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8 जनवरी को क्यों होने वाली है देशव्यापी हड़ताल


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देश के लगभग सभी केंद्रीय और स्वतंत्र मज़दूर संघों ने नए इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड बिल के ख़िलाफ़ 8 जनवरी को हड़ताल करने का फ़ैसला किया है.
मज़दूर संघ दावा करते हैं कि हड़ताल में 25 करोड़ कर्मचारी शामिल होंगे.  
अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के सी.एच वेंकटचलम और भारतीय ट्रेड यूनियनों के फ़ेडरेशन सीटू के महासचिव तपन सेन ने बीबीसी को बताया कि ये बिल उद्योगपतियों और मालिकों के पक्ष में और मज़दूरों के ख़िलाफ़ है. 
सी.एच वेंकटचलम ने कहा, "यह एक मज़दूर-विरोधी, ट्रेड यूनियन-विरोधी और लोकतंत्र-विरोधी क़दम है."
तपन सेन कहते हैं, "यह सरकार श्रमिकों को बंधुआ मज़दूर बनाना चाहती है, यह उद्योगपतियों की सरकार है और यह खुलकर ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस के नाम पर ऐसा कर रही है." 
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आरएसएस के संगठन ने बनाई दूरी

आरएसएस से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ के विरजेश उपाध्याय की प्रतिक्रिया मिली जुली थी.
वो कहते हैं, "अगर इस बिल से कर्मचारियों को बंधुआ मज़दूर बनाने की कोशिश की जा रही है तो वो पहले से ही बंधुआ मज़दूर हैं क्योंकि इस बिल का एक भाग तो पिछले साल ही क़ानून बन चुका था." 
उनके अनुसार संघ ने 8 जनवरी को होने वाली हड़ताल का समर्थन नहीं किया है. वो कहते हैं, "ये कांग्रेस और वामपंथी दलों की एक राजनीतिक हड़ताल है."     श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार के अनुसार विधेयक का उद्देश्य औद्योगिक संबंधों को सुव्यवस्थित करना और व्यापार सूचकांक को आसान बनाना है.
इस विधेयक में श्रम सुधार के हिस्से के रूप में श्रम मंत्रालय ने 44 श्रम क़ानूनों को चार लेबर कोड में करने का फ़ैसला किया है जिसमें मज़दूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति को समाहित किया गया है.
लेकिन ट्रेड यूनियन के अधिकारियों के अनुसार इस बिल द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार ने फ़ैक्ट्रियों और कंपनियों के लिए रास्ता आसान करते हुए कर्मचारी यूनियनों के लिए हड़ताल पर जाना मुश्किल बना दिया है.
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सरकार से नहीं लेनी होगी अनुमति

बिल में प्रस्ताव ये भी है कि मालिक किसी मज़दूर को किसी भी मुद्दत के लिए नौकरी दे सकता है और नौकरी ले भी सकता है.   हालांकि, 100 से अधिक कर्मचारियों वाली फ़र्मों को बंद करने और छंटनी के लिए सरकार से अनुमति की आवश्यकता होगी. लेकिन इसने राज्य सरकारों को इस सीमा को कम करने या बढ़ाने के लिए थोड़ा ढीलापन दिया है. सरकार का प्रस्ताव ये था कि 100 कर्मचारियों से संख्या को 300 या इसके ऊपर किया जा सकता है. सरकार ने मज़दूर संघों के ऐतराज़ के बाद इसे इस बिल में शामिल नहीं किया. आगे चलकर इस प्रस्ताव को शामिल किया जा सकता है क्योंकि अब प्रावधान ये है कि सरकार आगे जाकर इसमें परिवर्तन करना चाहे तो संसद में इसकी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं.  
भारतीय मज़दूर संघ के विरजेश उपाध्याय इस प्रावधान के ख़िलाफ़ हैं. वो कहते हैं, "अभी क़ानून यह है कि किसी उद्योग या फैक्ट्री को बंद करने के लिए 100 या इससे अधिक कर्मचारी हैं तो सरकार से इजाज़त लेनी पड़ेगी. सरकार ने इसे बढ़ाकर 300 कर्मचारियों का प्रस्ताव रखा था. हमने इसका विरोध किया था. सरकार ने इसे मान लिया लेकिन इसके साथ नए प्रावधान को जोड़ दिया है जो सही नहीं है."  
इस पर तपन सेन ने कहा, "कल अगर इसमें सरकार बदलाव करे तो संसद में आने की ज़रूरत नहीं है. सरकार अपनी मर्ज़ी से एक ऑर्डर पास करके परिवर्तन कर सकती है. सरकार ने विधायिका की प्रक्रिया की धज्जियां उड़ा दी है."
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श्रम मंत्री गंगवार का कहना है कि इस बिल को तैयार करने से पहले मज़दूर संघ और तमाम पक्षों से कई स्तर की बातचीत हुई और इसको तैयार करते समय कर्मचारियों और मज़दूरों के हित का ध्यान रखा गया है.
संसद में उन्होंने कहा कि इस बिल का मक़सद फ़ैक्ट्रियों, उद्योगों और  इसमें काम करने वाले लोगों की सुरक्षा, वेतन में बेहतरी और उनके लिए काम के अंदर बेहतर माहौल लाना है. 
लेकिन तपन सेन कहते हैं ये सब ग़लत है, "इस बिल का लक्ष्य है मज़दूरों के अधिकारों को छीनकर उन्हें बंधुआ मज़दूर बनाया जाए जिससे मालिकों का फ़ायदा हो."
अपनी नाराज़गी जताते हुए वो आगे कहते हैं, "सरकार मालिकों की है जनता की नहीं."
अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ के सी.एच वेंकटचलम के अनुसार सरकार पूंजीपतियों के साथ है जिनका मक़सद बेईमानी करना है. 
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बिल लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में पेश किया जाएगा. सरकार को उम्मीद है कि बिल जल्द ही क़ानूनी रूप ले लेगा.
तपन सेन के अनुसार सरकार के लिए इसे लागू करने इतना आसान नहीं होगा. वो कहते हैं, "सरकार कामयाब क्या होगी. फ़ैक्ट्रियां भी तो चलानी हैं. सारे ट्रेड यूनियन 8 जनवरी को हड़ताल पर जा रहे हैं. तब आपको हमारी ताक़त का अंदाज़ा होगा."
सरकार को लोकसभा और राज्यसभा में बिल पास कराने में कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं होनी चाहिए.  

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