नागरिकता संशोधन बिल असमिया जाति-संस्कृति के लिए सर्वनाशी!


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Image captionअसम में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ़ प्रदर्शन
लोकसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को संसद में पास करवाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी की मंशा पर न केवल सवाल खड़े हो गए है बल्कि असम में इसके खिलाफ जोरदार विरोध शुरू हो गया है.
नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में मंगलवार को ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) समेत कुल 30 प्रमुख संगठनों ने पूर्वोत्तर बंद बुलाया, जिसका असम में व्यापक असर देखा जा रहा है.
दरअसल, अभी चार दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी असम के सिलचर दौरे पर गए थे. उन्होंने वहां एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी से किसी भी भारतीय नागरिक का नाम नहीं छूटेगा. वहीं उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक को लोगों की भावनाओं और जिंदगियों से जुड़ा बताया था.
लेकिन मोदी के इस इलाके में दौरे को लेकर कई सवाल उठ रहें हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की बराकघाटी में हुई इस जनसभा के बाद राज्य में पहले से चल रहा विरोध काफी बढ़ गया. क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बराकघाटी के जिस इलाके में रैली करने गए थे, वहां हिंदुओं की एक बड़ी आबादी बांग्लादेश से आए विस्थापितों की है. ये हिंदू बंगाली लोग नागरिकता बिल का समर्थन कर रहें हैं. जबकि बराकघाटी और ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे असमिया लोगों के बीच हिंसक टकराव का पुराना इतिहास है.
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असम में जो विरोध हो रहा है वो धार्मिक उत्पीड़न के तहत बांग्लादेश से आने वाले हिंदू बंगालियों को यहां बसाने को लेकर है. असम के मूल स्वदेशी लोगों को आशंका है कि पड़ोसी मुल्क से लाखों हिंदुओं को अगर यहां बसा दिया गया तो असमिया जाति, भाषा और उनकी संस्कृति पूरी तरह खत्म हो जाएगी.
दरअसल, प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल की एक चुनावी रैली में बांग्लादेशी घुसपैठियों से बोरिया-बिस्तर बांधने को कहा था. नरेद्र मोदी के इस चुनावी भाषण का 2016 के असम विधानसभा चुनाव पर काफी असर पड़ा. नतीजतन उस समय पांच विधायकों वाली बीजेपी राज्य की कुल 126 सीटों में से सीधे 61 सीट जीतने में कामयाब रही और पहली बार असम में पार्टी की सरकार बन गई.
लेकिन अब असम में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे संगठन 'नरेंद्र मोदी गो बैक' के नारे लगा रहे हैं. इस विधेयक का विरोध कर रहे जातीय संगठनों का कहना है कि अगर मोदी सरकार के इस प्रस्तावित कानून को संसद की मंजूरी मिल जाती है तो असमिया भाषा, साहित्य और संस्कृति हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
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बिल का विरोध

