SUTRO KE ANUSAR,CHAKIA POLICE(MOTIHARI)NE MANICHAPRA VILL. ME DT.15.1.13 KO CHAPEMARI KR SAIKRO TAN SARKARI CHAWAL JIS AADMI KE YAHAN SE BARAMAD KI THI,SARKARI ADHIKARIYO AUR LAMBI SEYASI PAHUCH RAKHNE WALE SAFEDPOSHO KI SANLIPTA KE KARAN MAMLE KI LIPA POTI KE PARYASH TEZ HO GAYE HAIN.SUTRO KE ANUSAR JISWAIKTI K YHAN SE SARKARI CHAWAL BARAMAD KI GAI HAI US GAO K SCHOOL ME KAI BAR CHORO NE MDM KE ANAJO PR HATH SAF KARNE KI GHATNA BHI HO CHUKI HAI JISKI FIR CHAKIA THANA, se साससससससस क्यू ME DARJ BATAI JATI HAI.POLICE KI SITHIL RAWAIYA K KARAN MAMLE KA KHULASA ABTK NA HO SAKA HAI.AB UMID JAGI THI PR PANI FIRTA DIKH RAHA HAI
मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार का सुशासन एक बार फिर कटघेरे में खरा होता मालुम दिखाई पर रहा,वजह बना है, इस बार बिहार का education department ,बतायाजाताहै के पूर्बी चंपारणके फेन्हारा पर्खंड के श्री सुनील कुमार पासवान जो एक गरीब और अनुसूचित जाती से सम्बन्ध रखते हैं,इनसे सरकार ने 6 सालो से भी जेयदा समय तक पंचायत शिक्चक (shikchak ) के रूप में काम कराया जब बात वेतन भुगतान की आई तो उन्हें अवैध करार दिया जा रहा श्री सुनील कुमार उपरोक्त जिला एवं पर्खंड के बारा परसौनी में 2003 से ही लगातार काम करते आ रहे,इनके वेतन पे रोक साल 2006 में लगा दी गई ये कहते हु के इनका तीसरा पुनर्नियोजन नहीं हुआ इसलिए इनकी बहाली अवैध है
यहाँ बताते चले के जो भी शिक्चक (shikchak )para teacher के रूप में कार्ज कर रहे थे सरकार ने अपने एक आदेश
सूत्रों के अनुसार अगर पुलिस गहराई से पूछ ताछ करे तो चकिया के आस पास सरकारी स्कूलों में में पिछले 7 से आठ साल में हुए तमाम मिड डे मिल की चोरी की घटनाओं पर से प्रदा उठ जाएगा,मगर ऊँची पहुँच रखने वालों पे क्या पुलिस हाथ डाल पाए गी ,ये सबसे बड़ा सवाल है ,एक RTI के आवेदन पे दिए गए जानकारी के अनुसार 10 सालों में सिर्फ मिड डे मिल की सैकरों चोरी की घटनाएं हुईं पूर्बी चंपारण में ,गिरफ्तारी सिर्फ 2 मामलों में ,इससे अंदाजा लगाया जा सकता है के इस मामले में क्या होगा?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार चकिया पुलिस(पूर्बी चंपारण) ने जिन शातिरों,जो सकारी अनाज अवैध ढंग से खरीद बिक्री करते थे ,गरीबों के बच्चों के मिड डे मिल,अन्त्योदय ,बी पी एल धारकों के अनाजों को सरकारी अधिकारियों की मिली भगत से अंजाम देते थे ,जब मामले को www .biharbroadcasting .com ने खुलासा किया तो छोड़ दिए गए लोगों को पुनः गिरफ्तार कर लिए जाने की सूचना है ,सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस ने चकिया थाना के मनीछपरा पंचायात के वार्ड नंबर एक के एक प्रभावसाली वैक्ति को दिनांक 15.01/2013 को गिरफ्तार किया ,बाद में पता नहीं क्या हुआ उसे छोड़ दिया ,इससे इलाके के लोगों में हैरत होने लगी लोग सोचने लगे की जिस आदमी के घर से जिस पुलिस ने सैकड़ों तन अनाज बरामद करती है ,और ऐसे लोगों को छोड़ देती है .तब मैंने 17.1.2013 को सोशल मीडिया पे खबर अपडेट की गई ,उसके बाद आरोपी पुनः पकर लिए गए।यहाँ बताते चले कि जब 16.01.2013 को जब थाना प्रभारी बारा चकिया से बात करने के तीन बार कोशिश की और आरोपियों के सम्बन्ध में जानने की कोशिश की ,बार बार ,दो दो घंटे का मोहलत लेते रहे,तब मुझे दाल में कुछ काला नजर आया .