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चीन से जुड़े विवादित मुद्दों पर क्यों रहती है भारत की चुप्पी


नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंगइमेज कॉपीरइटGRIGORY SYSOYEV

दो देशों के बीच टकराव में एक-दूसरे के विवादित मामलों का रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल होना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा रहा है.
भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर, गिलगित-बलतिस्तान और बलूचिस्तान को लेकर अक्सर ऐसा देखने को मिलता है.
दोनों देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मुद्दे उठाते हैं और उस पर अन्य देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं. ऐसा अमरीका और चीन के बीच भी देखा गया है.
लेकिन, भारत और चीन के बीच ऐसे मुद्दों के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिश बहुत कम होती है.
हॉन्ग-कॉन्ग में विरोध प्रदर्शन हो, ताइवान के साथ विवाद हो या तिब्बत की निर्वासित सरकार हो, ये मामले लंबे समय से चीन के लिए फांस बने हुए हैं. इसके अलावा मानवाधिकार उल्लंघन से लेकर कोरोना वायरस की उत्पत्ति के लिए भी चीन पर सवाल उठाए जाते रहे हैं.
भारत-चीन के बीच इस समय सीमा विवाद गरमाया हुआ है. दोनों देश टकराव की स्थिति में हैं. 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो चुकी है.
लेकिन, फिर भी भारत चीन से जुड़े ऐसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुल कर नहीं बोल रहा है. वह इनका रणनीतिक तौर पर इस्तेमाल नहीं करता.
हाल ही में चीन ने हॉन्ग-कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू करने जा रहा है जिसका अमरीका ने भी विरोध किया लेकिन, भारत ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
1962 का युद्ध हो, चीन-पाकिस्तान की नज़दीकी या डोकलाम जैसा गतिरोध, भारत ने समाधान के लिए बातचीत से लेकर व्यापार प्रतिबंध तक के रास्ते अपनाए हैं लेकिन चीन से जुड़े विवादित मुद्दों को नहीं छेड़ा. चीन को लेकर भारत की इस नीति की वजह क्या है और क्या इसमें बदलाव संभव है?

भारत की पुरानी नीति


हॉन्ग-कॉन्ग में विरोध प्रदर्शनइमेज कॉपीरइटISAAC LAWRENCE/AFP
Image captionहॉन्ग-कॉन्ग में विरोध प्रदर्शन

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि भारत की हमेशा से ‘एक चीन’ को मानने की नीति रही है. इस नीति में बदलाव भारत की विदेश नीति में बड़ा परिवर्तन होगा.
स्वर्ण सिंह बताते हैं, “चीन में आंतरिक विरोध और ताइवान के साथ चीन के तौर पर मान्यता का विवाद, जैसे कारण हैं कि चीन ने हमेशा से एक चीन की नीति को आगे रखा है. उसने ज़ोर दिया है कि कोई भी देश जो चीन के साथ संबंध बनाना चाहता है वो पहले एक चीन की नीति को मान्यता दे. इसलिए भारत ने भी उसकी इस शर्त को अपनाया है.”
ताइवान के साथ हुए लंबे विवाद में चीन को मान्यता पाने में ही काफ़ी लंबा वक़्त लगा था. 20-25 साल तक दुनिया उसे चीन ही नहीं मानती थी. लेकिन, चीन की बढ़ती ताक़त और प्रभाव के चलते बड़े-बड़े देशों ने उसे मान्यता दे दी.
स्वर्ण सिंह कहते हैं कि भारत और चीन दोनों ही देश उपनिवेशवाद से गुज़र चुके हैं. इसलिए उनमें संप्रभुता को लेकर ज़्यादा जुनून भी है. सैद्धांतिक तौर पर भारत भी मानता है कि किसी देश के अंदरूनी मामलों में दूसरे देशों को दखल नहीं देना चाहिए. खुद भारत भी कश्मीर को लेकर दूसरे देश का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता. चीन भी भारत के इस रुख़ को मानता आया है. वह कश्मीर के मसले पर बहुत मुखर होकर नहीं बोलता.
हालांकि, तिब्बत के मामले में भारत ने ज़रूर चीन के आंतरिक मसले में दख़ल दिया है. भारत ने एक तरफ तिब्बत को चीन का हिस्सा माना है तो दूसरी तरफ दलाई लामा को शरण भी दी है.
इस पर स्वर्ण सिंह का कहते हैं कि तिब्बत का मामला थोड़ा अलग है. भारत उससे ख़ुद को अलग नहीं कर सकता. भारत में लाखों तिब्बती शरणार्थी रहते हैं. इसलिए उनके मुद्दे को भारत नज़रअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि उसका असर यहीं पर दिखेगा.
वहीं, दलाई लामा को भारत के लोगों में एक राजनेता नहीं बल्कि एक धर्मगुरू के तौर पर देखा जाता है. उनसे एक भावनात्मक जुड़ाव है. फिर तिब्बत के साथ भारत की सीमा भी जुड़ी हुई है.