राज्य में हो रहे व्यापक विरोध को देखते हुए सोमवार को क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) ने नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर बीजेपी गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है. हालांकि एजीपी के समर्थन वापस लेने से प्रदेश में संख्या बल को लेकर मौजूदा बीजेपी सरकार पर कोई आंच नहीं आएगी.
बीजेपी के कुछ प्रदेश नेताओं का कहना है कि ये विरोध कांग्रेस और कुछ संगठनों की तरफ से है. इससे राज्य की एक बड़ी आबादी कोई इत्तेफाक नहीं रखती. इन नेताओं का तर्क है कि इस विधेयक के लागू होने से असम के लोगों को कोई नुकसान नहीं होगा. उनकी सरकार पड़ोसी मुल्कों से धार्मिक उत्पीड़न के तहत आए अल्पसंख्यक लोगों को मानवीय आधार पर नागरिकता दे रही है. वहीं बीजेपी के कुछ नेता इस मुद्दे को 'मोहम्मद अली जिन्ना की विरासत' से जोड़कर अपने बयान दे रहें हैं.
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता ने बीबीसी से कहा कि इस बिल का राज्य की सवा तीन करोड़ आबादी विरोध नहीं कर रही. कुछ लोग हैं जो इसका विरोध कर रहें हैं.
वे कहते हैं, "एजीपी के समर्थन वापस लेने से हमारी सरकार को कोई नुकसान नहीं है. क्योंकि जो कुछ हो रहा है वो असम के लोगों के हित के लिए है. प्रदेश की जनता अपना हित कहां है और कहां नहीं है वो अच्छे से समझती है. हमारी पार्टी कोई हिंदू कार्ड नहीं खेल रही. बीजेपी का यह बहुत पुराना स्टेंड है कि जो धार्मिक उत्पीड़न के तहत अपना घर-बाहर सब कुछ छोड़कर आए हैं उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी. हमारी पार्टी उनके साथ न्याय करेगी."
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बीजेपी के इस कदम के खिलाफ अब पूर्वोत्तर राज्यों के प्रमुख छात्र संगठन संयुक्त रूप सामने आ गए है. नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (एनईएसओ) ने नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में मंगलवार को सुबह पांच बजे से लेकर शाम के चार बजे तक पूर्वोत्तर राज्यों में बंद का आह्वान किया है. इस बंद को सरकार से अलग हुई एजीपी समेत विपक्षी पार्टी कांग्रेस, एआईयूडीएफ और कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) ने अपना समर्थन दिया है.
असम प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अपूर्व कुमार भट्टाचार्य कहते है, "हमारी पार्टी इस बिल का विरोध करती है. क्योंकि इस बिल से असम समझौते का अपमान किया जा रहा है. अगर इस बिल से किसी का नुकसान नहीं हो रहा है तो फिर असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में इतना विरोध क्यों हो रहा है. इस बिल के जरिए बीजेपी एक-दूसरे को आपस में लड़ाने का प्रयास कर रही है ताकि चुनाव में हिंदू मतदाओं को अपने पाले में कर सके. लेकिन यहां के लोग अब बीजेपी के सांप्रदायिक खेल को समझ चुके है."
इस बिल के विरोध का एक धार्मिक कोण भी है. इस बिल में संशोधन के जरिए बीजेपी यहां शरणार्थियों के रहने की न्यूनतम सीमा को घटाकर 6 साल करना चाहती है. इससे पहले यह अवधि 11 साल तय की गई थी. विपक्षी पार्टियों का इस बिल के विरोध में प्रमुख तर्क है कि इसमें धार्मिक पहचान को प्रमुखता दी गई है. विपक्ष का यह भी तर्क है कि नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावना के खिलाफ है. आर्टिकल 14 बराबरी के अधिकार की व्याख्या करता है.
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नफ़ा-नुकसान

इस बारे में गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकिल हाफिज रसीद अहमद चौधरी कहते है, "लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस बिल को सदन में लाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बीते सप्ताह सिलचर में रैली करना, ये बातें बिल्कुल राजनीति के संकेत देती है. अगर सही तरीके से देखा जाए तो नागरिकता संशोधन बिल से बीजेपी को असम में कोई फायदा नहीं हो रहा है."
वो कहते हैं, "राज्य के कुल 14 लोकसभा सीटों में से केवल दो सीटों पर हिंदू बंगाली मतदाताओं का प्रभाव है. लेकिन बीजेपी हिंदूओं को नागरिकता देने से जुड़े इस बिल के जरिए मतदाओं में धार्मिक विभाजन करना चाहती है ताकि आगामी चुनाव में दूसरे प्रदेशों में उसकों फायदा मिले. असम से ज्यादा हिंदू बंगाली पश्चिम बंगाल में है. कई और राज्यों में भी इनकी बड़ी संख्या रहती है."
वे ये भी कहते हैं, "दरअसल हिंदी बहुल तीन राज्यों में हार के बाद बीजेपी काफी परेशान है और वो हर उस फार्मूले का इस्तेमाल करना चाहती जिससे उसे सीटों का फायदा हो."

