SUTRO KE ANUSAR,CHAKIA POLICE(MOTIHARI)NE MANICHAPRA VILL. ME DT.15.1.13 KO CHAPEMARI KR SAIKRO TAN SARKARI CHAWAL JIS AADMI KE YAHAN SE BARAMAD KI THI,SARKARI ADHIKARIYO AUR LAMBI SEYASI PAHUCH RAKHNE WALE SAFEDPOSHO KI SANLIPTA KE KARAN MAMLE KI LIPA POTI KE PARYASH TEZ HO GAYE HAIN.SUTRO KE ANUSAR JISWAIKTI K YHAN SE SARKARI CHAWAL BARAMAD KI GAI HAI US GAO K SCHOOL ME KAI BAR CHORO NE MDM KE ANAJO PR HATH SAF KARNE KI GHATNA BHI HO CHUKI HAI JISKI FIR CHAKIA THANA, se साससससससस क्यू ME DARJ BATAI JATI HAI.POLICE KI SITHIL RAWAIYA K KARAN MAMLE KA KHULASA ABTK NA HO SAKA HAI.AB UMID JAGI THI PR PANI FIRTA DIKH RAHA HAI
ऐसे में अब संघ किस बुनियाद पर कहेगा के मैं ही असल देश भग्त हूँ ?
संघ के नेता अब और जेयदा दिन तक हमारे मुल्क के लोगों को बुरबक और बेवकूफ बनाकर अपनी उल्लू सीधा नहीं कर सकते ,क्योंके केंद्रीय गृहमंत्री के बाद केंद्रीय गृहसचिव ने संघ के दस लोगों के आतंकी कार्यों में संलिप्ता के प्रमाणों के साथ पुष्टि ने देश के जाली वफादारों की कलई खोलकर देश के सामने नंगा कर दिया अब ऐसे में अब संघ किस बुनियाद पर कहेगा के मैं ही असल देश भग्त हूँ ?
मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार का सुशासन एक बार फिर कटघेरे में खरा होता मालुम दिखाई पर रहा,वजह बना है, इस बार बिहार का education department ,बतायाजाताहै के पूर्बी चंपारणके फेन्हारा पर्खंड के श्री सुनील कुमार पासवान जो एक गरीब और अनुसूचित जाती से सम्बन्ध रखते हैं,इनसे सरकार ने 6 सालो से भी जेयदा समय तक पंचायत शिक्चक (shikchak ) के रूप में काम कराया जब बात वेतन भुगतान की आई तो उन्हें अवैध करार दिया जा रहा श्री सुनील कुमार उपरोक्त जिला एवं पर्खंड के बारा परसौनी में 2003 से ही लगातार काम करते आ रहे,इनके वेतन पे रोक साल 2006 में लगा दी गई ये कहते हु के इनका तीसरा पुनर्नियोजन नहीं हुआ इसलिए इनकी बहाली अवैध है
मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार का सुशासन एक बार फिर कटघेरे में खरा होता मालुम दिखाई पर रहा,वजह बना है, इस बार बिहार का education department ,बतायाजाताहै के पूर्बी चंपारणके फेन्हारा पर्खंड के श्री सुनील कुमार पासवान जो एक गरीब और अनुसूचित जाती से सम्बन्ध रखते हैं,इनसे सरकार ने 6 सालो से भी जेयदा समय तक पंचायत शिक्चक (shikchak ) के रूप में काम कराया जब बात वेतन भुगतान की आई तो उन्हें अवैध करार दिया जा रहा श्री सुनील कुमार उपरोक्त जिला एवं पर्खंड के बारा परसौनी में 2003 से ही लगातार काम करते आ रहे,इनके वेतन पे रोक साल 2006 में लगा दी गई ये कहते हु के इनका तीसरा पुनर्नियोजन नहीं हुआ इसलिए इनकी बहाली अवैध है
यहाँ बताते चले के जो भी शिक्चक (shikchak )para teacher के रूप में कार्ज कर रहे थे सरकार ने अपने एक आदेश