छेत्र के लोगों को फोन लगाकर पूछा तो पता चला के पूरा दाल ही काला है,और समझ में सारी कहानी आ चुकी थी के चकिया पुलिस बार बार दो दो घंटे के मोहलत क्यों मांग रहे? सूत्रों के अनुसार अगर पुलिस गहराई से पूछ ताछ करे तो चकिया के आस पास सरकारी स्कूलों में में पिछले 7 से आठ साल में हुए तमाम मिड डे मिल की चोरी की घटनाओं पर से प्रदा उठ जाएगा,मगर ऊँची पहुँच रखने वालों पे क्या पुलिस हाथ डाल पाए गी ,ये सबसे बड़ा सवाल है ,एक RTI के आवेदन पे दिए गए जानकारी के अनुसार 10 सालों में सिर्फ मिड डे मिल की सैकरों चोरी की घटनाएं हुईं पूर्बी चंपारण में ,गिरफ्तारी सिर्फ 2 मामलों में ,इससे अंदाजा लगाया जा सकता है के इस मामले में क्या होगा?
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पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
कुलदीप नैयर
पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
मुसलामानों के संदर्भ में भाजपा ने इस बार कम आक्रामक रुख अख्तेयार किया है .इसके दो कारण हो सकते हैं ,पहला तो यह के 2014 में होने वाले संसदीय चुनाव के बाद की स्थिति पर पार्टी की नजरें टिकीं हैं ....लोकसभा में बहुमत के लिए उसे पंथनिरपेक्ष पार्टियों के साथ की जरुरत पड़ेगी ...ऐसे में मुसलामानों के खेलाफ कोई भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है और समर्थ गठबंधन प्रस्तुत करने के मौके को खतरे में डाल सकती है .दूसरा कारण यह हो सकता है आज जब वामपंथी पार्टियां भी उदार हिंदुत्व अपनाने लगी है ,ऐसे में भाजपा उदार दिखने का साहस कर सकती है .पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार पंथनिरपेक्ष पहचान खोती जा रही है .अगर किसी प्रमाण की जरुरत है तो गुजरात का ताज़ा विधानसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है .2002 में हुए गुजरात दंगों को चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने मुद्दा नहीं बनाया .कांग्रेस ने ऐसा माना के चुनाव प्रचार के दौरान मुसलामानों की हत्या का सवाल उठाने से हिन्दू वोट खिसक जायेंगे .कांग्रेस की इस रणनीति से पुरे देश के मुसलामानों को धक्का लगा ,क्योंके कमोबेश वे कांग्रेस को वोट देते आये हैं .....ऐसे में मुसलमानों के सामने यह तै करना मुश्किल भरा काम था कि कौन सी पार्टी सेक्युलर है ?
हिन्दू आतंकवाद का मुकाबला मुस्लिम आतंकवाद नहीं कर सकती .कयोंके मुसलामानों की संख्या कम है .मई इस बात को महसूस करता हूँ की कुछ मुसलामानों ने हताशा में में हिंसा का सहारा लिया है ,लेकिन बजरंग दल,राम सेना और विश्व हिन्दू परिषद जैसे हिन्दू संगठन चाहते हैं के मुसलमान इस रास्ते को अपनाएं .मालेगांव ,अजमेर और हैदराबाद के बम विस्फोटों में कुछ हिन्दू संगठनों का दोष साबित हो चुका है .जैसा के पुलिस हमेशा किया करती है ,इन विस्फोटों को लेकर भी शुरू में शक मुसलामानों पर ही हुआ था और कुछ मुसलमान युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था ....हैदराबाद में पुलिस ने उनकी पिटाई की थी ,लेकिन विस्तार से जांच होने पर खुलासा हुआ के इन विस्फोटों के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ था ........
