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#CoronaVirus (कोरोना वायरस): घरों में मेड और हेल्परों को लेकर छिड़ी बहस


कोरोना लॉकडाउनइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

भारत में लॉकडाउन दो हफ़्ते के लिए बढ़ा दिया गया है, लेकिन इस बार घरों में काम करने वाली मेड-हेल्परों को काम पर लौटने की इजाज़त दी गई है. इसके बाद लाखों मिडिल क्लास घरों में बहस शुरू हो गई है कि इन काम करने वालों को घर में आने दें या नहीं?
एक दोस्त ने एक बार कहा था कि उसे अपने पति और घरेलू मेड में किसी एक को चुनना पड़े तो वह घरेलू मेड को चुनेगी.
यह बात भले मज़ाक में कही गई थी लेकिन इससे यह ज़ाहिर होता है कि भारत के लोग अपने घरेलू हेल्परों पर कितने निर्भर हैं.
आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक़ भारत के मिडिल क्लास और संपन्न तबके के घरों में मामूली पैसों पर काम करने वाले हेल्परों की संख्या 40 लाख से अधिक है. अनाधिकारिक तौर पर यह संख्या पांच करोड़ के आसपास बताई जाती है. घरेलू काम धंधों में काम करने वाले लोगों में दो तिहाई महिलाएं हैं.
घरेलू मेड और इन लोगों को काम मुहैया कराने वाले परिवार एक दूसरे पर निर्भर हैं. बेहद ग़रीबी और किसी ख़ास काम की दक्षता के अभाव के चलते ग्रामीण इलाक़े से आए लोगों के लिए यह आजीविका का एक ज़रिया है जबकि दूसरी तरफ़ मिडिल क्लास थोड़े पैसे खर्च करके आराम और सुविधा के साथ घर परिवार चलाता है.
लेकिन बीते छह सप्ताह के दौरान भारत के लाखों मिडिल क्लास परिवारों को बिना मेड, कुक, बच्चों की देखभाल करने वाली नैनी, नर्स, ड्राइवर और माली के काम चलाना पड़ा क्योंकि सख्त लाकडॉउन के चलते यह सब लोग काम के लिए कहीं आ जा नहीं सकते थे.

कोरोना लॉकडाउनइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

कई तरह की मुश्किलें

शुरुआत में यह लॉकडाउन केवल तीन सप्ताह के लिए लगाया था तो लोगों ने इसे स्वीकार किया क्योंकि उन्हें लगा कि तीन हफ्तों की ही बात है. इस दौरान कुछ बॉलीवुड सितारों ने अपने घरों में साफ़ सफ़ाई करते, खाना बनाते और बर्तन धोते वीडियो भी इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए.
लेकिन इसके बाद लॉकडाउन दो बार बढ़ाया जा चुका है. जब यह बढ़ने लगा तब मिडिल क्लास परिवार अपने घरेलू हेल्परों को मिस करने लगे.
इस दौरान यह चर्चा भी होने लगी कि बुज़ुर्ग लोग किस तरह मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. ख़ासकर वे लोग जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हो, उन्हें किस तरह की मुश्किलें हो रही हैं.
इसके बाद घरेलू मेड और हेल्परों की मुश्किलों की बात शुरू हो गई क्योंकि उनके पास भी काम पर लौटने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं था.
घरेलू हेल्पर मुहैया कराने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हेल्पर4यू की प्रमुख मीनाक्षी गुप्ता जैन ने बताया, "कइयों की नौकरी चली गई और कइयों का कहना था कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें सैलरी नहीं मिल रही है."
पिछले एक महीने से हेल्पर4यू की कोविड हेल्पलाइन के वॉट्सऐप नंबर पर मीनाक्षी को हर दिन 10 से 15 मैसेज मिल रहे हैं. इनमें मेड, ड्राइवर और कुक मदद मांग रहे हैं.
मीनाक्षी गुप्ता जैन ने बताया, "वे लोग कह रहे हैं कि उनके पास पैसे नहीं रहे. हम क्या कर सकते हैं? हम अपने बच्चों को कैसे खिलाएं? हम उन्हें उस इलाक़े में काम करने वाली चैरेटी संस्थाओं के पास भेज रहे हैं ताकि उन्हें मुफ्त में राशन और कुकिंग गैस मिल पाए."

कोरोना लॉकडाउन
Image captionसोनिका वर्मा ने बताया कि उनकी बहनों को लॉकडाउन के दौरान कोई सैलरी नहीं मिली.

