ग्राउंड रिपोर्ट: असम में डिटेंशन कैंप के भीतर क्या क्या होता है


सुचिंद्रा गोस्वामी, चन्द्रधर दास, अजित दास
Image captionसुचिंद्रा गोस्वामी, चन्द्रधर दास, अजित दास
कल्पना कीजिए कि एक 35 फ़ुट x 25 फ़ुट के कमरे में करीब 35 आदमी सो रहे हों.
सुबह पांच बजे लगभग सभी को एक दहाड़ती हुई आवाज़ के साथ जगा दिया जाए.
छह बजे तक इन सभी को कमरे में मौजूद एकमात्र टॉयलेट से फ़ारिग होकर चाय और बिस्कुट ले लेने होंगे.
साढ़े छह बजे इन सभी लोगों को बाहर एक बड़े से आँगन में छोड़ दिया जाएगा, पूरा दिन काटने के लिए.
अगर सुबह की चाय-बिस्कुट मिस कर गए तो फिर कुछ घंटे बाद ही चावल मिलेगा, जिसके साथ दाल कितनी पकी मिलेगी ये सिर्फ़ क़यास की बात है.
चार बजे तक रात का डिनर भी ले लेना अनिवार्य सा है. सब्ज़ी-दाल और चावल.
हफ्ते में दो दिन उबले अंडे मिलेंगे और एक दिन मीट परोसा जाएगा.
सिलचर सेन्ट्रल जेल
Image captionसिलचर सेन्ट्रल जेल
रोज़ शाम साढ़े छह बजे इनकी दुनिया वापस उसी कमरे में सिमटा दी जाएगी.
रात भर खाने का कोई दूसरा ज़रिया नहीं और 'सही जुगाड़ वालों को' वालों को टॉयलेट के दरवाज़े से थोड़ी दूर सोने को मिल सकता है.
लेकिन इस दुनिया को सिर्फ़ भीतर रहने वाले ही देख पाते हैं और बयान कर पाते हैं.

