अदालतों के लिए गर्मियों की छुट्टियां क्यों?


सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
गर्मियों की छुट्टियों का मज़ा कौन लेते हैं? इस सवाल के जवाब में आप तुरंत कहेंगे कि स्कूल और कॉलेज. लेकिन इनके साथ एक नाम और जोड़ दीजिए देश के न्यायालय.
देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट 13 मई से 30 जून तक गर्मियों की छुट्टियों पर रहेगी. वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट में 6 मई से 1 जून तक छुट्टियां रहेंगी.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में तो सर्दियों की छुट्टियां भी होती हैं- इस साल कोर्ट 2 दिसंबर 2019 से 3 जनवरी 2020 तक बंद रहेगी.
अदालतों में छुट्टियों का यह कैलेंडर देखने का बाद आपका मन भी करने लगा होगा कि काश हम भी इन अदालतों के कर्मचारी होते, तो इतनी सारी छुट्टियां मिल जातीं.
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट में 193 दिन काम हुआ. जबकि देश की विभिन्न हाईकोर्ट औसतन 210 दिन खुली रहीं. इसके अलावा अन्य अधीनस्त अदालतें 254 दिनों तक काम करती रहीं.
लेकिन इन अदालतों से परे ज़िलों और तालुका स्तर की आपराधिक मामलों की अदालतें छुट्टी वाले दिनों में भी काम करती रहीं.
हालांकि, छुट्टी वाले दिनों में काम के दौरान किसी भी पुराने मामले के लिए नई तारीखों की घोषणा नहीं होती और सिर्फ ज़मानत याचिकाओं और अन्य ज़रूरी मामलों का निपटारा किया जाता है.
अदालतों के अलावा दूसरा कोई भी सरकारी विभाग इतने दिनों तक छुट्टियों पर नहीं जाता. यही वजह है कि अदालतों की ये छुट्टियां हमेशा चर्चा का विषय बनी रहती हैं. कई लोगों का मामना है कि अदालतों की इन छुट्टियों की वजह से ही आम जनता को न्याय मिलने में देरी होती है.
साल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय अदालतों में 3.3 करोड़ से अधिक मामले अभी विचाराधीन हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि छुट्टियों के चलते यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है.
लेकिन सवाल उठता है कि आखिर अदालतों में इतनी छुट्टियां मिलती क्यों हैं और छुट्टियों का यह नियम आया कहां से?
लाइन
लाइन

अंग्रेजों का बनाया नियम

कई लोगों का कहना है कि अदालतों में गर्मियों की छुट्टियों का नियम अंग्रेज़ों ने अपनी सुविधा के अनुसार बनाया था.
महाराष्ट्र के एक पूर्व महाधिवक्ता श्रीहरि अनेय इन छुट्टियों की बहुत ही कड़े शब्दों में निंदा करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोईइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
Image captionसुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई
वो कहते हैं, ''अंग्रेज़ों ने यह व्यवस्था बनाई. गर्मियों के दिनों में अंग्रेज जज किसी पहाड़ी इलाके में या फिर इंग्लैंड चले जाते थे. आज़ादी के बाद भी हम उनके इस नियम को लागू कर रहे हैं. मेरे विचार से अदालतों के पास बहुत ज़्यादा छुट्टियां हैं. दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जहां कि अदालतें इतनी लंबी छुट्टियों पर जाती हैं.''
वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता असीम सरोडे को लगता है कि अदालतों में लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए जजों का गर्मियों की छुट्टियों पर जाना उचित नहीं है.
वे कहते हैं, ''मैं यह नहीं कहता कि अदालतों में छुट्टियां होनी ही नहीं चाहिए. लेकिन छुट्टियों के चलते अदालतों का काम पूरी तरह ठप्प नहीं होना चाहिए. इसके स्थान पर कुछ न कुछ वैकल्पिक व्यवस्था ज़रूर होनी चाहिए. कई बार ऐसे मामले आते हैं जिसमें तुरंत न्याय की आवश्यकता होती है.''
''कई बार मानवाधिकार से जुड़े मामलों में तुरंत न्याय की गुंजाइश होती है लेकिन अदालत छुट्टी पर चल रही होती है, ऐसे हालात में यह साबित करना होता है कि हमें तुरंत न्याय क्यों चाहिए. यह बहुत बड़ा अन्याय है. इसीलिए अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए. सभी जजों को छुट्टी पर भेजने की जगह इसमें रोटेशन नीति अपनानी चाहिए.''
असीम सरोडे पुराने नियमों और व्यवस्था को ढोते रहने का विरोध करते हैं और नई व्यवस्था लागू करने की बात करते हैं.
वो कहते हैं, ''दरअसल अदालतों में मिलने वाली यह छुट्टियां अंग्रेज़ों की गुलामी का प्रतीक हैं. हम अभी तक इनसे बाहर नहीं निकल सके हैं. हम विकासशील देश हैं. हमें और तरक्की की ज़रूरत है. और इसके लिए हमें और अधिक काम करने की ज़रूरत है. लेकिन हम तो छुट्टियां ले रहे हैं.''
लाइन
लाइन