के जरिये उन्हें पंचायत shikchak मान चुकी ऐसी हालत में श्री सुनील कुमार पासवान और बाकी पंचायत shikchak अवैध किस कानून के तेहत हुए?एजुकेशन डिपार्टमेंट के अधिकारीयों को इसबात का जवाब देना होगा अगर कोई कहे के इन सभी को बहुत पहले ही हटा दिया गया था उन्हें ये साबित करना होगा के किस बुनियाद पर और हटाने का आधार क्या था? यहाँ बताते चले की पूर्व एवं वर्तमान BEO के रिपोर्ट ने साबित कर दिया है के साल 2003से 2012तक इनका काम संतोष
जनक रहा है इसकी पूष्टि स्कूल adhyakch ने भी की है ,यही रिपोर्ट त्रिअस्तरिये जाँच टीम जिसे तत्कालीन जिला पदाधिकारी ने गठित
की थी टीम के रिपोर्ट पर सवलिया निशान लगाने के साथ ही team के लोगों को भी जाँच के दाएरे में लाती है और अगर
मामले की निगरानी जाँच हुई तो टीम के लोगों को कई कारणों से
जेल जाने की नौबत तक आ सकती है ,पहली वजह तो ये है के जब DM ने जाँच टीम गठित की तो रिपोर्ट DM को ही आगे की करवाई हेतु सोंपा जाना था,मगर बताया जाता है के इस मामले में ऐसा नहीं किया गया,क्यों नहीं किया गया? मामले की जाँच कर रहे BIHAR HUMAN RIGHTS COMMISSION में उठने वाला है,जानकारों की माने तो रिपोर्ट इसलिए नहीं सोंपी गई क्योंके के जाँच team को इस बात का दर था के जाँच में ऐसा कुछ भी ठोस सबूत नहींमिल पारही थी जिससे की श्री सुनील कुमार पासवान और बाकी
पंचायतshikchako को हटाया जा सके,मगर मुखिया चुनाव 2006 की घोसना हो जाने के कारन आचार संहिता औधि में मुखिया पुत्र
और उनकी भतीजी की बहाली रद्द होने की पूरी खतरा थी ,जानकारों का मानना है के त्रिअस्तारिये जाँच टीम मिली भगत पहले से थी इसी वजह कर मुखिया और उसके रिश्तेदारों को बचाने के लिए रिपोर्ट को दबा दिया गया,अब जबके के मामले की जाँच बिहार मानवाधिकार आयोग कर रहा त्रिअस्तारिये
जाँच रिपोर्ट का समाप्त हो चूका , बिहार मानवाधिकार आयोग के
आदेश के आलोक में होरहे जाँच के बाद अपना गला फंसता देख वरिये पदाधिकारियों ने मुखिया के रिश्तेदारों की बहालियों को रद्द कर दिया है,सवाल यहाँ ये पैदा होता है के जब पूर्व BEO ने बहाली को गलत
साबित कर चुकी थी उस समय बहाली क्यों नहीं रद्द की गई ?जिस अवैध बहाली को 2007और उससे पहले रद्द होनी चाहिए थी वह
2012में क्यों हो रही ? अब जबके बहाली रद्द हो चुकी ऐसी हालत में मुखिया पर FIR दर्ज क्यों नहीं हो रही यहाँ बताते चले की
त्रिअस्तारिये जाँच टीम को और कुछ न मिला तो श्री सुनील कुमार
पासवान को मुखिया के जरिये स्कूल के प्रधानाचार्ज के जाली
hastakchar को आधार बनाकर हटाने सही साबित करना भी मुखिया
और जाँच टीम की मिली भगत को दरसा रहा,चुके संबधित HM ने
अपने hastakchar को जाली करार देते हुए
कानूनी करवाई की मांग भी की है इसके बावजूद जालसाजों पे
कारवाई का नहोना DEO ऑफिस के कारनामों को उजागर करती है
के पुरबी चम्पारण के deo ऑफिस गरीब और इमानदारों के लिए किस तरह दुश्मन की भुमिका निभाती तो दूसरी तरफ अमीर और पैसा वालों
के लिए किस तरह दोस्त की भूमिका में खरी रहती है?
