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पहलगाम हमला: तीन ऐसे सवाल जिनके जवाब अब तक नहीं मिले

 पहलगाम हमला: तीन ऐसे सवाल जिनके जवाब अब तक नहीं मिले

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में मंगलवार को चरमपंथी हमला हुआ था

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इमेज कैप्शन,जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में तैनात सुरक्षाकर्मी
  • Author,इशाद्रिता लाहिड़ी
  • पदनाम,बीबीसी संवाददाता

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले में 26 लोग मारे गए. इसके बाद कई वीडियो सामने आए. इनमें से एक वायरल वीडियो गुजरात की शीतल कलाठिया का है. शीतल के 44 साल के पति शैलेशभाई कलाठिया भी इस हमले में मारे गए थे.

केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल सूरत में उनके परिवार से मिलने गए. शीतल उनके सामने ख़ुद पर क़ाबू नहीं रख सकीं और अपना दुख बताने लगीं.

शीतल ने कहा, "आपके पास इतनी सारी वीआईपी कारें हैं. उस व्यक्ति का क्या जो टैक्स देता है? वहाँ न कोई सैनिक था और न ही कोई मेडिकल टीम."

अंग्रेज़ी के अखबार 'द हिंदू ' ने महाराष्ट्र के पारस जैन से भी बात की. वे इस हमले में बच गए हैं. उन्होंने कहा कि यह हमला 25-30 मिनट तक चला. उनका दावा है कि वहाँ न तो कोई पुलिसकर्मी था और न ही कोई आर्मी का कोई जवान.

रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) का कैंप हमले की जगह से सात किलोमीटर दूर था, जबकि सेना के राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) का कैंप पाँच किलोमीटर दूर.

केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल शैलेशभाई कलाठिया की पत्नी से मिले

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इमेज कैप्शन,केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल शैलेशभाई कलाठिया के परिवार से मिले

जैसे-जैसे मारे गए लोगों के परिवार वाले और देश के बाक़ी लोग इस हमले के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे-वैसे कई सवाल भी सामने आ रहे हैं.

फ़िलहाल इनमें कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं.

इन सवालों में सबसे अहम है कि पहलगाम के इस लोकप्रिय पर्यटन स्थल बैसरन में सुरक्षा क्यों नहीं थी?

बीबीसी ने जम्मू-कश्मीर और सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों से बात कर, ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

आइए जानते हैं, विशेषज्ञों की राय.

बैसरन में सुरक्षा क्यों नहीं थी?

पहलगाम में हुए हमले के बाद यह सवाल बार-बार उभरकर सामने आ रहा है कि इस लोकप्रिय पर्यटन स्थल पर सुरक्षा क्यों नहीं थी.

पत्रकार और कश्मीर मामलों की जानकार अनुराधा भसीन कहती हैं कि जहाँ तक उनकी याददाश्त है, उन्होंने हमेशा ही जम्मू-कश्मीर में सैन्य बल की भारी तैनाती देखी है.

भसीन कहती हैं, "1990 के दशक से ही, मुझे ऐसी कोई सार्वजनिक जगह याद नहीं जहाँ सुरक्षा न हो. हर जगह कुछ न कुछ सुरक्षाकर्मी या सुरक्षा के इंतज़ाम दिखेंगे ही. इसलिए यह चौंकाने वाली बात है कि इस इलाक़े में सुरक्षा नहीं थी."

उन्होंने कुछ और भी सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि हमले के कुछ घंटों के अंदर ही हमलावरों के नाम कैसे सार्वजनिक कर दिए गए? यही नहीं, पीड़ितों और उनके परिवार वालों की दिल दहला देने वाली तस्वीरें सार्वजनिक कैसे कर दी गईं?

अनुराधा भसीन का विश्लेषण

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वह कहती हैं, "सुरक्षा बलों को वहाँ पहुँचने में समय लगा. लेकिन कुछ ही घंटों में उनके पास हमलावरों की तस्वीरें थीं. वे इस नतीजे पर कैसे पहुँचे? ये जाँच बहुत विश्वसनीय नहीं लगती. ऐसी घटनाओं का इतिहास रहा है, जिनकी जाँच पर सवाल उठते रहे हैं. ये कुछ सवाल हैं जो मेरे ज़हन में हैं."

वह कहती हैं कि साल 2019 में अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद भी कश्मीर में इस तरह की घटनाएँ होती रही हैं. भले ही वे बहुत बड़ी न हों. वह कहती हैं कि यह घटना दुनिया के सबसे अधिक सैन्यीकृत इलाक़ों में से एक में हुई. इससे गंभीर सवाल उठते हैं.

अनुराधा भसीन कहती हैं, "पिछले पाँच सालों में कुछ घटनाएँ घटी हैं. यह नहीं कहा जा सकता कि मिलिटेंसी ख़त्म हो गई है. यहाँ तक कि सुरक्षा से जुड़े अफ़सर भी जब इस मुद्दे पर बात करते हैं तो 'नियंत्रित' जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं. वे मिलिटेंसी के 'ख़ात्मे' जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करते. यह एक राजनीतिक नैरेटिव ज़्यादा है कि मिलिटेंसी ख़त्म हो गई है. पिछले पाँच सालों में जो भी शांति बनी है, वह ज़्यादा सैन्य नियंत्रण की वजह से है."

