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ज़हरीले सांपों की वजह से बिहार में क्यों बढ़ रही हैं मौतें


ज़हरीले सांपों की वजह से बिहार में क्यों बढ़ रही हैं मौतें, बचाव के सरकारी उपाय कितने कारगर

बिहार के गांवों में ज़हरीले सांपों का आतंक
इमेज कैप्शन,बिहार के गांव में स्नेक रेस्क्युअर घरों में निकले सांपों को ले जाते हुए
  • Author,सीटू तिवारी
  • पदनाम,बीबीसी संवाददाता

सुबह के साढ़े छह बजे थे. 19 साल के गुलशन तख़्त पर अपने दादा के पास ही घर में सो रहे थे.

तभी उनको अपने दाएं पैर की उंगलियों के नीचे तेज़ चुभन महसूस हुई.

गुलशन तेज़ दर्द से कराह कर उठ बैठे. उन्होंने अपने दादा डोमिन मंडल को बताया कि शायद उन्हें सांप ने काटा है.

डोमिन मंडल उस दिन को याद कर कहते हैं, ''हम लोग पास में ही रहने वाले ओझा को फ़ौरन बुला लाए. इस बीच उसके पापा नाव लाने चले गए. ओझा आया. उसने गुलशन को जांचा और हमें बताया कि इसे छछूंदर ने काटा है. लेकिन बच्चे की हालत तो बिगड़ती ही जा रही थी.''

ये घटना बिहार के सुपौल ज़िले के बेलागोट गांव की है.

बीबीसी

25 जुलाई को ये घटना हुई लेकिन गुलशन की मां अनीता देवी आज भी उस दिन को याद करती हैं तो लगातार रोने लगती हैं.

इसके बाद घर में सांप की तलाश शुरू हुई. वो एक ड्रम के पीछे छिपा था. उसे जाल डालकर पकड़ लिया गया. वो बेहद ज़हरीला कोबरा सांप था.

जब ये घटना घटी तो कोसी नदी में पानी का स्तर बहुत बढ़ा हुआ था. गुलशन को सुपौल ले जाने के लिए बस नाव का ही सहारा था.

वीडियो कैप्शन,बारिश के मौसम में सांपों के काटने से होने वाली मौतों की संख्या बढ़ जाती है.

बारिश और बाढ़ की वजह से ये गांव सड़क मार्ग से कट जाता है. ढाई घंटे के इंतज़ार के बाद नाव की व्यवस्था हो पाई लेकिन तब तक कोबरा के ज़हर से गुलशन की हालत बिगड़ने लगी थी.

अनीता देवी कहती हैं, ''नाव से सुपौल पहुंचने में उसे तीन घंटे और लग गए. वो तब तक बुदबुदा रहा था. सुपौल के सदर अस्पताल में उसकी हालत ठीक नहीं हुई तो मधेपुरा रेफ़र कर दिया गया लेकिन चार बजे उसकी मौत हो गई.''

गुलशन के मरने की सूचना मिलने के बाद घरवालों ने घर में पकड़े गए सांप को भी मार डाला. बाद में गुलशन और मरे हुए सांप दोनों को कोसी नदी में बहा दिया गया.

ऐसी मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है

सांप काटने से गुलशन की मौत हो गई थी
इमेज कैप्शन,गुलशन के दादा उस जगह को दिखाते हुए जहां वो सोए हुए थे

गुलशन जैसे ही कई और लोग हर साल ज़हरीले सांपों के काटने से अपनी जान गंवा देते हैं. और बारिश के मौसम में बिहार के ग्रामीण इलाकों में इस समस्या ने एक गंभीर रूप अख़्तियार कर लिया है.

अंधविश्वास, मेडिकल सुविधाओं की कमी और आवागमन की बेहतर सुविधाएं ना होने की वजह से सांपों के काटने की वजह से होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

बेलागोट ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी से चारों तरफ से घिरा हुआ एक गांव है.

यहां आने-जाने का एकमात्र साधन नाव है. कोसी पार करने के बाद भी जो सड़क मिलती है, वो सबसे नज़दीकी सुपौल सदर अस्पताल जाने के रास्ते में तीन जगह कट गई है.