सूत्रों के अनुसार अगर पुलिस गहराई से पूछ ताछ करे तो चकिया के आस पास सरकारी स्कूलों में में पिछले 7 से आठ साल में हुए तमाम मिड डे मिल की चोरी की घटनाओं पर से प्रदा उठ जाएगा,मगर ऊँची पहुँच रखने वालों पे क्या पुलिस हाथ डाल पाए गी ,ये सबसे बड़ा सवाल है ,एक RTI के आवेदन पे दिए गए जानकारी के अनुसार 10 सालों में सिर्फ मिड डे मिल की सैकरों चोरी की घटनाएं हुईं पूर्बी चंपारण में ,गिरफ्तारी सिर्फ 2 मामलों में ,इससे अंदाजा लगाया जा सकता है के इस मामले में क्या होगा?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार चकिया पुलिस(पूर्बी चंपारण) ने जिन शातिरों,जो सकारी अनाज अवैध ढंग से खरीद बिक्री करते थे ,गरीबों के बच्चों के मिड डे मिल,अन्त्योदय ,बी पी एल धारकों के अनाजों को सरकारी अधिकारियों की मिली भगत से अंजाम देते थे ,जब मामले को www .biharbroadcasting .com ने खुलासा किया तो छोड़ दिए गए लोगों को पुनः गिरफ्तार कर लिए जाने की सूचना है ,सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस ने चकिया थाना के मनीछपरा पंचायात के वार्ड नंबर एक के एक प्रभावसाली वैक्ति को दिनांक 15.01/2013 को गिरफ्तार किया ,बाद में पता नहीं क्या हुआ उसे छोड़ दिया ,इससे इलाके के लोगों में हैरत होने लगी लोग सोचने लगे की जिस आदमी के घर से जिस पुलिस ने सैकड़ों तन अनाज बरामद करती है ,और ऐसे लोगों को छोड़ देती है .तब मैंने 17.1.2013 को सोशल मीडिया पे खबर अपडेट की गई ,उसके बाद आरोपी पुनः पकर लिए गए।यहाँ बताते चले कि जब 16.01.2013 को जब थाना प्रभारी बारा चकिया से बात करने के तीन बार कोशिश की और आरोपियों के सम्बन्ध में जानने की कोशिश की ,बार बार ,दो दो घंटे का मोहलत लेते रहे,तब मुझे दाल में कुछ काला नजर आया .छेत्र के लोगों को फोन लगाकर पूछा तो पता चला के पूरा दाल ही काला है,और समझ में सारी कहानी आ चुकी थी के चकिया पुलिस बार बार दो दो घंटे के मोहलत क्यों मांग रहे? सूत्रों के अनुसार अगर पुलिस गहराई से पूछ ताछ करे तो चकिया के आस पास सरकारी स्कूलों में में पिछले 7 से आठ साल में हुए तमाम मिड डे मिल की चोरी की घटनाओं पर से प्रदा उठ जाएगा,मगर ऊँची पहुँच रखने वालों पे क्या पुलिस हाथ डाल पाए गी ,ये सबसे बड़ा सवाल है ,एक RTI के आवेदन पे दिए गए जानकारी के अनुसार 10 सालों में सिर्फ मिड डे मिल की सैकरों चोरी की घटनाएं हुईं पूर्बी चंपारण में ,गिरफ्तारी सिर्फ 2 मामलों में ,इससे अंदाजा लगाया जा सकता है के इस मामले में क्या होगा?
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पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
कुलदीप नैयर
पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
मुसलामानों के संदर्भ में भाजपा ने इस बार कम आक्रामक रुख अख्तेयार किया है .इसके दो कारण हो सकते हैं ,पहला तो यह के 2014 में होने वाले संसदीय चुनाव के बाद की स्थिति पर पार्टी की नजरें टिकीं हैं ....लोकसभा में बहुमत के लिए उसे पंथनिरपेक्ष पार्टियों के साथ की जरुरत पड़ेगी ...ऐसे में मुसलामानों के खेलाफ कोई भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है और समर्थ गठबंधन प्रस्तुत करने के मौके को खतरे में डाल सकती है .दूसरा कारण यह हो सकता है आज जब वामपंथी पार्टियां भी उदार हिंदुत्व अपनाने लगी है ,ऐसे में भाजपा उदार दिखने का साहस कर सकती है .पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार पंथनिरपेक्ष पहचान खोती जा रही है .अगर किसी प्रमाण की जरुरत है तो गुजरात का ताज़ा विधानसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है .2002 में हुए गुजरात दंगों को चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने मुद्दा नहीं बनाया .कांग्रेस ने ऐसा माना के चुनाव प्रचार के दौरान मुसलामानों की हत्या का सवाल उठाने से हिन्दू वोट खिसक जायेंगे .कांग्रेस की इस रणनीति से पुरे देश के मुसलामानों को धक्का लगा ,क्योंके कमोबेश वे कांग्रेस को वोट देते आये हैं .....ऐसे में मुसलमानों के सामने यह तै करना मुश्किल भरा काम था कि कौन सी पार्टी सेक्युलर है ?
