Skip to main content

लाल किले की घटना के बाद अब क्या होगा ?

 BBC News, हिंदी

लाल क़िले की घटना के बाद किसान आंदोलन का क्या होगा

  • इक़बाल अहमद
  • बीबीसी संवाददाता
किसान

केंद्र के तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ गणतंत्र दिवस को किसानों ने ट्रैक्टर मार्च निकाला. एक तरफ़ जहाँ हज़ारों किसान दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों से हाथों में तिरंगा और अपने संगठन का झंडा लिए ट्रैक्टर में बैठे नज़र आए, वहीं दूसरी तरफ़ कई इलाक़ों में पुलिस और किसानों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं.

इस दौरान एक किसान की मौत हो गई और किसानों के एक समूह ने लाल क़िले के अंदर घुसकर सिखों के धार्मिक झंडे निशान साहब को फहरा दिया. इन सबके बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि दो महीने से भी लंबे समय से चल रहे आंदोलन का क्या होगा?

क्या मंगलवार को हुई हिंसा को आधार बनाते हुए सरकार इस आंदोलन को बंद करवा देगी या फिर किसान आंदोलन और उग्र हो जाएगा?

लेकिन इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि मंगलवार को आख़िर हुआ क्या?

किसानों की ट्रैक्टर रैली मंगलवार सुबह नौ बजे के क़रीब शुरू हुई. पुलिस के साथ कई दौर की बातचीत के बाद रूट तय हुआ. दोपहर 12 बजे के बाद कई जगहों से बैरिकेड तोड़ने, तय रूट से अलग जाने की कोशिश और पुलिस की लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दाग़ने की ख़बरें आने लगीं.

कुछ ही देर बाद ऐतिहासिक लाल क़िले पर सिखों के धार्मिक झंडे निशान साहब को फहराने की तस्वीरें और वीडियो मीडिया में छा गईं. कुछ मीडिया में यह भी कहा गया कि लाल क़िले पर तिरंगे का अपमान करते हुए ख़ालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया.

लेकिन बाद में यह स्पष्ट हुआ कि लाल क़िले पर फहराया जाने वाला झंडा सिखों का धार्मिक झंडा निशान साहब था. पुलिस ने इसके लिए किसानों को ज़िम्मेदार ठहराया है और कहा कि मंगलवार की घटना में 83 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और इस दौरान सार्वजनिक संपत्ति का भी नुक़सान हुआ है.

किसान

पुलिस ने कम से कम चार एफ़आईआर भी दर्ज की है. दिल्ली के पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने हिंसा के लिए किसानों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा, "ट्रैक्टर रैली के लिए वक़्त और रूट कई दौर की बैठकों के बाद तय किया गया था. लेकिन किसान तय रूट की बजाए दूसरी जगह से ट्रैक्टर ले आए और वो भी तय वक़्त से पहले. इसके बाद हुए बवाल में कई पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं."

वीडियो कैप्शन,

ट्रैक्टर परेड: जब किसानों ने बेकाबू भीड़ के हाथों से पुलिसवाले को बचाया

ज़िम्मेदारी किसकी

किसान इन सबके लिए अपने कुछ 'भटके' हुए साथियों और दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि पुलिस ने कई ट्रैक्टर तोड़ दिए हैं और उन्हें उनका जुर्माना देना होगा.

किसानों के संगठन संयुक्त किसान मोर्चा ने बयान जारी कर ट्रैक्टर परेड को तत्काल प्रभाव से ख़त्म करने की घोषणा की. इस मामले में राजनीतिक पार्टियों के भी बयान आने लगे. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट कर परेड में हुई हिंसा की निंदा की है.

छोड़िए Twitter पोस्ट, 1

पोस्ट Twitter समाप्त, 1

उन्होंने ट्वीट कर कहा, "दिल्ली में चौंकाने वाले दृश्य. कुछ तत्वों की ओर से की गई हिंसा अस्वीकार्य है. शांतिपूर्ण ढंग से विरोध कर रहे किसानों ने जो साख बनाई है, ये उसे नुक़सान पहुँचाएगा. किसान नेताओं ने ख़ुद को इससे अलग कर लिया है और ट्रैक्टर रैली को रोक दिया है. मैं सभी वास्तविक किसानों से दिल्ली ख़ाली करने और सीमाओं पर लौटने की अपील करता हूँ."

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है और मोदी सरकार को कृषि क़ानून को वापस ले लेना चाहिए.

छोड़िए Twitter पोस्ट, 2

पोस्ट Twitter समाप्त, 2

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने भी कहा कि जिस तरह से आंदोलन को हैंडल किया गया वो अफ़सोसनाक है. आम आदमी पार्टी ने भी इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया. डीएमके और ममता बनर्जी ने भी इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया.