बाहर का नज़ारा

दोपहर के साढ़े ग्यारह बजे हैं और लोहे के एक बड़े गेट के बाहर क़रीब एक दर्जन लोग लाइन लगा चुके हैं.
सभी को इंतज़ार है गेट के उस पार की दुनिया से किसी अपने की शक्ल देखने का, उसकी सुध लेने का.
सिर्फ़ पांच से 10 मिनट मिलेंगे ये करने को और अगर आपके पास 100 रुपए ज़्यादा हैं तो 10 मिनट बढ़ भी सकते हैं.
सन 1881 में बनी लाल रंग की ये इमारत सिलचर सेन्ट्रल जेल है.
बाहर गेट पर आपने मोबाइल भी निकाल लिया तो दो गार्ड पूछने दौड़ते हैं, "फोटू मत लेना, नहीं तो सजा हो सकता है."
लाइन में खड़े लोगों में एक मोहम्मद यूनुस भी हैं जो अपने पिता का हाल लेने आए हैं.
असम: डिटेंशन सेंटर से निकले लोगों ने बयां की दास्तां
"मेरे बाप ने कोई क़त्ल या चोरी नहीं की है. उन्हें कोई सजा भी नहीं सुनाई गई है. लेकिन पिछले कई महीनों से वे जेल के एक हिस्से में क़ैद हैं क्योंकि उन्हें विदेशी (बांग्लादेशी) बताया जा रहा है. अब आप मेरा फोटो मत लेना सर, नहीं तो मुझे भी विदेशी मान लिया जाएगा", कहते हुए यूनुस की आँखे नम हो चुकी हैं.
सिलचर सेन्ट्रल जेल के भीतर ही एक डिटेंशन कैंप है जिसमें 50 से ज़्यादा ऐसे लोग क़ैद हैं जिनकी भारतीय नागरिकता पर शक़ है.
असम में पिछले 10 वर्षों से 6 डिटेंशेन कैंप हैं और सरकार के मुताबिक़ क़रीब 1,000 लोग फ़िलहाल राज्य के डिटेंशेन कैंपों में क़ैद हैं.
एस लक्ष्मनन, कछार प्रांत के जिला उपायुक्त
Image captionएस लक्ष्मनन, कछार प्रांत के जिला उपायुक्त
ये कैंप राज्य के सिलचर, ग्वालपाड़ा, कोकराझार, तेज़पुर, जोरहट और डिब्रूगढ़ ज़िलों में हैं.
ख़ास बात ये है कि ऐसे मामलों की सुनवाई विशेष रूप से बनी विदेशी ट्राइब्यूनल में ही शुरू हो सकती है.
साल 2008 से अब तक क़रीब 90,000 लोगों की नागरिकता शक़ के घेरे में आ चुकी है.
इनमें वो भी शामिल हैं जिनका नाम डी-वोटर यानी संदिग्ध वोटर श्रेणी में है.
किस बात की सज़ा?
ऐसे ही शख़्स अजित दास भी हैं जिनके ख़िलाफ़ विदेशी ट्राइब्यूनल से तीन महीने पहले वारंट जारी हुआ था.
अजित एक पेशी में नहीं पहुंचे जिसके चलते उन्हें सिलचर जेल के भीतर बने डिटेंशन कैंप में पहुंचा दिया गया.
ढाई महीने बाद बेल पर रिहा होने वाले अजित ने अपना तजुर्बा बताया.
उन्होंने कहा, "डेढ़ महीने तक मर्डर, रेप और चीटिंग केस वाले क़ैदियों के साथ रखा गया. शिक़ायत करने पर उसी जेल के डिटेंशेन कैंप में शिफ़्ट किया. अस्पताल में बीमार लोगों सा खाना मिलता था. जाते समय मेरा वज़न 60 किलो था. ढाई महीने रहने पर 5 किलो कम हो गया. बाहर आने पर चलने-फिरने में दिक़्क़त हो रही है. एक रूम में 50 लोगों को रखा जाता है, बाथरूम के सामने सोना पड़ता है".
दशक भर पहल बने इन डिटेंशन कैंपों की व्यवस्था पर सवाल पहले भी उठे हैं.
चंद महीने पहले ही पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस कमिटी से इस्तीफ़ा दिया था इसने असम जाकर इन डिटेंशन कैंपों का जायज़ा लिया था.
हर्ष मंदर का दावा है कि, "कमिटी के दो और नुमाइंदों के साथ जमा होने वाली रिपोर्ट के अलावा मैंने एक स्वतन्त्र रिपोर्ट भी आयोग को सौंपी थी लेकिन उस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया".
विदेशी ट्राइब्यूनल
Image captionविदेशी ट्राइब्यूनल
हालाँकि असम सरकार ने इस बात को कई बार दोहराया है कि, "डिटेंशन कैंपों की तुलना जेलों से करना ग़लत है."
दक्षिणी असम के विशालकाय कछार प्रांत के जिला उपायुक्त एस लक्ष्मनन ने सभी आरोपों पर बीबीसी से बात की.
उन्होंने कहा, "कुछ संदिग्ध वोटरों को सज़ा काट रहे क़ैदियों के साथ एक ही जेल में रहना पड़ रहा है क्योंकि जगह की कमी है. वैसे भी जेल एक रिफ़ार्म सेंटर होता है. जिनको किसी भी क़िस्म की तकलीफ़ या मेडिकल सहायता की ज़रूरत होती है, उन्हें हम सब कुछ निःशुल्क मुहैया कराते हैं. सरकारी स्टाफ़ की कमी को भी पूरा किया जा रहा है."
