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दिल्ली दंगा: पीट-पीटकर राष्ट्रगान गवाने के मामले में पुलिस ने क्या किया?

 


  • पीयूष नागपाल
  • बीबीसी संवाददाता
दिल्ली दंगा

पाँच युवक ज़मीन पर गिरे हुए दर्द में कराह रहे हैं, हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहे हैं और बख़्श दिए जाने की विनती कर रहे हैं लेकिन उन्हें डंडे से पीटने वाले उन्हें गालियाँ देते हुए 'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' गाने के लिए कह रहे हैं.

इस घटना का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें इन युवकों को जो लोग क्रूरता से पीट रहे हैं और वे सब दिल्ली पुलिस की वर्दी में हैं.

पिछले साल फ़रवरी में हुए दंगों के दौरान जिन मामलों की वजह से दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठे हैं उनमें यह सबसे अहम मामला है.

दिल्ली पुलिस ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि वे पुलिसकर्मी ही थे, दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा है कि उन पुलिसकर्मियों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है.

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बुरी तरह पिटाई की वजह से इस मामले में फैज़ान की मौत हो गई और चार अन्य लोग बुरी तरह से ज़ख्मी हुए लेकिन आज एक साल बाद भी इस मामले की जाँच में कोई प्रगति नहीं हुई है.

वीडियो में नज़र आ रहे पुलिसकर्मी कौन थे, किस थाने के अंतर्गत उनकी तैनाती थी, किसके निर्देश पर उन्होंने यह सब किया? इनमें से किसी सवाल का जवाब अब तक नहीं मिला है.

फ़ैज़ान और 4 अन्य लोगों को 24 फ़रवरी को पीटा गया था, 26 फ़रवरी को फ़ैज़ान ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

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मरने से पहले फ़ैज़ान का बयान

फ़ैज़ान की माँ किस्मतून अपने छोटे से कमरे में सुबकते हुए कहती हैं, "क्राइम ब्रांच की जाँच से मेरा भरोसा उठ चुका है इसलिए अपने बेटे को इंसाफ़ दिलाने के लिए हमने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. मेरे बेटे ने मरने से पहले साफ़ कहा था कि पुलिस ने उसे बुरी तरह पीटा है और पुलिस ही उसकी हालत के लिए ज़िम्मेदार है."

किस्मतून के कमरे की दीवारों पर हुए पेंट की परतें उधड़ रही हैं. ये छोटा सा कमरा इस्तेमाल में न आने वाले एक पुरानी सिलाई मशीन और एक छोटे से बिस्तर भर से भर गया है.

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किस्मतून बताती हैं, "उसके साथ किसी जंगली जानवर-सा सलूक किया गया. वो बहुत अच्छा बेटा था, ज़िम्मेदार बच्चा था. वो ग़ाज़ीपुर मंडी में काम करता था. वो बहुत मेहनती था, वह कमाकर घर चलाता था, उसे इसलिए मारा गया क्योंकि वो मुसलमान था. पुराने वक़्त में आज जैसा माहौल नहीं था. तब आस-पड़ोस में मेलजोल था, ऐसा हिंदू मुसलमान नहीं होता था. अगर दंगों में कोई बड़ा आदमी मारा गया होता तो इंसाफ़ भी जल्दी होता."

बीबीसी ने पिछले साल एक मार्च को फ़ैज़ान की माँ किस्मतून से बात की थी. उन्होंने पुष्टि की थी कि वीडियो में दिखने वाले पाँच युवकों में से एक उनका बेटा फ़ैज़ान था. उस समय भी क़िस्मतून का यही कहना था कि फ़ैज़ान की मौत पुलिस की पिटाई के कारण हुई और किस्मतून के वकील का कहना है कि "पुलिस ने फ़ैज़ान को जान बचाने के लिए ज़रूरी मेडिकल सहायता से वंचित रखा".

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एफ़आईआर जिसमें पिटाई का ज़िक्र ही नहीं

इस मामले में दिल्ली के भजनपुरा पुलिस स्टेशन में 28 फ़रवरी को एक एफ़आईआर (0075/2020) दर्ज की गई थी लेकिन एफ़आईआर में उस वायरल वीडियो का ज़िक्र नहीं किया गया था जिसमें पुलिस फ़ैजान को पीटते हुए दिख रही थी.

क़िस्मतून ने अपने बेटे को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी. उन्होंने अदालत से अपील की थी की फैज़ान की मौत की जाँच के लिए अदालत की निगरानी में एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) बनाई जाए.

जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर और सौतिक बनर्जी ने अदालत में जस्टिस योगेश खन्ना के समक्ष क़िस्मतून का पक्ष रखा था. याचिका में कहा गया कि फ़ैज़ान को पुलिस ने पहले कर्दमपुरी में "निशाना बनाकर बर्बरतापूर्वक पीटा जिससे वो बुरी तरह घायल हो गया".

याचिका के मुताबिक़, "पुलिस ने फ़ैज़ान को पीटने के बाद उसे घायल और नाज़ुक हालत में ग़ैरक़ानूनी तरीके से हिरासत में लेकर ज्योति नगर पुलिस थाने में रख दिया, हालत बहुत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसकी मौत हो गई."

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बदन के ज़ख़्म तो भर जाएंगे लेकिन...