मीडिया के साथ बातचीत में किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि पुलिस ने उन रास्तों पर भी बैरिकैडिंग की, जिन पर ट्रैकटर रैली की सहमति बनी थी.

उन्होंने कहा, "एक रास्ता तो दोगे. ये एक बड़ी साज़िश है. पुलिस ने जो रास्ता दिया, उसी पर बैरिकेडिंग थी तो ज़ाहिर है किसान दूसरे रास्ते पर चले गए. कुछ लोग ऐसे ज़रूर थे, जो कभी आंदोलन का हिस्सा नहीं थे और तय करके आए थे कि आगे ही जाना था. हम उनको चिंन्हित करेंगे. जो एक दिन के लिए आए थे, वो बिगाड़ा करते हैं. लाल क़िले पर जो हुआ वो ग़लत हुआ. कोई धार्मिक प्रोग्राम हमारे आंदोलन का हिस्सा नहीं है. हम इसकी कड़ी निंदा नही करते हैं."

वीडियो कैप्शन,

ट्रैक्टर परेड: किसानों ने लाल किला पर लगाया केसरी झंडा

कई लोग इसे दिल्ली पुलिस और इंटेलिजेंस की नाकामी भी क़रार दे रहे हैं. लेकिन बीजेपी इसके लिए दिल्ली पुलिस की तारीफ़ कर रही है.

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, "मैं दिल्ली पुलिस का अभिनंदन करूंगा जिस तरह उन्होंने इतने उकसावे के बाद भी शांतिपूर्ण तरीक़े से स्थिति को संभाला. हमें पुलिस की समस्या समझना चाहिए. अगर पुलिस पहले बल प्रयोग करती तो यह किसान जो विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं और कई राजनीतिक दल जो उस विक्टिम कार्ड को राजनीतिक और इंटेलेक्चुअल कवर दे रहें हैं, उसको और ज़्यादा बल मिलता.''

किसान

किसान आंदोलन से जुड़े स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने भी इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि जिन्होंने लाल क़िले पर ऐसी हरकत की है, वो पहले दिन से ही आंदोलन का हिस्सा नहीं थे.

किसान नेता मंजीत सिंह ने बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा से बातचीत में कहा कि लाल क़िला पर जाने की किसी की कोई योजना नहीं थी. मंजीत सिंह के अनुसार कुछ लोगों को भड़काया गया था. संयुक्त किसान मोर्चा ने भी एक बयान जारी कर कहा कि कुछ असामाजिक तत्व हमारे शांतिपूर्ण आंदोलन में दाख़िल हो गए थे.

अपने बयान में कहा कि ''शांति ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है और इसका कोई भी उल्लंघन आंदोलन को नुक़सान पहुँचाता है.''

वीडियो कैप्शन,

ट्रैक्टर परेड के बाद किसान आगे क्या करेंगे, योगेंद्र यादव क्या बोले?

किसान आंदोलन का क्या होगा?

मंगलवार की घटना के बाद सबसे अहम सवाल यही है कि अब किसान आंदोलन का क्या होगा. क्या किसान आंदोलन से जुड़े नेता मंगलवार की घटना के बाद किसी तरह के दबाव में हैं और जिस तरह से इस पूरी घटना पर उनका बयान आया, उससे वो थोड़े बैकफ़ुट पर आ गए हैं?

वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ऐसा नहीं मानतीं. बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, ''वो (किसान नेता) बहुत परिपक्व और बहुत हिम्मती लोग हैं जिन्हें लंबे अर्से तक कार्यक्रम चलाने का अनुभव है. वो बहुत साफ़ और सीधे तरीक़े से अपनी बात अब तक कहते आए हैं. वो जानते हैं कि जिस प्रकार सरकारी तंत्र और मीडिया तंत्र पर इस सरकार का पूरा नियंत्रण है कि इससे (लाल क़िले की घटना) पूरी बात ही भटक जाएगी. यह उनकी अक़्लमंदी का सबूत है कि वो तीन क़ानून की बात कर रहे हैं ताकि पूरे किसान आंदोलन को सिर्फ़ लाल क़िले की एक घटना से ना जोड़ा दिया जाए.''

कृषि मामलों के जानकार देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि समाज और मीडिया पूरा इलज़ाम किसानों के मत्थे मढ़ने की कोशिश कर रहा है. उनके अनुसार किसानों को अराजक तत्व या आतंकवादी कहना बिल्कुल ग़लत है.

देवेंद्र शर्मा भी मानते हैं कि मंगलवार की घटना से किसानों ने अब तक जो मोरल हाइग्राउंड ले रखा था उस पर कोई आँच नहीं आएगी और वो बरक़रार है. देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि मंगलवार की घटना से किसान बहुत दुखी हैं लेकिन अपनी माँगों को लेकर वो बिल्कुल स्पष्ट हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं आएगा.