तनाव कम करने के लिए छुट्टियां ज़रूरी

हालांकि, कुछ लोगों का मत है कि अदालतों में छुट्टियां आवश्यक होती हैं.
बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील प्रवर्तक पाठक कहते हैं, ''न्यायव्यवस्था के भीतर वकील और जज बहुत अधिक दबाव में काम कर रहे हैं. इस दबाव को कम करने के लिए छुट्टियां बहुत आवश्यक हैं.''
वो साथ ही कहते हैं, ''अदालत में रहना जज की नौकरी का हिस्सा है. लेकिन जब वो कोर्ट में नहीं रहते तब भी वो कोई रिसर्च, किसी ऑर्डर का लेखन, दूसरे आदेश को पढ़ना और क़ानून को लगातार पढ़ते रहने का काम करते रहते हैं. इसलिए उन्हें लंबी छुट्टियों की ज़रूरत महसूस होती है.''
लाइन
लाइन

छुट्टियों के चलते नहीं लंबित होते हैं मामले

मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस हरि पारानथमन मानते हैं कि कोर्ट से दूसरे सरकारी विभागों की छुट्टियों की तुलना करना ठीक नहीं है.
वो कहते हैं, "ये एक अलग तरह का काम होता है. ये सवाल उठाना ग़लत है कि जब किसी अन्य विभाग में छुट्टियां नहीं होती हैं तो कोर्ट में क्यों होनी चाहिए"
लेकिन एक सवाल अभी भी मौजूद है कि क्या अदालतों में करोड़ों मामले कोर्ट की छुट्टियों की वजह से लंबित हैं.
सुप्रीम कोर्टइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय न्यायपालिका में जजों की संख्या में कमी मामलों के लंबित होने के लिए ज़िम्मेदार है.
जस्टिस पारानथमन कहते हैं, "छुट्टियां कोई मुद्दा नहीं हैं. अदालतों में मामले लंबित हैं क्योंकि किसी तरह की जवाबदेही नहीं है. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. निचली अदालतों में अगर कोई फैसला दो साल में नहीं आता है तो हाई कोर्ट उनसे देरी को लेकर सवाल करती हैं. लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ये सवाल पूछने वाला कोई नहीं है. ऐसे में कानूनी मामले 20 साल तक चलते रहते हैं."

'न्यायपालिका है आम आदमी के लिए'

श्रीहरि अनेय मानते हैं कि अदालतों में छुट्टियों के लिए वकील भी ज़िम्मेदार हैं.
वह कहते हैं, "मैं सभी जजों और वकीलों को मिलने वाली छुट्टियों के ख़िलाफ़ हूं. लेकिन वकील भी इस सिस्टम के ख़िलाफ़ नहीं हैं वे असुरक्षित महसूस करते हैं. वे मानते हैं कि अगर वो छुट्टियों पर गए तो कोई दूसरा वकील उनके क्लाइंट ले उड़ेगा. ऐेसे में वे इन छुट्टियों को ठीक मानते हैं."
जब अनेय महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल थे तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र लोढ़ा को पत्र लिखकर उच्च न्यायालयों को मिलने वाली छुट्टियों को कम करने की मांग उठाई थी.
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने एक नोटिस जारी करके सभी बार काउंसिलों और बार एसोशिएसन से छुट्टियों को कम करने पर उनकी राय मांगी थी.
अनेय बताते हैं, "उस वक्त मुझे और छत्तीसगढ़ के एडवोकेट जनरल को छोड़कर सभी बार एसोशिएसन, सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल और भारतीय बार काउंसिल ने एक मत में कहा कि उन्हें छुट्टियां चाहिए हैं."
अनेय मानते हैं कि लोग न्यायपालिका का असली मकसद भूल चुके हैं.
वो कहते हैं, "न्यायपालिका जज़ों को नौकरी देने और वकीलों को आय का स्रोत देने के लिए गठित नहीं की गई थी. इसका उद्देश्य लोगों को हो रही समस्याओं का निवारण करने और न्याय देने के लिए किया गया था लेकिन मुख्य उद्देश्य नज़रअंदाज़ हो रहा है."
लाइन
लाइन

