क्लीन चीट मीलने के दो साल बाद भी मासूम इंसानों की रिहाई नहीं ? इसके लिए दोषी कौन ? भारत का इमानदार न्यालय ? इमान्दार जांच एजेंसियां ? या कोई और ? और वह है कौन ? दोस्तों याद कीजिये ! इतिहास के पन्नों को पलट कर उस " मुस्लिम दौरे हुकूमत " को जहाँ घंटों में होने वाले फैसले मिनटों में और महीनों के फैसले घंटों में और सालों साल के फैसले महीनों में , जरा सोंचिये के आज के इस कथित आज़ाद हिन्दुस्तान से वह दौर खराब कैसे था ? और ऐसा मुस्लिम बादशाहों की सोंच की वजह कर नहीं बल्की इस्लाम के कानून की खूबी के कारण था , आज बाग़ डोर किनके हाथों में हैं ? ये कहने की जरुरत नहीं, हाँ जिनके हाथों में हैं वह मुसलमान नहीं अब तो मान लो दोस्तो "ं इस्लाम इज द बेस्ट " कयोंकि बेगुनाहों को क़ैद और गुनाहगारों को आज़ाद रखने से भी बड़ा कोई पाप है क्या ? इसलिए अब मत सोंचीये " इस्लाम "को आइडियल मजहब मान ही लीजिये जैसा के चार महीने पूर्व दरभंगा के एक पढ़े लिखे एक " झा " ने इस्लाम को गले लगा लिया और इस बार उमीद करता हूँ के आप .......? जिस तरह केजरीवाल की पार्टी "आप " ज्वाइन करने के लिए बेताब हैं वही बेताबी इस्लाम को जोइनिङ्ग करने के लिए दिखला दीजिये और मासूम इंसानों को जेल में रखने की सोंच रखने वालों और इन्साफ देने में कोताही बरतने वालों को झटका दीजिये ! ऐसे लोगों को जैसा के दरभंगा के एक पढ़े लिखे झा ने कुछ दिनों पहले इस्लाम को गले लगा कर दिया था , और ऐसे झटकों से बदल दीजिये हिंदुस्तान को और बना दीजिये एक इमानदार हिंदुस्तान ,जहाँ जालिम बचे नहीं और मासूम फंसे नहीं ,क्या आप चाहते हैं तो कल ही से इस्लाम के बारे में अध्यन शुरू कर दीजिये और अच्छा लगे तो फिर देर ........मत कीजिये , चूंके यहाँ आप हमेशा के लिए नहीं चंद दिनों की मुसाफिर की तरह आये हैं , और इस सफ़र का कब अंत हो कौन जानता ? तब तक "यू एन आई " के हवाले से प्रकाशित खबर जिसे बिहार के एक उर्दू दैनिक पिन्दार ने दिनांक 19/1/14 को अपने पेज नंबर 6 पे छापा था आप के लिए ........ पढ़िए और समझिये इन्साफ का हाल आज़ाद हिंदुस्तान में ?

मुस्लिम नौजवानों की बाइज्जत रहे पर सी बी आई ने अपना पलड़ा झाड़ा ।
ए टी एस ने आज भी जवाब दाखिल नहीं किया ।,कार्रवाई 17 फ़रवरी 2014 तक स्थगित ।
मुंबई ,18/जनवरी 2014 ( यू एन आई ) 2006 मालेगांव बम धमाके मामले में मोक़द्मों का सामना करने वाले 9 बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को मुक़दमा से बाइज्जत बड़ी किये जाने वाली दरखास्त को उस वक़्त धक्का लगा जब इस मामले की तफ्तीश करने वाली पूर्व जांच एजेंसी सी बी आई ने मुल्जेमिन की रिहाई से सम्बंधित दाखिल किये गए अपने एक जवाब में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया के चूंकी इस मामले की आखरी तफ्तीश "एन आई ए " ने की है लिहाजा उससे राये मांगी जाए ।,वाजेह रहे की "एन आई ए " ने गुजिस्ता दिनों इस मामले में अपना जवाब दाखिल किया था और मुस्लिम नौजवानों को क्लीन चीट देते हुए उनकी अर्ज्दास्तों पर फैसला करने का अख्तियार अदालत के ऊपर छोड़ दिया था ।
एक जानिब जहां सी बी आई ने पलड़ा झाड़ने की कोशीश की है तो वहीँ दूसरी तरफ इस मामले के एक अहम फरीक ATS ने अब तक इस मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं किया ,बलके आज दुबारा पूर्व की तरह ATS के आला अफसर मोहते ने माजुरी का इज़हार करते हुए कहा कि चूँकि इस मामले के सरकारी वकील राजा ठाकड़े एक दुसरे मामले में शहर से बाहर गए हुए हैं लिहाज़ा उन्हें चार हफ़्तों की मजीद मोहलत दी जाए ,जिसे खसुसी " एन आई ए " की अदालत के जज वाई डी शिंधे ने मंजूर करते हुए मामले की कार्रवाई 17 फ़रवरी तक के लिए स्थगित कर दी ।वाजेह रहे की माले गाँव 2006 बम धमाकों के इल्जेमात के तेहत ATS ने शुरू में 9 मुस्लिम मुल्जेमिन को गिरफ्तार किया था लेकिन " एन आई " की तहकीकात और तफ्तीश और असीमानंद के एतराफे जुर्म (जुर्म की स्वीकारोक्ति )के बाद 16 नवंबर 2011 को मुंबई की खसुसी मकोका अदालत ने सात मुस्लिम मुल्जेमिन को जमानत पर रेहा कर दिया था जिसके बाद जमिअत ऑलोमा के जरिये आरोपियों ने गुजिस्ता दिनों मुक़दमे से बाइज्ज़त बड़ी किये जाने की दरखास्त दाखिल की थी लेकिन किसी न किसी वजह से ये मामला तुल ही पकड़ता चला गया और तकरीबन दो साल से जेयादः वक़्त गुजर जाने के बावजूद भी विशेष न्यालय अपना आखरी फैसला न सुना सकी और मामले की सुनवाई मुल्तवी होते हुए जाती दिखलाई पड़ रही है ।

मुल्जेमिन (आरोपी )बरी हुए तो जांच अफसर को सजा (सुप्रीम कोर्ट )




Posted on: 18-January-2014
एक फैसला जो मुझे पहली बार भाया ..............! क्या है फैसला देखिये ................... नई देहली , 8 जनवरी 2014 (एजेंसी )............................................... सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में आरोपी के बरी होने पर मामले की जांच करने वाले अफसरों को सजा दी जानी चाहिए । यही नहीं अदालत ने चाक व चौबंद जांच पर जोर दिया और हुकूमतों को कुछ रहनुमा असूल ( आदर्श असूल )भी जारी किये ,अदालत ने कहा है कि बरी होने वाले हर मामले को इन्साफ देने वाले नेजाम की नाकामी तस्लीम (स्वीकार ) किया जाना चाहिए ।अदालत ने तमाम रियासतों के होम सेक्रेटरीज को 6 महीने के अन्दर कसूरवार अफसरों के खेलाफ कार्रवाई करने के लिए मशीनरी बनाने की हेदायत दी है । जस्टिस सी के प्रसाद और जस्टिस जे एस खैबर की बेंच ने खराब जाँच की वजह से मुल्जेमीन (आरोपियों ) के बरी होने पर गहरी तशवीश जाहीर की है । बेंच ने मंगल को ये फैसला अस्मत्दरी (बलात्कार )के बाद 6 साल की बच्ची के कतल से सम्बंधित गुजरात के मामले में सुनाया है । सेशन अदालत ने मुलजिम को अंदेशे का फायेदा देते हुए बरी कर दिया था जिस पर हाई कोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी । बेंच ने रियासतों को हिदायत दी है कि जांच अफसर की लापरवाई और खराब जांच से मुल्जेमीन बरी हो जाते हैं तो कसूरवार अफसरों के खेलाफ मोहक्मये जाती की कार्रवाई (डिपार्टमेंटल एक्शन ) की जाए ..................................। ( उपरोक्त खबर उर्दू दैनिक पिन्दार दिनांक 9/1/14 में प्रकाशित हुई थी ) ये तो हुई जनाब खबर जो फैसले के बाद आई ,मगर अदालत ने उपरोक्त फैसला देते हुए क्या कार्रवाई की ये तो खबर में नहीं ,लेकिन मेरे खेयाल से कोर्ट को खुद फैसला सुनाते हुए जांच अफसरों के खेलाफ कार्रवाई कर देनी चाहिए थी , अगर ऐसा कर दी तब तो बहुत अच्छी बात और शुरुआत कही जायेगी ।कार्रवाई , कोर्ट ने सभी राज्यों के होम सेक्रेटरीज को ऐसा करने के लिए 6 महीने के अन्दर मशीनरी बनाने को कहा है , जनता को भी चाहिए के राज्यों के होम सेक्रेटरीज ने तय समय सीमा के अन्दर ऐसा किया के नहीं सूचना अधिकार अधिनियम के जरिये नजर रखे , किसी मामले में आरोपी के बरी होने की खबर पढ़ने और मिलने की सूरत मेंजांच अधिकारी के खेलाफ कार्रवाई हुई के नहीं ,ये भी सम्बंधित अधिकारी से पूछे ।


Read more at http://www.biharbroadcasting.com/blog.php#i6DjkpOOrpr6mIYP.99 - See more at: http://www.biharbroadcasting.com/blog.php#sthash.pR2KBySN.dpuf

कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या ! लम्बे समय से लंबित दंगा निरोधक कानून पास नहीं हुआ ,तब कांग्रेस के युवराज को गुस्सा क्यों नहीं आया ? मुसलमानों को रिजर्वेशन देने या रिजर्वेशन से मुस्लिम जातों को दूर रखने पर राहुल को गुस्सा क्यों नहीं आया ? क्यों वह इस पे गुफ्तगू भी करना पशंद नहीं करते ? मुस्लिम नौजवानों की बेरोकटोक गिरफ्तारी और बेक़सूर साबीत होने पर भी उनकी अदम त्वज्जहि और दोषी अफसरों के विरुद्ध नहीं हो रही कार्रवाई पर कांग्रेस के युवराज को गुस्सा क्यों नहीं आया ? ............ तुम्ही बतलाओ के हम बतलाये क्या ?



