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#Bihar_Election2025 ।।

ऐश्वर्या राय ने मोदी के मुंह पर राहुल गांधी की मोहब्बत का तमाचा जड़ा!
राहुल गांधी से डरे मोदी ने चुनाव आयोग के बचाव में उतारे अपने 272 जजेज- नौकरशाह!
चुनाव आयोग नहीं दे पा रहा राहुल गांधी के तीनों सवालों के जवाब, जुटा धांधली में
जनता सोई पड़ी है और लोकतंत्र लुट रहा, बता रहे उनके कष्ट मगर वो डरे

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272 रिटायर्ड जजों और ब्यूरोक्रेट्स ने खुली चिट्ठी लिखते हुए राहुल गांधी पर ये आरोप लगाया कि वो चुनाव आयोग की छवि कर रहे हैं. चुनाव आयोग की मक्कारी पर चुप्पी, राहुल गांधी के आरोपों पर बवाल और सवाल ? क्या इन्होंने कभी चुनाव आयोग पर लगे आरोपों पर कभी सवाल पूछा ? क्या इन्होंने सत्ता में बनी BJP पर लगे आरोपों पर कभी सवाल पूछा ? आखिर कौन हैं ये 272 प्रतिष्ठित लोग जिन्होंने चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के आरोपों के बाद लिखी खुली चिट्ठी ? उनके इस आरोप के मायने क्या ? विस्तार से जानने के लिए देखें पूरा वीडियो… 

 

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विपक्ष करेगा चुनाव का बहिष्कार, Supreme Court में चुनौती | Rahul Gandhi | Tejashwi Yadav |








15.11.2025

राहुल ने चुटकियों में उतारी जीत का नशा 8 सबूत !





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Rahul Gandhi on Bihar Election Result: राहुल बोले- चौंकाने वाला परिणाम, चुनाव निष्पक्ष नहीं।Congress
Bihar Election Results: NDA ने बड़ी जीत दर्ज की, महागठबंधन को बड़ा झटका। नतीजों पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया—चुनाव को बताया “निष्पक्ष नहीं”, लोकतंत्र की लड़ाई जारी रखने की बात कही।





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14.11.2025

विपक्ष हमलावर! ज्ञानेश गुप्ता ने हराया चुनाव?अमित शाह को क्यों याद आए घुसपैठिए?

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तेजस्वी यादव कहाँ चूक गए, अब आरजेडी की राह क्या होगी?

तेजस्वी यादव

इमेज स्रोत,Hindustan Times via Getty Images

इमेज कैप्शन,बिहार के नतीजों के बाद तेजस्वी के सामने चुनौतियां और बढ़ गई हैं.
    • Author,रजनीश कुमार
    • पदनाम,बीबीसी संवाददाता

बिहार में पहले चरण के मतदान से ठीक पहले बारिश हो रही थी. आसमान में बादल डेरा जमाए हुए थे. नेताओं को ले जा रहे हेलिकॉप्टरों के उड़ान भरने में मुश्किलें हो रही थीं.

एक नवंबर को महुआ में तेज प्रताप यादव आने वाले थे. उनके हेलिपैड के सामने भीड़ जमा थी. लोगों की नज़रें आसमान में थीं कि हेलिकॉप्टर कब लैंड करेगा. लेकिन आसमान में काले बादल घुमड़ रहे थे.

तभी तेज प्रताप की पीआर टीम ने कहा कि मौसम प्रतिकूल होने की वजह से तेज प्रताप उड़ान नहीं भर पाए.

उसी वक़्त महुआ में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की रैली चल रही थी. नीतीश सड़क मार्ग से महुआ पहुँचे थे. नीतीश मंच पर पहुँचे और बहुत लंबा भाषण नहीं दिया. वह एलजेपी (रामविलास) के उम्मीदवार के लिए यहाँ प्रचार करने पहुँचे थे.

बिहार विधानसभा चुनाव नतीजे 2025

एलजेपी (रामविलास) के उम्मीदवार संजय सिंह को आगे करते हुए कहा कि इन्हें वोट करेंगे न? माला पहना दें? लोगों ने हामी भरी और नीतीश ने माला पहना दी.

