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कोरोना से लड़ते सफ़ाई कर्मचारी ‘भगवान भरोसे’- बीबीसी विशेष


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'जय वाल्मीकि' से शुरू होने वाले दो मिनट के एक वाट्सऐप वीडियो क्लिप में दिल्ली सरकार और दक्षिण दिल्ली नगर निगम से मदद की गुहार लगाते युवा सुमित कुमार का चेहरा एक उपेक्षित पीड़ित का चेहरा है.
सुमित उन चेहरों के एक प्रतिनिधि हैं जो कोरोना के ख़िलाफ़ इस युद्ध की एक बड़ी कीमत चुका रहा है. सुमित के पिता, 57 वर्षीय विनोद कुमार, दक्षिण दिल्ली नगर निगम में स्थायी सफ़ाई कर्मचारी थे. दिल्ली की सड़कों से कूड़ा उठाते हुए वे कोरोना संक्रमण का शिकार हुए और बीते 25 अप्रैल को दिल्ली के एम्स अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया.
सुमित बताते हैं कि उनके पिता बिना मास्क और दस्तानों के ही लगतार सफ़ाई का काम करने को मजबूर थे. काम के दौरान हुए कोरोना संक्रमण की वजह से जान से जाने वाले 55 साल के विनोद दिल्ली के दूसरे सफ़ाई कर्मचारी हैं जो कोरोना से साथ युद्ध में मारे गए.
उनकी मृत्यु से ठीक पहले दिल्ली के शाहादरा क्षेत्र के वार्ड नम्बर 238 में काम करने वाली सफ़ाई कर्मचारी दया की भी कोरोना संक्रमण से मौत हो गई थी.
विनोद और दया की मौत में अपनी डरावनी नियति की आशंका देखने वाले दिल्ली के सफ़ाई कर्मचारी इन दोनों को 'शहीद सफ़ाई सैनिक' मानते हैं. लेकिन विनोद और दया तो राजधानी दिल्ली के सरकारी सफ़ाईकर्मी थे, ज़रा सोचिए कि भारत भर में काम कर रहे 50 लाख से भी ज़्यादा सफ़ाई कर्मचारियों के जीवन कितने जोखिम से भरा और कितना कठिन होगा.

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कोरोना महामारी के बीच काम करने को मजबूर सफ़ाई कर्मचारी

दिल्ली में बिना सुरक्षा हेड कवर, मास्क, दस्ताने और सैनिटाइज़र के काम करने को मजबूर सफ़ाई कर्मचारियों के कोरना संक्रमण की चपेट में आने की सबसे ज़्यादा आशंका है. इनमें से ज़्यादातर वंचित तबके और दलित वर्ग से आने वाले कर्मचारी हैं.
अखिल भारतीय सफ़ाई मजदूर संघ के प्रभारी अशोक गियानी ने अनुसार अभी तक दिल्ली में 50 से ज़्यादा सफ़ाई कर्मचारी कोरना संक्रमण का शिकार हो चुके हैं. बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "कोरोना के इस संकट भरे समय में डॉक्टरों, नर्सों और पुलिस प्रशासन के काम की सभी सराहना कर रहे हैं. यह बिल्कुल सही भी है... लेकिन साथ ही हमें उन सफ़ाई कर्मचारियों के योगदान को नहीं भूलना चाहिए जिनके सहियोग के बिना हम कोरोना से यह युद्ध कभी नहीं जीत सकते".
अशोक याद दिलाते हैं, "सफ़ाई कर्मचारियों का काम 'एसेंशियल सर्विसेज़' में आता है- मूलभूत सेवाएँ. ऐसे में कम-से-कम उन्हें ग़म बूट्स, हेड कवर, दस्ताने, मास्क और सैनेटाईज़र जैसी मूलभूत चीज़ें उपलब्ध करवाई जानी चाहिए. बिना किसी सुरक्षा के शहर की सफ़ाई के लिए निकलने का मतलब तो ख़ुद को कोरना संक्रमण के हवाले करना है."

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'शहीद' सफ़ाई सैनिक विनोद कुमार