हम शुक्र करें किस का शाकी हों तो किस के हों
रहबर ने भी लूटा है रहजन ने भी लूटा है
गुजिस्ता दो हफ़्तों के दौरान मेरे पास लातादाद फोने आये , कई खतूत आये और जाती गुफ्तगू में बार बार ये जिक्र आया के आखिर मुसलमान इन्तेखाब की सियासत में जायें तो किस के साथ जाएँ ? कोई पार्टी ऐसी नहीं है जिसने धोका नहीं दिया हो , जिस की वजह से जख्म नहीं लगे हों ।बात बिलकुल दुरुस्त भी है ।जब हम सियासी मंजरनामा पर नजर दौराते हैं तो ऐसा ही पाते हैं । मुल्क में लम्बी मुद्दत तक बलके आज़ादी के बाद अब तक जेयादा तर कांग्रेस की ही हुकूमत रही और कांग्रेस के सबब ही मुसलमानों को सबसे जेयादः नुकसान का सामना करना पड़ा है । सिर्फ फसाद ही नहीं बल्कि इक्तसादी और तालीमी पेश्मांदगी के लिए भी जेयादः जिम्मेदारी उसी पर जाती है । वजह साफ़ जाहिर है की जम्हूरी नेजाम में कुछ भी करने से क़ब्ल वोटों की गिनती भी नजर में रहती है और इसी लिए बड़े वोट बैंक पर छोटे वोट बैंक को हमेशा कुर्बान किया जाता है ।इसी लिए कांग्रेस भी हमेशा मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों को खुश रखने की कोशिश में रहती है । मुसलमानों को वादों से खुश रखती है और अक्सर्यती (बहुसंख्यक)को अमल (काम)से बात सिर्फ फसाद की नहीं है बल्कि तालीमी और एक्तेसादी (आर्थिक ) शोबों में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है ,हकीकत मालुम हो जाने के बवजूद मुसलामानों को लुभाने के लिए सिर्फ वादे किये गए , "दो रोटी "फेंकने की कोशिश ! तालीमी वजीफा की तादाद और रक़म दर्ज फेहरिस्त जात और क़बायेल (एस सी ,एस टी )छात्रों के मुकाबिले में अक्लियती तोलोबा (अल्पसख्यक छात्रों )के लिए बहुत कम है ,और शराएत शख्त । अक्लियती मालयाती कमीशन से अकलियतों को जो क़र्ज़ मिलता है उस रक़म की हद बहुत कम है और शरायेत काफी शख्त , जबकि दर्ज फेहरिस्त जात और क़बाएल को मिलने वाले कर्ज की हद भी जेयादा है और शराएत भी बहुत नर्म , कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या ? कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी को गुस्सा आया इन्स्दाद बदअनवानी कानून (भ्रष्टाचार रोक थाम कानून )एक हप्ता के अन्दर आनन फानन में मंजूर हो गया , भ्रष्टाचारी नेताओं की अदम अह्लियत से सम्बंधित तजवीज (प्रस्ताव )राष्ट्रपति के दफ्तर से वापस मंग्वाली गई लेकिन तवील मुद्दत (लम्बे समय )से तातुल (लंबित ) के शिकार सम्प्रदायिक रोक थाम बिल और एंटी रायट फाॅर्स की तशकील (गठन ) के लिए युवराज को गुस्सा क्यों नहीं आया ? मुसलमानों को रिजर्वेशन देने या रिजर्वेशन से मुस्लिम जातों को दूर रखे जाने पर उनको गुस्सा क्यों नहीं आता ! क्यों वह उसपर कोई गुफ्तगू भी करना पशंद नहीं करते ? मुसलमान लड़कों की बेरोकटोक गिरफ्तारी और बेक़सूर साबित होने पर भी उनकी अदम त्वज्जहि पर कांग्रेस क्यों नहीं कोई ठोस क़दम उठाती है ? दो फिसद आबादी वाले सीखों की रजामंदी हासिल करने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री भी बना दिया गया ,फिर भी वह कांग्रस की तरफ रागिब नहीं हुए ,उनसे भी कम आबादी वाली कायेस्थ बेरादरी को कांग्रेस ने राष्टपति ,वजीरे आज़म (PM)समेत तमाम अहम् ओहदे पेश किये ,हालाकि इनके लोग "आर एस एस "और "भाजपा "नवाज है , लेकिन मुसलमान प्रधानमंत्री कांग्रेस क्यों नहीं बना पायी ? इसलिए की कांग्रेस को सिर्फ मुसलमानों का वोट चाहिए और हम यह आसानी से दे देते हैं ,बीजेपी का जिक्र नहीं करता हूँ ,कयोंकि मुसलमानों की दुश्मनी के मामले में वह कुछ छुपा के नहीं रखती ,जख्म सीधे देती है ,हमला सीधे करती है और जलील करने का कोई मौका नहीं गंवाती कयोंकि वह तो खुली दुश्मन है ,लेकिन हम तो उनका हिसाब कर रहे हैं जिन को दोस्ती का दावा है ,जो हमारे सर पर एहसान का पोटली रखते नहीं थकते , कम्युनिस्ट पार्टियां सीना थोक कर कहती है की उनहोंने बीजेपी से दुश्मनी मोल ही ली है , मुसलमानों की खातिर लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी तवील हुकूमत के दौरान फसाद भी हुए और मुसलमानों की एक्तेसादी हालत ( आर्थिक हालत) भी डगमगाई ही रही , सच्चर कमिटी ने जिन रेयासतों में मुसलमानों की हालत जेयादः खराब होने की बात कही थी उन में हैरत अंगेज तौर पर पश्चिमी बंगाल भी शामिल था..................!

बहुजन समाज पार्टी ने बहुजन की सेयासत की जिसमें मुसलमान कहीं फीट ही नहीं थे और सेकुलरिज्म के चैंपियन समाजवादी पार्टी को " यू पी " के मुसलमानों ने बड़ी मेहनत ,कुर्बानियों और हुकूमत के साथ पूरी ताक़त से सत्ता में वापस लाया लेकिन असेम्बली में जबरदस्त अक्सरियत मिलते ही उनके हौसले जवान हुए और नजर डेल्ही पर टिकी ,मुज़फ्फरनगर का फसाद हो गया ।मंजरनामा कहीं भी अहमदाबाद से मुख्तलिफ नजर नहीं आया । यहाँ तक की वजीर ए आला अखीलेश यादव को भी वहां जाने का मौका एक महीने बाद मिला । लखनऊ में बैठे दुसरे मसायेल में उलझे रहे ...........।
लोग जान बचा कर भागे तो कैम्पों में उन्हें पूछने वाला नहीं था । राजाकार तंजीमों की मदद से जो पहुँच सका वह पहुंचा बाकी लोग ठंड में कंपकपाते ,भूख से बिलकते तन ढांपने को शर्मिंदा हुए ,लेकिन सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा ।दर्जनों बच्चों की मौत हो गई और सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा , अलबत्ता ये हुआ कि हुकूमत ने दो बांस पर तिरपाल दाल कर जिंदगी बचाने का जो मौका उन फसान पीड़ितों को दिया था ,हुक्म हुआ के उन्हें उखाड़ दिया जाए , फिर पुलिस उन बे यारों मददगार (असहाय )
लोगों के सर से तिरपाल हटाने लगी और अरबाबे इक्तेदार " सफई " में नाच गाना दिखाने में मशरूफ हो गए ...............! तुम्ही बताओ की हम बतलाये क्या ? किस किस का हिसाब लीजिये ,किस किस का लेखा जोखा पेश किया जाए ....................!?