आर्थिक निर्भरता

दोनों देशों के बीच इस आपसी समझ के पीछे जानकार आर्थिक कारणों को भी एक वजह मानते हैं. दोनों देशों की एक-दूसरे पर आर्थिक निर्भरता बढ़ी है जिसके चलते भी वो बड़े टकरावों से बचना चाहते हैं.
प्रोफेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं, “1962 के बाद एक दशक तक दोनों देशों के बीच बातचीत ही नहीं हुई. 1990 में भारत में कारोबार बढ़ा और आर्थिक सुधार हुए. दोनों देशों में जो आर्थिक वृद्धि हुई और संभावनाएं बनीं, उससे दोनों का एक-दूसरे के प्रति रुझान भी बदल गया. अब ज़ोर आपसी टकराव से ज़्यादा आर्थिक फ़ायदे पर हो गया. दोनों देश एक-दूसरे में आर्थिक संभावनाएँ देखने लगे ताकि आपसी सहयोग से विश्व पर अपने प्रभाव को बढ़ा सकें.”
“अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे मंच हैं, जहाँ चीन और भारत एकजुट होकर एक ही रणनीति अपनाते हैं. उनके बीच भारत और पाकिस्तान की तरह हर जगह तनाव नहीं दिखता. इसलिए भारत सरकार नीति में इतना बड़ा बदलाव जल्दबाज़ी में नहीं कर सकती. हालाँकि, विदेश नीति समय और परिस्थिति के अनुसार बदल सकती है.”

पंचशील का सिद्धांत


तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामाइमेज कॉपीरइटAFP
Image captionतिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर चाइनीज़ एंड साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर गीता कोचर मानती हैं कि भारत को अपनी इस नीति में बदलाव नहीं करना चाहिए.
वह कहती हैं, “पंचशील का समझौता दो देशों के आंतरिक मामलों में दखल ना देने की बात करता है. अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको अपने विरोध के लिए भी तैयार रहना होगा. कल चीन भी कश्मीर को लेकर सवाल उठा सकता है. पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर होते हुए भी वो फ़िलहाल इस मसले पर बोलने से बचता है.
पंचशील समझौते पर 1954 को हस्ताक्षर हुए थे. चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था. इस समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धांत थे. इसका तीसरा सिद्धांत कहता है कि दोनों देश एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र में कई बार चीन ने कश्मीर के मसले को उठाने की कोशिश की है लेकिन वो इसे दूसरे तरीक़े से लेकर गया है. कभी मानवाधिकार का मसला उठाया है, तो कभी पाकिस्तान के कश्मीर का मुद्दा उठाने पर उस पर अपने विचार प्रकट किए हैं. लेकिन, चीन ने कभी भी कश्मीर को लेकर सीधे भारत से सवाल नहीं पूछे हैं.

पश्चिमी देशों का साथ

अमरीका और कई यूरोपीय देश कोरोना वायरस को लेकर चीन पर खुलकर निशाना साध रहे हैं. जैविक हथियार से लेकर कोरोना की उत्पत्ति जैसे सवाल पूछे जा रहे हैं. लेकिन, भारत ने इस पर भी संयमित रुख़ अपनाया हुआ है.
इस पर स्वर्ण सिंह का कहना है कि अमरीका की स्थिति अलग है. उसकी सीमाएँ चीन से नहीं मिलतीं इसलिए उसे युद्ध का सीधा ख़तरा नहीं है. फिर वो चीन को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है. उसे लगता है कि चीन कुछ दशकों में उससे आगे निकल सकता है. चीन भी सुपर पावर बनने की महत्वाकांक्षा रखता है. ऐसे में अमरीका चीन पर खुला हमला कर सकता है.
हालांकि, जानकारों का ये भी मानना है कि भारत इन सभी मसलों को पूरी तरह नज़रअंदाज नहीं करता है. ये भारत के हाथ में कार्ड की तरह हैं. ज़रूरत पड़ी तो वो इनका इस्तेमाल कर सकता है.
वहीं, गीता कचोर कहती हैं कि व्यक्तिगत तौर पर या पार्टी के स्तर पर कोई क्या कहता है ये अलग बात है. आप सरकार में ना रहते हुए या भावनाओं में बहकर कह सकते हैं कि चीन के अंदरूनी मामलों को उठाकर उस पर दबाव बनाना चाहिए. लेकिन, जब सरकार की सरकार से बात होती है तो आप समझौतों की बात करते हैं.
अगर भारत ये समझौते तोड़ेगा तो चीन उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाएगा और उसे दूसरे समझौते तोड़ने का मौक़ा मिल जाएगा. चीन के साथ सिक्किम को लेकर समझौता हुआ है जिसमें उसने सिक्किम का भारत का हिस्सा माना है. इसलिए ये फैसले कई पक्षों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं.
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