कोरोना लॉकडाउन शुरू होने के बाद जब सारी दिल्ली अपने घरों तक सिमटी हुई थी, तब 57 वर्षीय विनोद कुमार कूड़ा उठाने के लिए हर रोज़ सुबह 5 बजे अपने घर के सुरक्षा घेरे से बाहर निकल आया करते थे.
एक कर्फ़्यू पास और सफ़ाई का झाड़ू हाथ में पकड़े दिल्ली की जनता की सेवा में जुटे विनोद को 'कोरोना की ख़िलाफ़ भारत की जंग के 'फ़्रंटलाइन' योद्धा' के तौर पर याद करते हुए उनके बेटे सुमित की आवाज़ भर्रा जाती है.
विनोद की असमय मृत्यु से परिवार सदमे में तो है, लेकिन कोरना की वजह से हुई इस मृत्यु की क्रूरता ने जैसे सभी को तोड़ कर रख दिया है.
बीबीसी से बातचीत के दौरान पिता के अंतिम दिनों को याद करते हुए सुमित बताते हैं, "पापा ही हमारे परिवार में मुख्य कमाने वाले व्यक्ति थे. उनकी उम्र 55 साल थी. सरकार का निर्देश भी था की 50 से ऊपर के सरकारी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी जाए और उनसे कोरोना के दौर में काम न करवाया जाए लेकिन पापा की ड्यूटी फिर भी लगा दी गयी थी. वह 15 अप्रैल तक लगातार काम पर गए और इसके बाद अचानक उनकी तबीयत ख़राब हो गई".
सुमित और उनके बड़े भाई अजय घर के ख़र्चों में हाथ बंटाने के लिए सब्ज़ी की रेहड़ी लगाते थे लेकिन लॉकडाउन और पिता के देहांत के बाद वह काम भी ठप्प पड़ गया. 16 अप्रैल के आसपास विनोद को बुख़ार आया और दस दिनों के भीतर ही उनकी मौत हो गई लेकिन पीछे छूटे उनके परिवार के लिए ये दस दिन अभी तक जैसे गुज़रे ही नहीं हैं.

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Image captionमृतक विनोद कुमार का परिचय पत्र

कोरोना से हुई क्रूर मौत का अकेलापन

विनोद का परिवार उनकी मौत से ज़्यादा कोरोना से हुई उस मौत के अकेलेपन के सदमे से नहीं निकल पा रहा है. आंसुओं में डूबी आवाज़ में सुमित कहते हैं, "जिस दिन मैं उनको अस्पताल ले गया, उस दिन ठीक ही लग रहे थे. सबसे हंसते हुए कह कर गए कि हल्का सा बुख़ार है मुझे, अभी ठीक हो जाऊँगा. लेकिन एम्स ले जाते ही डॉक्टरों ने उन्हें आइसोलेशन में रख दिया और मुझे घर भेज दिया. कुछ ही देर में मालूम चल गया कि उनको कोरोना हुआ है. डॉक्टरों ने हमें कहा कि वो रोज़ दोपहर 3.30 बजे फ़ोन पर हमें पिताजी का हाल बता देंगे...लेकिन थोड़े ही दिनों में हमें बताया गया कि वह नहीं रहे. वीडियो कॉल पर देख भी नहीं पाए उन्हें".
क्वारंटीन में बंद सुमित का परिवार अकेले में शोक भी नहीं मना सका. अपने ऊपर टूटे पहाड़ के बारे में बताते विनोद के भतीजे आकाश जोड़ते हैं, "न बाऊजी के अंतिम दर्शन हो सके और न ही हम साथ मिलकर रो सके. सुमित को अपनी माँ की चूड़ियाँ तोड़नी पड़ीं क्योंकि परिवार की कोई दूसरी महिला उनसे मिल ही नहीं सकती थी. परिवार की भूखों मरने की नौबत आ गई है. इतना अवसाद है कि सुमित आत्महत्या की कोशिश भी कर चुका है".

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सफ़ाई कर्मचारियों की मौत पर घोषित मुआवज़ों की हक़ीक़त

यूं तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लेकर दक्षिण दिल्ली नगर निगम की मेयर सुनीता कांगरा ने भी काम के दौरन कोविड वाइरस का शिकार हो जान से जाने वाले सफ़ाई कर्मचारियों के परिवारों के लिए मुआवज़े की घोषण की है, लेकिन इसका कोई लाभ पीड़ित परिवार तक नहीं पहुँचा है.
एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री केजरीवाल ने काम के दौरन संक्रमित होने वाले सफ़ाई कर्मचारियों के परिवार को एक करोड़ रुपए की सहायता राशि देने का वादा किया है वहीं मेयर सुनीता कांगरा ने 10 लाख की मुआवज़ा राशि देने की घोषणा की है. लेकिन सुमित के परिवार का कहना है कि उनके पास अभी तक नगर निगम और दिल्ली सरकार की ओर 'एक सुई तक नहीं पहुंची है'.
"मुआवज़ा तो छोडिए, जिस नगर निगम को पापा ने अपना पूरा जीवन दे दिया..उनके जाने के बाद वहां का किसी अधिकारी के हमारी खोज-खबर तक नहीं ली. एक बार भी न शोक जताया और न पूछा कि हम ज़िंदा हैं या मर गए".
इस संबंध में बीबीसी से दक्षिण दिल्ली नगर निगम के कमिश्नर ज्ञानेश भारती को कई बार लिखित सवालों के साथ विस्तृत इमेल भेजे और फ़ोन पर सम्पर्क करने के भी कई प्रयास किए. लेकिन तीन दिन बाद सिर्फ़ कमिशनर के जनसम्पर्क विभाग के निदेशक राधाकृष्ण ने फ़ोन पर जवाब देते हुए कहा कि उनके विभाग को इस बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं है कि मृतक विनोद कुमार के परिवार को नगर निगम और दिल्ली सरकार मुआवज़े की राशि कब तक और कैसे देगी.
50 वर्ष से ऊपर होने के बावजूद मृतक विनोद को काम पर बुलाने के परिवार के आरोप को ख़ारिज करते हुए राधाकृष्ण ने कहा, "वह अपने मर्ज़ी से काम पर आए थे. दक्षिण दिल्ली नगर निगम सभी सफ़ाई कर्मचारियों को मास्क, सैनेटाईज़र समेत सभी ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध करवा रहा है".