मगर कब तक ? इन सब मामलों के लिए जितने जिम्मेदार वह लोग हैं ,जितने जिम्मेदार अरबाबे सेयासत हैं उनसे कहीं जेयादः जिम्मेदार हम खुद हैं ,कयोंकि हम उंगलियाँ पकड़ कर चलने की आदी हो गए हैं ,उससे भी बढ़ कर हम मतलब परस्त ,मौका परस्त और मुफाद परस्त हो गए हैं ।नुक्सान होता है जम कर ,कटते मरते हैं तो मिल्लत और समाज की याद आती है ,लेकिन जैसे ही सकून मिलता है हम अपनी रोटी और दूसरों का चूल्हा बुझाने की कोशिश में मशरूफ हो जाते हैं तब हमें किसी भाई बहन ,बाप चाचा भतीजा की याद नहीं आती है.............और फिर भी पूछते हैं की क्या करें .भूख लगती है तो पूछते हो कि क्या करें ? खाना खाते हों न भाई ! प्यास लगती है तो पूछते हो कि क्या करें ? पानी पीते हो तो फिर इस मामले में 66 साल गुजर जाने के बाद भी आप किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुँच रहे हैं । ऐसा नहीं कि आप कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं ,बात यह है कि आप कोई फैसला करना ही नहीं चाहते हैं । जब आप कुछ करना ही नहीं चाहते हैं तो आप से कोई जबरदस्ती क्या करवा सकता है। हम आप सब की एक आदत बन गई है । हम चर्चा करते हैं ,हम बहस करते हैं लेकिन हम क़दम आगे नहीं बढाते . अमल का वक़्त आता है तो हाथ बढ़ा कर पानी भी नहीं पीना चाहते हैं ,बल्कि चाहते हैं कि कोई
पिला दे ,अगर कोई पानी पिला देता है तो उसके ममनून नहीं होते , बलके कीड़े निकालते हैं कि पानी पिलाने में जरुर उसका फायेदा होगा ,उसने गंदे हाथ से पानी पिला दिया ,उसने थोड़ा कम पानी दिया .......ऐसी बहुत सारी बातें ।

देहली के लोग बद उन्वानी से कीमतों में इजाफा से ,बिजली के बिल से ,पानी की किल्लत से परीशान थे। उन्होंने फैसला किया और पलक झपकते बड़ी पार्टी का दावा करने वाली पार्टियों को धुल चटा दिया ,यू पी में मुसलमानों ने क्या किया था ,डेल्ही के अवाम ने क्या किया सामने दिखाई दे रहा है ,फिर हम उसे देखने और समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ? क्यों अपनी हुकूमत अमली तय नहीं कर पा रहे हैं ? किस्मत को कोसने और दूसरों को मुरीद इलज़ाम ठहराने से कुछ नहीं होगा ।खुद अमल करना होगा ,और दूसरों से इमानदारी की उमीद रखने से पहले खुद इमानदार बनना होगा ,और इत्तेहाद का ढोंग करने के बजाये इत्तेहाद के लिए कोशिश करना पड़ेगा ,जिस दिन हमने सच मुच इमानदारी से इत्तेहाद की कोशिश की ,हम मुत्तहित हो जायेंगे ,और जिस दिन हम मुत्तहिद हो गए उस दिन यही पार्टीयां आप से आप की समस्या पूछेगी और वोट मांगने से पहले आपका सामस्या हल करने की कोशिश करेंगे ,लेकिन उस मुकाम तक पहुँचने के लिए हमें खुदगर्जी और नेफाक की नफ्सियात से बाहर आना होगा ।

(राशीद अहमद -अहमद कौमी तंजीम , पटना , 12 /1 /14 )

कांग्रेस के युवराज को मसलमानों के असल समस्या के निवारण के लिए गुस्सा क्यों नहीं आया ? कांग्रस ने आज तक मुस्लिम प्रधान मंत्री नहीं बनाया युवराज को गुस्सा क्यों नहीं आया ?

हम कुछ करना ही नहीं चाहते

हम शुक्र करें किस का शाकी हों तो किस के हों
रहबर ने भी लूटा है रहजन ने भी लूटा है
गुजिस्ता दो हफ़्तों के दौरान मेरे पास लातादाद फोने आये , कई खतूत आये और जाती गुफ्तगू में बार बार ये जिक्र आया के आखिर मुसलमान इन्तेखाब की सियासत में जायें तो किस के साथ जाएँ ? कोई पार्टी ऐसी नहीं है जिसने धोका नहीं दिया हो , जिस की वजह से जख्म नहीं लगे हों ।बात बिलकुल दुरुस्त भी है ।जब हम सियासी मंजरनामा पर नजर दौराते हैं तो ऐसा ही पाते हैं । मुल्क में लम्बी मुद्दत तक बलके आज़ादी के बाद अब तक जेयादा तर कांग्रेस की ही हुकूमत रही और कांग्रेस के सबब ही मुसलमानों को सबसे जेयादः नुकसान का सामना करना पड़ा है । सिर्फ फसाद ही नहीं बल्कि इक्तसादी और तालीमी पेश्मांदगी के लिए भी जेयादः जिम्मेदारी उसी पर जाती है । वजह साफ़ जाहिर है की जम्हूरी नेजाम में कुछ भी करने से क़ब्ल वोटों की गिनती भी नजर में रहती है और इसी लिए बड़े वोट बैंक पर छोटे वोट बैंक को हमेशा कुर्बान किया जाता है ।इसी लिए कांग्रेस भी हमेशा मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों को खुश रखने की कोशिश में रहती है । मुसलमानों को वादों से खुश रखती है और अक्सर्यती (बहुसंख्यक)को अमल (काम)से बात सिर्फ फसाद की नहीं है बल्कि तालीमी और एक्तेसादी (आर्थिक ) शोबों में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है ,हकीकत मालुम हो जाने के बवजूद मुसलामानों को लुभाने के लिए सिर्फ वादे किये गए , "दो रोटी "फेंकने की कोशिश ! तालीमी वजीफा की तादाद और रक़म दर्ज फेहरिस्त जात और क़बायेल (एस सी ,एस टी )छात्रों के मुकाबिले में अक्लियती तोलोबा (अल्पसख्यक छात्रों )के लिए बहुत कम है ,और शराएत शख्त । अक्लियती मालयाती कमीशन से अकलियतों को जो क़र्ज़ मिलता है उस रक़म की हद बहुत कम है और शरायेत काफी शख्त , जबकि दर्ज फेहरिस्त जात और क़बाएल को मिलने वाले कर्ज की हद भी जेयादा है और शराएत भी बहुत नर्म , कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या ? कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी को गुस्सा आया इन्स्दाद बदअनवानी कानून (भ्रष्टाचार रोक थाम कानून )एक हप्ता के अन्दर आनन फानन में मंजूर हो गया , भ्रष्टाचारी नेताओं की अदम अह्लियत से सम्बंधित तजवीज (प्रस्ताव )राष्ट्रपति के दफ्तर से वापस मंग्वाली गई लेकिन तवील मुद्दत (लम्बे समय )से तातुल (लंबित ) के शिकार सम्प्रदायिक रोक थाम बिल और एंटी रायट फाॅर्स की तशकील (गठन ) के लिए युवराज को गुस्सा क्यों नहीं आया ? मुसलमानों को रिजर्वेशन देने या रिजर्वेशन से मुस्लिम जातों को दूर रखे जाने पर उनको गुस्सा क्यों नहीं आता ! क्यों वह उसपर कोई गुफ्तगू भी करना पशंद नहीं करते ? मुसलमान लड़कों की बेरोकटोक गिरफ्तारी और बेक़सूर साबित होने पर भी उनकी अदम त्वज्जहि पर कांग्रेस क्यों नहीं कोई ठोस क़दम उठाती है ? दो फिसद आबादी वाले सीखों की रजामंदी हासिल करने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री भी बना दिया गया ,फिर भी वह कांग्रस की तरफ रागिब नहीं हुए ,उनसे भी कम आबादी वाली कायेस्थ बेरादरी को कांग्रेस ने राष्टपति ,वजीरे आज़म (PM)समेत तमाम अहम् ओहदे पेश किये ,हालाकि इनके लोग "आर एस एस "और "भाजपा "नवाज है , लेकिन मुसलमान प्रधानमंत्री कांग्रेस क्यों नहीं बना पायी ?
(राशीद अहमद -अहमद कौमी तंजीम , पटना , 12 /1 /14 )

चुनाव के समय ही क्यों याद आते हैं शिंदे को बेगुनाह मुसलमान?