हिन्दू आतंकवाद का मुकाबला मुस्लिम आतंकवाद नहीं कर सकती .कयोंके मुसलामानों की संख्या कम है .मई इस बात को महसूस करता हूँ की कुछ मुसलामानों ने हताशा में में हिंसा का सहारा लिया है ,लेकिन बजरंग दल,राम सेना और विश्व हिन्दू परिषद जैसे हिन्दू संगठन चाहते हैं के मुसलमान इस रास्ते को अपनाएं .मालेगांव ,अजमेर और हैदराबाद के बम विस्फोटों में कुछ हिन्दू संगठनों का दोष साबित हो चुका है .जैसा के पुलिस हमेशा किया करती है ,इन विस्फोटों को लेकर भी शुरू में शक मुसलामानों पर ही हुआ था और कुछ मुसलमान युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था ....हैदराबाद में पुलिस ने उनकी पिटाई की थी ,लेकिन विस्तार से जांच होने पर खुलासा हुआ के इन विस्फोटों के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ था ........
हकीकत में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी इस समुदाय के लिए सबसे बड़ी चिंता का वषय थी .इसके समाधान के लिए एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला .इस प्रतिनिधिमंडल में हिन्दू भी शामिल थे .प्रधानमंत्री ने कार्रवाई का आश्वासन दिया और इसके बाद मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी कम हुई ,लेकिन मुस्लिम समुदाय अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है .और अभी भी अपने मुकदमों की सुनवाई का इन्तेजार में कई मुस्लिम युवक जेलों में बंद हैं ,जिस समय का इस्तेमाल वे पढाई में या अन्य किसी उपयोगी
काम में कर सकते थे उनका वह समय जेल में बीत रहा है .अगर जवाबदेही नाम की कोई चीज होती तो पुलिस इस तरह मनमानी नहीं करती .जब कोर्ट ने देख लिया के इनके खेलाफ मामला नहीं बनता ,तब जाकर युवकों की रिहाई हुई .तो फिर आखिर गलती किसने की ?अगर इस धारणा को खात्म्कारना है के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी बिना किसी अपराध या बेवजह हुई तो दोषियों के खेलाफ कार्रवाई होनी चाहिए .हिन्दू और मुसलामानों के बीच बढ़ती दूरी को लेकर मैं ज्यादा चिंतित हूँ .सच्चाई यह है के इनके बीच सामाजिक लगाव नहीं .साथ ही आपसी समझबूझ की भी कमी ..संतोष की बात बस इतनी है के गुजरात नरसंहार के बाद कोई दूसरा बड़ा दंगा नहीं हुआ है ,लेकिन इसका ये मतलब नहीं के देश साम्प्रदाइक्तता पर काबू पाने में कामयाब हो गया है .असम ताज़ा उदहारण है .पिछले दिनों मैं केरल में था .वहाँ मैंने वामपंथियों को भी साम्प्रदाइक होते देखा .यह ऐसा राज्य है जहाँ हिन्दू और मुसलमानों की तरह मेलजोल की कीमत पर इसाई भी अपनी बांह फैला रहे हैं .हैरत की बात यह है के मजहबी वर्चस्व बढ़ने पर सर्वश्रेष्ठ आर्थिक विचारधारा भी विफल हो रही है .उत्तर प्रदेश में अनगिनत छोटे मोटे दंगे हुए हैं .मीडिया में इनकी खबरें नहीं आई हैं .सच्चाई यह है के जब तक दंगे का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आ जाता ,मीडिया में खबरें नहीं आती है .
