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पटना: जलजमाव में शहर का वीआईपी इलाका क्यों नहीं डूबा?


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पिछले सात दिनों से पटना शहर का आधे से अधिक हिस्सा जलमग्न है. 72 घंटे में लगभग 300 मिलिमीटर बारिश हुई और पानी इतना भर गया कि लोग डूबने लगे, सड़कों पर नावें चलने लगी.
लगातार हो रही बारिश तो थम गई मगर पानी अब तक नहीं निकला है.
शहर की एक बड़ी आबादी अपनी ज़मीन छोड़ चुकी है. जिनके घर ऊंचे थे, वे ऊपर चढ़ गए हैं. जिनके घर नहीं थे वे डूबते-उतराते किसी तरह पलायन कर गए. जानवरों का कुछ नहीं था. बहुत से डूब गए. सड़ गए. अब पानी में उतरा रहे हैं.
वैसे तो सरकार ने बाढ़ में डूबने के कारण फ़िलहाल किसी तरह की मानवीय क्षति की बात नहीं स्वीकारी है. मगर पानी जैसे-जैसे कम हो रहा है, शंकाएं गहरी होती जा रही हैं.
बेउर, रामकृष्ण नगर, इंद्रपुरी, शिवपुरी, कंकड़बाग जैसे कई रिहायशी इलाकों में पानी छह से सात फीट तक भर गया था.
कई दिनों तक जलजमाव रहने के कारण शहर पर महामारी का संकट भी मंडरा रहा है.
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आख़िर इतने अधिक समय तक जलजमाव क्यों रह गया?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण असमय बहुत ज़्यादा बारिश हो गई. विपक्ष कह रहा है ड्रेनेज सिस्टम फ़ेल हो जाने की वजह से ऐसा हुआ.
लेकिन कंकड़बाग स्थित अपने घर के डायनिंग हॉल में हफ़्ते भर से जमा बदबूदार काले पानी में खड़े वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "पानी इसलिए नहीं निकल सका क्योंकि प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने तत्परता नहीं दिखाई."
उन्होंने कहा, "यहां के लगभग सारे पंप हाउस तो पहले से बंद पड़े ही थे, जिस दिन (सोमवार को) विलासपुर के साउथ इस्टर्न कोल्डफ़ील्ड्स लिमिटेड (SECL) से ज्यादा क्षमता के साथ पानी निकालने वाली एचपी मशीनें आयीं थीं, उस दिन वीआईपी मूवमेंट बढ़ गया था. नीतीश कुमार और सुशील मोदी समेत कई मंत्री ओर वीआईपी उसी दिन जायज़ा लेने भी निकले थे. क्योंकि वर्षा बारिश बंद हो चुकी थी."
मिश्रा के मुताबिक़, "अधिकारी वीआईपी मूवमेंट में ही लगे रहे. उधर दूसरे राज्य से एचपी मशीनें लेकर आने वाले 18 लोग की टीम ट्रकों को लेकर पूरे दिन इधर से उधर घूमती रहीं. कोई उनसे को-ऑर्डिनेट नहीं कर सका. अगले दिन तक भी ये मशीनें नहीं लगाई जा सकी थीं."
उन्होंने बताया, "शुरू में तो उन्हें गैस कटर तक के लिए जूझना पड़ा था. अब जाकर पांच में से चार मशीनें चालू हो सकी है़. मगर स्थानीय निकायों और विभागों के अधिकारियों का अभी भी कोई सामंजस्य नहीं है. वे सभी 18 लोग अपने ख़र्चे पर और अपने प्रबंध पर यहां रुककर शहर का पानी निकाल रहे हैं. देखिए कब तक निकाल पाते हैं."
क्या वीआईपी लोगों के कारण ही शहर का पानी निकालने में ही देरी हो रही है? क्योंकि उन्हीं वीआईपी लोगों पर शहर की ड्रेनेज व्यवस्था दुरुस्त करने का जिम्मा भी है.
वीआईपी इलाकाइमेज कॉपीरइटNEERAJ PRIYADARSHI/BBC
Image captionवीआईपी इलाका

शहर डूबा मगर वीआईपी इलाके में उड़ रही है धूल

पानी में डूबे इलाक़ों का हाल देखने के बाद हम उस इलाक़े में पहुंचे जहां पर वीआईपी रहते हैं.
गुरुवार को सातवें दिन भी कदमकुआं इलाके में इतना पानी था कि नाव से राहत सामग्री पहुंचायी जा रही थी. कंकड़बाग में भी अधिकांश जगहों पर तीन से चार फ़ीट जमा था.
इसके उलट, अणे मार्ग जहां मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों के बंगले हैं , वहां राजेन्द्र चौक से जब तेज़ रफ़्तार में गाड़ियां गुज़रतीं तो धूल उड़ती दिखती.
केवल 1-अणे मार्ग ही नहीं, बल्कि सर्कुलर पथ भी (जहां पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी रहती हैं), देशरत्न मार्ग (जहां उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी) का सरकारी बंगला है, कौटिल्य मार्ग, स्ट्रैंड रोड समेत उस एरिया में कहीं भी एक बूंद पानी ज़मीन पर नहीं दिख रहा था. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम उसी पटना में खड़े हैं जहां के जलजमाव के ख़बरें राष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियां बनी हुई हैं.
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वीआईपी बनाम बाकी पटना

वीआईपी इलाका होने और सामान्य इलाके के बीच का फ़र्क 1अणे मार्ग, मुख्यमंत्री आवास से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित हज भवन के पीछे वाले इलाके की तरफ़ जाने से हो जाता है.
यहां सैकडों झुग्गी-झोपड़ियां जलमग्न थीं. उनमें से आधे से अधिक झोपड़ियां तो तहस-नहस हो चुकी थीं. वहां का प्राथमिक विद्यालय काले पानी से घिरा था.
पुरुष, महिलाएं और बच्चे सामान के साथ सड़क पर थे. कुछ स्वयंसेवी राहत समूह सामग्रियां बांट रहे थे. उस सड़क पर किसी तरह का वीआईपी मूवमेंट नहीं था.
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तो क्यों नहीं डूबा वीआईपी इलाका?