मौसम प्रतिकूल होने के कारण तेजस्वी ने भी कई रैलियां रद्द कीं लेकिन 77 साल के नीतीश कुमार ने हेलिकॉप्टर उड़ाने लायक मौसम का इंतज़ार नहीं किया.

आसान नहीं है राह

आरजेडी कार्यकर्ता

इमेज स्रोत,Hindustan Times via Getty Images)

इमेज कैप्शन,सवाल अब आरजेडी के भविष्य पर भी उठने लगेंगे

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने 200 से ज़्यादा रैलियों को संबोधित किया था. वहीं इस बार तेजस्वी ने 100 से भी कम रैलियों को संबोधित किया.

तेजस्वी यादव शुरुआती रुझानों में अपनी सीट राघोपुर से भी आगे-पीछे हो रहे थे. आख़िरकार उन्होंने 14,532 वोटों से जीत दर्ज की. तेज प्रताप यादव तो महुआ में तीसरे नंबर पर चले गए.

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

राघोपुर में बीजेपी के सतीश कुमार ने तेजस्वी को कड़ी टक्कर दी. सतीश कुमार ने 2010 में राघोपुर से राबड़ी देवी को हराया था.

तेजस्वी यादव 2015 के विधानसभा चुनाव में राघोपुर से विधायक चुने गए. यह उनका पहला चुनाव था.

तब नीतीश कुमार और लालू यादव ने मिलकर चुनाव लड़ा था. चुनाव में इसी गठबंधन को जीत मिली और तेजस्वी पहली बार में ही प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बन गए.

दो साल भी नहीं हुए कि नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ चले गए और तेजस्वी को 16 महीने बाद उपमुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. उसके बाद वो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने.

इस छोटे से राजनीतिक करियर में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे. आईआरसीटीसी लैंड स्कैम केस में उन्हें अगस्त 2018 में बेल मिली थी.

ये मामला पटना में तीन एकड़ ज़मीन को लेकर है. इस ज़मीन पर एक मॉल प्रस्तावित है. लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने 2006 में रेल मंत्री रहते हुए एक निजी कंपनी को होटल चलाने का कॉन्ट्रैक्ट दिया और इसके बदले उन्हें महंगा प्लॉट मिला.

तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी तीन चुनाव लड़ चुकी है. 2015, 2020 और 2025. साल 2015 में आरजेडी और नीतीश कुमार साथ थे और इस गठबंधन को जीत मिली थी.

आरजेडी 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. 2020 में आरजेडी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए थे. इस चुनाव में भी आरजेडी 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. लेकिन 2025 का चुनाव उनके नेतृत्व में आरजेडी के लिए 2010 की तरह रहा. 2010 में भी आरजेडी को महज़ 22 सीटों पर ही जीत मिली थी और इस बार भी इसी के आसपास जीत मिलती दिख रही है.

ऐसे में सवाल उठता है कि अब आरजेडी का क्या होगा? क्या तेजस्वी यादव वो मुकाम हासिल कर पाएंगे जो लालू यादव को 90 के दशक में मिला था?

आरजेडी के पूर्व नेता प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि कोई भी पार्टी एक जाति से नहीं चल सकती है और मुझे लग रहा है कि यादव भी आरजेडी के साथ अब पूरी तरह से एकजुट नहीं हैं.

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ''दानापुर में अगर यादव पूरी तरह से आरजेडी के साथ होते तो रामकृपाल यादव की बढ़त नहीं होती बल्कि रीतलाल यादव की होती. राघोपुर में कांटे की टक्कर नहीं होती. पूर्णिया में लोकसभा चुनाव में आरजेडी की उम्मीदवार बीमा भारती महज़ 27 हज़ार वोट नहीं पातीं और पप्पू यादव जीत हासिल नहीं कर पाते.''

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ''मुसलमान भी इनसे छिटक रहे हैं. हिना शहाब को सिवान में पिछले साल लोकसभा चुनाव में तीन लाख से ज़्यादा वोट मिले थे. ज़ाहिर है कि मुसलमानों ने इन्हें वोट किया था, जबकि वह आरजेडी की उम्मीदवार नहीं थीं. सीमांचल में ओवैसी की पार्टी पांच सीटें नहीं जीत पाती.''

लालू यादव इसी साल 24 जून को लगातार 13वीं बार राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे. 28 साल पुरानी पार्टी का लालू यादव के अलावा कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहा. 77 साल के लालू यादव सेहत से जुड़ी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं.