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देश भर में विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ) के सुरक्षा निर्देशों के उल्लंघन पर दाख़िल की गई एक जनहित याचिका के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा. सामाजिक कार्यकर्ता हरनाम सिंह की इस याचिका का जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने दक्षिण दिल्ली नगर निगम की ही तर्ज़ पर सर्वोच्च न्यायलय को बाताया कि देश भर की सड़कें और नाले साफ़ कर रहे सफ़ाई कर्मचारियों को काम के दौरन पहनने के लिए मास्क और दस्तानों जैसी सभी सामग्री दी गई है.
लेकिन सुरक्षा इंतज़ामों के बारे में बीबीसी ने राजधानी के अलग-अलग कोनों में फैले जिन दर्जन भर सफ़ाई कर्मचारियों से बात की, उन सभी के बयान सरकारी दावों के ठीक उलट हैं.

सफ़ाई कर्मचारियों की कोविड से सुरक्षा के सरकारी दावों का सच

दक्षिण दिल्ली नगर निगम में कार्यरत सफ़ाई कर्मचारी अनिल लोहित बताते हैं कि उन्हें क्वारंटीन के अंतर्गत बंद पड़े घरों के सामने भी बिना सुरक्षा उपकरणों के झाड़ू लगनी पड़ती है. "मैं दिल्ली के नजफ़गढ़ क्षेत्र में कार्यरत हूँ. यहां कितने ही अस्पताल और घर ऐसे हैं जो कंटेनमेंट ज़ोन में आते हैं. कई घरों को क्वारंटीन घोषित कर सील कर दिया गया है. ऐसे रिहाइशी इलाक़ों में भी हमें बिना मास्क, दस्तानों, बूट और सैनिटाइज़र के काम करना पड़ता है".
अनिल कहते हैं, "हमारा काम सफ़ाई का है और अगर हम काम करना बंद कर दें और न जाने और कितनी बीमारियाँ फैलने लग जाएँगी. लेकिन दुःख तब होता है जब लोग हमें सिर्फ़ सफ़ाई करने वालों की तरह देखते हैं, इंसान की तरह नहीं. तभी तो हमें अभी तक ठीक सुरक्षा किट नहीं दिए गए हैं..इसलिए तो इतने सारे सफ़ाई कर्मचारी संक्रमण का शिकार हो रहे हैं और जान गवां रहे हैं".
वहीं विनोद के सहकर्मी रहे वीरेंद्र सिंह का मानना है कि समुचित जाँच होने पर दिल्ली के सफ़ाई कर्मचारियों में बड़ी संख्या कोविड मरीज़ों की निकल सकती है. बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि बिना मास्क, दस्तानों और ग़म बूट के काम कर रहे हमारे बहुत से कर्मचारियों के कोरोना संक्रमित होने की पूरी आशंका है. लेकिन हम सभी ऐसे ही सड़कों पर और अस्पतालों के आसपास खुले में काम करने को मजबूर हैं. क्योंकि एक्सपोज़ हो रहे सफ़ाई कर्मचारियों की सतत कोविड जांच का कोई प्रावधान नहीं है. सिर्फ़ जब हमारे लोग बीमार पड़ जाते हैं, तभी उनकी कोविड जाँच होती है, उससे पहले नहीं".

सफ़ाईकर्मी

सफ़ाई कर्मचारी और जाति

सफ़ाई कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से काम कर रहे बेजवाडा विल्सन कोरोना महामारी को सफ़ाई कर्मियों में बड़ी संख्या में मौजूद दलित समुदाय पर पड़ रही दोहरी मार की तरह देखते हैं. बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "आज कोरोना है, कल डेंगू था और परसों प्लेग. सफ़ाई कर्मचारी तो हमेशा से समाज की वह अदृश्य फ़ौज रही है जो हर तरह के संक्रमण से जूझते हमारी सड़कों और अस्पतालों को साफ़ रखते हैं".
विल्सन कहते हैं, "हमेशा से बड़ी संख्या में इनमें दलित समुदाय के लोग शामिल रहे हैं जिन्हें बेहतर अवसर और शिक्षा के आभाव में यह काम मजबूरन करना पड़ रहा है. अगर वह एक दिन काम करना बंद कर दें तो सड़कों पर कूड़े का ढेर लग जाए और कई नई महामारियाँ सामने आ जाएँ. लेकिन प्रशासन समेत आम लोगों में दलित सामज के प्रति उपेक्षा ख़त्म होने का नाम नहीं लेती".