हकीकत में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी इस समुदाय के लिए सबसे बड़ी चिंता का वषय थी .इसके समाधान के लिए एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला .इस प्रतिनिधिमंडल में हिन्दू भी शामिल थे .प्रधानमंत्री ने कार्रवाई का आश्वासन दिया और इसके बाद मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी कम हुई ,लेकिन मुस्लिम समुदाय अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है .और अभी भी अपने मुकदमों की सुनवाई का इन्तेजार में कई मुस्लिम युवक जेलों में बंद हैं ,जिस समय का इस्तेमाल वे पढाई में या अन्य किसी उपयोगी
काम में कर सकते थे उनका वह समय जेल में बीत रहा है .अगर जवाबदेही नाम की कोई चीज होती तो पुलिस इस तरह मनमानी नहीं करती .जब कोर्ट ने देख लिया के इनके खेलाफ मामला नहीं बनता ,तब जाकर युवकों की रिहाई हुई .तो फिर आखिर गलती किसने की ?अगर इस धारणा को खात्म्कारना है के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी बिना किसी अपराध या बेवजह हुई तो दोषियों के खेलाफ कार्रवाई होनी चाहिए .हिन्दू और मुसलामानों के बीच बढ़ती दूरी को लेकर मैं ज्यादा चिंतित हूँ .सच्चाई यह है के इनके बीच सामाजिक लगाव नहीं .साथ ही आपसी समझबूझ की भी कमी ..संतोष की बात बस इतनी है के गुजरात नरसंहार के बाद कोई दूसरा बड़ा दंगा नहीं हुआ है ,लेकिन इसका ये मतलब नहीं के देश साम्प्रदाइक्तता पर काबू पाने में कामयाब हो गया है .असम ताज़ा उदहारण है .पिछले दिनों मैं केरल में था .वहाँ मैंने वामपंथियों को भी साम्प्रदाइक होते देखा .यह ऐसा राज्य है जहाँ हिन्दू और मुसलमानों की तरह मेलजोल की कीमत पर इसाई भी अपनी बांह फैला रहे हैं .हैरत की बात यह है के मजहबी वर्चस्व बढ़ने पर सर्वश्रेष्ठ आर्थिक विचारधारा भी विफल हो रही है .उत्तर प्रदेश में अनगिनत छोटे मोटे दंगे हुए हैं .मीडिया में इनकी खबरें नहीं आई हैं .सच्चाई यह है के जब तक दंगे का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आ जाता ,मीडिया में खबरें नहीं आती है .
दूसरी तरफ एक उदाहरण दिल्ली का है ,जहाँ 23 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खेलाफ सभी जाति धर्म के छात्र आगे आए बर्बरता का विरोध करने के सवाल पर वे एक हुए .और दूसरी तरफ एक गलत रास्ते से जुलूस निकलने पर तलवारें निकल आईं .सियासी तंजीमों को जब भी लगता है के इससे चुनावी या कोई और लाभ हो सकता है तो वे आग में भी घी डालने का काम करते हैं .बद्किश्मती से आजादी के 65 सालों बाद भी पंथनिरपेक्षता की जड़े मजबूत नहीं ही पाई हैं .इससे भी बड़ी समस्या ये है के समाज में सामंजस्य की भावना ही खत्म होती जा रही है .पंथनिरपेक्षता को बचाने का एक रास्ता है यह के इसे नुक्सान पहुंचाने वाले हर एक आदमी को सजा दी जाए ....लेकिन विवादित ढांचा गिराने वालों को अबतक सजा नहीं दी गई है ....इसी तरह मुस्लिम विरोधी दंगों के मामले में नरेंदर मोदी पर हाथ नहीं डाला गया है ....सहूलियत और वेयाओहारिकता आड़े आजाती है और दोषी खुले घूम रहे हैं .लेकिन कल्पना कीजिये मुसलामानों पर इसका क्या असर पड़ा है .भाजपा 1984 के दंगों में सिखों की हत्या के लिए कांग्रेस की आलोचना करती है और इसके जवाब में कांग्रेस गुजरात की घटनाओं की याद दिलाती है .बहस के लिहाज से दोनों घटनाएं अहम हैं ,लेकिन भारत की पंथनिरपेक्षता का क्या होगा ?