चुनाव के समय ही क्यों याद आते हैं शिंदे को बेगुनाह मुसलमान?
Posted by: admin  January 13, 2014 in India, Lead Leave a comment

BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ : गुजरात के सादिक जमाल मेहतर की हत्या में शामिल आईबी अधिकारी राजेन्द्र कुमार, सुधीर कुमार, यशोवर्धन आजाद, गुरुराज सवादत्ती को सीबीआई द्वारा बचाने का आरोप लगाते हुए सादिक जमाल की हत्या की 11वीं बरसी पर रिहाई मंच ने कहा कि जब तक खुफिया विभागों के षडयंत्रकारी अधिकारी नहीं पकड़े जाएंगे तब तक देश में न तो बेगुनाह मुस्लिमों के फर्जी एनकाउंटर और फर्जी मुक़दमें रुकेंगे और न ही आतंकवादी वारदातों के असली मुजरिम पकड़े जा सकेंगे.
रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुएब ने कहा कि 2003 में सादिक जमाल मेहतर को खुफिया विभाग के अधिकारियों और मुंबई तथा गुजरात के कथित एनकाउंटर स्पेश्लिस्टों द्वारा नरेन्द्र मोदी को मारने का षडयंत्र रचने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था. जिसके कई पुख्ता सबूत होने के बावजूद सीबीआई ने आईबी अधिकारियों को आज तक गिरफ्तार नहीं किया है, इतना ही नहीं इस हत्या कांड में शामिल गुजरात पुलिस के आला अधिकारियों डीजी वंजारा और पीपी पांडे जैसे लोगों को भी दूसरे मामलों में जेल में होने के बावजूद आज तक सादिक हत्या कांड में गिरफ्तार नहीं किया गया है.
वहीं इस पूरे मामले में जांच के दौरान इस तथ्य का भी खुलासा हुआ था कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई थी, लेकिन बावजूद इसके सीबीआई ने न तो मुख्यमंत्र नरेन्द्र मोदी से और न ही तत्कालीन गृह मंत्री रहे अमित शाह से ही कोई पूछताछ की. जो साबित करता है कि आईबी अधिकारियों को बचाने और आतंकी घटनाओं के असली गुनहगारों को आजाद रखने में कांग्रेस और भाजपा दोनों एक मत हैं.
आज़मगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि आईबी ने जिस तरह मुज़फ्फरनगर दंगों के पीछे आईएसआई तो कभी आईएम तो कभी भटकल बंधुओं को जिम्मेदार बता रही है. उससे साफ हो रहा है कि जो आईबी मोदी के लिए काम करती थी वो  आजकल कभी राहुल गांधी तो कभी सांप्रदायिक हिंसा के सवालों से घिरी अखिलेश सरकार के लिए काम कर रही है.
पिछले दिनों जिस तरीके से मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और उसके बाद मुज़फ्फरनगर से राहत शिविरों को संदेह में लाया गया वो साफ करता है कि राहुल गांधी जिन्होंने कहा था कि राहत शिविरों के लोगों से आईएसआई का संपर्क है. उस बात को पुख्ता करने के लिए यह गिरफ्तारियां की जा रही है.
देश की खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां ने 2002 के बाद जिस तरीके से आतंकवाद के नाम पर गुजरात में इशरत जहां, सादिक तो कभी बाटला हाउस में बेगुनाहों का ठंडे दिमाग से क़त्ल किया कि यह सब गुजरात 2002 का बदला लेने वाले थे, आज वैसे ही हालात मुज़फ्फरनगर को लेकर बनाया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इन घटनाक्रमों के बीच कथित खुफिया सूत्रों के हवाले से इस बात का कहा जाना कि गोरखनाथ पीठ पर भी आतंकी हमले का खतरा बढ़ गया है और प्रदेश में बड़ी तादाद में आईएम के आतंकी घुस आए हैं, आईबी की नापाक साजिशों का पता चलता है कि आने वाले दिनों में जब गोरखपुर में नरेन्द्र मोदी की रैली होनी है और गणतंत्र दिवस भी आने वाला है, तब आईबी सूबे और देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए आतंकी वारदातों को अंजाम दे सकती है या फिर उन बेगुनाह मुस्लिम युवकों को जिन्हें आईबी आतंकी बता रही है और जो उन्हीं की अवैध हिरासत में हैं, को गिरफ्तार करने का दावा कर सकती है. जैसा कि पिछले दिनों होली के मौके पर लियाकत शाह की फर्जी गिरफ्तारी करके उसने किया था.
गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा राज्यों को आतंकवाद के नाम पर कैद मुस्लिम नौजवानों के मुद्दे पर स्क्रीनिंग कमेटी बनाने के लिए लिखे गए पत्र पर टिप्पणी करते हुए रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज़ आलम और राजीव यादव ने कहा कि यूपीए सरकार को बताना चाहिए कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बंद हजारों मुस्लिम युवकों की याद उसे सिर्फ विधानसभा और लोकसभा चुनाव में ही क्यों आ रही है.
उन्होंने कहा कि शिंदे को पहले देश को यह बताना चाहिए कि उन्होंने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में आईबी के अधिकारी राजेन्द्र कुमार का नाम सीबीआई की चार्जशीट में आने से बचाने के लिए क्यों आईबी और सीबीआई पर दबाव डाला. उन्होंने कहा कि यह दोहरा रवैया नहीं चल सकता है कि एक तरफ आतंकी वारदातों में लिप्त आईबी अधिकारियों को बचाने की कोशिश करें और वोट के लिए बेगुनाह मुस्लिम युवकों को छोड़ने की बात करें जो उन्हीं आईबी अधिकारियों के सांप्रदायिक षडयंत्रों का शिकार हुए हैं.
प्रवक्ताओं ने कहा कि सपा सरकार के मंत्री अहमद हसन का बयान जिसमें उन्होंने सपा सरकार में एक भी मुस्लिम नौजवान को आतंकवाद के आरोप में न गिरफ्तार करने के दावा किया था को झूठा क़रार देते हुए कहा कि इसी सरकार में 13 मई 2012 को सीतापुर के शकील, आज़मगढ़ के जमातुर फलाह मदरसे के छात्र वसीम बट व सज्जाद बट और गोरखपुर से पिछले होली के दौरान लियाकत शाह को उठाया गया. यहां तक कि शकील के परिजन इस मसले पर अबू आसिम आज़मी और जेल मंत्री व सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी से भी कई बार मिल चुके और मुख्यमंत्री के नाम कई बार ज्ञापन भी दिया है.
प्रवक्ताओं ने अहमद हसन के इस बयान को भी भ्रामक बताया जिसमें उन्होंने दावा किया था कि मुज़फ्फरनगर के पीडि़तों को सरकार ने दस-दस लाख रूपए दिए हैं. सच्चाई तो यह है कि अब भी पचास से अधिक ऐसी हत्याएं हैं जिन्हें सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा में हुई हत्या माना ही नहीं है. सपा सरकार यदि ईमानदार हैं तो 10-10 लाख रुपए मुआवजा प्राप्त लोगों की सूची जारी करे.

रिहाई मंच ने कहा कि कुछ तथाकथित मुस्लिम धर्म गुरु और सपा नेता अबू आसिम आज़मी जो बेगुनाह मौलाना खालिद की हत्या को बीमारी से हुई मौत बताते हैं और उनकी सरकार मौलाना खालिद की जिन्दगी की कीमत 6 लाख रुपए उनके चचा को देने की कोशिश करती है, वो अबू आसिम आज़मी आजकल मुज़फ्फरनगर में मुसलमानों की कीमत लगा रहे हैं. अबू आसिम आज़मी और ऐसे सरकारी मौलानावों को बताना चाहिए कि उन्होंने भाजपा के दंगाई नेताओं की गिरफ्तारी के लिए अब तक क्या किया है.

चुनाव के समय ही क्यों याद आते हैं शिंदे को बेगुनाह मुसलमान?

चुनाव के समय ही क्यों याद आते हैं शिंदे को बेगुनाह मुसलमान?