किसान

हालाँकि वो कहते हैं कि किसान नेताओं को इसकी सामूहिक ज़िम्मेदारी तो लेनी होगी.

वो आगे कहते हैं, "जो लोग वहाँ बैठे हैं, वो दर्द और पीड़ा को लेकर आए हैं. उन्हें उम्मीद थी कि वो धरने पर बैठेंगे तो उनका समाधान निकलेगा. दिल्ली सीमा पर भले ही किसान दो महीने से बैठे हैं, लेकिन पंजाब में तो तीन-चार महीने से मूवमेंट चल रहा था. कुछ एक कमी तो रही है कि कोई समाधान नहीं निकला.''

कुछ लोग कह रहे हैं कि सरकार मंगलवार की घटना की आड़ में किसान आंदोलन को ख़त्म करने की कोशिश कर सकती है.

बीजेपी प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ऐसा नहीं मानते और कहते हैं कि सरकार किसी मौक़े का लाभ नहीं लेना चाहती.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "हम प्रजातांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं. किसान शांतिपूर्ण तरीक़े से आंदोलन करना चाहें, उनका स्वागत है. हम आख़िर तक प्रजातांत्रिक मूल्यों को इस भारत में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं. उसमें विरोध करने का और अपनी बात रखने का सबको अधिकार है. लेकिन कोई यह कहे कि अल्पमत में रहने वाले लोगों की बात चल जाएगी तो ऐसा नहीं होगा.''

गोपाल कृष्ण अग्रवाल के अनुसार भारत में 14 करोड़ किसान हैं और दिल्ली सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों की तादाद उनकी तुलना में बहुत कम है, जो इस क़ानून का समर्थन कर रहे हैं.

किसान

क्या कर सकती है सरकार?

तो क्या सरकार क़ानून की वापसी को लेकर कोई दोबारा विचार कर सकती है?

देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि सरकार को बड़ा दिल दिखाना चाहिए था और इन तीन क़ानूनों को वापस ले लेना चाहिए. बीजेपी के प्रवक्ता इससे साफ़ इनकार करते हैं.

वो कहते हैं कि जबसे आंदोलन शुरू हुआ है, सरकार ने किसानों से 11 राउंड में 45 घंटे की बात की, 20 से ऊपर बदलाव को लिखित रूप से दिया है, सरकार ने इन क़ानूनों को स्थगित करने का प्रस्ताव रखा और किसानों के साथ मिलकर कमेटी गठन करने का प्रस्ताव रखा. लेकिन सरकार ने सब कुछ ठुकरा दिया.

वो आगे कहते हैं, ''क़ानून वापसी की बात करना जायज़ नहीं है. यह तो अल्पसंख्यक की राय बहुसंख्यक किसानों पर थोपना है. इससे दूसरा आंदोलन खड़ा हो सकता है. 1991 के बाद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है. सब बातें करते थे, लेकिन किसी में यह क़ानून लाने की हिम्मत नहीं थी. कभी भी सुधार करना होता है तो उसके लिए राजनीतिक कैपिटल इंवेस्ट करना पड़ता है. मोदी ने इसमें इंवेस्ट किया है. सरकार में यह स्पष्ट मत है कि यह क़ानून किसानों के हित में है और लाखों-करोड़ों किसान इसके समर्थन में हैं."

लेकिन सीमा चिश्ती बीजेपी प्रवक्ता के इस तर्क से सहमत नहीं हैं. वो कहती हैं, ''एक महामारी से दुनिया जूझ रही है, भारत जूझ रहा है. उसके बीच में तीन क़ानून इस तरह से लाए जाते हैं. उन पर बहस नहीं होती है, उन पर वोट नहीं होता है और उनको बिना किसी कमेटी के भेजे यूँ हीं एक दिन में ही पास कर दिया जाता है. तो यह किस तरह की बहुमत है. इसकी अभी ज़रूरत क्या थी कि इसको लाया जा रहा है.''

किसान

किसान नेताओं ने कहा है कि वो अपनी अगली रणनीति एक दो दिन में तय करेंगे. किसानों ने एक फ़रवरी को बजट के दिन संसद मार्च करने की घोषणा की थी, लेकिन सीमा चिश्ती को लगता है कि शायद संसद मार्च को अब टाल दिया जाए और मामला को ठंडा करने की कोशिश करेंगे.

