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मुंबई कोरोना संक्रमण: कैसे एक ग़लती से 18 लोगों का परिवार वायरस की चपेट में आ गया?


पवार परिवारइमेज कॉपीरइटJANHAVI MOOLE/BBC
Image captionपवार परिवार
"एक के बाद एक परिवार के लोग बीमार पड़ने लगे थे. कोई खांस रहा था तो किसी को छींक आ रही थी. पूरे माहौल में डर पसरा हुआ था."
नेहाली पवार बताती हैं कि कैसे कोरोना वायरस संक्रमण कहर बन कर उनके परिवार पर टूटा. 18 सदस्यों का उनका संयुक्त परिवार मुंबई में वडाला के नज़दीक रहता है.
हालांकि ये इलाक़ा झुग्गी झोपड़ियों और तंग गलियों से पटा पड़ा है लेकिन नेहाली के घर में नौ कमरे हैं.
कोरोना के कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान देश के दूसरे परिवारों की तरह उनका परिवार भी अपने घर पर ही सिमट गया.
परिवार के सदस्य अलग-अलग तरह के पकवान बनाने, मिल कर गीत गाने, ताश के पत्ते खेलने और पूरी-पूरी रात जाग कर खेलने में बिताने लगे थे.
लेकिन महीने भर के भीतर ये खुशी उस वक्त ख़त्म हो गई जब परिवार के सामने कोरोना वायरस का संकट आया.
लेकिन वडाला के इस पवार परिवार ने इस बीमारी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जीत ली है.
COVER STORY: मुंबई में कैसे काबू होगा कोरोना?
'एक ग़लती से पूरा परिवार संक्रमित हुआ'
नेहाली कहती हैं कि सभी सदस्य घर के भीतर ही थे और सभी ज़रूरी एहतियात का ध्यान भी रख रहे थे.
वो कहती हैं, "कोरोना को लेकर सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नियम बताए थे हम उस सभी नियमों का पालन कर रहे थे. हम बार-बार अपने हाथ धो रहे थे, बाहर से घर के भीतर आने वाले सभी सामान को पहले धो रहे थे, सब्ज़ियां धो रहे थे, घर में साफ़ सफ़ाई रख रहे थे, सैनिटाइज़र का इस्तेमाल कर रहे थे, गाड़ी भी साफ़ रख रहे थे."
"परिवार के सदस्य घर से बाहर जाए तो आने पर उसके कपड़े गर्म पानी से धो रहे थे. और तो और हम चाय में लौंग और दालचीनी डाल कर पी रहे थे, गर्म पानी भी पी रहे थे. आप कह सकते हैं कि हम सभी सावधानियां बरत रहे थे."
नेहाली एक कंपनी में काम करती हैं और लॉकडाउन के बाद वो घर से ही काम कर रही थीं.
लेकिन परिवार के कुछ सदस्यों को काम के लिए घर से बाहर जाना पड़ रहा था और नेहाली को इस बात से चिंता हो रही थी.
पवार परिवारइमेज कॉपीरइटJANHAVI MOOLE/BBC

सामान्य दिनों की तरह ही...

नेहाली के पति अमित विजय पवार एक निजी अस्पताल में काम करते हैं जो आवश्यक सेवाओं के तहत आता है.
ऐसे में वो कई बार दो-तीन दिन तक काम के सिलसिले में घर से बाहर रहे.
उनके देवर एक सिक्योरिटी एजेंसी में काम करते हैं और वो अमित के साथ ही काम पर निकला करते थे. नेहाली के ससुर इलाक़े के एक जानेमाने सोशल वर्कर हैं.
नेहाली कहती हैं, "हमने केवल एक ग़लती की. परिवार का जो सदस्य घर से बाहर जाएं उससे सभी को दूरी बना कर रखनी चाहिए ताकि अगर वो संक्रमित होता भी है तो उससे दूसरों में संक्रमण न फैले. लेकिन हमने ऐसा नहीं किया. हम इमोशनल लोग हैं तो ऐसे में जब सभी सदस्य एक साथ थे तो हमें किसी एक को दूर रखना ग़लत लगा. मेरे पति को परिवार के दूसरे लोगों से दूर रहना चहिए था. शायद उन्हें कई दिनों तक घर से दूर ही रहना चाहिए था. लेकिन जब भी वो काम से वापस लौटते हम सामान्य दिनों की तरह ही उनसे मिलते जुलते थे."