प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में पढाते हैं और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और सुरक्षा के विशेषज्ञ हैं.

भसीन के सवालों का जवाब देते हुए वह कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में पर्यटन स्थलों पर सैन्य बल की भारी तैनाती न करने का रुझान रहा है.''

वह कहते हैं, "ऐसी रणनीति अपनाई गई जो असरदार तो हो लेकिन बहुत ज़्यादा खुले रूप में दिखाई न दे. लेकिन किसी भी सूरत में, यह एक बड़ी सुरक्षा चूक थी."

बीबीसी ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एसपी वैद से भी बात की. उन्होंने कहा कि चूँकि पर्यटकों को एक दूरदराज़ के इलाक़े में ले जाया जा रहा था, इसलिए वहाँ पुलिस कर्मियों की तैनाती होनी चाहिए थी.

वैद कहते हैं, "मुझे लगता है कि वहाँ सशस्त्र पुलिस की मौजूदगी होनी चाहिए थी. पुलिस या अर्धसैनिक बलों को वहाँ होना चाहिए था. अगर वे वहाँ होते तो वे आतंकवादियों से निपट सकते थे. यह भी सच है कि पुलिस कर्मी हर जगह नहीं हो सकते. संसाधन सीमित होते हैं. हाँ, अगर पर्यटक दूरदराज़ के इलाक़े में जा रहे थे, तो वहाँ कुछ न कुछ पुलिसकर्मी ज़रूर होने चाहिए थे."

लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर) सतीश दुआ लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे हैं. वे कहते हैं, "सेना और राष्ट्रीय राइफल्स (आआर) हर जगह अंदरूनी इलाक़ों में नहीं हो सकते. वे सीमा पर आतंकवादियों से निपटने के लिए तैनात होते हैं. अब अगर पुलिस की बात करें, तो कश्मीर घाटी 120 किलोमीटर लंबी और 38 किलोमीटर चौड़ी है. हर जगह पुलिसकर्मी तैनात करना मुमकिन नहीं है."

आम लोगों को क्यों निशाना बनाया गया?

पहलगाम हमले के बाद लोग अपने घर जाने के लिए श्रीनगर एयरपोर्ट पर इंतज़ार करते हुए

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पहलगाम हमले में आम नागरिकों को निशाना बनाए जाने से जुड़ा सवाल भी उठता है. इस हमले में चरमपंथियों ने वह तरीक़ा अपनाया जो अन्य हमलों से अलग था.

इस हमले में सैनिकों या पुलिस को नहीं बल्कि आम नागरिकों को निशाना बनाया गया. यह जम्मू-कश्मीर या देश के किसी हिस्से में लंबे समय बाद हुआ ऐसा हमला था, जिसमें इतने बड़े पैमाने पर आम लोगों को निशाना बनाया गया.

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ इस बारे में विस्तार से समझाते हैं.

दुआ कहते हैं, "पिछले पाँच सालों में कश्मीर घाटी में हालात बेहतर हुए हैं और सकारात्मक बदलाव आया है. लोग फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटने लगे थे. पर्यटन भी बहुत तेज़ी से बढ़ने लगा. आतंकवादी कभी भी पर्यटन वाले इलाक़े को निशाना नहीं बनाते. यह बात दुनिया भर में सच है और कश्मीर में ख़ासकर. क्योंकि अगर आतंकवादी ऐसा करते तो वे स्थानीय कश्मीरियों की आजीविका को निशाना बनाते. वे इन स्थानीय लोगों से ही समर्थन की उम्मीद करते हैं. इससे उनका ही समर्थन ख़त्म होता. यही वजह है कि घरेलू इलाक़ों में हमारी हमेशा यह समझ रही है कि आतंकवादी आम लोगों को निशाना नहीं बनाएँगे."

उन्होंने बताया, "जब मैं कोर कमांडर भी था तो लोग मुझसे पूछते थे कि क्या वे (पर्यटन के लिए) कश्मीर आ सकते हैं. मैं हमेशा उनसे कहता था, कृपया आइए. आप डल झील के पास बैठ सकते हैं या पर्यटन स्थलों पर घूम सकते हैं क्योंकि इन जगहों पर हमले नहीं होते."

संजय लेले के परिवार

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इमेज कैप्शन,पहलगाम हमले में जान गंवाने वाले संजय लेले के परिवार के सदस्य

प्रोफ़ेसर अमिताभ मट्टू इस हमले में आम नागरिकों को निशाना बनाने के कारण पर सवाल उठाते हैं.

वह कहते हैं, "आतंकी समूहों ने नागरिकों को निशाना क्यों बनाना शुरू कर दिया? पहले यह मुख्य रूप से सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते थे. इस बार उन्होंने कश्मीरी लोगों की भावनाओं का कोई ख़्याल नहीं किया. क्या यह हालात सामान्य होने के विचार को नकारने का एक तरीक़ा है?