लालू यादव की विरासत

लालू यादव

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इमेज कैप्शन,नब्बे के दशक में लालू यादव ने जो सफलता हासिल की, तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी वहां तक नहीं पहुँच पाई है.

लालू यादव सक्रिय राजनीति से भी दूर हैं लेकिन पार्टी में अब भी वह काफ़ी अहमियत रखते हैं. 10 मार्च 1990 को लालू यादव ने बिहार के 25वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

लालू यादव कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में आ गए थे. पहला चुनाव लालू यादव ने 1977 में छपरा लोकसभा क्षेत्र से जीता था. तब लालू यादव की उम्र महज़ 29 साल थी.

महज़ 42 साल की उम्र में लालू यादव चार बड़े चुनाव जीत चुके थे. ये चुनाव थे, 1977 और 1989 में सांसदी के चुनाव और 1980, 1985 में बिहार में विधायक का चुनाव.

लालू यादव जब मुख्यमंत्री बने तो उनके शासन का अंदाज़ बिल्कुल नए तेवर में था. शुरुआती महीनों में लालू स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों में अचानक दस्तक दे देते थे. सार्वजनिक रूप से नौकरशाहों को डांटते थे. ग़रीबों के साथ खाना खाते थे और गांवों में कैबिनेट की बैठक कर लेते थे.

लालू यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद 1992 में मैथिली को बिहार की एक आधिकारिक भाषा का दर्जा ख़त्म कर दिया था.

90 के दशक में हिन्दुस्तान टाइम्स के पॉलिटिकल रिपोर्टर रहे संजय सिंह कहते हैं, ''मैथिली को ब्राह्मणों से जोड़कर देखा जाता था और लालू यादव के उदय से पहले बिहार की राजनीति में मैथिली ब्राह्मणों का दबदबा रहा था. कहा जाता है कि लालू यादव इस दबदबे को हर स्तर पर तोड़ना चाहते थे. लालू यादव ने पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों की हितैषी वाली छवि बनाई. दशकों की राजनीति के बावजूद लालू यादव इस छवि से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं.''

बदलता बिहार

जेडीयू कार्यालय

इमेज स्रोत,Getty Images

इमेज कैप्शन,पटना में जेडीयू के कार्यालय के बाहर लगा एक बैनर

लेकिन बिहार अब वह राज्य नहीं है, जिस पर कभी लालू यादव ने शासन किया था और न ही लालू यादव अब वह शख़्स हैं, जो कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे. लालू यादव की सेहत ठीक नहीं रहती है और उनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. वह सक्रिय राजनीति से भी बाहर हैं.

संजय सिंह कहते हैं कि लालू यादव की दो तरह की विरासत है और एक विरासत तेजस्वी यादव पर हर चुनाव में भारी पड़ती है.

संजय सिंह कहते हैं, ''लालू यादव की एक विरासत तेजस्वी की मज़बूती है. वह विरासत है, लालू का एमवाय समीकरण. अब भी आरजेडी के साथ यादव और मुसलमान बने हुए हैं. दूसरी विरासत है कि लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के राज में बिहार पटरी पर नहीं था. तेजस्वी यादव अब भी इस राजनीतिक विरासत की छाया से बाहर नहीं निकल पाए हैं. जब-जब चुनाव क़रीब आता है, यह नैरेटिव मज़बूत हो जाता है कि यादवों के पास सत्ता आई तो वे क़ानून व्यवस्था अपने हाथ में ले लेंगे.''

संजय सिंह कहते हैं, ''तेजस्वी यादव के लिए आगे की राह बहुत मुश्किल है. उनके ऊपर चार दिसंबर से भ्रष्टाचार के मामले में ट्रायल शुरू होगा. परिवार के भीतर फूट पहले से ही है. लालू यादव की सेहत अच्छी है नहीं. लालू यादव का उभार तब हुआ था, जब कांग्रेस बिल्कुल कमज़ोर स्थिति में भी."