कर्दमपुरी के अंदर तक पहुँचने के लिए कई सँकरी गलियों को पार करना पड़ता है. यहाँ घुसते ही कसाइयों की दुकानें, चाय की टपरी और छोटा-मोटा कारोबार करने वाले लोग नज़र आते हैं.

यहाँ पहुँचकर मैंने कौसर अली के घर का दरवाजा खटखटाया. कौसर अली भी उन पाँच युवकों में से एक हैं, जो वीडियो में पुलिस से पिटते नज़र आए थे. जब मैं उनसे मिला तो वो काम पर जाने के लिए तैयार हो रहे थे.

कौसर ज़िंदगी बसर करने के लिए एक बैटरी रिक्शा चलाते हैं. उनके परिवार में छह सदस्य हैं, जिनका ख़र्च चलाने के लिए उनकी आमदनी कम ही पड़ती है. उनकी पत्नी रोटियाँ बना रही हैं और उनके बेटे आस-पास बैठे खाने का इंतज़ार कर रहे हैं.

चाय पीते हुए कौसर अली उस दिन को याद करते हैं जिस दिन उनके साथ वो भयावह वाकया हुआ था.

कौसर कहते हैं, "उस घटना की वजह से मुझे अब तक पुलिस से डर लगता है. मुझ जैसे लोगों को बचाने के बजाय पुलिस ने हम पर ही जुल्म किए. हमें पीटने वाले पुलिसवाले ही थे. उन्होंने हेलमेट पहने हुए थे और उनकी वर्दी से नाम ग़ायब थे. पिछले एक साल हमारे लिए बेहद मुश्किल रहे हैं और ये मुश्किलें अब भी जारी हैं."

वे कहते हैं, "हालाँकि अब धीरे-धीरे मुझे काम मिलने लगा है लेकिन पिछली घटनाओं को याद करके मैं अब भी डर जाता हूँ. मेरा शरीर अब भी पूरी तरह फ़िट नहीं हो पाया है. बदन पर लगे ज़ख़्म तो भर जाएंगे लेकिन मेरे ज़हन के जख़्मों का क्या होगा? मैं अब भी सदमे में हूँ. लेकिन ज़िंदगी तो चलती रहेगी."

वृंदा ग्रोवर
इमेज कैप्शन,

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर

मुआवज़ा मिला मगर इंसाफ़ नहीं

पुलिस ने कौसर अली के ख़ून से लथपथ कपड़ों को सबूत के तौर पर अभी तक इकट्ठा भी नहीं किया है.

दंगों के बाद कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने हिंसा पीड़ितों के हालात और मुश्किल बना दिए. फ़ैज़ान के परिवार को 10 लाख और कौसर अली को दो लाख रुपये मुआवज़ा तो मिल गया लेकिन दोनों को लगता है कि उन्हें इंसाफ़ अब तक नहीं मिला है और इसके लिए संघर्ष जारी है.

वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया, "हमने हाई कोर्ट में रिट पेटिशन दाख़िल की है. पुलिस आरोपों से नहीं बच सकती. घटना के एक साल बाद भी जाँच आगे नहीं बढ़ी है और ये पता नहीं लगाया जा सका है कि वो पुलिसकर्मी कौन थे. जाँच की बेहद धीमी रफ़्तार को देखते हुए ही हमने इंसाफ़ के लिए हाई कोर्ट का रुख़ किया. फ़ैज़ान की माँ भी जाँच की रफ़्तार से संतुष्ट नहीं थीं."

हाईकोर्ट ने पुलिस को यह बताने का निर्देश दिया था कि जिस समय फ़ैज़ान को ज्योति नगर पुलिस थाने में रखा गया तब वहाँ के सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे थे या नहीं. 26 फ़रवरी को पुलिस थाने से रिहा होने और अस्पताल में भर्ती होने के चंद घंटों के भीतर ही फ़ैज़ान की मौत हो गई थी.

किस्मतून की वकील का कहना है कि उनके बेटे को वहाँ ग़ैरक़ानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया था, वे घायल हालत में थाने में रखे तो गए थे लेकिन उन्हें गिरफ़्तार या हिरासत में नहीं दिखाया गया.

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दंगों में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल

पुलिस ने इस बारे में पिछले साल 22 जुलाई को अदालत में स्टेटस रिपोर्ट दाख़िल की थी, जिसमें कहा गया था, "जाँच के दौरान न तो कोई सरकारी और न ही कोई प्राइवेट सीसीटीवी कैमरा उस इलाके में थे."

दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि वो अब भी वीडियो में मौजूद पुलिसकर्मियों की पहचान करने की कोशिश कर रही है. क़िस्मतून की वकील वृंदा ग्रोवर का कहना है कि "ऐसा कैसे हो सकता है कि पुलिस को मालूम न हो कि उसके जवानों की तैनाती कहाँ है, कहाँ-कहाँ कौन-कौन तैनात है पुलिस के रजिस्टर में सब दर्ज होता है."

पुलिस ने अदालत में ये भी कहा कि फ़ैज़ान और अन्य युवकों को ज्योति नगर थाने में उनकी सहमति से रखा गया था क्योंकि उन्होंने खुद ही अपनी सुरक्षा की वजह से ऐसा करने का अनुरोध किया था क्योंकि पिटाई के बाद वे घबरा गए थे.

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हाल ही में दिल्ली दंगों में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे. संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि पुलिस ने दंगों में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था.

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