साम्प्रदैकता को वैधता मिलने पर मैं असहज महसूस कर रहा हूँ .अधिक से अधिक लोग उन्मादी बनते जा रहे हैं .यहाँ तक की पुलिस या दुसरे सुरक्षा बल भी इससे मुक्त नहीं हैं ,जबके अगर लोकतंत्र को जिन्दा रखना है तो नफरत आयर तरफदारी को मिटाना होगा .हैदरबाद में माहौल को साम्प्रदाइक बनाने के मकसद से अकबरुद्दीन ओवैसी ने जो भड़काऊ भाषण दिया,उसे सुनकर मई अचंभित हूँ .उसके समर्थन में भीड़ ने जो तालियाँ बजाएँ उससे उतना ही हैरान भी हूँ .भारत जैसे मुल्क में उनके लिए कोई जगह नहीं है ,कयोंके ऐसे लोग पंथनिरपेक्षता की जड़ को काट रहे हैं .सीमाएं चाहे जो भी हों ,भारत पंथनिरपेक्षता के पथ पर आगे बढ़ने को बेताब है इस असल बात से समझौता नहीं हो सकता
उपरोक्त लेख दैनिक जागरण के दिनांक 16.1.2013 में प्रकाशित अंक से लिया गया है
पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
मुसलामानों के संदर्भ में भाजपा ने इस बार कम आक्रामक रुख अख्तेयार किया है .इसके दो कारण हो सकते हैं ,पहला तो यह के 2014 में होने वाले संसदीय चुनाव के बाद की स्थिति पर पार्टी की नजरें टिकीं हैं ....लोकसभा में बहुमत के लिए उसे पंथनिरपेक्ष पार्टियों के साथ की जरुरत पड़ेगी ...ऐसे में मुसलामानों के खेलाफ कोई भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है और समर्थ गठबंधन प्रस्तुत करने के मौके को खतरे में डाल सकती है .दूसरा कारण यह हो सकता है आज जब वामपंथी पार्टियां भी उदार हिंदुत्व अपनाने लगी है ,ऐसे में भाजपा उदार दिखने का साहस कर सकती है .पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार पंथनिरपेक्ष पहचान खोती जा रही है .अगर किसी प्रमाण की जरुरत है तो गुजरात का ताज़ा विधानसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है .2002 में हुए गुजरात दंगों को चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने मुद्दा नहीं बनाया .कांग्रेस ने ऐसा माना के चुनाव प्रचार के दौरान मुसलामानों की हत्या का सवाल उठाने से हिन्दू वोट खिसक जायेंगे .कांग्रेस की इस रणनीति से पुरे देश के मुसलामानों को धक्का लगा ,क्योंके कमोबेश वे कांग्रेस को वोट देते आये हैं .....ऐसे में मुसलमानों के सामने यह तै करना मुश्किल भरा काम था कि कौन सी पार्टी सेक्युलर है ?
हिन्दू आतंकवाद का मुकाबला मुस्लिम आतंकवाद नहीं कर सकती .कयोंके मुसलामानों की संख्या कम है .मई इस बात को महसूस करता हूँ की कुछ मुसलामानों ने हताशा में में हिंसा का सहारा लिया है ,लेकिन बजरंग दल,राम सेना और विश्व हिन्दू परिषद जैसे हिन्दू संगठन चाहते हैं के मुसलमान इस रास्ते को अपनाएं .मालेगांव ,अजमेर और हैदराबाद के बम विस्फोटों में कुछ हिन्दू संगठनों का दोष साबित हो चुका है .जैसा के पुलिस हमेशा किया करती है ,इन विस्फोटों को लेकर भी शुरू में शक मुसलामानों पर ही हुआ था और कुछ मुसलमान युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था ....हैदराबाद में पुलिस ने उनकी पिटाई की थी ,लेकिन विस्तार से जांच होने पर खुलासा हुआ के इन विस्फोटों के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ था ........