देशरत्न मार्ग से अणे मार्ग को जोड़ने वाले चौक पर कुछ युवक खड़े थे. वहीं बगल में नौकठिया की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले भी थे.
उनमें से एक युवक अंगद ने कहा, "मेन रोड पर तो एक मिनट भी पानी नहीं जमा था. हां, हमारी झुग्गियों की ओर थोड़ा ज़रूर जम गया था क्योंकि वो निचले इलाके में है. मगर वो भी तुरंत हट गया था. नगर निगम वाले मशीन लेकर आए थे. कचरा साफ़ कर दिए. सारा पानी चला गया.कह सकते हैं. क्योंकि प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाई. शायद इसलिए क्योंकि बगल में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री का घर है, गवर्नर हाउस है."."
बेली रोड के किनारे से एयरपोर्ट तक बसे वीआईपी इलाके में राजभवन, मुख्यमंत्री निवास, मुख्यमंत्री कार्यालय, मंत्रियों के आवास, वरीय प्रशासनिक अधिकारियों के आवास, सरकारी संस्थाओं के दफ़्तर, विधानमंडल और सचिवालय हैं.
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Image captionमुख्यमंत्री आवास का रास्ता

ऊंचा इलाका

जब पूरा पटना डूब रहा था, शहर की पॉश कॉलोनियां जलमग्न थीं. तब भी यह वीआईपी एरिया कैसे बचा रह गया?
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पटना के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेन्ट में एसोसिएट प्रोफेसर एनएस मौर्य इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, "यह शहर तीन तरफ से नदियों से घिरा है. किनारों पर नदियां हैं इसलिए किनारे बाकी शहर की अपेक्षा ऊंचे हैं. जिन इलाकों में पानी भरा है वे और भी ज्यादा निचले इलाके हैं. राजेंद्र नगर पहले एक जलाशय हुआ करता था. लेकिन वहां अब बस्तियां और कॉलोनियां बसा दी गई हैं. जो वीआईपी इलाका है वो इन निचले इलाकों की अपेक्षा ऊंचा है. वहां ट्रीटमेंट भी वीआईपी तरह का ही है. ऊंचे इलाकों पर वैसे भी पानी नहीं टिकता."
इनटैक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चर हेरिटेज) के पटना संयोजक जेके लाल, एनएस मौर्य की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, "क्योंकि एक तो यह इलाका ऊंचे जगह पर स्थित है और दूसरा कि यहां की ड्रेनेज व्यवस्था बाकी शहर के मुकाबले ज्यादा-चाक चौबंद है. यहां का ड्रेनेज सिस्टम पुराना वाला ही है. जबकि बाकी शहर का पुराना ड्रेनेज सिस्टम अब ध्वस्त हो चुका है. यह योजनाबद्ध तरीके से बसा-बसाया गया इलाका है. शहर में आबादी बढ़ने के साथ बेतरतीब ढंग से निर्माण हुए हैं. उसी में ड्रेनेज सिस्टम ख़राब हुआ."
बाढ़ से प्रभावित हुए कई इलाके
Image captionबाढ़ से प्रभावित हुए कई इलाके

ऐसे सुधरा था यहां का ड्रेनेज सिस्टम

अंग्रेज़ों के ज़माने में इसे न्यू पटना का नाम दिया गया था. 1911 में दिल्ली दरबार में किंग जॉर्ज पंचम ने यह घोषणा की कि उड़ीसा और बिहार को मिलाकर एक नया प्रांत बनेगा जिसके एक ही लेफ़्टिनेंट गवर्नर होंगे. इस प्रांत की राजधानी पटना को बनाया गया.
1912 में जब लॉर्ड हार्डिंग उड़ीसा और बिहार के लेफ़्टिनेंट गवर्नर थे, तभी नई राजधानी बनाने के क्रम में अंग्रेजों ने इस एरिया में गवर्नर हाउस बनाने की आधारशिला रखी. 1917 में यह इमारत बनकर तैयार हुई. शुरू में इसका विस्तार 100 एकड़ था. 1970 में पटना का चिड़ियाघर बनाने के लिए इसी के कंपाउंड से जमीन दी गई थी.
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "1967 के बाढ़ में गवर्नर हाउस, अणे मार्ग, देशरत्न मार्ग, सब जगह पानी भर गया था. फिर उसके बाद यहां का ड्रेनेज सिस्टम सुधार लिया गया. यहां के इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर बहुत काम हुआ. तब से इस इलाके में कभी पानी नहीं जमा हुआ."
लव से ही बातचीत में पता चला कि 1997 में जब एक बार और राजेंद्र नगर तथा कंकड़बाग जलमग्न हुआ था, तब तत्कालीन हाई कोर्ट के वकील श्याम किशोर शर्मा ने इसी बात को लेकर याचिका दायर की थी.
उसी मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के आदेश पर जलनिकासी के लिए अलग से एक कमिश्नर नियुक्त किया गया था, जिसका यही काम ही था देखना कि जल निकासी की समस्याएं क्या हैं और इसे कैसे दूर किया जा सकता है. फिर बहुत दिनों तक पटना में जलजमाव नहीं हुआ. अब वह व्यवस्था खत्म हो चुकी है.

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