"पहले आतंकवादी समूहों की रणनीति यह थी कि वे सैन्य ठिकानों और उन टारगेट के बीच अंतर करते थे, जिनका स्थानीय आबादी पर असर पड़ सकता था. अब वह अंतर गायब सा हो गया है. हाँ, सिवाय इसके कि उन्होंने इस बार हिंदुओं को निशाना बनाया."

दुआ भी मानते हैं कि नागरिकों को निशाना बनाने का एक कारण यह हो सकता है कि इसके ज़रिए देश के बाक़ी हिस्सों में भावनाओं को भड़काया जा सके.

उन्होंने कहा, "आतंकवादियों ने क्या किया? उन्होंने हिंदू पुरुषों को अलग किया और उन्हें मार डाला. इसका मक़सद था कि महिलाएँ अपने-अपने शहर वापस जाएँ और इन सबकी कहानी सुनाएँ. एक महिला की दर्दनाक़ चीख़ हर जगह असर डालती है और फिर इससे देश के अलग-अलग हिस्सों में भावनाएँ भड़केंगी. भारत को यह तय करना होगा कि हम उनके जाल में न फँसें."

उनके मुताबिक, यह साल 2023 में इसराइल पर हमास के हमले जैसा है.

वह कहते हैं, "उन्होंने हमास के तौर-तरीक़े को अपनाया है. वैसा ही कुछ किया है जैसा उन्होंने नोवा म्यूजिक फ़ेस्टिवल (इसराइल) में किया था. इसका कारण यह है कि निर्दोष आम नागरिकों, विशेष रूप से पर्यटकों को मारना, सुरक्षा बलों को मारने से ज्यादा लोगों पर असर डालता है."

क्या यह एक ख़ुफ़िया तंत्र की विफलता थी?

विक्रम मिसरी

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इमेज कैप्शन,भारत ने कहा है कि पहलगाम हमले के तार सीमा पार से जुड़े हैं

अमिताभ मट्टू का कहना है कि उन्हें इस हमले में पाकिस्तान का हाथ होने में कोई संदेह नहीं है. तब यह सवाल उठता है कि क्या यह एक बड़ी ख़ुफ़िया नाकामी थी.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच कितनी मिलीभगत है, यह अभी तक साफ़ नहीं है. क्या पाकिस्तानी सरकार को इस बारे में जानकारी थी कि सेना और आईएसआई और लश्कर-ए-तैयबा जैसे फ्रंटल संगठन इस तरह की गतिविधियों में शामिल हैं? मुझे एक पल के लिए भी पाकिस्तान के इसमें शामिल होने पर संदेह नहीं है."

मट्टू कहते हैं, "यह एक ख़ुफ़िया नाकामी है. क्यों हमें कोई ऐसी इलेक्ट्रॉनिक जानकारी नहीं मिली, जिसके ज़रिए हम इस हमले का अंदाज़ा लगा पाते और उसे नाकाम कर सकते थे?"

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ भी मानते हैं कि ख़ुफ़िया नाकामी बड़ी चूक है.

दुआ कहते हैं, "क्या हम कुछ बेहतर कर सकते थे? हाँ. मैं यह नहीं कहता कि कोई चूक नहीं थी. हम बेहतर ख़ुफ़िया जानकारी जुटा सकते थे. इस घटना से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ ने एक बयान दिया था. इसमें उन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बारे में बात की. उन्होंने मुसलमानों की श्रेष्ठता आदि के बारे में बात की थी. हमें उस संकेत को समझना चाहिए था. कोई भी उच्च-प्रोफ़ाइल आतंकवादी हमला हमेशा शीर्ष स्तर पर मंज़ूर होता है. पाकिस्तानी आर्मी चीफ़ जानते थे कि वह क्या कर रहे थे. इसलिए हमें ऐसी चीजों के प्रति अधिक सावधान रहना चाहिए था. हमें ज़मीन पर कान और आँखें ज्यादा सजग रखनी चाहिए थीं."

उनका कहना है, "देश को मानव ख़ुफ़िया (ह्यूमन इंटेलिजेंस) जानकारी में सुधार करने की ज़रूरत है. हम अब बहुत ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक ख़ुफ़िया जानकारी पर निर्भर हो गए हैं. यह दोनों का एक बेहतर मेल होना चाहिए."

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि हमले के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 'कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी' (सीसीएस) की बैठक हुई थी.

बैठक के फ़ैसलों की जानकारी देते हुए विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा था कि इस 'आतंकी हमले' के तार सीमा पार से जुड़े हैं. यही नहीं, भारत ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कई क़दम भी उठाए. इसमें सिंधु जल समझौते का निलंबन, वीज़ा निरस्त करना और अटारी सीमा बंद करना शामिल है. पाकिस्तान के कई राजनयिकों से भी भारत छोड़ने को कहा गया

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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