छुट्टियों के ख़िलाफ़ मुकदमा

अदालतों की छुट्टियों को लेकर कई बार चर्चा की गई है.
लेकिन साल 2018 में इन छुट्टियों को लेकर एक मुकदमा दर्ज किया गया था.
बीजेपी प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल मुकदमे में मांग की गई उच्च अदालतों को साल के 225 दिन चलने चाहिए और प्रतिदिन न्यूनतम काम के घंटे छह होने चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट को कानून मंत्रालय को ये नियम बनाने के लिए आदेश देना चाहिए.
उपाध्याय अपने मुकदमे में मांग करते हैं, "तत्काल न्याय पाना हर व्यक्ति का मूल अधिकार है. संविधान ने ये अधिकार हर भारतीय नागरिक को दिया है. कोर्ट की छुट्टियां न्याय दिए जाने में देरी करती हैं और आम आदमी के लिए इससे दिक्कतें पैदा होती हैं. इस वजह से अदालतों की छुट्टियां कम होनी चाहिए और जजों के काम करने के घंटे बढ़ाए जाने चाहिए."
टीएस ठाकुरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर ने भी साल 2017 में एक सुझाव दिया था कि गर्मियों की छुट्टियों को कुछ मामलों की सुनवाई के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए.
अपने सुझाव में उन्होंने कहा था, "भारत में लंबित मामले होना कोई नई बात नहीं है. लेकिन अब ये कुछ ज़्यादा ही बढ़ गए हैं. एक तरह न्यायपालिका लंबित मामलों की वजह से काफ़ी तनाव में है तो वहीं न्याय देने में बेहद देरी के चलते आम आदमी ने न्यायपालिका में विश्वास खो दिया है."
"कोई भी न्याय में देरी होने के लिए ज़िम्मेदार कारणों पर बात नहीं करना चाहता है. ऐसे में त्वरित न्याय का संवैधानिक आश्वासन उपहास का विषय बन गया है."

ज़्यादा जज़ों की ज़रूरत

लंबित मामलों के त्वरित न्याय को लेकर लगभग हर पक्ष ये मानते है कि जजों की संख्या को बढ़ाकर ही इस समस्या का समाधान निकल सकता है.
पूर्व जस्टिस पारानथमन सुझाव देते हैं, "भारत में प्रति हज़ार व्यक्ति पर उपलब्ध जज़ों की संख्या दूसरे देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. ऐसे में लंबित मामलों की समस्या कभी सुलझती नहीं है. छुट्टियों पर दोष देने की जगह न्यायपालिका को ज़्यादा संसाधन उपलब्ध कराया जाना ही इस समस्या का समाधान है."

क्या आप कभी-कभी लगातार छींकने लगते हैं?


हेफीवरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
हम सभी कभी न कभी लगातार बेवजह छींक आने, नाक और शरीर में खुजली होने से परेशान होते हैं.
इसे 'हे फ़ीवर' यानी परागण बुखार कहा जाता है. जब धूल में फूलों और घास-फूस के कण मिलकर हमारे ऊपर हमला करते हैं, तो ये बुखार होता है. जिसे घुल, परागण से एलर्जी होती है, वो हे फ़ीवर से ज़्यादा परेशान होता है. लोगों की नाक बहने लगती है, आंख से पानी आने लगता है, गले में ख़राश होती है, लगातार छींकें आने लगती हैं. बसंत के बाद के दिनों में ख़ासतौर से ये बीमारी हमें तंग करती है.
10 से 30 फ़ीसदी तक आबादी इससे प्रभावित होती है. पर हे फ़ीवर को लेकर कुछ मनगढ़ंत बातें भी फैली हुई हैं.
हमने परागण से होने वाले बुखार को लेकर प्रचलित कुछ बातों की हक़ीक़त जानने की कोशिश की.
घास के बुख़ार का घास से कोई ताल्लुक़ नहीं है?
उन्नीसवीं सदी में लोगों का यक़ीन था कि ताज़ा कटी घास की वजह से ये बुख़ार लोगों को जकड़ता है. इसीलिए इसे हे फ़ीवर कहा गया. उस दौर में एक ब्रितानी डॉक्टर जेम्स बोस्टॉक हे फ़ीवर का शिकार हुआ, तो उसने पड़ताल की. वो हर साल गर्मी में इस बुख़ार से पीड़ित होता था. जेम्स बोस्टॉक इस नतीजे पर पहुंचा कि इस बुख़ार का ताल्लुक़ घास से नहीं है. वो जब समंदर किनारे रहने के लिए गया तो उसे इससे निजात मिल गई. लेकिन, डॉक्टर जेम्स का ये मानना था कि ये गर्मी में आने वाली सालाना बीमारी है. जो कि ग़लत था.
इस बुख़ार का फलों के कणों से संबंध 1859 में पता लगाया गया. ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स ब्लैकले को जब एक गुलदस्ता दिया गया, तो सूंघते ही उन्हें छींकें आने लगीं. जांच-पड़ताल के बाद ब्लैकले इस नतीजे पर पहुंचे कि फूलों के पराग और घास से निकलने वाले कण ही हवा में मिलकर हे फ़ीवर को जन्म देते हैं. इसका हमारी रोगों से लड़ने की क्षमता से सीधा मुक़ाबला होता है.
कुल मिलाकर, हे फ़ीवर घास-फ़ूस और फूलों के पराग की वजह से होता है. ये बात हमारी पड़ताल में सही पायी गई.
हेफीवरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
उम्र बढ़ने के साथ ख़त्म हो जाता है हे फ़ीवर?
हम आम तौर पर ये मानते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उन्हें हे फ़ीवर जकड़ना छोड़ देता है. 20 फ़ीसद लोगों को तो हमेशा के लिए इससे मुक्ति मिल जाती है. उम्र के पांचवें दशक में आम तौर पर लोग हे फ़ीवर के शिकंजे से मुक्त हो जाते हैं.
हालांकि जिन लोगों को बचपन में ये बीमारी परेशान नहीं करती, उन्हें बढ़ती उम्र के साथ ये बुख़ार तंग करने लग सकता है.
तो, बढ़ती उम्र के साथ हे फ़ीवर से छुटकारा भी मिल सकता है और लोग इसके शिकार भी हो सकते हैं.
बारिश से हे फ़ीवर से निजात मिल जाती है?
कई लोगों को लगता है कि बारिश होने से हवा में मौजूद कण बैठ जाते हैं और उन्हें इससे छुटकारा मिल जाता है. उनकी आंखों और नाक में होने वाली खुजली और छींकें आनी बंद हो जाती हैं.
पर, सच्चाई ये है कि बारिश से एलर्जी की परेशानी बढ़ सकती है. हां, 10 सेंटीमीटर तक बारिश होने के बाद परागण हवा में कम हो जाते हैं. लेकिन, तेज़ बारिश होने पर फूलों से पराग कण निकल कर और भी हवा में मिल जाते हैं और हमें हे फीवर जकड़ सकता है.
तो, बारिश कितनी हुई है, इस बात से तय होता है कि हे फ़ीवर से छुटकारा मिलेगा या नहीं.
हेफीवरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
दिन में ये बुख़ार ज़्यादा तंग करता है
अगर आप हे फ़ीवर के शिकार हैं, तो बेहतर होगा कि घर में रहें. खुली हवा में निकलेंगे तो ये और परेशान करेगा.
दिन में हवा गर्म होने से परागण ऊपर उठ आते हैं. वहीं रात में तापमान कम होने से ये ज़मीन पर बैठ जाते हैं.
कुल मिलाकर, हे फ़ीवर आप को कितना तंग करेगा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप के आस-पास कैसे पौधे हैं. जिनमें परागण ज़्यादा होता है, वो आप को ज़्यादा परेशान करेंगे.
एंटीहिस्टामाइन दवाएं आप को सुस्त कर देंगी
एंटीहिस्टामाइन दवाएं आप पर हे फ़ीवर के असर को कम कर देती हैं. असल में जब परागण हमारे शरीर पर हमला करते हैं, तो हमारे रोग प्रतिरोधक सिस्टम को लगता है कि इसके प्रोटीन हमारे ऊपर हमला कर रहे हैं. तब हमारे शरीर से हिस्टामाइन नाम का केमिकल निकलता है. इसे रोकने के लिए ही एंटीहिस्टामाइन दवाएं दी जाती हैं. पहले इन दवाओं को लेने के बाद लोग ऊंघते रहते थे. सुस्ती आ जाती थी. अक्सर ये दवाएं रात में खायी जाती थीं, ताकि छींकें आना बंद हों और अच्छी नींद आए.
पर 1980 और 90 के दशक में नई दवाएं ईजाद हुईं. इनसे सुस्ती नहीं आती है. हालांकि कुछ लोगों पर अभी भी ये दवाएं लेने से सुस्ती तारी हो सकती है.
हेफीवरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
शहद हे फ़ीवर से निजात दिलाता है?
शहद को अमृत के समान माना जाता है. कहते हैं कि इस में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. इसलिए हे फ़ीवर होने पर एक चम्मच शहद लेने की सलाह दी जाती है.
लेकिन, रिसर्च से ये बात सही नहीं साबित हुई है. अमरीका और फिनलैंड में हुई रिसर्च में पाया गया है कि शहद लेने से हे फ़ीवर में कोई राहत नहीं मिलती.
यानी, शहद स्वाद में भले अच्छा लगे, पर इससे इस बीमारी से राहत नहीं मिलती.