इस बीच डिटेंशन कैंपों में रह कर आए लोगों के दावे दिल दहलाने वाले हैं.
करीब सात साल पहले सिलचर की रहने वाली सुचंद्रा गोस्वामी के घर विदेशी ट्राइब्यूनल का एक नोटिस पहुंचा था.
विदेशी होने के शक का नोटिस जिस व्यक्ति के नाम पर था उससे सुचंद्रा का नाम ज़रा सा ही मिलता था तो परिवार ने नोटिस पर ध्यान नहीं दिया.
लेकिन मई, 2015 की एक शाम स्थानीय पुलिस वाले सुचिंद्रा को उनके घर से पूछताछ के लिए थाने ले गए और फिर वहां से डिटेंशन कैंप.
सुचिंद्रा गोस्वामी उस दिन को याद कर के आज भी भावुक हो उठती हैं.
उन्होंने कहा," ग़लत नाम के चलते तीन दिन सेंट्रल जेल में रहना पड़ा. ऐसा तजुर्बा तो बुरा ही होगा. मेरी जैसी हाउसवाइफ़ को जेल में डाल दिया. डिटेंशेन कैंप नाम की कोई चीज़ नहीं थी, मुझे दूसरे क़ैदियों के साथ डाल दिया. जेल में साफ़-सफ़ाई नहीं है,. बाथरूम इतने गंदे कि पूछिए मत. समझ लीजिए खाना सिर्फ़ ज़िंदा रहने के लिए मिलता है. कोई क़ैदी है तो क्या हुआ, उसका पानी-खाना तो ठीक होना चाहिए".
डिटेंशन कैंप के बाहर
Image captionडिटेंशन कैंप के बाहर
सुचिंद्रा के लिए ग़लतफ़हमी के वे तीन दिन तीस साल के बराबर हैं.
डिटेंशन कैंप में रह कर आए ज़्यादातर लोग बताते हैं कि वहां ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोग ही हैं.
उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके विदेशी होने का प्रमाण भी मिल चुका है.
लेकिन अमराघाट के रहने वाले और अपनी उम्र 100 से ऊपर बताने वाले चन्द्रधर दास जैसे भी हैं जिन्हे फ़िलहाल छोड़ दिया गया है अगली पेशी की तारीख़ तक.
हाइवे से सटे एक छोटे से दो कमरे वाली टीन की छत के नीचे चन्द्रधर दास ने अपनी दास्तान सुनाई.
"जेल में दूसरे क़ैदियों को मेरी उम्र और वहाँ होने पर ताज्जुब था. क़ैदी ही मेरी मदद करते थे क्योंकि मैं बिना सहारे के चल नहीं सकता, उठ-बैठ नहीं सकता. मैंने ऐसा क्या गुनाह किया था कि इस उम्र में मुझे तीन महीने जेल में डाल दिया गया...अगर जेल जाना पड़ा तो दोबारा जाऊँगा लेकिन ये साबित करके रहूँगा कि मैं भारतीय ही हूँ".
असम के डिटेंशन कैंप इन दिनों ज़्यादा चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि हाल ही में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम लिस्ट को जारी किया गया है.
इस लिस्ट में उन लोगों का नाम है जिन्हें भारतीय नागरिक घोषित कर दिया गया है. हालांकि करीब 40 लाख लोग ऐसे भी हैं जिनका नाम इस लिस्ट में नहीं आया है.
लोगों में इस बात को लेकर डर था कि आगे उनका क्या होगा, क्या उन्हें विदेश भेज दिया जाएगा या फिर कहीं उनके ख़िलाफ़ विदेशी ट्राइब्यूनल में मामले तो नहीं शुरू हो जाएंगे.
हलांकि सरकार ने इस बात को साफ़ किया है कि एनआरसी का डिटेंशन कैंपों में रहने वालों से कोई लेना-देना नहीं है और जिनका नाम लिस्ट में नहीं आया उन्हें और मौके दिए जाएंगे नागरिकता साबित करने के.
एनआरसी की वजह से मुश्किल में कई परिवार
लेकिन डिटेंशन कैंपों के भीतर के हालात पर असम सरकार ने अभी तक ज़्यादा खुल कर बात नहीं की है.
राज्य गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफ़सर ने बीबीसी से कहा, "हम लोग इस बात पर काम कर रहे हैं कि डिटेंशन कैंपों को जेलों से अलग शिफ़्ट किया जाए. साथ ही हम लोग डिटेंशन कैंपों के हालात सुधारने के लिए पूरे प्रयास कर रहे है."
ये 'प्रयास' कब तक सच होने की शक्ल लेंगे ये कह पाना फिलहाल मुश्किल है.
लेकिन जिन लोगों के यहाँ रहना पड़ रहा है या जो लोग यहाँ रह चुके हैं, उनके लिए ये डिटेंशन कैंप एक भयानक सपना है जिसे भुलाने में वे दिन-रात लगे हैं.