इस वजह से गुलशन को सुपौल ले जाने में जो देरी हुई वो उसके लिए जानलेवा साबित हुई.

गुलशन की मौत सर्पदंश से हुई थी
इमेज कैप्शन,गुलशन की मां अनिता देवी

गुलशन के घर से क़रीब 300 किलोमीटर दूर भोजपुर ज़िले के बिहिया के सदासी टोला में रहने वाली 55 साल की पुनीता देवी को भी 23 अगस्त को घर में झाड़ू लगाते वक़्त एक ज़हरीले सांप ने काट लिया.

उनके घर से सांप निकालने पहुंचे स्नेक रेस्क्युअर नवनीत कुमार राय बीबीसी को बताते हैं, ''उनके घर से 25 किलोमीटर दूर सदर अस्पताल है लेकिन ये लोग इलाज के लिए नहीं गए. ये लोग उन्हें 50 किलोमीटर दूर कंजिया धाम नाम की एक धार्मिक जगह लेकर गए. जहां के बारे में मान्यता है कि सांप काटे व्यक्ति को वहां सुला देने से वो ठीक हो जाता है. जब कई घंटे महिला नहीं जगी तो ये लोग डॉक्टर के पास ले गए. तब तक वो मर चुकी थीं.”

'स्नेक बाइट कैपिटल'

कोसी का इलाका
इमेज कैप्शन,कोसी का इलाक़ा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक़, हर साल सांपों के काटने से दुनिया भर में 80 हज़ार से एक लाख 30 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है.

इनमें से हर साल भारत में औसतन 58 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. इस वजह से भारत को दुनिया की ‘स्नेकबाइट कैपिटल ऑफ़ द वर्ल्ड’ का दुर्भाग्यपूर्ण टैग मिला है.

बिहार राज्य के हेल्थ मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस) से मिले आंकड़ों के मुताबिक़, अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच राज्य में 934 मौतें सांपों के काटने की वजह से हुईं.

इसी दौरान सांपों के काटने के कारण सरकारी अस्पतालों में 17,859 मरीज़ इलाज के लिए आए.

लेकिन केंद्र सरकार की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक़, देशभर में सांप के काटने से होने वाली मौतों का आंकड़ा 'अंडर रिपोर्टेड' है.

बिहार में सर्पदंश

जुलाई माह में बिहार के सारण लोकसभा सीट से सांसद राजीव प्रताप रूडी ने लोकसभा में कहा, ''पूरे भारत में 50 से 60 हज़ार लोगों की मौत सर्पदंश से हो जाती है जो दुनिया में सबसे अधिक है. सबसे अधिक मौतें बिहार में होती हैं जहां हर साल 10 हज़ार से ज़्यादा लोग सांप के काटने से मर जाते हैं.''

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की एक रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र है कि सर्पदंश के ज़्यादातर मामलों में बहुत कम मरीज़ ही अस्पतालों तक पहुंच पाते हैं, जिसके कारण सांपों के काटने से होने वाली मौत का आंकड़ा कम रिपोर्ट हो पाता है.

साथ ही सर्पदंश से होने वाली 70 फ़ीसदी मौत बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और गुजरात में होती हैं.

बेहद ज़हरीले हैं ये ‘बिग 4’ सांप

बिहार में सांपों का आतंक

जून 2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्पदंश से फैलने वाले ज़हर को ‘निगलेक्टेड ट्रॉपिकल डिज़ीज़’ की प्राथमिकता सूची में डाला था.

भारत सरकार ने भी इस साल मार्च में सर्पदंश से होने वाली मौतों को साल 2030 तक ‘वन हेल्थ’ अप्रोच के माध्यम से आधा करने का लक्ष्य रखा है.

भारत में सांप की 310 से अधिक प्रजातियां हैं. इसमें सिर्फ़ 66 प्रजातियां ही ज़हरीली या हल्की ज़हरीली होती हैं.

इसमें 4 प्रजातियां जिन्हें ‘बिग 4’ के नाम से जाना जाता है, वही ज़्यादातर मौतों के लिए ज़िम्मेदार होती हैं. इन्हीं प्रजातियों के सांप लोगों को सबसे ज़्यादा काटते हैं.