कैसे पता चला कि अमित को कोरोना संक्रमण है?

21 अप्रैल को जब अमित पवार काम से लौटे तो उन्हें बुख़ार आ गया. दो दिन बाद उनका बुख़ार उतर गया.
नेहाली कहती हैं, "हम सोचते हैं कि जिस व्यक्ति को कोरोना संक्रमण होगा वो खांसेगा और छींकेगा. लकिन अमित में इस तरह के लक्षण नहीं थे. इसलिए हमने उनके बुख़ार को गंभीरता से नहीं लिया. हम सोच रहे थे कि शायद ठंडे पानी में नहाने के कारण या कलर में अधिक देर बैठने के कारण उन्हें बुख़ार हुआ है."
अप्रैल 25 को इस इलाक़े में कोरोना टेस्टिंग के लिए ख़ास शिविर लगाया गया.
पवार परिवार ने तय किया कि वो पांच सदस्य जो नियमित तौर पर काम के सिलसिले में घर से बाहर जाते रहे हैं उनका टेस्ट कराया जाए. शिविर में जब डॉक्टरों को पता चला कि अमित को बुख़ार था तो उन्होंने उनका स्वैब टेस्ट करने का फ़ैसला किया.
चार दिन बाद 28 अप्रैल को अमित काम पर लौट गए. इस दौरान पीपीई किट पहने कई लोग उनके घर के बाहर डिसइन्फेक्टेंट स्प्रे करने लगे. पूछने पर उन्होंने कहा कि अमित विजय पवार कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं, अब परिवार को कोई सदस्य घर से बाहर न निकले, बीएमसी के कर्मचारी उनसे संपर्क करेंगे.
अगले दिन एक एंबुलेन्स आई और अमित को वडाला में मौजूद एक अस्पताल ले गई.
निहाली कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि क्या करना है. मैं पूरी तरह से टूट गई. मेरे मन में सवाल उठा कि क्या मैं अपने पति को फिर देख सकूंगी, मेरे परिवार के और कितने लोगों कोरोना संक्रमित होंगे? परिवार से सभी सदस्य मिल कर रात के 3.30 तक ताश के पत्ते खेल रहे थे, क्या हम नई सुबह देख पाएंगे?"

टेस्टिंग के बाद चुनौतियां

पवार परिवार का घर बड़ा था और उसमें एक से अधिक बाथरूम थे. ऐसे में उन्हें घर पर ही क्वारंटीन किये जाने की इजाज़त दे दी गई.
लेकिन परिवार को ये नहीं पता था कि सभी सदस्यों का टेस्ट कब और कैसे होगा और इस बीच अगर कोई बीमार पड़ गया तो क्या होगा, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.
इसके बाद अगले कुछ दिनों में एक के बाद एक कई सदस्य बीमार पड़ते चले गए.
नेहाली कहती हैं, "हम रोज़ाना बीएमसी को फ़ोन करते और हमें बताया जाता कि फिलहाल उनके पास टेस्टिंग के लिए किट नहीं हैं. इसी तरह तीन दिन बीत गए. उस वक्त निजी अस्पतालों में कोरोना के टेस्ट नहीं हो रहे थे. हमारे हाथों में क्वारटीन का स्टांप लगाया गया था और हगम कहीं बाहर नहीं जा सकते थे. न ह कोई हमारे घर आकर टेस्ट कर रहे थे."
नेहाली के एक देवर आर्टिस्ट हैं. उन्होंने फ़ेसबुक लाइव के ज़रिए अपनी कहानी दुनिया को बताने का फ़ैसला किया. इसके बाद सोशल मीडिया और एक स्थानीय टीवी चैनल पर उनकी कहानी प्रसरित की गई.
इसके बाद 2 मई को बीएमसी की एक टीम ने उनके परिवार के सात लोगों का टेस्ट किया जिनमें बीमारी के लक्षण दिख रहे थे. सातों के नतीजे पॉज़िटिव आए और उन्हें परिवार से दूर अस्पताल में ले जाया गया.
कोरोना वायरसइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionसांकेतिक तस्वीर