शिवानंद तिवारी का बयान ग्राफ़िक्स में

"1989 में भागलपुर दंगे के बाद मुसलमान विकल्प खोज रहे थे. लेकिन अब स्थिति बिल्कुल अलग है. बीजेपी बहुत मज़बूत पार्टी है. नीतीश कुमार के साथ रहने से बेहतरीन सामाजिक समीकरण बन जाता है. ऐसे में यादव और मुसलमान साथ होकर भी आरजेडी को जीत नहीं दिला पाते हैं.''

राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता रहे और राबड़ी देवी की कैबिनेट में आबकारी मंत्री रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं कि तेजस्वी यादव को अगर लगता है कि वह अपने पिता की राजनीति अभी के समय में कर लेंगे तो यह उनका ग़लत आकलन है.

शिवानंद तिवारी कहते हैं, ''तेजस्वी यादव ने पूरी पार्टी को वन मैन शो बना दिया है. पार्टी का पूरा कैंपेन देखिए तो एक व्यक्ति की परिधि में रहा. लालू यादव के वक़्त में भी यही हाल था. अब तो परिवार के भीतर ही सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हो गया है. मैं राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री था और मुझे पता है कि सरकार कैसे चलती थी. अगर लोग कहते हैं कि लालू राज में क़ानून व्यवस्था एक परिवार के हाथ में आ जाती है, तो इसमें तथ्य भी हैं.''

शिवानंद तिवारी कहते हैं, ''तेजस्वी यादव के साथ यादव हैं. मुसलमान मजबूरी में साथ हैं.''

नहीं जुड़ रहे नए मतदाता?

बिहार में मतदान

इमेज स्रोत,Hindustan Times via Getty Images

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में प्रोफ़ेसर रहे पुष्पेंद्र कहते हैं कि राष्ट्रीय जनता दल अपने साथ नए मतदाताओं को नहीं जोड़ पा रहा है.

पुष्पेंद्र कहते हैं, ''आप एनडीए को देखिए तो उसके साथ यादव और मुसलमान छोड़कर सारी जातियां हैं. लेकिन आरजेडी अपने साथ नए मतदाताओं को नहीं जोड़ पा रही है. लालू यादव का उभार तब हुआ, जब बिहार सामंती जकड़ में था. लालू यादव ने इस जकड़न पर चोट की और तोड़ा भी. लालू यादव को पता था कि इसके दम पर दस साल तो शासन किया ही जा सकता है. लेकिन सामंतवाद कमज़ोर होने के बाद लालू यादव को जो करना था, वो नहीं कर पाए. नीतीश कुमार ने कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं किया लेकिन सड़क और बिजली का श्रेय तो उन्हें दे ही सकते हैं.''

पुष्पेंद्र कहते हैं, ''विपक्ष तो वादा ही कर सकता है लेकिन सत्ताधारी पार्टी के पास अपने वादों को लागू करने का अधिकार होता है. मैं ये कहना चाह रहा हूं कि महागठबंधन या इंडिया गठबंधन के कई अच्छे वादों को एनडीए ने अपनी सरकारों में लागू किया है."

"बिहार में 40 लाख से ज़्यादा स्कीम वर्कर हैं. यानी मिड डे मील बनाने वाले, आंगनबाड़ी और अन्य तरह के कर्मचारी, जिनकी सैलरी चुनाव से पहले दोगुनी कर दी गई. जीविका से जुड़ी बिहार की लाखों महिलाओं के खाते में 10-10 हज़ार रुपये ट्रांसफ़र किए गए. दूसरी तरफ़ तेजस्वी यादव जो वादे कर रहे थे, उन पर किसी ने भरोसा नहीं किया. जैसे बिहार में हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी. इस पर कौन भरोसा करता?''

पुष्पेंद्र कहते हैं कि आरजेडी को परिवार की परिधि से बाहर निकलना होगा और उसे यह भी समझना होगा कि यादवों को भी हिन्दुत्व की राजनीति रास आ रही है.

पुष्पेंद्र कहते हैं, ''मुसलमान आरजेडी के साथ मजबूरी में हैं और यादवों के लिए भी हिन्दुत्व की राजनीति अछूत नहीं है. ऐसे में ये नए वोटर जोड़ने के बदले अपना पुराना वोट बैंक भी खो सकते हैं.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Voting से पहले पैसे बांटते पकड़े गए भाजपाई! कैमरे में गुंडई करते डिप्टी CM! UP की MLA भी पकड़ी गई!