ये 4 प्रजातियां हैं- कॉमन करैत, इंडियन कोबरा, रसेल वाइपर और सॉ स्केल्ड वाइपर.

सर्पदंश की ज़द में सबसे ज़्यादा, कम और मध्यम आय वाले देशों के ग़रीब ग्रामीण समुदाय की महिलाएं, बच्चे और किसान आते हैं.

ऐसे देश जहां की स्वास्थ्य प्रणाली कमज़ोर और चिकित्सीय साधन कम हैं वहां सर्पदंश का प्रभाव सबसे ज़्यादा पड़ता है.

बाढ़ कितनी ज़िम्मेदार

स्पेशलिस्ट मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर ठाकुर प्रसाद गुप्ता
इमेज कैप्शन,सुपौल ज़िले के सदर अस्पताल के स्पेशलिस्ट मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर ठाकुर प्रसाद गुप्ता स्नैकबाइट पर कहते हैं कि इसमें सबसे ज़रूरी चीज़ है मरीज़ का समय पर अस्पताल पहुंच जाना.

बिहार का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94.16 लाख हैक्टेयर है. इनमें से एक बड़ा हिस्सा बाढ़ प्रभावित है.

सांपों के काटने के मामले भी ज़्यादातर बारिश और बाढ़ के वक़्त होते हैं. क्योंकि इस दौरान सांप के बिल में पानी घुसने के कारण वो बाहर निकलते हैं.

ख़ासतौर पर उत्तर बिहार की मानसून के वक्त उफ़नाई नदियां सर्पदंश के मामलों को बढ़ाने की बड़ी वजह बनती हैं.

बिहार के सुपौल ज़िले के सदर अस्पताल के स्पेशलिस्ट मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर ठाकुर प्रसाद गुप्ता कहते हैं, ''हमारे यहां एंटीस्नेक वैनम हमेशा उपलब्ध रहता है. लेकिन स्नेकबाइट में सबसे ज़रूरी चीज़ है मरीज़ का समय पर आना. अगर मरीज़ सांप काटने के बाद देर से आएंगे और सांप न्यूरो टॉक्सिक है तो मरीज़ के बचने की संभावना कम हो जाती है.''

बिहार सर्पदंश से लड़ने के लिए कितना तैयार?

बिहार में शर्पदंश

तो क्या आवागमन के कमज़ोर साधन भी इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय इस बात से इनकार करते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, ''अब राज्य में किसी भी जगह से आपको अस्पताल तक पहुंचने में 30 मिनट से ज़्यादा नहीं लगता. ऐसे में किसी के अस्पताल नहीं पहुंच पाने की बात ग़लत है. राज्य के सभी अस्पतालों में एंटी स्नेक वैनम की उपलब्धता है. और सोशल मीडिया के ज़माने में अंडर रिपोर्टेड केस की बात बेमानी है.''

लेकिन कोसी या अन्य नदियों से घिरे गांवों में जलस्तर बढ़ जाने पर क्या होता है?.

इस सवाल के जवाब में मंगल पांडेय कहते हैं, ''बाढ़ के समय में हम लोग बोट एंबुलेंस इन इलाकों में चलवाते हैं जिस पर डॉक्टरों की तैनाती और ज़रूरी दवाइयां होती हैं.''

बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष उदय कांत
इमेज कैप्शन,बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष उदय कांत

ये जानना भी ज़रूरी है कि बोट एंबुलेंस की व्यवस्था बाढ़ के समय के लिए है, जबकि कोसी नदी के पास बसने वाले खासतौर पर सुपौल ज़िले की बात करें तो वहां बीते आठ अगस्त को कोसी इलाके को बाढ़ग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर धरना हुआ.

साल 2008 में हुई कुसहा त्रासदी के बाद बने कोसी संगठन नवनिर्माण संगठन के संस्थापक महेन्द्र यादव कहते हैं, ''लोग स्कूल, स्वास्थ्य, रोज़ाना की ज़रूरतों के लिए कहीं जा नहीं सकते लेकिन सरकार बाढ़ घोषित ही नहीं करती. हमें बाढ़ घोषित करवाने तक के लिए धरना देना पड़ रहा है.''