हकीकत में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी इस समुदाय के लिए सबसे बड़ी चिंता का वषय थी .इसके समाधान के लिए एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला .इस प्रतिनिधिमंडल में हिन्दू भी शामिल थे .प्रधानमंत्री ने कार्रवाई का आश्वासन दिया और इसके बाद मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी कम हुई ,लेकिन मुस्लिम समुदाय अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है .और अभी भी अपने मुकदमों की सुनवाई का इन्तेजार में कई मुस्लिम युवक जेलों में बंद हैं ,जिस समय का इस्तेमाल वे पढाई में या अन्य किसी उपयोगी
काम में कर सकते थे उनका वह समय जेल में बीत रहा है .अगर जवाबदेही नाम की कोई चीज होती तो पुलिस इस तरह मनमानी नहीं करती .जब कोर्ट ने देख लिया के इनके खेलाफ मामला नहीं बनता ,तब जाकर युवकों की रिहाई हुई .तो फिर आखिर गलती किसने की ?अगर इस धारणा को खात्म्कारना है के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी बिना किसी अपराध या बेवजह हुई तो दोषियों के खेलाफ कार्रवाई होनी चाहिए .हिन्दू और मुसलामानों के बीच बढ़ती दूरी को लेकर मैं ज्यादा चिंतित हूँ .सच्चाई यह है के इनके बीच सामाजिक लगाव नहीं .साथ ही आपसी समझबूझ की भी कमी ..संतोष की बात बस इतनी है के गुजरात नरसंहार के बाद कोई दूसरा बड़ा दंगा नहीं हुआ है ,लेकिन इसका ये मतलब नहीं के देश साम्प्रदाइक्तता पर काबू पाने में कामयाब हो गया है .असम ताज़ा उदहारण है .पिछले दिनों मैं केरल में था .वहाँ मैंने वामपंथियों को भी साम्प्रदाइक होते देखा .यह ऐसा राज्य है जहाँ हिन्दू और मुसलमानों की तरह मेलजोल की कीमत पर इसाई भी अपनी बांह फैला रहे हैं .हैरत की बात यह है के मजहबी वर्चस्व बढ़ने पर सर्वश्रेष्ठ आर्थिक विचारधारा भी विफल हो रही है .उत्तर प्रदेश में अनगिनत छोटे मोटे दंगे हुए हैं .मीडिया में इनकी खबरें नहीं आई हैं .सच्चाई यह है के जब तक दंगे का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आ जाता ,मीडिया में खबरें नहीं आती है .
दूसरी तरफ एक उदाहरण दिल्ली का है ,जहाँ 23 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खेलाफ सभी जाति धर्म के छात्र आगे आए बर्बरता का विरोध करने के सवाल पर वे एक हुए .और दूसरी तरफ एक गलत रास्ते से जुलूस निकलने पर तलवारें निकल आईं .सियासी तंजीमों को जब भी लगता है के इससे चुनावी या कोई और लाभ हो सकता है तो वे आग में भी घी डालने का काम करते हैं .बद्किश्मती से आजादी के 65 सालों बाद भी पंथनिरपेक्षता की जड़े मजबूत नहीं ही पाई हैं .इससे भी बड़ी समस्या ये है के समाज में सामंजस्य की भावना ही खत्म होती जा रही है .पंथनिरपेक्षता को बचाने का एक रास्ता है यह के इसे नुक्सान पहुंचाने वाले हर एक आदमी को सजा दी जाए ....लेकिन विवादित ढांचा गिराने वालों को अबतक सजा नहीं दी गई है ....इसी तरह मुस्लिम विरोधी दंगों के मामले में नरेंदर मोदी पर हाथ नहीं डाला गया है ....सहूलियत और वेयाओहारिकता आड़े आजाती है और दोषी खुले घूम रहे हैं .लेकिन कल्पना कीजिये मुसलामानों पर इसका क्या असर पड़ा है .भाजपा 1984 के दंगों में सिखों की हत्या के लिए कांग्रेस की आलोचना करती है और इसके जवाब में कांग्रेस गुजरात की घटनाओं की याद दिलाती है .बहस के लिहाज से दोनों घटनाएं अहम हैं ,लेकिन भारत की पंथनिरपेक्षता का क्या होगा ?