भारतीय नागरिकता में आवेदन करने की समस्याएं

नागरिकता संशोधन बिल की गहन समझ रखने वाले चौधरी कहते है कि अगर ये बिल संसद में पास हो भी जाता है तो भी कई हिंदू बंगालियों को नागरिकता नहीं मिलेगी.
चौधरी बताते हैं, ''इस बील की शर्तों के अनुसार केवल वैध शरणार्थी ही भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे. इसके अलावा उन्हें बांग्लादेश के उन दस्तावेजों को आवेदन के साथ जमा करवाना पड़ेगा जिनसे ये बात सिद्ध हो सके कि आवेदनकारी सही में बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के चलते यहां आया हैं.''
असम: एनआरसी पर गरमाई राजनीति
वे इसी में आगे जोड़ते हैं, ''लेकिन इसमें भी कई तरह की समस्याएं है. दंगो से प्रभावित होकर जो लोग बाद में अपना सबकुछ छोड़कर यहां आए है उनके पास लीगल दस्तावेज कहां से आएंगे. जो लोग काफी पहले आ गए थे उनके पास शरणार्थी सेर्टिफिकेट जरूर मिलेगा. लेकिन बाद में आए अधिकतर लोगों के पास बांग्लादेश का कोई वैध दस्तावेत नहीं है. जबकि आवेदन करने की पहली शर्त है कि शरणार्थी को ये साबित करना होगा कि वो बांग्लादेश से भागकर आए दंगा प्रभावित पीड़ित है. इसके अलावा छह साल तक उसे बतौर शरणार्थी यहा रहना होगा. इस दौरान इन शरणार्थियों का आपराधिक रिकार्ड देखा जाएगा. अगर सबकुछ नियमों के अनुसार भी होता है तो भी अंतिम निर्णय सरकार लेगी कि वो उसे नागरिकता देगी या नहीं. कुल मिलाकर इस मुद्दे पर आगे लंबे समय तक राजनीति चलेगी और लोग परेशान ही रहेंगे."

नागरिकता संशोधन बिल 2016

नागरिकता संशोधन बिल जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.
बंद का असरइमेज कॉपीरइटBBC/DILIP SHARMA
असमिया लोगों की सबसे बड़ी नाराजगी इस नागरिकता बिल को लेकर है. क्योंकि अगर नागरिकता संशोधन बिल को मंजूरी मिलती है तो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की प्रासंगिकता एक तरह से खत्म हो जाएगी. असम के जातिय संगठनों की मांग है कि असम समझौते की शर्तों के अनुसार 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से आए प्रत्येक व्यक्ति को यहां से बाहर निकाला जाए. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.
दरअसल, असम में बांग्लादेशी नागरिकता का मुद्दा दशकों पुराना है. इसके खिलाफ साल 1979 से छह साल तक चले हिंसक आंदोलन के बाद 1985 में असम और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ था जिसके नतीजे में 24 मार्च 1971 के बाद से राज्य में आने वाले तमाम ग़ैर क़ानूनी आप्रवासियों को विदेशी घोषित कर राज्य से निकाल दिया जाना था. 1971 के बाद लाखों बांग्लादेशी हिंदू असम में आकर बस गए थे. कुछ अनुमानों के मुताबिक 1971 के बाद तकरीबन 20 लाख बांग्लादेशी हिंदू गैर क़ानूनी तौर पर असम में आकर रहने लगे.

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दिल्ली अग्निकांड ! किसकी ज़्यादा ज़िम्मेदारी दिल्ली में?

दिल्ली: आग के लिए पार्टियां एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं


दिल्ली में एक कारखाने में लगी आगइमेज कॉपीरइटEPA
रविवार सवेरे दिल्ली के रानी झांसी स्थित आज़ाद अनाज मंडी में भयंकर आग लग गई. आग के कारण क़रीब 43 लोगों की मौत हुई जबकि दर्जनों घायल हुए.
संकरी गलियों वाले इस इलाक़े में आग स्कूल बैग और प्लास्टिक के खिलौने बनाने वाली एक फैक्ट्री में लगी और तेज़ी से फैली.
दोपहर तक दमकल कर्मचारियों ने आग पर क़ाबू पा लिया. लेकिन इसके साथ ही जो सियासत शुरु हुई उसकी आंच अभी कुछ दिनों तक रहने वाली है.
एक तरफ जहां कांग्रेस और बीजेपी ने प्रदेश की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार ठहराया वहीं आम आदमी पार्टी ने इसका ठीकरा म्यूनिसिपलिटी (एमसीडी) पर फोड़ा जो फिलहाल बीजेपी के हाथों में है.
वहीं दिल्ली में दमकल विभाग के प्रमुख अतुल गर्ग ने बीबीसी को बताया है न तो इस इमारत का फाय़र क्लीरेंस था और न ही इमारत के भीतर आग लगने की स्थिति से बचने के लिए ही कोई तैयारी थी.
दिल्ली में जल्द विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में माना जा रहा है राजनीतिक पार्टियां इसे बड़ा मुद्दे बना रही हैं.

एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने कहा कि इसके लिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार ज़िम्मेदार है. बीजेपी के अधिकार वाली एमसीडी भी इसके लिए समान रूप से ज़िम्मेदार है.
वहीं बीजेपी नेता हरदीप पुरी ने कहा कि पूरे इलाके में बिजली के खंभों से तारें लटक रही हैं जो बेहद ख़तरनाक है, लेकिन प्रदेश सरकार कई शिकायतों के बाद भी इस मामले का कोई समाधान नहीं कर रही.

दिल्ली में एक कारखाने में लगी आगइमेज कॉपीरइटEPA
बीजेपी नेता हरदीप पुरी ने कहा कि पूरे इलाके में बिजली के खंभों से तारें लटक रही हैं जो बेहद ख़तरनाक है, लेकिन प्रदेश सरकार कई शिकायतों के बाद भी इस मामले का कोई समाधान नहीं कर रही.
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार को इस इलाके से लोगों को निकाल कर दूसरी जगह पर बसाना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
वहीं एक और वरिष्ठ बीजेपी नेता विजेंद्र गोयल ने कहा कि रिहाईशी इलाक़े में फैक्ट्री चल रही थी जिन्हें दूसरी जगहों पर शिफ्ट करना चाहिए थे, सरकार ने ऐसा नहीं किया.
वहीं आप आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा है कि फैक्ट्री की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई और बीजेपी ने अपनी राजनीति शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि "फैक्ट्री का लाइसेंस देने का काम एमसीडी करती है. अगर एक घर के भीतर कोई अवैध तरीके से फैक्ट्री चल रही है तो इसे रोकने का काम एमसीडी का है जो भाजपा के शासन में है."

बीजेपी ने अलग से की मदद की घोषणा


दिल्ली में एक कारखाने में लगी आगइमेज कॉपीरइटREUTERS
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घटना पर शोक जताते हुए प्रधानमंत्री राहत कोष से मारे जाने वाले लोगों के परिवारों के लिए 2-2 लाख की मदद का ऐलान किया.
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने मौक़े का दौरा किया और कहा कि इस मामले में न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं. उन्होंने मृतकों के लिए 10-10 लाख रुपये की मदद और घायलों को 1 लाख रुपये की मदद की घोषणा की है.
बीजेपी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने मौक़े का दौरा किया और पार्टी की तरफ से मृतकों के परिवार को 5-5 लाख रुपए और घायलों को 25,000 रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा की.
ऐसे मौक़े पर राजनीति करना ग़ैर-ज़िम्मेदाराना- नज़रिया
दिल्ली में हुई इस घटना के बाद राजनेताओं के बयानों और ज़िम्मेदारी को एक-दूसरे पर डालने की कोशिशों को लेकर बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने वरिष्ठ पत्रकारशेखर अय्यर से बात की. पढ़ें उनका नज़रिया:
इस दुखद घटना के लिए सारी पार्टियां दोषी हैं क्योंकि इन्होंने फ़ायर सेफ़्टी नॉर्म्स और बिल्डिंग संबंधी क़ानून दिल्ली में लागू ही नहीं किए. जितने भी ग़ैरकानूनी निर्माण हैं, उन्हें वैध करने के लिए दिल्ली सरकार, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन और केंद्र सरकार के बीच होड़ मची रहती है. इसी में सुरक्षा के नियमों का बहुत उल्लंघन हुआ है और इस संबंध में सख़्त कार्रवाई करने की इनमें इच्छा नहीं हैं.
चुनाव आने में जब तीन-चार महीने ही बचे हैं, तब इनके अंदर दूसरी दौड़ शुरू हो गई है- घटना के पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए ताकि यह दोष न आए कि घटना को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया. क्योंकि इस पूरे मामले में अहम सवाल यही है कि ऐसी घटनाएं हो क्यों रही हैं.
1997 के उपहार कांड के बाद आज की घटना में ही सबसे अधिक लोगों की मौत हुई है. इसमें शहर के अधिकारियों के साथ-साथ सरकारों का भी दायित्व बनता है.