Posted by: admin  January 13, 2014 in India, Lead Leave a comment

BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ : गुजरात के सादिक जमाल मेहतर की हत्या में शामिल आईबी अधिकारी राजेन्द्र कुमार, सुधीर कुमार, यशोवर्धन आजाद, गुरुराज सवादत्ती को सीबीआई द्वारा बचाने का आरोप लगाते हुए सादिक जमाल की हत्या की 11वीं बरसी पर रिहाई मंच ने कहा कि जब तक खुफिया विभागों के षडयंत्रकारी अधिकारी नहीं पकड़े जाएंगे तब तक देश में न तो बेगुनाह मुस्लिमों के फर्जी एनकाउंटर और फर्जी मुक़दमें रुकेंगे और न ही आतंकवादी वारदातों के असली मुजरिम पकड़े जा सकेंगे.
रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुएब ने कहा कि 2003 में सादिक जमाल मेहतर को खुफिया विभाग के अधिकारियों और मुंबई तथा गुजरात के कथित एनकाउंटर स्पेश्लिस्टों द्वारा नरेन्द्र मोदी को मारने का षडयंत्र रचने के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था. जिसके कई पुख्ता सबूत होने के बावजूद सीबीआई ने आईबी अधिकारियों को आज तक गिरफ्तार नहीं किया है, इतना ही नहीं इस हत्या कांड में शामिल गुजरात पुलिस के आला अधिकारियों डीजी वंजारा और पीपी पांडे जैसे लोगों को भी दूसरे मामलों में जेल में होने के बावजूद आज तक सादिक हत्या कांड में गिरफ्तार नहीं किया गया है.
वहीं इस पूरे मामले में जांच के दौरान इस तथ्य का भी खुलासा हुआ था कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई थी, लेकिन बावजूद इसके सीबीआई ने न तो मुख्यमंत्र नरेन्द्र मोदी से और न ही तत्कालीन गृह मंत्री रहे अमित शाह से ही कोई पूछताछ की. जो साबित करता है कि आईबी अधिकारियों को बचाने और आतंकी घटनाओं के असली गुनहगारों को आजाद रखने में कांग्रेस और भाजपा दोनों एक मत हैं.
आज़मगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि आईबी ने जिस तरह मुज़फ्फरनगर दंगों के पीछे आईएसआई तो कभी आईएम तो कभी भटकल बंधुओं को जिम्मेदार बता रही है. उससे साफ हो रहा है कि जो आईबी मोदी के लिए काम करती थी वो  आजकल कभी राहुल गांधी तो कभी सांप्रदायिक हिंसा के सवालों से घिरी अखिलेश सरकार के लिए काम कर रही है.
पिछले दिनों जिस तरीके से मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और उसके बाद मुज़फ्फरनगर से राहत शिविरों को संदेह में लाया गया वो साफ करता है कि राहुल गांधी जिन्होंने कहा था कि राहत शिविरों के लोगों से आईएसआई का संपर्क है. उस बात को पुख्ता करने के लिए यह गिरफ्तारियां की जा रही है.
देश की खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां ने 2002 के बाद जिस तरीके से आतंकवाद के नाम पर गुजरात में इशरत जहां, सादिक तो कभी बाटला हाउस में बेगुनाहों का ठंडे दिमाग से क़त्ल किया कि यह सब गुजरात 2002 का बदला लेने वाले थे, आज वैसे ही हालात मुज़फ्फरनगर को लेकर बनाया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इन घटनाक्रमों के बीच कथित खुफिया सूत्रों के हवाले से इस बात का कहा जाना कि गोरखनाथ पीठ पर भी आतंकी हमले का खतरा बढ़ गया है और प्रदेश में बड़ी तादाद में आईएम के आतंकी घुस आए हैं, आईबी की नापाक साजिशों का पता चलता है कि आने वाले दिनों में जब गोरखपुर में नरेन्द्र मोदी की रैली होनी है और गणतंत्र दिवस भी आने वाला है, तब आईबी सूबे और देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए आतंकी वारदातों को अंजाम दे सकती है या फिर उन बेगुनाह मुस्लिम युवकों को जिन्हें आईबी आतंकी बता रही है और जो उन्हीं की अवैध हिरासत में हैं, को गिरफ्तार करने का दावा कर सकती है. जैसा कि पिछले दिनों होली के मौके पर लियाकत शाह की फर्जी गिरफ्तारी करके उसने किया था.
गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा राज्यों को आतंकवाद के नाम पर कैद मुस्लिम नौजवानों के मुद्दे पर स्क्रीनिंग कमेटी बनाने के लिए लिखे गए पत्र पर टिप्पणी करते हुए रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज़ आलम और राजीव यादव ने कहा कि यूपीए सरकार को बताना चाहिए कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बंद हजारों मुस्लिम युवकों की याद उसे सिर्फ विधानसभा और लोकसभा चुनाव में ही क्यों आ रही है.
उन्होंने कहा कि शिंदे को पहले देश को यह बताना चाहिए कि उन्होंने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में आईबी के अधिकारी राजेन्द्र कुमार का नाम सीबीआई की चार्जशीट में आने से बचाने के लिए क्यों आईबी और सीबीआई पर दबाव डाला. उन्होंने कहा कि यह दोहरा रवैया नहीं चल सकता है कि एक तरफ आतंकी वारदातों में लिप्त आईबी अधिकारियों को बचाने की कोशिश करें और वोट के लिए बेगुनाह मुस्लिम युवकों को छोड़ने की बात करें जो उन्हीं आईबी अधिकारियों के सांप्रदायिक षडयंत्रों का शिकार हुए हैं.
प्रवक्ताओं ने कहा कि सपा सरकार के मंत्री अहमद हसन का बयान जिसमें उन्होंने सपा सरकार में एक भी मुस्लिम नौजवान को आतंकवाद के आरोप में न गिरफ्तार करने के दावा किया था को झूठा क़रार देते हुए कहा कि इसी सरकार में 13 मई 2012 को सीतापुर के शकील, आज़मगढ़ के जमातुर फलाह मदरसे के छात्र वसीम बट व सज्जाद बट और गोरखपुर से पिछले होली के दौरान लियाकत शाह को उठाया गया. यहां तक कि शकील के परिजन इस मसले पर अबू आसिम आज़मी और जेल मंत्री व सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी से भी कई बार मिल चुके और मुख्यमंत्री के नाम कई बार ज्ञापन भी दिया है.
प्रवक्ताओं ने अहमद हसन के इस बयान को भी भ्रामक बताया जिसमें उन्होंने दावा किया था कि मुज़फ्फरनगर के पीडि़तों को सरकार ने दस-दस लाख रूपए दिए हैं. सच्चाई तो यह है कि अब भी पचास से अधिक ऐसी हत्याएं हैं जिन्हें सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा में हुई हत्या माना ही नहीं है. सपा सरकार यदि ईमानदार हैं तो 10-10 लाख रुपए मुआवजा प्राप्त लोगों की सूची जारी करे.
रिहाई मंच ने कहा कि कुछ तथाकथित मुस्लिम धर्म गुरु और सपा नेता अबू आसिम आज़मी जो बेगुनाह मौलाना खालिद की हत्या को बीमारी से हुई मौत बताते हैं और उनकी सरकार मौलाना खालिद की जिन्दगी की कीमत 6 लाख रुपए उनके चचा को देने की कोशिश करती है, वो अबू आसिम आज़मी आजकल मुज़फ्फरनगर में मुसलमानों की कीमत लगा रहे हैं. अबू आसिम आज़मी और ऐसे सरकारी मौलानावों को बताना चाहिए कि उन्होंने भाजपा के दंगाई नेताओं की गिरफ्तारी के लिए अब तक क्या किया है.

बेरोजगार को ठगने का धंधा जारी , शिक्षा विभाग की भी मिलीभगत की आशंका ।

# क्या आप 34540 Trained teachers बहाली के वक़्त 12हजार के आस पास होने वाली उर्दू टीचर के पदों के लिए उमीदवार थे / थीं  ...............?
## क्या आप से किसी वैक्ति  ने इन्साफ दिलाने के नाम पर /कोर्ट से लड़ कर इन्साफ दिलाने के नाम पर सुनहरे और हसीन ख्वाब दिखा कर पैसे लिए थे ..........?

## क्या आप वैसे लोगों के जरिये दिखाए गए सुनहरे और सब्ज ख़्वाबों पर यकीं करते हुए अपने  मेहनत और मुशक्कत की कमाई ऐसे लोगों पर एतमाद करते हुए थमा दिए थे ..........?
## क्या आप को कानून और अदालत से इन्साफ दिलाने वालों ने आपको नौकरी यानी उर्दू टीचर बनाने में कामयाब रहे ............?
क्या उनकी कानूनी लड़ाइयों के नतीजे में 50 नंबर और 100 नंबर से उर्दू पास होने वाले लोगों की बहाली हो सकी ?

अगर ऐसा वे नहीं कर सके तो आपको ऐसे लोगों से पूछना चाहिए की आपने कौन सी लड़ाई और कैसी लड़ाई लड़ी के 1200 से कुछ अधिक पदों में से करीब चार हजार के आस पास ही उर्दू के शिक्षक बहाल हो सके ?
ये भी पूछिए के आखिर ओ कौन सी लड़ाई आप ने लड़ी के 50 /और 100 नंबर से इंटर में उर्दू पढ़ने वालों को नौकरी नहीं मिली ?
जाहिर है वे ऐसा कराने में पूरी तरह नाकाम रहे , और सरकार अपनी हठधर्मी  पे अड़ी रही और अपने पैमाने के हिसाब से 200 नंबर के साथ इंटर और साथ में trained उमीदवारों को ही बहाल की , और जाहिर है ऐसे लोगों की बहाली किसी की कोशिश और काविश के नतीजे में नहीं बलके सरकार के जरिये बनाए गए पैमाना पर खरे उतरने की वजह कर हुई

## इसलिए पैसा लेने वालों को चाहिए की जिन बेरोजगारों से पैसे लिए थे , इंसानियत और मानवता का परिचय देते हुए बेरोजगारों से लिए गए पैसे वापस कर दे ।