साम्प्रदैकता को वैधता मिलने पर मैं असहज महसूस कर रहा हूँ .अधिक से अधिक लोग उन्मादी बनते जा रहे हैं .यहाँ तक की पुलिस या दुसरे सुरक्षा बल भी इससे मुक्त नहीं हैं ,जबके अगर लोकतंत्र को जिन्दा रखना है तो नफरत आयर तरफदारी को मिटाना होगा .हैदरबाद में माहौल को साम्प्रदाइक बनाने के मकसद से अकबरुद्दीन ओवैसी ने जो भड़काऊ भाषण दिया,उसे सुनकर मई अचंभित हूँ .उसके समर्थन में भीड़ ने जो तालियाँ बजाएँ उससे उतना ही हैरान भी हूँ .भारत जैसे मुल्क में उनके लिए कोई जगह नहीं है ,कयोंके ऐसे लोग पंथनिरपेक्षता की जड़ को काट रहे हैं .सीमाएं चाहे जो भी हों ,भारत पंथनिरपेक्षता के पथ पर आगे बढ़ने को बेताब है इस असल बात से समझौता नहीं हो सकता
उपरोक्त लेख दैनिक जागरण के दिनांक 16.1.2013 में प्रकाशित अंक से लिया गया है
चोरी के सैकड़ों क्विंटल अनाज के खरीदार को पुलिस ने पकड़ा,पुलिस अगर गहराई से पूछ ताछ करेगी तो कई सफ़ेदपोश चेहरे के बेनकाब होने की संभावना जताई जारही,मगर स्थानिये पुलिस ऐसा करने के लिए तैयार है?
बारा चकिया (पूर्बी चंपारण ,बिहार)चकिया पुलिस ने दिनांक 15 .1.2013 को थाना के तेहत आने वाले मनीछपरा पंचायत के वार्ड नंबर निवासी एक वैक्ति को गिरफ्तार सरकारी चावल खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया,सूत्रों के अनुसार पुलिस ने सैकरों क्विंटल सरकारी अनाज बरामद की,आरोपी के ऊँची पहुँच और कई सफ़ेदपोश से संबंध रहने के कारण स्थानिये पुलिस पुरे मामले को दबाने की कोशिश में लगी है ,सूत्रों के अनुसार आरोपी प्रशाशन की मिलीभगत से सालों से बी पी एल , अन्तयोदय और मिड डे मील के अनाजों को सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से खरीदने का काम करता था ,लोगों का कहना है के पुलिस अगर कड़ाई से पूछ -ताछ करे तो सरकारी स्कूलों में होने वाले मीड डे मील चोरी की घटनाओं का प्रदाफ़ाश हो सकता है,पर सूत्रों की माने तो बारा चकिया पुलिस मामले को गंभीरता से लेने के मूड में नहीं,सूत्रों के अनुसार आरोपी वैक्ति के पंचायत में पिछले 10 सालों में मीड डे मील के अनाजों की कई चोरी की घटनाएं घटीं ,पर पुलिस ने गहनता से जांच करने की बजाये मामले को सूत्रहीन जान बुझकर करार देकर मामले की लीपा पोती करदी,वर्ना सूत्रों के अनुसार आरोपी बहूत पहले जेल की सलाखों में होता ....
आरोपी के बगल के एक उर्दू प्राथमिक विद्यालय दो दो बार मीड डे मील की चोरी की घटना बहूत कम अंतराल पे हुआ ,लेकिन स्थानिये पुलिस के मामले में जेयादा रुची न लेने के कारण मामले का खुलासा न हो सका,और आरोपी सालों से पुलिस की आखों से बचता रहा ,सूत्रों के अनुसार आरोपी से उसके पंचायत,और बगल के पंचायत में हुए तमाम मीड डे मील चोरी की घटनाओं के सम्बन्ध में पूछ ताछ करे तो मामले का खुलासा हो सकता है,और क्षेत्र के कई सफ़ेदपोश चेहरे बेनकाब होंगे ,लेकिन क्या पुलिस विभाग के आला अधिकारी ऐसा करने के लिए तैयार हैं
दलित के साथ जुल्म और नाइंसाफी की इससे बड़ी और क्या मिशाल हो सकती है ?