लॉकडाउन में पैसों की किल्लत

दिल्ली में घरेलू हेल्पर सोनिका वर्मा ने सोमवार से अपने काम पर जाना शुरू कर दिया है. वह ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानती हैं क्योंकि वह जिस घर में काम करती हैं, उन लोगों ने उन्हें लॉकडाउन के समय की सैलरी भी दी है.
सोनिका वर्मा ने बताया, "इन सभी सप्ताहों के दौरान मैं काफ़ी तनाव में रही. मेरे पति ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लेकिन ऑटो चलाने पर रोक के चलते वे घर पर बैठे हुए हैं. मैं भी काम पर नहीं जा पा रही थी. मैं डरी हुई थी कि अगर मेरी नौकरी चली गई तो हम लोग क्या करेंगे?"
सोनिका ने बताया कि उनकी बहनों को लॉकडाउन के दौरान कोई सैलरी नहीं मिली.
सोनिका ने बताया, "वे जिनके यहां काम करती थीं उन लोगों ने उसे मार्च में केवल उतने ही दिन की ही सैलरी दी. अप्रैल का कोई भुगतान नहीं हुआ. उन लोगों ने कहा था कि काम पर लौटने के बाद ही पैसा मिलेगा. लेकिन अभी तक उन्होंने काम पर वापस नहीं बुलाया है."
दरअसल, सोनिका की बहनों को काम पर नहीं वापस नहीं बुलाए जाने की वजह है, कई आवासीय सोसायटी ये तय नहीं कर पाई हैं कि वे घरेलू हेल्परों को आने की अनुमति देंगी या नहीं. इसको लेकर बहस देखने को मिल रही है.
कुछ लोगों का कहना है कि अभी पाबंदी हटाई गई है, कोरोना वायरस तो मौजूद ही है. ऐसे लोगों को आशंका है कि बाहरी लोगों को सोसायटी के अंदर आने देने से कोरोना वायरस का संक्रमण उन तक पहुंच सकता है.
हालांकि इससे राय के उलट कुछ लोगों का मानना है कि बुजुर्ग और बीमार लोगों की जरूरतों की उपेक्षा नहीं की जा सकती. भारत के अधिकांश मिडिल क्लास परिवारों में बर्तन धोने और कपड़े धोने की मशीनें नहीं होतीं और उनके लिए घरों को काम करना मुश्किल भरा होता है.
नोएडा की पॉश सोसायटी एटीएस ग्रीन्स के अध्यक्ष अनिल तिवारी ने बताया कि घरेलू हेल्परों को अंदर आने के मामले पर उनकी सोसायटी तैयार है. उन्होंने बताया, "हमारे यहां 735 अपार्टमेंट्स हैं. इसमें कइयों में सीनियर सिटीजन अकेले रहते हैं. इनमें कइयों को बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. हमने इन बातों को ध्यान में रखा है."
इस सोसायटी में रहने वाले ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) कुलदीप सिंह छोक्कर ने अपनी मुश्किलों को काफी चुनौतीपूर्ण बताया. 80 साल के कुलदीप सिंह कैंसर सर्वाइवर हैं. पेसमेकर पर निर्भर हैं. उनकी 75 साल की पत्नी भी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही हैं.
कुलदीप सिंह छोक्कर ने फोन पर बताया, "अगर हमारी उम्र कम होती है, तो हम चीज़ों को संभाल लेते. लेकिन घर को मेंटेंन करने में काफी मुश्किल हो रही है."
लॉकडाउन से पहले, हर दिन ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) छोक्कर के यहां पार्ट टाइम मेड, एक माली और कार साफ करने वाला क्लीनर काम करने आते थे.
इन लोगों को काम पर वापस बुलाने पर छोक्कर ने कहा, "हम बुलाना चाहते हैं. इससे हमारी मुश्किल काफ़ी कम हो जाएगी."

कोरोना लॉकडाउन

घरेलू मेड और ड्राइवरों को क्यों सजा मिल रही है?

मेरी पड़ोसी पिंकी भाटिया रिटायर्ड स्कूल टीचर हैं, वह घरेलू हेल्पर को काम पर वापस बुलाने के मुद्दे पर थोड़ी चिंतिंत हैं हालांकि उनकी पीठ में तकलीफ है और बिना किसी मदद के घरेलू कामों में उन्हें बेहद मुश्किल होती है.
उन्होंने बताया, "हमारे पास कोई रास्ता नहीं है. हमें खुद से ही सारे काम करने पड़ रहे थे- खाना बनाने से लेकर पोछा लगाने, बर्तन धोने और कपड़े धोने तक."
मिसेज भाटिया 65 साल की हैं जबकि हाइपर टेंशन और हृदय संबंधी मुश्किलों से ग्रस्त उनके पति 70 से अधिक उम्र के हैं.
कोरोना वायरस पर सरकार की एडवाइजरी में कहा गया है कि 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के संक्रमित होने का खतरा ज्यादा है, ऐसे लोगों से घर से नहीं निकलने को कहा गया है. इसके बाद से भाटिया दंपति बीते छह सप्ताह से घरों में कैद हो कर रह गए हैं.
मिसेज भाटिया ने बताया, "पड़ोसी का ड्राइवर हमारे लिए स्थानीय मार्केट से दूध और राशन का सामान ला देता है." घरेलू मेड को काम पर बुलाएं या नहीं बुलाएं, इसको लेकर उनकी सोच स्पष्ट नहीं हो रही है.
उन्होंने बताया, "मेरे बच्चे मुंबई और स्विटजरलैंड में रहते हैं. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि एक सप्ताह और रुकने को कहा है. इस दौरान स्थिति को देखने को कहा है. इसलिए हम एक सप्ताह इंतजार करेंगे."
मीनाक्षी गुप्ता जैन का मानना है कि जब सफाईकर्मियों और सब्जी बेचने वालों को अंदर आने की अनुमित मिल रही है तो घरेलू मेड और ड्राइवरों को क्यों सजा मिल रही है?
उन्होंने कहा, "आप इन लोगों को मास्क-सेनिटाइजर दे सकते हैं और अपने घर में रहने के दौरान इस्तेमाल के लिए एक सेट कपड़ा. सारी सावधानी रखिए लेकिन इन लोगों को काम पर बुला लीजिए."
https://www.bbc.com से साभार

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