अफगानिस्तान का वो राष्ट्रपति जिसे तालिबान ने चौराहे पर टांग दिया था !




   12.41 K शेयर्स


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नजीबुल्लाह को संयुक्त राष्ट्र के कंपाउंड से निकाल कर तालिबान ने मार डाला था.

ये सब खतम करो. मैं करने पर आया न, जडवाल को पूरा खोल के चौराहे पर लटका दूंगा. क्या समझा? नजीबुल्लाह को टांगा था न काबुल में, तू बस पैदा हुआ था तब. छोड़ दे इनको.
– डुकी बना (गुलाल, 2009)
नजीबुल्लाह. अफगानिस्तान का वो राष्ट्रपति जिसका हश्र का सुन कर जडवाल के गुर्गे रणसा और दिलीप को छोड़ देते हैं. 28 सितंबर, 1996 को नजीबुल्लाह को कभी उन्हीं की राजधानी रहे काबुल की आरियाना चौक में एक खंबे से टांग दिया गया था. लेकिन ये फांसी नहीं थी. जान उनकी जाने कब चली गई थी. टांगे जाने से पहले उन्हें एक ट्रक के पीछे बांध कर पूरे काबुल की सड़कों पर घसीटा गया था. उस से पहले सिर में एक गोली भी मारी गई थी. उन्हीं के बगल में उनके भाई शाहपुर अहमदज़ाई की लाश भी लटक रही थी.


‘गुलाल’ में डुकी बना ने जडवाल के गुर्गों को नजीबुल्लाह का हश्र याद दिला कर डराया था

काबुल फतह कर अफगानिस्तान के शासक होने का दावा करने वाले तालिबान की तरफ से ये जीत का ऐलान था. और इसका भी, कि एक वक्त का अंत हो चुका है. नजीबुल्लाह वो आखिरी राष्ट्रपति थे, जो अफगानिस्तान में सोवियत दखल की देन थे.
नजीबुल्लाह को संयुक्त राष्ट्र के कंपाउंड से निकाल कर तालिबान ने मार डाला था. तालिबान को खड़ा किया था पाकिस्तान और उसके बड़े पापा अमेरिका ने. ताकि अफगानिस्तान से सोवियत भगाए जा सकें. इतना सबको पता है. आज हम जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतना ताकतवर आदमी ऐसी मौत मरा.
नजीबुल्लाह का इंडिया कनेक्शन
अंग्रेज़ी का एक शब्द है टर्ब्युलेंस. माने हद दर्जे की हलचल, अशांति. अफगानिस्तान लगभग आधी सदी से टर्ब्युलेंस में ही जी रहा है. नजीबुल्लाह ने इसे शुरू होते इसे अपने चरम पर पहुंचते देखा. 1947 में पैदा हुए तो अफगानिस्तान एक कॉन्स्टिट्यूशनल मोनार्की था. माने ब्रिटेन जैसी व्यवस्था. ज़ाहिर शाह राजा थे लेकिन संसद भी होती थी, जो सिविलियन सरकार चलाती थी. पढ़ाई कुछ काबुल में हुई, कुछ बारामुला (हां, अपना कश्मीर वाला बारामुला) में. बाद में काबुल यूनिवर्सिटी से मेडिसिन की पढ़ाई कर के डॉक्टर हो गए.


नजीबुल्लाह को लोग नजीब-ए-गौ कहा करते थे. (फोटोः Pajhwok Afghan News)

18 की उम्र में वो पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान (PDPA)से जुड़े. ये एक कम्युनिस्ट विचारधारा वाली पार्टी थी. बुलंद कद-काठी और गर्म मिज़ाज के थे तो लोगों ने उन्हें नजीब-ए-गौ कहना शुरू दिया. ‘गौ’ का मतलब सांड होता है. PDPA अफगान संसद में बैठती थी, और नजीब PDPA कामों में हाथ बंटाते रहते थे. करीबी रही बाबरक करमल से, जो आगे चल कर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बने.
उथल-पुथल ने जना था नजीबुल्लाह के राज को
अफगानिस्तान के राजा मुहम्मद ज़ाहिर शाह ने अपने चचेरे भाई मुहम्मद दाउद खान को प्रधानमंत्री बनाया था. 1973 में दाउद ने ज़ाहिर का पत्ता कट कर के अफगानिस्तान को एक गणतंत्र घोषित कर दिया. लेकिन पांच साल के अंदर दाउद का पत्ता कट गया. 1978 में सॉर क्रांति हुई. इसमें PDPA ने दाउद को हटा कर मौत के घाट उतार दिया और अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों का राज आ गया. ‘रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान’ अब ‘डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान’ कहलाने लगा.