दलित जुल्म की एक मिशाल आपके सामने पेश है ,जो अंग्रेजों के जरिये ढाए गए जुल्म को भी फीका करदे
मामला बिहार के पूर्बी चंपारण से ज़ुरा हुआ है
उपरोक्त जिला के फेन्हरा ब्लॉक के बारा परसौनी पंचायत के एक ऊँची जाति के एक मुखिया ने अपने बेटे और भतीजी को बहाल कराने के लिए पहले एक दलित जाति के एक पंचायत शिक्षक श्री सुनील कुमार पासवान को एक साजिश के तहत शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों से मिलकर हटा दिया,वह भी इस प्रकार से के सुनील कुमार काम भी 6 सालों से उपर से काम भी करते रहे पर वेतन न मिला ,मगर बैक डोर से बहाल उची जाति के मुखिया के जरिये बहाल रिश्तेदारों के वेतन भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आई ,मगर श्री सुनील कुमार चुके दलित जाति से संबंध था सो इनका वेतन मिलता तो कैसे,सुनील कुमार दौरते रहे मगर न मुखिया ने इनकी सुनी न बिहार के सुशासन बाबू की वह सरकार जो दलितों और अल्पसंख्यकों के कल्याण के नाम पर सालों से हुकूमत स्थापित है ,बात जब न बनी 6 साल से भी जेयदा अर्से बीत गए,तब बिहार के मशहूर सौतंत्र पत्रकार सह मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद कौसर नदीम ने दलित सुनील कुमार को इन्साफ दिलाने के खातिर मोर्चा संभाला ,जनाब नदीम ने पुरे मामले को निष्पक्ष जांच कराने हेतु बिहार राज मानवाधिकार के अध्यक्ष श्री एस एन झा को पत्र लिखा ,
राज मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद जांच तो हुई ,पर साल बीत गए ,पर न जाने मावाधिकार आयोग भी आज तक फैसला न ले सका ,शायद ऐसे संस्थानों में भी कहीं बैठे बरी जाति कहीं सुनील कुमार पासवान के इन्साफ पाने की राह में रुकावट तो नहीं? ,ये सवाल उठने लगे हैं,कयोंके मामला इतना गंभीर ,और इन्साफ होने में इतनी देरी ? सवाल उठे भी क्यों नहीं ,जिस मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद वारिये अधिकारिओं ने जांच की ,गलत ढंग से बहाल लोगों को हटाया ,लेकिन उनके विरूद्ध आज तक एफ आई आर तक दर्ज न हुआ ,यानि ऊँची जाति के जालसाजों के साथ मरौअत और इमानदार दलितों के साथ न इंसाफी?अगर ये नाइंसाफी की मिशाल नहीं तो बिहार के सुशासन बाबू और उनके कर्ता धर्ता बताएं के ये किस बात की निशानी है .......
बात यहीं पर ख़त्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी ,मगर अंधा कानून का ही शायद परिणाम था के मुखिया के बेटे ने एक समय में दो स्थानों पर सालों साल नौकरी भी करता रहा यानि के एक ही समय में वह डाक विभाग का मुलाजिम भी रहा और पंचायात शिक्षक भी ,जरा खुद सोंचिये के भला बगैर किसी आला अधिकारिओं की मिली भगत के संभव हो सकता था .........हम को तो कतई मुमकिन नहीं दिखता लेकिन आप लोग क्या सोंचते हैं?
मामले का सबसे मजेदार पहलू तो ये है के वारिये पदाधिकारी अपने को इस मामले में फंसता देख मुखिया के बेटे और भतीजी के वेतन भुगतान पर जब रोक लगाईं तो इन लोगों ने मुख्मंत्री के सेवा यात्रा में जाकर नाइंसाफी की गुहार लगाईं ,मगर सच्चाई सामने पहले ही आ चुकी थी सो वारिये पदाधिकारियों ने अब आगे साथ तो जरूर न दी मगर इन जालसाजों को बचाने में कोई कमी नहीं की ,मसलन प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी ने इन जालसाजों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुसंसा कर रख्खी है ,शायद ऊँची जाति और ऊँची पकड़ का ही नतीजा है के प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी के आदेश के बावजूद न तो जाल जालसाजों से रुपया ही वसूला जा सका है और न अब तक एफ आई आर ही दर्ज हो सका ,ऐसी सूरत में अब नीतीश किस मूह से कहते फिरेंगे के मैं दलित और अल्पसंख्यक प्रेमी हूँ?और हमारे प्रदेश में न्याय के साथ विकास भी हो रहा ?
4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना बिहार के पूर्बी चंपारण के बारा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की ......
Md Kaushar Nadeem shared a status.
बिहार के पूर्बी चंपारण के बरा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक 4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की www.biharbroadcasting.com......
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बिहार के पूर्बी चंपारण के बरा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक 4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की www.biharbroadcasting.com......
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