है क्योंकि निर्यात ठप हो चुका है, शहरी क्षेत्रों में कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि मांग बढ़ रही है और ग्रामीण क्षेत्र में कीमतें गिरेंगी क्योंकि किसान अपनी फसल बेच नहीं पाएंगे.''
यह संकट बेहद गंभीर समय में आया है, जब नई फसल तैयार है और बाज़ार भेजे जाने के इंतज़ार में है. भारत जैसे देश में जहां लाखों लोग गरीबी में जी रहे हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि कठिन लॉकडाउन की स्थिति में गांवों से खाने-पीने की ये चीज़ें शहरों और दुनिया के किसी भी देश तक कैसे पहुंचेंगी. अगर सप्लाई शुरू नहीं हुई तो खाना बर्बाद हो जाएगा और भारतीय किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा. भारत की कुल आबादी का 58 फ़ीसदी हिस्सा खेती पर निर्भर है और देशी की अर्थव्यस्था में 256 बिलियन डॉलर का योगदान है.
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बेरोज़गारी

विशेषज्ञ इस बात के लिए भी चेतावनी दे रहे हैं कि भारत में बेरोज़गारी बढ़ने के पूरे आसार हैं. बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां बंद होने की वजह से उत्पादन में भारी गिरावट आई है.
प्रोफेसर घोष का मानना है कि स्वयं रोज़गार करने वाले या छोटे कारोबार में जुड़े लोगों को राहत देने के लिए सरकार ब्याज़ और टैक्स चुकाने में छूट देकर उनकी मदद कर सकती है ताकि कारोबार उबर पाए.
अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं, ''भारत में बेरोज़गारी अब भी रिकॉर्ड स्तर पर है और अगर यह स्थिति जारी रहती है तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों को बड़ी मुश्किल झेलनी पड़ेगी. छोटो कारोबार में काम करने वाले लोग या तो कम पैसे में काम करने को मज़बूर होंगे या फिर उनकी नौकरी छिन जाएगी. मैं ऐसी जगहें जानता हूं जहां कंपनियों में यह चर्चा चल रही है कि कितने लोगों को नौकरी से निकाले जाने की ज़रूरत है.''
भारत में हवाई सफ़र पर फिलहाल 14 अप्रैल तक के लिए रोक लगी है. बंद का असर एविएशन इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. सेंटर फॉर एशिया पैसिफिक एविएशन (CAPA) के अनुमान के मुताबिक एविएशन इंडस्ट्री को करीब चार अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ेगा. इसका असर हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म सेक्टर पर भी होगा. देश में होटल और रेस्टोरेंट चेन बुरी तरह प्रभावित हैं और कई महीनों तक यहां सन्नाटा पसरे रहने से बड़ी संख्या में लोगों को सैलरी न मिलने का भी संकट नज़र आ रहा है.
बंद की वजह से ऑटो इंडस्ट्री पर भी अछूती नहीं है और करीब दो अरब डॉलर का अनुमानित नुकसान झेलना पड़ सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने कोरोना वायरस के प्रभाव की वजह से अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जिस राहत पैकेज की घोषणा की है वो देश के कुल जीडीपी का एक फ़ीसदी है. सिंगापुर, चीन और अमरीका की तुलना में यह राहत पैकेज ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को बड़े पैकेज की घोषणा जल्द करनी चाहिए ताकि कोरोना की तबाही में डूब रहे कारोबार को वापस पटरी पर लाया जा सके.
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