ज़ाहिर शाह का तख्तापलट उन्हीं के चचेरे भाई ने कर दिया था

राज कहने का ये मतलब नहीं कि कम्युनिस्ट पूरे अफगानिस्तान पर पकड़ बनाए हुए थे. अफगानिस्तान में ऐतिहासिक तौर पर ताकत कबीलों और इलाकों में बंटी रही है. कुछ कबीले और इलाके सरकार के साथ रहते तो कुछ नहीं. ऐसा ही सॉर क्रांति के बाद आई PDPA सरकार के ज़माने में भी था. PDPA सरकार में राष्ट्रपति बने बाबरक करमल. कभी उनके बॉडीगार्ड रहे नजीबुल्ला मिनिस्टर ऑफ स्टेट सिक्योरिटी बने और साथ में ख़दमत-ए-ऐतलाअत-ए-दलवती (KHAD) के चीफ भी. KHAD वैसे ही है जैसे हिंदुस्तान की आईबी.
कम्युनिस्ट सरकार ने अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर सोशल इंजीनियरिंग की, औरतों को हक दिए, धर्मनिरपेक्षता की बात की. इसके अलावा रूस की तरह ही एक पार्टी का राज कायम किया. नाम में डेमोक्रेटिक लगा था, पर था इसमें भी पोलित ब्यूरो ही जो सारे बड़े फैसले लेता था. नजीबुल्लाह पोलित ब्यूरो मेंबर बने.  लेकिन कम्युनिस्टों ने सब अच्छा-अच्छा ही नहीं किया. उनके रहते बड़े पैमाने पर लोगों पर बर्बरता हुई, सेंसरशिप रही.


अफगानिस्तान के अलग-अलग इलाकों में लड़ाके सरकार के खिलाफ खड़े थे. (फोटोः एपी)

कम्युनिस्ट सरकार के तौर-तरीकों से अफगानिस्तान के देहाती लोगों में काफी असंतोष पनप गया, जो अपने रहने के तौर तरीकों को एकदम से बदलने के पक्ष में नहीं थे. तो सरकार के खिलाफ लड़ रहे मुजाहिदीनों को लोगों का साथ मिलने लगा. एक कम्युनिस्ट सरकार को घिरते देख सोवियत संघ ने अपनी फौज अफगानिस्तान भेज दी. सोवियत को अफगानिस्तान में फौज भेजते देख अमरीका की सीआईए ने पाकिस्तान से मिल कर अफगान मुजाहिदीनों को समर्थन देना शुरू कर दिया. इससे अफगानिस्तान में गृहयुद्ध छिड़ गया.
सोवियत फौज थी, तो PDPA ने मुजाहिदीनों को काफी पीछे धकेल दिया. लेकिन लड़ाई खिंचने लगी तो उन्हें समझ आया कि बेहतर होगा एक हाथ में बंदूक रखते हुए दूसरा हाथ दोस्ती के लिए बढ़ाया जाए. तो नजीबुल्लाह ने 1986 के सितंबर में नेशनल कॉम्प्रोमाइज़ कमीशन बनवाया ताकि मुजाहिदीनों को सरकार के करीब लाया जा सके.


नजीबुल्लाह सोवियत फौज के साथ. सोवियतों ने ही उन्हें राष्ट्रपति भी बनवाया था (फोटोःएपी)

1987 में सोवियत संघ ने नजीबुल्ला को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनवाया. नजीबुल्ला सोवियत कंधो पर चढ़कर राष्ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचे थे. लेकिन अरसे से चली आ रही लड़ाई के बाद वो समझ गए थे कि कम्युनिज़म से अफगानिस्तान में बात बनेगी नहीं. तो उन्होंने PDPA और इस्लामिक परंपराओं के बीच की खाई पाटने की कोशिश शुरू की. उन्होंने अफगानिस्तान का संविधान दोबारा लिखवाया, PDPA का एकाधिकार खत्म करवाया और अफगानिस्तान का नाम बदल कर फिर से रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान करवा दिया. उन्होंने PDPA की छवि बदल कर मार्कसिस्ट से एक इस्लामिक पार्टी करवाया और अपने नाम नजीब के आगे ‘उल्लाह’ लगवाया (वो नजीबुल्लाह ऐसे ही बने थे).
लेकिन वो मुस्लिम कट्टरपंथ और मुजाहिदीनों से जीत नहीं ही पाए. तंग आकर 9 साल बाद जब सोवियत लौटे तो नजीबुल्लाह अकेले पड़ गए. दिसंबर 1991 में सोवियत संघ टूटा तो नजीबुल्लाह को मिलने वाली सारी मदद बंद हो गई. मुजाहिदीनों के हाथों रोज़ ज़मीन खोते नजीबुल्लाह को आखिर इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा. उनकी जगह ली यूएन की बनाई अंतरिम सरकार ने. लेकिन नजीबुल्लाह काबुल से निकल नहीं पाए. एयरपोर्ट पर ही रोक लिए गए. जान बचाने के लिए नजीबुल्लाह यूएन के एक कंपाउंड में छिपे.