दिल्ली अग्निकांडइमेज कॉपीरइटAFP
दिल्ली फ़ायर सर्विस की ओर से रिपोर्ट दी जाती है कि कितनी इमारतें ऐसी हैं जो सुरक्षा नियमों के अनुरूप नहीं हैं. कुछ जगहों पर तो दमकल वाहन भी नहीं पहुंच सकते.
आज की घटना तो दिल्ली की एकदम आंतरिक जगह हुई है जो सेंट्रल दिल्ली के क़रीब है. यहां पर बाहर से आए ग़रीब श्रमिक काम करते थे. कहा जा रहा है कि इस इमारत में फ़ैक्ट्रियां चल रही थीं. इस सबको रोका नहीं गया तो अब हादसा होने पर मुआवज़ा देने की होड़ मची है.
सवाल है सुशासन का है मगर चुनाव नज़दीक होने के कारण पार्टियां मुआवज़ा देने में लगी हुई हैं. आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार है तो साधन होने के कारण वह 10 लाख दे पा रही है. बीजेपी भी मुआवज़ा दे रही है. वह सोच रही होगी कि लोकसभा में अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए आगामी विधानसभा चुनाव जीतने का मौक़ा है.
लेकिन राजनीतिक पार्टियां इच्छाशक्ति इस्तेमाल करके ऐसी फ़ैक्ट्रियों को क्यों नहीं रोक रहीं जहां ऐसे हादसे होने की आशंका है?
पूरे एनसीआर में, अंदरूनी दिल्ली से लेकर बाहरी इलाक़ों तक ऐसी कई फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं. मगर इन्हें रोकने के बजाय घटना होने पर मुआवज़ा देकर सोचा जाता है कि मामला दब गया.

दिल्ली अग्निकांडइमेज कॉपीरइटANI

किसकी ज़्यादा ज़िम्मेदारी दिल्ली में?

दिल्ली ऐसा राज्य है जहां केंद्र सरकार की भी काफ़ी भूमिका है. यहां राज्य सरकार की तो ज़िम्मेदारी बनती ही है, एमसीडी वगैरह का भी दायित्व बनता है. उनके अधिकारियों, सेफ़्टी इंस्पेक्टर और इंडस्ट्रियल इंस्पेक्टर वगैरह की ज़िम्मेदारी बनती है कि सारी चीज़ों पर नज़र रखे और ज़रूरी क़दम उठाए.
राजनीतिक दायित्व के अभाव के अलावा सिस्टम में भी एक ख़ामी है. जहां भी निर्माण होता है, वहां नियमों को न तो शुरू में लागू किया जाता है और फिर उल्लंघन करने वालों पर बाद में कार्रवाई भी नहीं होती.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण को लेकर सख़्ती बरती थी तो भी हमने देखा कि पार्टियां उसका तोड़ निकालने में जुटी हुई थीं.
जब अवैध कॉलोनियों को रेग्युलराइज़ किया गया तो केंद्र और राज्य सरकारों के बीच श्रेय लेने की होड़ मच गई. मगर आप ऐसी कॉलोनियों को रेग्युलराइज़ करेंगे तो सेफ़्टी के बारे में तो सोचना ही होगा.

ऐंबुलेंसइमेज कॉपीरइटANI
ज़्यादा समय नहीं हुआ जब दिल्ली के करोल बाग़ में भी आग लगने की ऐसी घटना हुई थी जहां रेस्तरां में बाहर निकलने का रास्ता नहीं था. वहां पर दिल्ली फ़ायर सर्विस के हर नियम का उल्लंघन किया गया था.
दिल्ली में आबादी का घनत्व इतना है कि एक भी इमारत हादसे की शिकार हो जाए तो कम से कम 50-60 लोगों की तो मौत होना स्वाभाविक है. ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए पहले से उपाय उठाने की ज़रूरत है. मगर ऐसा हो नहीं रहा.
पार्टियां सिर्फ़ राजनीति कर रही हैं. बिहार से आए श्रमिकों की मौत की बात भी उठाई जा रही है क्योंकि वहां से आए लोगों के काफ़ी वोट हैं.
लेकिन पार्टियों को सोचना चाहिए कि चुनाव तो आएंगे-जाएंगे, अगर आप दिल्ली शहर में इस तरह से अवैध निर्माण होने देते रहेंगे तो ऐसी घटनाएं भी होती रहेंगी.
चुनाव आता देख अगर पार्टियां राजनीति में लग जाएं तो यह बहुत ग़ैर-ज़िम्मेदार काम है.