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असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM क्या इस बार किशनगंज में दिखा पाएगी अपना कमाल ? ओवैसी फैक्टर का यहां कितना है असर ? किशनगंज के मुस्लिम वोटर्स के लिए इस चुनाव में क्या हैं मुद्दे ? यहां के मुस्लिम वोटर इस बार क्या सोच रहे हैं ? नीतीश-तेजस्वी-ओवैसी या प्रशांत किशोर - किसपर है यहां के मुसलमानों को भरोसा ? जुमे की नमाज़ के बाद बाहर आये मुसलमान क्या बोले ? देखिए किशनगंज से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट…
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Rahul Gandhi Vote Chori आरोप के बाद Bihar Election Voting में BJP नेता Rakesh Sinha कैसे फंसे?


Bihar Election 2025 के दौरान BJP leader Rakesh Sinha पर बड़ा आरोप लगा है। सोशल मीडिया पर उनकी voting photo viral होने के बाद विवाद बढ़ गया है। आरोप है कि Rakesh Sinha ने सिर्फ 10 महीनों में दो अलग-अलग राज्यों में vote cast किया। Congress और AAP ने BJP पर election code violation का आरोप लगाया है। यह मामला अब Bihar politics में गरमाया हुआ है और election news की सुर्खियों में





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बीजेपी गठबंधन नेता पर FIR!
तेजस्वी का एलान- पलटी तस्वीर?
बोले राहुल- रील नहीं रोज़गार!

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भाजपा की दबंगई!

"विपक्ष को वोट देने से रोको"
सो रहा चुनाव आयोग?

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तेजस्वी - राहुल का "डबल अटैक"!
तेजस्वी : "नौकरी पर मारेंगे छक्का"!
बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?
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तेजस्वी पर बीजेपी ATTACK !
IRCTC घोटाले में चलेगा मुकद्दमा!

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 आयोग सवालों से भागा! 

सही साबित हुए राहुल गांधी!



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बिहार विधानसभा चुनाव : 6 और 11 नवंबर को वोटिंग, 14 को नतीजों का एलान, जानिए अहम बातें

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इमेज कैप्शन,मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बिहार चुनाव की तारीख़ों का एलान किया

बिहार चुनाव की तारीख़ों का एलान हो गया है.

प्रदेश में दो चरणों में चुनाव होगा. 6 और 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे और 14 नवंबर को नतीजों का एलान होगा.

इसके अलावा उम्मीदवारों के लिए पहले चरण की नामांकन दाखिल करने की आख़िरी तारीख़ 17 अक्तूबर है और दूसरे चरण के लिए नामांकन दाखिल करने की आख़िरी तारीख़ 20 अक्तूबर है.

पहले चरण के लिए नामांकन वापिस लेने की आख़िरी तारीख़ 20 अक्तूबर और दूसरे चरण के लिए नामांकन वापिस लेने की आख़िरी तारीख़ 23 अक्तूबर है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा है कि बिहार चुनाव में 17 नए क़दम उठाए जा रहे हैं जो बाद में पूरे देश में लागू किए जाएंगे.

उन्होंने कहा कि पोलिंग स्टेशन के ठीक बाहर मतदाता अपना मोबाइल जमा करा सकते हैं जिन्हें वोट डालने के बाद वो वापस ले सकते हैं.

चुनाव आयोग ने ये भी बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए कुल मतदाता लगभग 7.43 करोड़ हैं. इनमें करीब 3.92 करोड़ पुरुष, 3.50 करोड़ महिलाएं और 1,725 ट्रांसजेंडर मतदाता शामिल हैं. इनमें 14 लाख से ज़्यादा ऐसे मतदाता हैं जो पहली बार वोट डालेंगे.

चुनाव आयोग ने बताया कि बिहार में कुल 90,712 मतदान केंद्र बनाए गए हैं. इनमें से 76,801 ग्रामीण इलाकों में और 13,911 शहरी क्षेत्रों में हैं. हर मतदान केंद्र पर औसतन 818 मतदाता होंगे. सभी केंद्रों पर 100% वेबकास्टिंग की व्यवस्था की गई है. इनमें 1,350 मॉडल मतदान केंद्र, 1,044 महिलाओं द्वारा संचालित केंद्र, 292 दिव्यांग मतदाताओं के प्रबंधन वाले केंद्र और 38 युवाओं द्वारा संचालित केंद्र शामिल हैं.