सीवर के भीतर नहीं बदली है सफ़ाई कर्मचारियों की ज़िंदगी

दक्षिण दिल्ली के मोती नगर क्षेत्र में काम करने वाले सफ़ाई कर्मचारी धर्मवीर बताते हैं कि कोरोना के दौर में सीवेज का काम करना और चुनौतीपूर्ण हो गया है.
"हेड कवर, मास्क, बूट और वर्दी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हमें हैं, लेकिन हमारे पास कोई संसाधन नहीं हैं. कोरना के दौर में काम का बोझ भी बढ़ गया हैं क्योंकि कर्मचारी कम हैं. हमने कितनी ही बार अधिकारियों के कान में यह बात डालने की कोशिश की, और निवेदन किया कि हमें उचित सुरक्षा की चीज़ें पहनने के लिए दी जाएँ. लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई है. सुबह 9 से शाम 5 तक नालों की सफ़ाई करता हूँ. कई बार सीवर में भी उतरना पड़ता है और मशीन नहीं हो तो ज़मीन को समतल भी ख़ुद करना पड़ता है".
एक ओर जहाँ धर्मवीर अस्पताल और कंटेनमेंट ऐरिया में आने वाले सीवरों में घुसकर काम करने की वजह संक्रमित हो जाने की आशंका से परेशान हैं. वहीं गजियाबाद नगर निगम की सीवरों की सफ़ाई करने वाले अस्थायी सफ़ाईकर्मी प्रदीप गंदगी को जैसे अपना भाग्य ही मान बैठे हैं. सुरक्षा इंतज़ामों के प्रति एक विरक्त भाव से वह कहते हैं, "मैडम सीवर की गंदगी में उतरेंगे तो और क्या होगा? हमारा काम ही ऐसा है... क्या कर सकते हैं..".

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'भगवान के भरोसे' सफ़ाई कर्मचारी

दिल्ली जल बोर्ड में कार्यरत वेदप्रकाश, प्रदीप जैसे कर्मचारियों की विरक्ति के लिए सरकार के साथ-साथ सफ़ाई कर्मचारियों के प्रति समाज की उदासीनता को भी दोषी ठहराते हैं.
सीवर डिपार्टमेंट मज़दूर संघ के अध्यक्ष वेदप्रकाश इस वक़्त ख़ुद भी बीमार हैं. अस्पताल से फ़ोन पर बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि दिल्ली नगर निगम से लेकर सीवेज विभाग तक के सभी सफ़ाई कर्मचारियों का स्वास्थ अब 'भगवान के हवाले' है.
"मैडम, ग़रीब दलित मज़दूर हमेशा भगवान के हवाले रहता है. बेचारे सफ़ाई कर्मचारियों को अपना परिवार भी चलाना है. बच्चों के लिए खाना जुटाना है. इसलिए वह अपनी मजबूरियों की वजह से कोरोना के इस ख़तरनाक दौर में भी बिना सुरक्षा इंतज़ामों के गटर में घुस कर काम करने को सड़कों से कूड़ा हटाने को मजबूर हैं. लेकिन यह पहली बार नहीं हैं. हमने चिकनगुनिया में...डेंगू में और ऐसी ही न जाने कितनी महामारियों में काम करना पड़ता रहा है. अब कोरना में भी कर रहे हैं. लेकिन हमें साफ़ और ताज़ा मास्क, बूट और हेड कवर जैसी चीज़ें भी नहीं मिल रही हैं,"
सफ़ाई कर्मचारियों के बड़ी तादाद में संक्रमित होने की आशंका को दोहराते हुए वेदप्रकाश जोड़ते हैं, "हम अस्पताल के सामने भी सफ़ाई करते हैं और घने संक्रमण वाले इलाक़ों में भी. हमारा काम तो रुक नहीं सकता. लेकिन जो सफ़ाई कर्मचारी शहीद हुए हैं उनके अलावा भी हमारे बीच में न जाने कितने ही कोरोना लेकर घूम रहे होंगे. लेकिन हमें मालूम ही नहीं क्योंकि सफ़ाई कर्मचारियों की कोरना संक्रमण की जाँच तब तक नहीं हो रही है जब तक वह बीमार न पड़ जाए."
https://www.bbc.com/hindi से साभार

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