अफगानिस्तान में तालिबान उन्हीं दिनों चरम पर पहुंचा जब नजीबुल्लाह ने ज़मीन खोई (फोटोःएपी)

इन्हीं दिनों अफगानिस्तान में तालिबान खड़ा हुआ. धीरे-धीरे उसका असर इतना बढ़ा कि दूसरे लड़ाके तक उस से खौफ खाने लगे. तालिबार शहर दर शहर कर के अफगानिस्तान कब्ज़ाते गए. तालिबान के पास अमरीका का डॉलर और पाकिस्तान की आईएसआई की ट्रेनिंग थी. अफगानिस्तान की सरकार के पास अपने फाइटर प्लेन्स में डालने के लिए तेल तक नहीं था. तालिबान कई जगह बिना लड़े जीत गया.
नजीबु्ल्लाह 1992-96 के बीच साढ़े चार साल काबुल के यूएन कंपाउंड में ही रहे. इस इंतज़ार में कि उनके बचने की कोई तरकीब निकल आए. उनके भारत से संबंध अच्छे थे. भारत भी काबुल में तालिबान को नहीं देखना चाहता था. वो यहीं आना चाहते थे. लेकिन वो तालिबान के काबुल पहुंचने तक यूएन के कंपाउंड से नहीं निकल पाए. सितंबर 1996 में तालिबान काबुल में घुस गया. अंतरिम सरकार कुछ दिन लड़ी, फिर पीछे हट गई. काबुल से जाते हुए अहमद शाह मसूद (तब के एक लड़ाके जिन्होंने बाद में नॉर्दन अलायंस बनाया) ने नजीबुल्लाह को साथ चलने को कहा. लेकिन नजीबुल्लाह ने कहा,
‘मैं एक ताजीक के साथ अपनी राजधानी से भाग गया तो पख्तूनों की नज़र में गिर जाउंगा’


अहमद शाह मसूद (बीच में) ने आगे चल कर नॉर्दन अलायंस बनाया. (फोटोःएपी)

नजीब नहीं गए. तालिबान यूएन कंपाउंड के करीब पहुंच गया. द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 28 सितंबर, 1996 की सुबह तीन बजे के करीब नजीबुल्लाह ने शॉर्टवेव रेडियो पर यूएन की एक दूसरी पोस्ट से संपर्क कर के कहा कि उनके गार्ड नज़र नहीं आ रहे. उन्होंने अपने लिए सुरक्षा मांगी. लेकिन उनकी मदद के लिए कोई नहीं पहुंचा. तालिबान के डर से दो दिन पहले ही ज़्यादातर लोग शहर छोड़ कर चले गए थे.
लोग सुबह सड़कों पर निकले तो आरियाना चौक पर एक ट्रैफिक कंट्रोल टावर से नजीबुल्ला की लाश टंगी हुई देखी. एक पूर्व-राष्ट्रपति का ये हश्र देख कर लोगों को लगा कि तालिबान के आने से पिछले चार सालों से चल रही लड़ाई आखिर खत्म होगी और काबुल पर जब-तब गिरने वाले रॉकेट अब नहीं दागे जाएंगे. शायद इसीलिए लोगों ने नजीबुल्लाह की लाश देखकर नारा लगा दिया,
‘नजीब हत्यारा था. कम्युनिस्टों का यही हाल होना चाहिए’
तब लोग नहीं जानते थे कि तालिबान उनकी ज़िंदगी को कहां से कहां ला पटकेगा. नजीबुल्लाह को कभी एक कम्युनिस्ट हत्यारा कहने वाले लोग आज उनकी तस्वीर अपने घरों और दुकानों में लगाते हैं.
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