इसके पहले रविवार को भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी.

जिसमें उन्होंने बताया था कि बिहार में सफलता के साथ एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हुई है.

बिहार में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले चुनाव आयोग ने एसआईआर शुरू किया था जिसके आंकड़े हाल ही में जारी किए गए. इसकी टाइमिंग को लेकर विपक्षी दलों ने कई सवाल उठाए जबकि चुनाव आयोग ने इसे वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने की प्रक्रिया करार दिया.

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आधार कार्ड पर क्या बोले मुख्य चुनाव आयुक्त?

वोट डालने के बाद इंक मार्क दिखातीं महिला मतदाता

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रविवार को आधार कार्ड से जुड़े एक सवाल के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार बोले, ''सुप्रीम कोर्ट के कई आदेशों के अनुसार, आधार एक्ट के तहत न तो इसे जन्मतिथि का प्रमाण माना जा सकता है, न निवास का, और न ही नागरिकता का. आधार केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता या जन्म का नहीं.''

उन्होंने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हम यह मानते हैं कि आधार कार्ड पहचान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इसे नागरिकता या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता. आधार एक्ट की धारा 9 में भी साफ़ लिखा है कि आधार किसी व्यक्ति की नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है."

''इसलिए, जो लोग 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रमाण देने के लिए केवल आधार कार्ड दिखाते हैं, उनके लिए यह पर्याप्त नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन पात्रता या आयु से जुड़ी पुष्टि के लिए अन्य दस्तावेज़ों की भी आवश्यकता होगी.''

2020 के बाद की राजनीति में क्या हुआ?

बिहार के सीएम नीतीश कुमार

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इमेज कैप्शन,5 सितंबर 2025 को कार्यकर्ता संवाद कार्यक्रम में बिहार के सीएम नीतीश कुमार

राज्य में 2020 के चुनाव के बाद एनडीए की सरकार बनी, लेकिन अगस्त 2022 में बीजेपी से रिश्ता तोड़ते हुए नीतीश कुमार ने महागठबंधन का दामन थाम लिया.

बीजेपी और जेडीयू के रिश्ते इतने तल्ख़ हो गए थे कि नीतीश कुमार ने ये बयान तक दिया कि वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ कभी नहीं जाएंगे.

वहीं, दूसरी तरफ़ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा कि नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो गए हैं.

लेकिन जैसा कि राजनीति में कुछ भी अंतिम सत्य नहीं होता है, उसी क्रम में चीजें एक बार फिर बदल गईं.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन तैयार करने की कोशिश में जुटे चेहरों में नीतीश कुमार अहम नेता माने जा रहे थे.

लेकिन जनवरी, 2024 में वो एक बार फिर एनडीए में शामिल हो गए और आरजेडी से अपनी राहें अलग कर लीं.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव जेडीयू और राष्ट्रीय जनता दल ने मिलकर लड़ा था और बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी. तब ये गठजोड़ 2017 में टूट गया था.

बिहार विधानसभा की स्थिति क्या है?

बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन के पास 122 सीटें होना ज़रूरी है.

बिहार में फ़िलहाल जेडीयू और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के घटक दलों वाली एनडीए सरकार है और आरजेडी के तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं.

बिहार विधानसभा में अभी बीजेपी के 80 विधायक हैं, आरजेडी के 77, जेडी(यू) के 45 और कांग्रेस के 19 विधायक हैं.

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) के 11, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के 4, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के 2, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के 2, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के 1 और 2 निर्दलीय विधायक हैं.

कौन-कौन से गठबंधन मैदान में हैं?

राज्य में इस बार भी अहम मुक़ाबला एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच माना जा रहा है.

एनडीए में जेडीयू, बीजेपी, एलजेपी (आर), जीतनराम मांझी की हम (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे दल हैं.

वहीं महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले), विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), जेएमएम और राष्ट्रीय एलजेपी शामिल हैं.

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इन दोनों गठबंधन में से किसी का भी हिस्सा नहीं है. 2020 के चुनाव में उनकी पार्टी पांच सीटों पर चुनाव जीतने में सफल रही थी, लेकिन बाद में उनकी पार्टी के चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे.

