बिहार मानवाधिकार आयोग ने मेरे द्वारा दायर करवाई गई याचिका पर सुनवाई करते हुए मुजफ्फरपुर SSP से एक महीना के भीतर जवाब मांगा है जिसमें नवोदय के एक पूर्व छात्र रौशन कुमार पर नाबालिग होने के बावजूद बालिग के कोर्ट में केस चलाने का आरोप लगाया गया है।मामला 2009 का ही है,जब वह दसवीं कक्षा में और 18 वर्ष से कम उम्र का थे। 11 दिसंबर 2013 को इन्हें और इनके माता-पिता को प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी के कोर्ट से जमानत करवाना पड़ा है और 7 अप्रैल 2014 से इनके खिलाफ भी इसी कोर्ट में मुकदमा चलेगी।किशोर न्याय कानून,2000 की धारा 15 के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड में इनके मामले पर सुनवाई होना चाहिए और किशोर न्याय बोर्ड को इसी धारा के तहत मारपीट जैसे छोटे मामले पर किशोर का Counselling करके या Parents को direction देकर छोड़ देना चाहिए।
आरोप झूठा है क्योंकि पुलिस निरीक्षक के पर्यवेक्षण रिपोर्ट और ग्रामीणों के गवाही के मुताबिक करीब 8 बजे सुबह इनके घर पर कुछ लोगों ने आकर इनके माता-पिता से मारपीट की और वहाँ पर ये भी उपस्थित थे।इनपर और इनके माता-पिता पर भी बगल के किसी दूसरे जगह पर ठीक उसी समय करीब 8 बजे सुबह मारपीट करने का आरोप है।आखिर एक ही व्यक्ति एक ही समय में दो अलग अलग जगह पर कैसे उपस्थित हो सकता है?इनके खिलाफ गवाह भी वही लोग हैं जिनपर इनके घर पर आकर मारपीट करने के आरोप को सही पाया गया है।जब उस समय ये गवाह इनके घर पर मारपीट कर रहे थे तो फिर ये गवाह ठीक उसी समय बगल के उस जगह पर कैसे उपस्थित हो गए?पूर्व डीजीपी और बिहार मानवाधिकार आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष नीलमणी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं और ये उम्मीद की जा सकती है कि लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए नाबालिग का मानवाधिकार का हनन करने में शामिल दोषी पुलिस वाले पर कार्रवाई करेंगे।आखिर दारोगा को क्यों नहीं दिखा कि दसवीं के एक नाबालिग लड़का पर भी आरोप है?( Rahul kumar के फेसबुक वाल से , 4/2/14)
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