'रडार काम नहीं कर रहे थे, तब भी गिरा दिए भारत के दो विमान' - पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों की समीक्षा


पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ानइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते पाकिस्तान की बदहाल अर्थव्यवस्था, आईएमएफ़ से बेलआउट पैकेज, बढ़ती मंहगाई और ईरान और अमरीका के बीच ख़राब होते रिश्ते से जुड़ी ख़बरें सुर्ख़ियों में रही.
सबसे पहले बात पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार ख़राब होती जा रही है. मंहगाई बढ़ती जा रही है और स्टॉक मार्केट पूरी तरह क्रैश हो गया है.
सप्ताह के शुरू में पाकिस्तान को आर्थिक तंगी से निकालने के लिए बेलआउट पैकेज पर पाकिस्तान और आईएमएफ़ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) में समझौता हो गया.
अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय के सलाहकार अब्दुल हफ़ीज़ शेख़ ने आईएमएफ़ से समझौते की आधिकारिक घोषणा कर दी.
पाकिस्तानी मुद्रा (फ़ाइल फोटो)इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अब्दुल हफ़ीज़ ने सरकारी टीवी चैनल पीटीवी पर इसकी घोषणा करते हुए कहा कि पाकिस्तान को अगले 39 महीने के दौरान आईएमएफ़ से छह अरब डॉलर मिलेंगे. उन्होंने कहा कि आर्ईएमएफ़ के अलावा वर्ल्ड बैंक और एशिया डेवेलपमेंट बैंक (एडीबी) से भी दो-तीन अरब डॉलर का क़र्ज़ मिलेगा.

नए टैक्स का ख़ौफ़

अख़बार के अनुसार समझौते के तहत पाकिस्तान क़रीब 750 अरब रुपए के नए टैक्स लगाएगा.
इस समझौते की शर्तें जैसे-जैसे सामने आने लगीं बाज़ार और ख़राब होता चला गया.
शुक्रवार को पाकिस्तानी शेयर बाज़ार इस क़दर प्रभावित हुआ कि डॉलर की क़ीमत 150 पाकिस्तानी रुपए को पार कर गई.
जंग अख़बार के अनुसार पाकिस्तान के इतिहास में डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रुपया इतना कमज़ोर कभी नहीं हुआ था.
स्टॉक मार्केट में 800 से ज़्यादा प्वाइंट की गिरावट देखी गई.
पाकिस्तानी स्टॉक मार्केट को देखता एक निवेशकइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार पाकिस्तान की करेंसी इस समय एशिया की सबसे कमज़ोर करेंसी हो गई है. अख़बार कहता है कि अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश की करेंसी भी पाकिस्तानी रुपए से ज़्यादा मज़बूत है.
अख़बार के अनुसार इमरान ख़ान ने जब प्रधानमंत्री का पद संभाला था उस वक़्त एक अमरीकी डॉलर की क़ीमत 124 पाकिस्तानी रुपए थी लेकिन इमरान की तमाम कोशिशों के बावजूद उसमें कोई बेहतरी नहीं हुई और अब एक डॉलर 150 रुपए का हो गया है.