आठ अगस्त को कोसी इलाके को बाढ़ग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर धरना देते लोग
इमेज कैप्शन,आठ अगस्त को कोसी इलाके को बाढ़ग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर धरना देते लोग

वहीं बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष उदय कांत कहते हैं, ''मुख्यमंत्री स्कूल सुरक्षा योजना के तहत बच्चों को सर्पदंश के बारे में जानकारी भी दी जा रही है. लेकिन रूढ़ियां तोड़ने में पीढ़ियां लगती हैं. तकनीक को अपनाना लोगों के लिए आसान है लेकिन ओझा के साथ एक पूर्वाग्रह जुड़ा है.''

वो कहते हैं, ''दरअसल कई बार विषहीन सांप के काटने पर जब लोग ओझा के पास व्यक्ति को ले जाते हैं तो इन मामलों में व्यक्ति अपने आप ही ठीक हो जाता है. लेकिन आम लोगों के मन में ये धारणा मज़बूत हो जाती है कि ओझा सर्पदंश को ठीक करने में सक्षम हैं.''

जलवायु परिवर्तन और सांप

बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक पी के गुप्ता
इमेज कैप्शन,बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक पीके गुप्ता मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से सांप बिलों से बाहर निकल रहे हैं

सर्पदंश से निपटने की सरकारी कोशिशों के बीच ये देखना भी ज़रूरी है कि जलवायु परिवर्तन का क्या सांप की प्रवृत्ति, आबादी आदि पर भी प्रभाव पड़ रहा है?

राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक पीके गुप्ता बीबीसी से कहते हैं, ''क्लाइमेट चेंज का प्रभाव तो सभी पर है. बाढ़ आ रही है, सूखा पड़ रहा है. फसलें ख़राब हो रही हैं. फसल खाने वाले चूहे या दूसरे छोटे जीव अपने इलाके से शिफ्ट हो रहे हैं, जिससे सांप को उसका खाना नहीं मिल रहा है. बाढ़ आने पर सांप अपने बिल से निकलेंगे, खुले में आएंगे तो वो ज़ाहिर तौर पर नुक़सान पहुंचाएंगे. ये उनका प्राकृतिक स्वभाव है.''

पीके गुप्ता के मुताबिक़, बिहार में पांच प्रजातियों के ज़हरीले सांप हैं- कोबरा, कॉमन करैत, करैत, रसेल वाइपर और सो स्केल्ड वाइपर.

कोसी इलाके में बाढ़ से घिरा एक गांव और कटी हुई सड़क
इमेज कैप्शन,कोसी इलाके में बाढ़ से घिरा एक गांव और कटी हुई सड़क
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अभिषेक, नेचर इन्वायरमेंट एंड वाइल्ड सोसाइटी के ह्यूमन वाइल्डलाइफ कन्फ़्लिक्ट मिटिगेशन प्रोजेक्ट मैनेजर हैं.

वो बिहार और उत्तर प्रदेश में वन विभाग को स्नेक रेस्क्यू की ट्रेनिंग देते हैं.

अभिषेक बताते हैं, ''क्लाइमेट चेंज के कारण इनक्यूबेशन पीरियड जो 45 से 60 दिन का होता था वो घटकर 45 से 50 दिन का हो गया है. साथ ही सांप कोल्ड ब्लडेड होते हैं. ऐसे में धरती के बढ़े हुए तापमान में वो ज़्यादा आक्रामक हो रहे हैं. उनके प्राकृतिक आवास भी हम उनसे लगातार छीनते जा रहे हैं.''

अभिषेक ये भी कहते हैं कि बिहार में डॉक्टर सर्पदंश के इलाज के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं.

वो कहते हैं, ''सिर्फ एएसवी (एंटी स्नेक वैनम) की उपलब्धता से ही बात नहीं बनेगी बल्कि सेकेंड लाइन ऑफ ट्रीटमेंट में भी डॉक्टर्स ट्रेन्ड होने चाहिए.''

हालांकि स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय कहते हैं, ''हमारे चिकित्सक सर्पदंश के इलाज में प्रशिक्षित हैं.''

ऐसे में इन मौत के आंकड़ों और दावों के बीच सवाल यही है कि सर्पदंश से हो रही मौतों को रोकने के लिए क्या ज़मीनी स्तर पर कोई तैयारी है?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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