## और उन अभियार्थियों से अनुरोध है कि  आप अपने खून पसीने की कमाई मुंगेरी लाल की तरह हसींन सपने दिखाकर जिन लोगों ने पैसे लिए थे डीमांड करें ,न देने की सूरत में हमारे वेबसाइट के पब्लिक पेज पर जिन्होंने आपसे पैसे लिए अथवा जिनको आप दिए उनके नाम व पते के साथ लिख दीजिये . www.biharbroadcasting.com वैसे लोगों को समाज के सामने बेनकाब करेगी और उर्दू मीडिया - कौमी तंजीम , पिन्दार ,फारुकी तंजीम जैसी अखबारें भी आपका साथ बखूबी के साथ अंजाम देगी .............!
## कयोंकि  हद तो तब हो गई , जैसा कुछ Urdu Trained उमिद्वारों ने बताया के कुछ लोग - 34540 बहाली में आवेदक (Applicant)नहीं होने के बावजूद 34540 पदों की हुई बहाली में 12 से कुछ अधिक सीटों पर grade pay टीचर बनाने का सपना दिखा रहे ,कुछ लोगों के जरिये उर्दू अखबारों  में ये प्रसारित कराया जा रहा के 2413 सीट खाली पड़े हुए हैं ,जिन पर जो लोग आवेदक नहीं भी थे उन्हें भी शिक्षक बनवादेंगे जबके सरकार के नियम में ये बात साफ़ तौर से लिखा था के 2006 के बाद जो लोग टीचर ट्रेंनिंग किये हैं वे पात्र नहीं होंगे , मगर कानून का हवाला देकर कुछ लोग लोग बेरोजगारों को सपना दिखा रहे .सरकार को भी चाहिए  के 2413 के आस पास जो सीट बची रह गई है ,साफ़ करे  के उन सीटों पर कौन लोग बहाल  होंगे ? fress application ली  जायेगी  या पुराने application पे ही लोगों  की बहालियाँ होंगी ? कयोंकि कुछ लोग  तरह तरह से भरम फैला रहे ,और बेचारा बेरोजगार वैसे लोगों  के जाल में फंस  जा रहे ।



Rahul Kumar

दहेज प्रताड़ना,रंगदारी के खिलाफ और भरन-पोषण के लिए दायर किए गए एक झूठा मुकदमा का अध्ययन मैंने किया और झूठे
आरोप का शिकार हुए लोगों को सहयोग भी किया।आरोप प्रथम दृष्टया देखने से ही झूठा प्रतीत होता है।

1.भरन-पोषण के लिए नियम के विरुध्द आवेदन देना

Hindu ADOPTION AND MAINTENANCE ACT,1956 (हिन्दु दत्तकग्रहण तथा भरन-पोषण
अधिनियम)की धारा 19(1) के तहत एक हिन्दु विधवा महिला अपने ससुर से भरन-पोषण
के लिए कोर्ट में आवेदन कर सकती है बशर्तेँ कि उस विधवा के पास आय का
पर्याप्त स्त्रोत ना हो।इसी कानून का धारा 19(2) के तहत ससुर भरन-पोषण
नहीं देगा जब उसके पास देने के लिए पर्याप्त सहदायिकी संपत्ति (जो संपत्ति
पिता के मरने के बाद वारिसों को बांटी जाती है) नहीं है।मतलब ससुर अपने
मासिक आय से भरन-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है।विधवा रानी देवी ने अपने
जेठ दिलीप ठाकुर और ननद मुनचुन देवी से भी भरन-पोषण लेने के लिए आवेदन दे
दिया है।ससुर के सिवाय किसी दूसरे से भरन-पोषण मांगने का अधिकार विधवा को
नहीं है।
Hindu Minority and Guardianship Act,1956(हिन्दू नाबालिगी तथा संरक्षता अधिनियम) की धारा 9(3) के तहत एक विधवा अपने नाबालिग बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक होती है और उसे नाबालिग बच्चे की संपत्ति का रक्षा करने और नाबालिग के हित में संपत्ति का उपयोग करने का अधिकार होता है।विधवा सिर्फ अपने नाबालिग बच्चे के संपत्ति का संरक्षक होती है।नाबालिग बच्चे के संपत्ति पर विधवा का स्वामित्व नहीं होता।हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के तहत विधवा की मृत पति के संपत्ति पर उसका और उसके बच्चे यानि सभी का बराबर का हिस्सा होता है।मसलन,यदि एक विधवा और उसके तीन बच्चे हैं तो चारों का 1/4 हिस्सेदारी बनता है।अपने बच्चे के हिस्से का संपत्ति का विधवा सिर्फ संरक्षक होती है।यदि रानी देवी ने भरन-पोषण के लिए CrPC का धारा 125 के तहत आवेदन दिया है तो उसे भरन-पोषण नहीं मिल सकता।क्योंकि CrPC का धारा 125 के तहत सिर्फ पत्नी अपने पति से,बच्चा अपने माता-पिता से और वृध्द माता-पिता अपने संतान से भरन-पोषण मांग सकता है।

2.दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप

(i) मृतक ललित ठाकुर की पत्नी रानी देवी अपने ससुर छेदी ठाकुर और जेठ दिलीप
ठाकुर पर ललित ठाकुर का किडनी का ईलाज कराने के लिए दहेज मांगने का आरोप
लगाया है।रानी देवी का आरोप है कि ससुर छेदी ठाकुर और जेठ दिलीप ठाकुर ने
रानी देवी से ईलाज के लिए दहेज के रुप में मांगी गई कुछ राशि और एक भैंस
नहीं देने के कारण ललित ठाकुर का सही से ईलाज नहीं कराया,जिस कारण से उसकी
मौत हो गई।
(ii) रानी देवी का आरोप स्वतः झूठा प्रतीत होता है।आखिर कोई पिता या सगा भाई
ईलाज कराने के लिए दहेज पर आश्रित कैसे हो सकता है?यदि रानी देवी का ईलाज
कराने की बात होती तो एक ससुर(छेदी ठाकुर) और एक जेठ(दिलीप ठाकुर) ईलाज
कराने के लिए दहेज पर आश्रित हो सकते थे लेकिन ललित ठाकुर का ईलाज कराने के
लिए दहेज पर ये आश्रित नहीं हो सकते।इसलिए आरोप झूठा है
(iii) आरोप के अनुसार,ईलाज के लिए दहेज में भैंस भी मांगी गई।ईलाज के लिए
त्वरित राशि चाहिए ना कि भैंस।पहले भैंस के खरीदार को खोजना पड़ेगा,फिर राशि
मिल पाएगी।तब तक ईलाज में काफी विलंब हो जाएगी।इसलिए भैंस मांगने का सवाल
ही पैदा नहीं होता।
(iv) दहेज के लिए सिर्फ रानी देवी पर ही दवाब बनाया गया।यदि ईलाज कराने जैसे अतिआवश्यक काम के लिए दहेज मांगा जाता तो इसके लिए रानी देवी के परिवार वाले पर भी दवाब बनाया जाता क्योंकि ईलाज के लिए दहेज लेना उस वक्त URGENT होता और रानी देवी के परिवार वाले पर दवाब दिए बगैर दहेज नहीं मिल सकता था और यदि URGENT था तो दहेज लेने के लिए परिवार वाले पर भी दवाब बनाया जाता।URGENT Case में सिर्फ लड़की पर दवाब बनाए जाने की बात कहना झूठा आरोप है।

3.धमकाकर रंगदारी करने का झूठा आरोप

(i)रानी देवी का आरोप है कि उसके पति ललित ठाकुर का मर जाने के बाद उसे ससुराल से भगा दिया गया।उसका भतीजा मुन्ना ठाकुर एक कागज पर रानी देवी का अंगूठा का निशान लेने का कोशिश किया जिसपर लिखा जाता कि रानी देवी स्वेच्छा से ससुराल छोड़कर जा रही है।रानी देवी ने अपने ससुर छेदी ठाकुर पर आरोप लगायी है कि छेदी ठाकुर रानी देवी का बेटा रौशन कुमार का हाथ रानी देवी के सामने पकड़कर उसे चाकू दिखा कर धमका रहा था ताकि रानी देवी अपने बेटा का जान बचाने के डर से अंगूठा का निशान कागज पर लगा दे।

(ii) रानी देवी से अंगूठा का निशान लेना काफी आसान था क्योंकि वह एक असहाय विधवा महिला थी और उसके ससुराल में सभी उसके
विरोधी थे।उसके बयान के अनुसार यदि मान लिया जाए कि उसे ससुराल से भगा दिया गया तो जब ससुराल से भगाया जा सकता है तो अंगूठा का निशान भी लिया जा सकता
है क्योंकि अंगूठा का निशान लेना ससुराल से भगाने से ज्यादा आसान है।इसलिए यदि अंगूठा का निशान नहीं लिया गया है तो इसका मतलब होता है कि उसे ससुराल
से भी नहीं भगाया गया है।इसलिए रानी देवी द्वारा अपने जेठानी विमला देवी और सास सैलू देवी और अन्य पर लगाया गया यह आरोप झूठा है कि इन लोगों ने
धक्का मारकर उसे ससुराल से भगा दिया।रानी देवी से मुन्ना ठाकुर द्वारा जबरन अंगूठा का निशान लेने की कोशिश करने की जरुरत भी नहीं पड़ती क्योंकि अपने
पुत्र रौशन कुमार का जान बचाने की डर से वह खुद अंगूठे का निशान दे देती।लेकिन मुन्ना ठाकुर द्वारा जबरन निशान लिए जाने की कोशिश करने और छेदी ठाकुर द्वारा उसके बेटे को चाकू दिखाने के बाद भी उससे अंगूठा का निशान नहीं लिया जा सका।ऐसा कैसे हो सकता है?
इससे जाहिर होता है कि रानी देवी से ना ही अंगूठा का निशान लेने का कोशिश किया गया और ना ही रौशन कुमार को चाकू दिखाया गया।