इमरान ज़िम्मेदार

पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी इसके लिए सीधे तौर पर इमरान ख़ान और उनकी नीतियों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार नेता प्रतिपक्ष और मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ़ ने इमरान ख़ान को निशाना बनाते हुए कहा, ''पाकिस्तान आईएमएफ़ के सामने लेट गया है. ये है इमरान ख़ान का नया पाकिस्तान.''
नवाज़ शरीफ़ के साथ शाहबाज़ शरीफ़इमेज कॉपीरइटEPA
उन्होंने इमरान पर हमला करते हुए कहा, ''सब जानते थे कि 'सेलेक्टेड' प्रधानमंत्री की समझ कम है. न काम को समझते हैं न जानते हैं. लेकिन बदक़िस्मती से इमरान ख़ान ठीढाई के साथ झूठ भी बहुत बोलते हैं. पाकिस्तान के इतिहास में उनसे ज़्यादा झूठा प्रधानमंत्री मैंने नहीं देखा है.''
शहबाज़ शरीफ़ के बेटे हमज़ा शरीफ़ ने भी इमरान ख़ान पर हमला बोलते हुए कहा, ''डॉलर भी नियाज़ी साहब (इमरान ख़ान) की तरह कहीं ठहर नहीं रहा. अब हम आपका ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकते. अब आपको जाना होगा.''

विपक्ष करेगा आंदोलन

अख़बार दुनिया के अनुसार मुस्लिम लीग (नवाज़) ने ईद के बाद सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन करने का फ़ैसला किया है.
अख़बार दुनिया के अनुसार इस मामले पर और विचार विमर्श करने और सरकार को घेरने के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के प्रमुख बिलावल भुट्टो ने रविवार को तमाम विपक्षी पार्टी के नेताओं को इफ़तार की दावत के बहाने बुलाया है.
मुस्लिम लीग (नवाज़) की उपाध्यक्ष और नवाज़ शरीफ़ की बेटी मरियम नवाज़ ने भी बिलावल की दावत क़ुबूल कर ली है. दूसरे विपक्षी नेताओं ने भी बैठक में शामिल होने पर अपनी सहमति दे दी है.
लेकिन इमरान ख़ान अपने फ़ैसले का बचाव करते हुए कह रहे हैं कि ये परेशानी केवल कुछ समय के लिए है जल्द ही इससे निजात मिल जाएगी.
इमरान ख़ानइमेज कॉपीरइटREUTERS
अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार इमरान ख़ान का कहना था, ''हमने अहम फ़ैसले किए हैं. चंद महीने में बेहतर नतीजे सामने आएंगे. देश का फ़ायदा निजी राजनीतिक फ़ायदे-नुक़सान से हमेशा ऊपर रहता है.''
पाकिस्तान का कहना है कि वो अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात में किसी कैम्प का हिस्सा नहीं बनेगा.
अख़बार जंग के अनुसार इस्लामाबाद में पत्रकारो से बात करते हुए पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा, ''ईरान हमारा पड़ोसी है और इस क्षेत्र का एक अहम मुल्क है. अमरीका और ईरान के बीच किसी भी विवाद में हम किसी की तरफ़दारी नहीं करेंगे.''
उसी संवाददाता सम्मेलन में क़ुरैशी से जब बालाकोट हमले और रडार से जुड़े भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था, ''मौसम की ख़राबी के कारण हमारे रडार काम नहीं कर रहे थे तब हमने भारत के दो विमान मार दिए थे. मेरा मोदी साहब से सवाल है कि हमारे रडार काम कर रहे होते तो भारत के साथ क्या होता वो ज़रा ये सोच लें.''