सीमा चिश्ती कहती हैं, ''किसान अपने मुद्दे (क़ानून वापसी) पर बात करना चाहेंगे और सरकार चाहेगी कि मुद्दे पर बात ना हो, किसी तरह से इस बात को झंडे पर ही अड़ा दिया जाए. मोदी सरकार के लिए और विशेष रूप से गृहमंत्री के लिए उनके रिकॉर्ड पर बहुत बड़ा कलंक है. रिपब्लिक दिवस पर हर जगह नाका होता है, पुलिस तैनात रहती है. सबको पता है कि किसान ट्रैक्टर रैली करने वाले हैं और इतने बड़े क़िले (लाल क़िले) की हिफ़ाज़त अगर सरकार नहीं कर पाई, तो उनके लिए भी एक धक्का है, उनकी छवि को क्षति पहुँची है."

सीमा चिश्ती के अनुसार सरकार चाहेगी कि इसे क़ानून-व्यवस्था का मामला बनाकर पेश किया जाए लेकिन वो इससे किसान आंदोलन को कमज़ोर होता नहीं देख रही हैं.

किसान

किसान नेताओं का अगला क़दम क्या होगा उसके बारे में पूरी जानकारी कुछ घंटों में शायद मिले लेकिन इतना ज़रूर है कि मंगलवार की घटना के बाद उनके सामने कुछ चुनौतियाँ ज़रूर हैं.

मसलन आंदोलन में एकजुटता कैसे बरक़रार रखी जाए, आंदोलन में जो युवा वर्ग शामिल हैं, उन्हें कैसे अनुशासन में रखा जाए और इन सबके अलावा सरकार पर कैसे दबाव बनाए रखा जाए ताकि आंदोलन कमज़ोर नहीं पड़े.

Comments

Popular posts from this blog

"बक्श देता है 'खुदा' उनको, ... ! जिनकी 'किस्मत' ख़राब होती है ... !! वो हरगिज नहीं 'बक्शे' जाते है, ... ! जिनकी 'नियत' खराब होती है... !!"

सिमरन प्रजापति  with  Rekha Vinod Jain  and  4 others Mon  ·  क्या खुब लिखा है किसी ने ... "बक्श देता है 'खुदा' उनको, ... ! जिनकी 'किस्मत' ख़राब होती है ... !! वो हरगिज नहीं 'बक्शे' जाते है, ... ! जिनकी 'नियत' खराब होती है... !!" न मेरा 'एक' होगा, न तेरा 'लाख' होगा, ... ! न 'तारिफ' तेरी होगी, न 'मजाक' मेरा होगा ... !! गुरुर न कर "शाह-ए-शरीर" का, ... ! मेरा भी 'खाक' होगा, तेरा भी 'खाक' होगा ... !! जिन्दगी भर 'ब्रांडेड-ब्रांडेड' करने वालों ... ! याद रखना 'कफ़न' का कोई ब्रांड नहीं होता ... !! कोई रो कर 'दिल बहलाता' है ... ! और कोई हँस कर 'दर्द' छुपाता है ... !! क्या करामात है 'कुदरत' की, ... ! 'ज़िंदा इंसान' पानी में डूब जाता है और 'मुर्दा' तैर के दिखाता है ... !! 'मौत' को देखा तो नहीं, पर शायद 'वो' बहुत "खूबसूरत" होगी, ... ! "कम्बख़त" जो भी ...

छिनतई होती रही और सामने से चली गई पुलिस.....

 DB Gaya 28.08.23

Magar Momino pe Kushada hain rahen || Parashtish karen Shauq se Jis ki chahein

  करे गैर गर बूत की पूजा तो काफिर  जो ठहराए बेटा खुदा का तो काफिर  गिरे आग पर बहर सिजदा तो काफिर  कवाकिब में मानें करिश्मा तो काफिर  मगर मोमिनो पर कुशादा हैं राहें  परस्तिश करें शौक से जिस की चाहें  नबी को जो चाहें खुदा कर दिखाएं  इमामों का रुतबा नबी से बढ़ाएं  मज़ारों पे दिन रात नजरें चढ़ाएं  शहीदों से जा जा के मांगें दुआएं  न तौहीद में कुछ खलल इससे आये  न इस्लाम बिगड़े न ईमान जाए । ( मुसद्दस हाली ) __________________________________________________ Padhne k baad kya Samjhe ? Agar Gair Boot ki Puja , Murti Puja , Yani ek khuda k Awala ki kisi Dusre ki puja kare to Kafir  Eesha Alaihissalam ko manne wale Agar Ek Allah ki Parastish karne k sath Eesha Alaihissalam ko Khuda maan Liya to  Fir bhi Kaafir  Aag ki sijdah Jisne Kiya wah bhi kaafir ho gaya  Falkiyaat Aur chaand aur sitaron k Wajud ko Allah ka banaya hua n maan kar Sirf Karishma maan liya to bhi Kaafir ... Lekin Musalmano ki Rahen Aasan aur Wasi  kai...