Rahul kumar  के फेसबुक वाल से 

Rahul Kumar

दहेज प्रताड़ना,रंगदारी के खिलाफ और भरन-पोषण के लिए दायर किए गए एक झूठा मुकदमा का अध्ययन मैंने किया और झूठे
आरोप का शिकार हुए लोगों को सहयोग भी किया।आरोप प्रथम दृष्टया देखने से ही झूठा प्रतीत होता है।

1.भरन-पोषण के लिए नियम के विरुध्द आवेदन देना

Hindu ADOPTION AND MAINTENANCE ACT,1956 (हिन्दु दत्तकग्रहण तथा भरन-पोषण
अधिनियम)की धारा 19(1) के तहत एक हिन्दु विधवा महिला अपने ससुर से भरन-पोषण
के लिए कोर्ट में आवेदन कर सकती है बशर्तेँ कि उस विधवा के पास आय का
पर्याप्त स्त्रोत ना हो।इसी कानून का धारा 19(2) के तहत ससुर भरन-पोषण
नहीं देगा जब उसके पास देने के लिए पर्याप्त सहदायिकी संपत्ति (जो संपत्ति
पिता के मरने के बाद वारिसों को बांटी जाती है) नहीं है।मतलब ससुर अपने
मासिक आय से भरन-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है।विधवा रानी देवी ने अपने
जेठ दिलीप ठाकुर और ननद मुनचुन देवी से भी भरन-पोषण लेने के लिए आवेदन दे
दिया है।ससुर के सिवाय किसी दूसरे से भरन-पोषण मांगने का अधिकार विधवा को
नहीं है।
Hindu Minority and Guardianship Act,1956(हिन्दू नाबालिगी तथा संरक्षता अधिनियम) की धारा 9(3) के तहत एक विधवा अपने नाबालिग बच्चे की प्राकृतिक संरक्षक होती है और उसे नाबालिग बच्चे की संपत्ति का रक्षा करने और नाबालिग के हित में संपत्ति का उपयोग करने का अधिकार होता है।विधवा सिर्फ अपने नाबालिग बच्चे के संपत्ति का संरक्षक होती है।नाबालिग बच्चे के संपत्ति पर विधवा का स्वामित्व नहीं होता।हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम,1956 के तहत विधवा की मृत पति के संपत्ति पर उसका और उसके बच्चे यानि सभी का बराबर का हिस्सा होता है।मसलन,यदि एक विधवा और उसके तीन बच्चे हैं तो चारों का 1/4 हिस्सेदारी बनता है।अपने बच्चे के हिस्से का संपत्ति का विधवा सिर्फ संरक्षक होती है।यदि रानी देवी ने भरन-पोषण के लिए CrPC का धारा 125 के तहत आवेदन दिया है तो उसे भरन-पोषण नहीं मिल सकता।क्योंकि CrPC का धारा 125 के तहत सिर्फ पत्नी अपने पति से,बच्चा अपने माता-पिता से और वृध्द माता-पिता अपने संतान से भरन-पोषण मांग सकता है।

2.दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप

(i) मृतक ललित ठाकुर की पत्नी रानी देवी अपने ससुर छेदी ठाकुर और जेठ दिलीप
ठाकुर पर ललित ठाकुर का किडनी का ईलाज कराने के लिए दहेज मांगने का आरोप
लगाया है।रानी देवी का आरोप है कि ससुर छेदी ठाकुर और जेठ दिलीप ठाकुर ने
रानी देवी से ईलाज के लिए दहेज के रुप में मांगी गई कुछ राशि और एक भैंस
नहीं देने के कारण ललित ठाकुर का सही से ईलाज नहीं कराया,जिस कारण से उसकी
मौत हो गई।
(ii) रानी देवी का आरोप स्वतः झूठा प्रतीत होता है।आखिर कोई पिता या सगा भाई
ईलाज कराने के लिए दहेज पर आश्रित कैसे हो सकता है?यदि रानी देवी का ईलाज
कराने की बात होती तो एक ससुर(छेदी ठाकुर) और एक जेठ(दिलीप ठाकुर) ईलाज
कराने के लिए दहेज पर आश्रित हो सकते थे लेकिन ललित ठाकुर का ईलाज कराने के
लिए दहेज पर ये आश्रित नहीं हो सकते।इसलिए आरोप झूठा है
(iii) आरोप के अनुसार,ईलाज के लिए दहेज में भैंस भी मांगी गई।ईलाज के लिए
त्वरित राशि चाहिए ना कि भैंस।पहले भैंस के खरीदार को खोजना पड़ेगा,फिर राशि
मिल पाएगी।तब तक ईलाज में काफी विलंब हो जाएगी।इसलिए भैंस मांगने का सवाल
ही पैदा नहीं होता।
(iv) दहेज के लिए सिर्फ रानी देवी पर ही दवाब बनाया गया।यदि ईलाज कराने जैसे अतिआवश्यक काम के लिए दहेज मांगा जाता तो इसके लिए रानी देवी के परिवार वाले पर भी दवाब बनाया जाता क्योंकि ईलाज के लिए दहेज लेना उस वक्त URGENT होता और रानी देवी के परिवार वाले पर दवाब दिए बगैर दहेज नहीं मिल सकता था और यदि URGENT था तो दहेज लेने के लिए परिवार वाले पर भी दवाब बनाया जाता।URGENT Case में सिर्फ लड़की पर दवाब बनाए जाने की बात कहना झूठा आरोप है।

3.धमकाकर रंगदारी करने का झूठा आरोप

(i)रानी देवी का आरोप है कि उसके पति ललित ठाकुर का मर जाने के बाद उसे ससुराल से भगा दिया गया।उसका भतीजा मुन्ना ठाकुर एक कागज पर रानी देवी का अंगूठा का निशान लेने का कोशिश किया जिसपर लिखा जाता कि रानी देवी स्वेच्छा से ससुराल छोड़कर जा रही है।रानी देवी ने अपने ससुर छेदी ठाकुर पर आरोप लगायी है कि छेदी ठाकुर रानी देवी का बेटा रौशन कुमार का हाथ रानी देवी के सामने पकड़कर उसे चाकू दिखा कर धमका रहा था ताकि रानी देवी अपने बेटा का जान बचाने के डर से अंगूठा का निशान कागज पर लगा दे।

(ii) रानी देवी से अंगूठा का निशान लेना काफी आसान था क्योंकि वह एक असहाय विधवा महिला थी और उसके ससुराल में सभी उसके
विरोधी थे।उसके बयान के अनुसार यदि मान लिया जाए कि उसे ससुराल से भगा दिया गया तो जब ससुराल से भगाया जा सकता है तो अंगूठा का निशान भी लिया जा सकता
है क्योंकि अंगूठा का निशान लेना ससुराल से भगाने से ज्यादा आसान है।इसलिए यदि अंगूठा का निशान नहीं लिया गया है तो इसका मतलब होता है कि उसे ससुराल
से भी नहीं भगाया गया है।इसलिए रानी देवी द्वारा अपने जेठानी विमला देवी और सास सैलू देवी और अन्य पर लगाया गया यह आरोप झूठा है कि इन लोगों ने
धक्का मारकर उसे ससुराल से भगा दिया।रानी देवी से मुन्ना ठाकुर द्वारा जबरन अंगूठा का निशान लेने की कोशिश करने की जरुरत भी नहीं पड़ती क्योंकि अपने
पुत्र रौशन कुमार का जान बचाने की डर से वह खुद अंगूठे का निशान दे देती।लेकिन मुन्ना ठाकुर द्वारा जबरन निशान लिए जाने की कोशिश करने और छेदी ठाकुर द्वारा उसके बेटे को चाकू दिखाने के बाद भी उससे अंगूठा का निशान नहीं लिया जा सका।ऐसा कैसे हो सकता है?
इससे जाहिर होता है कि रानी देवी से ना ही अंगूठा का निशान लेने का कोशिश किया गया और ना ही रौशन कुमार को चाकू दिखाया गया।

Rahul kumar  के फेसबुक वाल से 

BBC: बिहार के मोतिहारी जिला में मनरेगा के नाम पर भारी घ...

BBC: बिहार के मोतिहारी जिला में मनरेगा के नाम पर भारी घ...: मनरेगा में भारी गड़बड़ी की संभावना , फर्जी मजदूरों और फर्जी कामों को दिखलाकर करोड़ों के घपले की आशंका । मामले का संबंध पूर्वी चंपारण के कल्याण...

बिहार के मोतिहारी जिला में मनरेगा के नाम पर भारी घोटाला , फर्जी काम और फर्जी नाम पर करोड़ों का घोटाला ,ऊँची पहुँच और रुतबा के कारण नहीं हो रही कार्रवाई


मनरेगा में भारी गड़बड़ी की संभावना , फर्जी मजदूरों और फर्जी कामों को दिखलाकर करोड़ों के घपले की आशंका । मामले का संबंध पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड के मनिचाप्रा पंचायत से , इस घटना ने न केवल पुरबी चंपारण में चल रहे मनरेगा के काम और उसकी इमानदारी पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है बलके पुरे बिहार का मनरेगा के तेहत चल रहा काम जाँच के दाएरे में आ गया है .............!