क्वारंटीन का समय

18 लोगों के इस परिवार के आठ सदस्यों को अस्पताल के आईसोलेशन वार्ड में रखा गया जबकि दस लोगों को क्वारंटीन में रहने के लिए कहा गया.
इनमें छोटे बच्चे भी शामिल थे. इनमें चार और 15 साल के दो बच्चे और 12 साल की एक बच्ची शामिल थी.
नेहाली बताती हैं कि उनके चार साल के भतीजे को उनके माता-पिता से दूर कर दिया गया जो उसके लिए सदमे की तरह था.
वो कहती हैं, "उस मासूम के लिए ये बड़ा सदमा था. वो उन लोगों से दूर था जो उसके साथ खेलते थे और उसका ख़याल रखते थे. उसने देखा कि कोई उसे गोद में नहीं ले रहा, उसका सामान भी औरों के सामान से अलग रखा गया था. आज भी वो मुझसे पूछता है कि 'छोटी मम्मा, क्या मैं आपके पास आ सकता हूं? क्या मैं आपके गले लग सकता हूं?' "
परिवार के बड़े बूढ़ों के लिए भी ये मुश्किल दौर था.
वो कहती हैं, "मेरे ससुर सेवेन हिल्स अस्पताल में थे. वो 62 साल के हैं और उन्हें ऑक्सीजन पर रखा गया था. परिवार के दूसरे बुज़ुर्ग जो 60 साल के हैं उनके दिल में चार जगह ब्लॉकेज है, उन्हें भी आईसीयू वार्ड में रखा गया था. दोनों को डायबिटीज़ भी है."

दक्षिण और पूर्वी एशिया में भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले सबसे अधिक हैं

स्रोत: जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी
नेहाली में कोरोना के कोई लक्षण नहीं थे. शुरूआत में दो दिन उन्हें क्वारंटीन में रख गया बाद में आईसोलेशन वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया.
वो कहती हैं, "डॉक्टर केवल रात को ही क्वारंटीन सेंटर में आते थे. दिन में जो कुछ हमारे साथ हुआ हमें वो सब उन्हें एक बार रात को बताना होता था. आईसोलेशन वार्ड में चौबीसों घंटे नर्सें होती थीं."
वो कहती हैं के वैसे तो आईसोलेशन वार्ड में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन वहां किसी भी व्यक्ति में कोई भी लक्षण दिखता तो लोगों डर लगता.
वो कहती हैं, "कोविड 19 के इलाज के लिए कोई ख़ास दवा तो है नहीं ऐसे में हमें विटामिन और एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती थीं. जहां तक खाने की बात है, वहां अच्छी साफ़ सफ़ाई थी, लेकिन खाने का स्वाद... इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है क्योंकि हमें खाने का स्वाद पता नहीं चल पा रहा था. हमें ये समझ ही नहीं आ रहा था कि हम क्या खा रहे हैं."
"सेवेन हिल्स अस्पताल में मरीज़ों को घर से खाना लाने की इजाज़त थी. पनवेल में रहने वाली मेरी मौसी मेरे ससुर के लिए टिफिन में खाना भेजती थीं. दादर में मेरी मां के घर के पास रहने वाली एक महिला ने भी हमारी बहुत मदद की. मुझे इस बात की खुशी है कि इस लड़ाई में हम हर कदम पर अच्छे लोगों के संपर्क में आते रहे."

कोविड ने क्या सिखाया?

मई 7 को बुद्ध पूर्णिमा के दिन हमें ख़बर मिली की अमित के कोरोना टेस्ट का नतीजा नेगेटिव आया है.
इसके बाद अगले दस बारह दिनों में एक के बाद एक परिवार के सभी सदसय घर लौट आए.
हमने तालियों से सभी सदस्यों का स्वागत किया लेकिन हम सभी को इस बात का अहसास हो गया था कि अब ज़िदगी पहले जैसी नहीं होगी.
नेहाली कहती हैं कि घर के भीतर भी सभी सदस्यों को सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पालन करते रहना था.
वो कहती हैं, "जो भी सदस्य घर के बाहर जाते हैं उनसे घर के दूसरे सदस्य दूरी बनाए रखते हैं. घर के भीतर हम सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं और सभी सदस्य अपना सामान एक दूसरे से अलग रखते हैं. हम जितना हो सकते अपना काम अब खुद ही करते हैं."

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