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बिहार चुनाव: ओवैसी की वजह से आरजेडी को कितना नुक़सान, बीजेपी को कितना फ़ायदा?

 


  • दिलनवाज़ पाशा
  • बीबीसी संवाददाता
ओवैसी को गले लगाता मुसलमान बुज़ुर्ग

बिहार के सीमांचल इलाक़े में 24 सीटे हैं जिनमें से आधी से ज़्यादा सीटों पर मुसलमानों की आबादी आधी से ज़्यादा है. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इनमें से पांच सीटों पर आगे चल रही है.

आमौर सीट से पार्टी के अख़्तरउल ईमान, कोचाधाम से इज़हार आसिफ़, बायसी से रुकुनुद्दीन, बहादुरगंज से अंजार नईमी और जोकीहाट से शाहनवाज़ आलम जीत रहे हैं.

चुनाव नतीजे आने से पहले राजनीतिक विश्लेषक ये मान रहे थे कि सीमांचल के मुसलमान मतदाता ओवैसी की पार्टी के बजाए धर्मनिरपेक्ष छवि रखने वाली महागठबंधन की पार्टियों को तरजीह देंगे.

लेकिन, अब ये साफ़ हो गया है कि सीमांचल के मतदाताओं ने बदलाव के लिए वोट किया है.

'ख़बर सीमांचल' के संस्थापक हसन जावेद के मुताबिक, "सीमांचल की जनता बदलाव के लिए वोट कर रही है. सेक्युलर दलों को लगता है कि मुसलमान सिर्फ उन्हें ही वोट देंगे, भले ही वो काम करें या नहीं. लेकिन इस बार लोग नए चेहरों को चुन रहे हैं."

बिहार कांग्रेस

36 और 16 सालों से मौजूद विधायक हारे

पूर्णिया की अमौर सीट पर अब तक कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान पिछले 36 सालों से विधायक थे. इस बार उन्हें सिर्फ़ 11 फ़ीसद वोट मिले हैं जबकि एआईएमआईएम के अख़्तर-उल-ईमान ने 55 फ़ीसद से अधिक मत हासिल कर सीट अपने नाम की है.

बहादुरगंज सीट पर कांग्रेस के तौसीफ़ आलम पिछले सोलह सालों से विधायक हैं. इस बार उन्हें दस फ़ीसद मत ही मिले हैं जबकि एआईएमआईएम के अंज़ार नईमी ने 47 फ़ीसद से अधिक मत हासिल कर ये सीट जीती है.

हसन जावेद कहते हैं, "महागठबंधन को लग रहा था कि सीमांचल से आसानी से सीटें निकल जाएंगी और वो राज्य में सरकार बना लेंगे. लेकिन यहां नतीजे इसके उलट रहे हैं."

ये रिपोर्ट लिखे जाने तक सीमांचल की कुल चौबीस में से 11 सीटों पर एनडीए, 7 पर महागठबंधन और पांच पर एआईएमआईएम कब्ज़ा कर रही हैं जबकि एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में जा रही है.

किशनगंज लोकसभा क्षेत्र की छह में से चार सीटों पर ओवैसी की पार्टी जीत रही है. पिछले चुनाव में ये सीटें महागठबंधन के पास थीं.

अख़्तरउल ईमान

'अलग पहचान चाहते हैं मुसलमान'

चुनाव अभियान के दौरान सीमांचल का दौरा करने वाले स्वतंत्र पत्रकार पुष्य मित्र कहते हैं, "मुसलमान वोटर अपनी अलग पहचान चाह रहे हैं. वो नहीं चाहते कि उन्हें सिर्फ़ बीजेपी को हराने वाले वोट बैंक के तौर पर देखा जाए. वो अपने इलाक़े में बदलाव चाहते हैं, विकास चाहते हैं."

पुष्य मित्र कहते हैं, "सीमांचल इलाक़े में विकास अवरुद्ध रहा है. यहां पुल-पुलिया टूटे हुए नज़र आते हैं. लोग अभी भी कच्चे पुलों पर यात्रा करते हैं. यहां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जीतते रहे उम्मीदवार विकास कार्यों में दिलचस्पी नहीं लेते हैं."

वहीं, हसन जावेद कहते हैं कि इस बार इस इलाक़े के मुसलमानों की मांग थी कि कांग्रेस और राजद अपने पुराने उम्मीदवारों को बदल दें लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसकी वजह से एआईएमआईएम को अपनी ज़मीन मज़बूत करने का मौका मिल गया.

हसन जावेद कहते हैं, "कांग्रेस यहां के मुसलमानों को अपने बंधुआ वोटर जैसा समझ रही थी जबकि लोग बदलाव चाह रहे थे. यही वजह है कि कई सीटों पर लंबे समय से जीतते आ रहे उम्मीदवारों को इस बार जनता ने पूरी तरह नकार दिया है."

पुष्य मित्र कहते हैं, "सीमांचल में राजनीति में नई पीढ़ी को जगह नहीं मिल पा रही थी. पुराने लोग ही खूंटा गाड़कर बैठे थे. जबकि नई उम्र के मुसलमान वोटर अपने लिए नए चेहरे चाहते हैं."

एक चुनावी रैली में असदुद्दीन ओवैसी

एआईएमआईएम ने नहीं काटे वोट

एआईएमआईएम के मैदान में आने की वजह से आरजेडी और कांग्रेस को सीटों का नुकसान तो हुआ है लेकिन ऐसा नहीं कि एमआईएमआईएम ने वोट काट लिए हों.

ओवैसी की पार्टी इस बार बीस सीटों पर चुनाव लड़ रही है. जिन पांच सीटों पर ओवैसी की पार्टी जीत रही है उनके अलावा दूसरी सीटों पर उसे बहुत ज़्यादा वोट नहीं मिले हैं.

उदाहरण के तौर पर नरपतगंज सीट पर बीजेपी आरजेडी से क़रीब 14 हज़ार वोटों से आगे है और यहां एआईएमआईएम के उम्मीदवार को चार हज़ार से कुछ अधिक वोट ही मिले हैं.

वहीं, प्राणपुर सीट पर कांग्रेस के तौकीर आलम बीजेपी की निशा सिंह से क़रीब पांच हज़ार वोटों से पीछे हैं. यहां एआईएमआईएम के उम्मीदवार को चार सौ के क़रीब वोट मिले हैं.

कटिहार की ही बरारी सीट पर राजद और जदयू के उम्मीदवारों के बीच पंद्रह हज़ार के करीब वोटों का फ़ासला है. यहां भी एआईएमआईएम के उम्मीदवार को छह हज़ार के क़रीब वोट ही मिले हैं.

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