मामला क्या है ................? पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड के मनीछपरा पंचायत में जिन मनरेगा मजदूरों के नाम पर पैसा की निकासी दिखलाई गई है , उन मजदूरों का सम्बन्ध उक्त पंचायत से है ही नहीं , काम भी जिन जगहों का होते रिकॉर्ड में दर्ज हैं उसका भी संबंध उपरोक्त पंचायत से नहीं । जैसे 1.एक संजय यादव - ग्राम मधुछपरा , मस्टर रोल नंबर - 662 इनके नाम पर 2070 , A/C - 90403084 , 2. दुसरे संजय यादव - -- -- मस्टर रोल नंबर 601 दिनांक 1/4/13 से 15/4/13 तक कुल 12 दिन का 1656 रुपया का भुगतान होते दिखाया गया है । मजे की बात ये है कि एक तीसरे संजय यादव भी हैं ,जिनका मस्टर रोल नंबर 483 है मजे की एक और बात है कि सम्बंधित पंचायत के लोगों से पुछ ताछ के बाद इन तीनों संजय यादव के बारे में पता नहीं चल पा रहा ? यानी जिन तीनों संजय यादव के नाम पर पैसा उठा पहली ही नजर में फर्जी साबित हो गया है , सवाल पैदा हो रहा है के आखिर जिन तीनों संजय यादव के नाम पर पैसा उठा वह आखिर कहाँ के निवासी थे ? किस जिला ,किस ब्लॉक ,और किस पंचायत के निवासी हैं ? सवाल यह भी है कि जब इन तीनों का सम्बन्ध उपरोक्त पंचायत से था ही नहीं तो फिर काम किस ने और कैसे दिया ? क्या इन तीनों संजय यादव का अपना कोई पंचायत ही नहीं था ? क्या ये तीनों संजय यादव बगैर पंचायत के निवासी थे के उनसे मनी छपरा पंचायत में काम कराया गया ? बात यहीं पे ख़त्म नहीं है दो संजय यादव मस्टर रोल 483 , दुसरे संजय यादव जिनका मस्टर रोल नंबर 602 है से same डेट में काम लेते दिखाया गया है ( 16/4/ 13 से 30 4/ 2013 )और कुल 15 दिन की मजदूरी 2070 रुपया देते हुए दिखाया गया है ! दोनों संजय यादव को काम भी same place पर करते हुए हुए दिखाया गया है यानी गोपाल छपरा ,और जानकारों की मानें तो गोपाल छपरा मनी छपरा में पंचायत में आता ही नहीं ,जानकारों ने इस बात की पुष्टी की है । ये तो मात्र उदाहरण हैं ऐसे सैकड़ो नाम और इन फर्जी नामों पर सैकड़ों फर्जी काम काम को होते हुए दिखाया गया है । सवाल पैदा होने लगा है कि आखिर इन फर्जी नामों को दिखलाकर करोड़ों रूपये की नकासी किसने की ? कौन - कौन लोग इसमें हिस्सेदार बने ? सूत्रों की मानें तो मनरेगा के घपले के पैसे से एक घोटाले बाज़ ने इतनी कमाई की के इंट निर्माण कराने की चिमनी तक खोल दी ।और ऐसा नहीं है के बिहार सरकार के आला अधिकारी नहीं जानते , तो सवाल उठना लाजमी है कि , क्या बड़े लोगों और अधिकारियों को मिली हिस्सेदारी कार्रवाई करने से रोक रही ? अगर ऐसा नहीं तो फिर इतनी देरी क्यों ?

Share0 Share0 Tweet0 0 Em

Read more at http://www.biharbroadcasting.com/blog/viewpost.php?id=30#6p3G8lRGs3JoxYw1.99

Biharbroadcasting.com - डी डी सी और डी एम मोतिहारी , ग्रामीण विकाश मंत्री और सी ऑफ़ बिहार ,एक मिनट....... प्लीज ।

Biharbroadcasting.com - डी डी सी और डी एम मोतिहारी , ग्रामीण विकाश मंत्री और सी ऑफ़ बिहार ,एक मिनट....... प्लीज ।

इस देश का निगेहबान क्या -क्या कर और करवा सकता है ? देखिये उदहारण नंबर -2

आई पी सी में धारा 511 तक का ही जिक्र ,पर पुलिस ने लगा दी 566 । जरा देखिये और खुद समझिये मुसलमानों का आरोप पुलिस के विरुद्ध लगता रहा है ,कितना दुरुस्त और सही है ? मुसलान वर्षों से कहता रहा इस्लाम और आतंकवाद दोनों का कोई ताल मेल ही नहीं ,बड़े बड़े दावे होते रहे , इस दावे को जब देश का एक इमानदार चौकीदार आईपीएस अफसर और देश का सच्चा निगेहबान हेमंत करकरे ने , जब देश और हिन्दू मुस्लिम एकता के असल दुश्मन चेहरों पर चढ़ी आतंकवाद के परदे को उठाते हुए मुसलमानों को जैसे ही क्लीन चीट दी , और मुसलमानों के आरोपों को जैसे ही सही साबित की उन्हें शहीद कर दिया गया , जिससे दुनिया खूब अच्छी तरह जानती है ..........।
लीजिये ,देखिये , पढ़िए , समझिये और सोंचिये के हमारे देश की जांच एजेंसियां और पुलिस कौन - कौन सी करतूत कर और करवा कर सकती है ?पेश है मिशाल नंबर -2 (अलोक कुमार ,दैनिक जागरण दिनांक 6/1/14) आई पी सी में धारा 511 पुलिस ने लगाईं 566. अपने कारनामों से हमेशा सुर्खी में रहने वाली पुलिस ने एक नया धमाका किया है । इंडियन पैनल कोड (आई पी सी ) में धारा 511 तक का ही उल्लेख है ,मगर पुलिस न एक मामले में लगा दी धारा 566 । यानी आई पी सी में नई धारा इजाद कर दी । इतना ही नहीं कोर्ट में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया । आरोप पत्र में आई पी सी से बाहर की धारा देखकर न्यायेधिश परीशान हो गए ,जज साहेब की परिशानी यह है कि वे किस धारा में आरोप गठित करें । पुलिसिया कारनामे से मामला न्यालय में लंबित है ।और आरोपी आर्थिक और मानसिक संकट झेल रहे हैं , 5 साल पूर्व संहौला के महेशपुर गाँव में प्रेमी युगल पकड़ा गया था । लोगों ने युवक का सर मुंडन कर कालिख पोती थी ।इस मामले में किशोर मंडल ने 9 /9/2008 को संहौला थाना में मामला दर्ज कराया था ।महेशपुर पंचायत के सरपंच ब्रजेश महाराज ,गणेश मंडल ,किसन मंडल व अजय मंडल को नामजद किया गया था ।आरोपियों पर तब धारा 341 ,342 ,323,354 ,386 ,387 ,504 ,506 ,34, लगाईं गई थी ,बाद में अनुसंधानकर्ता एस आई घन्शेयाम राय ने इसमें धारा 467 , जोड़ने के लिए सी जे एम् कोर्ट में आवेदन दिया ,न्यालय के आदेश पर राय ने मामले में उपरोक्त धारा जोड़ दी ब्रजेश व अजय को अग्रिम जमानत मिल गई थी । गणेश व किशन जेल भेजे गये थे ,पुलिस ने ब्रजेश ,गणेश ,व किशन के खेलाफ न्यालय में आरोप पत्र दाखिल किया ,ब्रजेश के मुताबिक़ अनुसंधान में आई ओ ने अरुण मंडल ,और शालिग्राम मंडल उर्फ़ शालों के नाम भी जोड़े ,दोनों को अप्राथ्मिकी आरोपी बनाया ,अरुण व सालों भी अग्रिम जमानत मिली थी ,बाद में आई ओ ने दोनों अप्राथ्मिकी आरोपियों समेत प्राथमिकी आरोपी अजय के खेलाफ अन्य धाराओं समेत धारा 566 लगा कर आरोप पत्र दाखिल कर दिया ,ख़ास बात यह है कि आरोप पत्र तभी दाखिल किया जाता है जब उसे देख कर एस एस पी अनुमति प्रदान करते हैं .........................!



उपरोक कहानी और खबर से स्पष्ट हो गया होगा कि ............ वर्दी पहनते वक़्त जो कसमें खाई जाती हैं , वो कसमें शायद याद रहते तो शायद ये नौबत न आती । मालेगांव ,मक्का मस्जिद ,हैदराबाद समझौत एक्सप्रेस और न जाने कौन कौन से एक्सप्रेस में हेमंत करकरे से खुलासे से पहले जिन अधिकारिओं ने जो कारनामे किये ,देश को गुमराह किये ,हिन्दू मुसलमानों में गलत जांच रिपोर्ट के आधार पर जो भ्रम फैलाई गई थी , इस बात की इजाज़त कौन धर्म देता है ? जब धर्म देता ही नहीं तो फिर ऐसे लोगों के विरुद्ध करवाई में कौन सी बाधाएं सामने आजाती हैं ।