बिहार के सीएम नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री और बिहार बीजेपी के इलेक्शन इंचार्ज धर्मेंद्र प्रधान

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इमेज कैप्शन,बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्री और बिहार बीजेपी के इलेक्शन इंचार्ज धर्मेंद्र प्रधान से 28 सितंबर को मुलाक़ात की

सीट बंटवारा और नए खिलाड़ी कौन हैं?

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अभी तक न तो एनडीए ने और न ही महागठबंधन ने सीट बंटवारे के आंकड़े जारी किए हैं. दोनों प्रमुख गठबंधनों में सीट शेयरिंग पर पेच फंसता दिख रहा है.

सीट बंटवारे को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है. दोनों गठबंधनों में शामिल छोटे दल 'सम्मानजनक सीटों' के लिए अपना दावा पेश कर रहे हैं.

नीतीश कुमार की ख़राब सेहत की ख़बरों, जेडीयू में उत्तराधिकारी पर अटकलों और प्रशांत किशोर की एंट्री और रह-रह कर चिराग पासवान के चुनाव लड़ने की ख़बरों से चुनाव और दिलचस्प होता जा रहा है.

नीतीश कुमार से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने वाले प्रशांत किशोर से बीबीसी ने एक इंटरव्यू में जब ये सवाल किया था कि उनको कितनी सीटों पर जीत का भरोसा है तो उनका कहना था कि या तो उनकी पार्टी अर्श पर होगी या फर्श पर.

उनकी पार्टी सभी 243 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारेगी और वो बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी.

इसके अलावा बिहार में एक और नई पार्टी का उदय हुआ है. तीन महीने पहले आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को उनकी एक फ़ेसबुक पोस्ट के बाद पार्टी से निकाल दिया था. अब उन्होंने अपनी एक नई पार्टी बना ली और इसका नाम रखा है जनशक्ति जनता दल.

चुनाव के मुख्य मुद्दे क्या हैं?

अति पिछड़ा न्याय संकल्प

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इमेज कैप्शन,पटना में महागठबंधन ने अति पिछड़ा न्याय संकल्प जारी किया

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए यह कहकर मैदान में उतर रही है कि उसने राज्य का हर तरह से विकास किया है और युवाओं को रोजगार देने के साथ-साथ लड़कियों-महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं.

वहीं, महागठबंधन रोजगार, पेपर लीक समेत एसआईआर को लेकर एनडीए को घेर रही है और युवाओं से सरकारी नौकरियां तथा रोजगार सृजन समेत कई वादे कर रही है.

राज्य में तेजस्वी यादव के साथ 'वोट अधिकार यात्रा' करते हुए राहुल गांधी ने लगातार एसआईआर और 'वोट चोरी' का मुद्दा उठाया.

हालांकि, बीजेपी और जेडीयू इसे विपक्षी दलों की हताशा वाली राजनीति बता रही है और उनका आरोप है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनी तो राज्य का विकास रुक जाएगा.

अब तक कितने विधानसभा चुनाव हो चुके हैं?

1952 से बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी. इसके बाद से 2020 तक बिहार में 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं.

साल 2005 की फ़रवरी में हुए चुनाव में सरकार नहीं बन पाने के कारण अक्तूबर में फिर से चुनाव आयोजित करने पड़े थे.

आज़ादी के बाद पहले चुनाव में क्या हुआ था?

साल 2016 में भारत सरकार ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा की याद में एक डाक टिकट जारी किया था

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इमेज कैप्शन,साल 2016 में भारत सरकार ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा की याद में एक डाक टिकट जारी किया था

आज़ादी के बाद पहली बार हुए 1951 के चुनाव में कई पार्टियों ने भाग लिया, लेकिन कांग्रेस ही उस समय सबसे बड़ी पार्टी थी.

इन चुनाव में कांग्रेस को 322 में से 239 सीटें मिली थीं.

1957 के चुनाव में भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसे 312 में से 210 सीटें मिली थीं.

1962 के चुनाव में कांग्रेस को 318 में से 185 सीटों के साथ बहुमत हासिल हुआ था. उसके बाद स्वतंत्र पार्टी को सबसे ज़्यादा 50 सीटें मिली थीं.

श्री कृष्ण सिन्हा बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने थे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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