दूसरी तरफ एक उदाहरण दिल्ली का है ,जहाँ 23 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खेलाफ सभी जाति धर्म के छात्र आगे आए बर्बरता का विरोध करने के सवाल पर वे एक हुए .और दूसरी तरफ एक गलत रास्ते से जुलूस निकलने पर तलवारें निकल आईं .सियासी तंजीमों को जब भी लगता है के इससे चुनावी या कोई और लाभ हो सकता है तो वे आग में भी घी डालने का काम करते हैं .बद्किश्मती से आजादी के 65 सालों बाद भी पंथनिरपेक्षता की जड़े मजबूत नहीं ही पाई हैं .इससे भी बड़ी समस्या ये है के समाज में सामंजस्य की भावना ही खत्म होती जा रही है .पंथनिरपेक्षता को बचाने का एक रास्ता है यह के इसे नुक्सान पहुंचाने वाले हर एक आदमी को सजा दी जाए ....लेकिन विवादित ढांचा गिराने वालों को अबतक सजा नहीं दी गई है ....इसी तरह मुस्लिम विरोधी दंगों के मामले में नरेंदर मोदी पर हाथ नहीं डाला गया है ....सहूलियत और वेयाओहारिकता आड़े आजाती है और दोषी खुले घूम रहे हैं .लेकिन कल्पना कीजिये मुसलामानों पर इसका क्या असर पड़ा है .भाजपा 1984 के दंगों में सिखों की हत्या के लिए कांग्रेस की आलोचना करती है और इसके जवाब में कांग्रेस गुजरात की घटनाओं की याद दिलाती है .बहस के लिहाज से दोनों घटनाएं अहम हैं ,लेकिन भारत की पंथनिरपेक्षता का क्या होगा ?
साम्प्रदैकता को वैधता मिलने पर मैं असहज महसूस कर रहा हूँ .अधिक से अधिक लोग उन्मादी बनते जा रहे हैं .यहाँ तक की पुलिस या दुसरे सुरक्षा बल भी इससे मुक्त नहीं हैं ,जबके अगर लोकतंत्र को जिन्दा रखना है तो नफरत आयर तरफदारी को मिटाना होगा .हैदरबाद में माहौल को साम्प्रदाइक बनाने के मकसद से अकबरुद्दीन ओवैसी ने जो भड़काऊ भाषण दिया,उसे सुनकर मई अचंभित हूँ .उसके समर्थन में भीड़ ने जो तालियाँ बजाएँ उससे उतना ही हैरान भी हूँ .भारत जैसे मुल्क में उनके लिए कोई जगह नहीं है ,कयोंके ऐसे लोग पंथनिरपेक्षता की जड़ को काट रहे हैं .सीमाएं चाहे जो भी हों ,भारत पंथनिरपेक्षता के पथ पर आगे बढ़ने को बेताब है इस असल बात से समझौता नहीं हो सकता
उपरोक्त लेख दैनिक जागरण के दिनांक 16.1.2013 में प्रकाशित अंक से लिया गया है
पंथनिरपेक्षता का धुंधला पथ
मुसलामानों के संदर्भ में भाजपा ने इस बार कम आक्रामक रुख अख्तेयार किया है .इसके दो कारण हो सकते हैं ,पहला तो यह के 2014 में होने वाले संसदीय चुनाव के बाद की स्थिति पर पार्टी की नजरें टिकीं हैं ....लोकसभा में बहुमत के लिए उसे पंथनिरपेक्ष पार्टियों के साथ की जरुरत पड़ेगी ...ऐसे में मुसलामानों के खेलाफ कोई भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है और समर्थ गठबंधन प्रस्तुत करने के मौके को खतरे में डाल सकती है .दूसरा कारण यह हो सकता है आज जब वामपंथी पार्टियां भी उदार हिंदुत्व अपनाने लगी है ,ऐसे में भाजपा उदार दिखने का साहस कर सकती है .पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार पंथनिरपेक्ष पहचान खोती जा रही है .अगर किसी प्रमाण की जरुरत है तो गुजरात का ताज़ा विधानसभा चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है .2002 में हुए गुजरात दंगों को चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने मुद्दा नहीं बनाया .कांग्रेस ने ऐसा माना के चुनाव प्रचार के दौरान मुसलामानों की हत्या का सवाल उठाने से हिन्दू वोट खिसक जायेंगे .कांग्रेस की इस रणनीति से पुरे देश के मुसलामानों को धक्का लगा ,क्योंके कमोबेश वे कांग्रेस को वोट देते आये हैं .....ऐसे में मुसलमानों के सामने यह तै करना मुश्किल भरा काम था कि कौन सी पार्टी सेक्युलर है ?
हिन्दू आतंकवाद का मुकाबला मुस्लिम आतंकवाद नहीं कर सकती .कयोंके मुसलामानों की संख्या कम है .मई इस बात को महसूस करता हूँ की कुछ मुसलामानों ने हताशा में में हिंसा का सहारा लिया है ,लेकिन बजरंग दल,राम सेना और विश्व हिन्दू परिषद जैसे हिन्दू संगठन चाहते हैं के मुसलमान इस रास्ते को अपनाएं .मालेगांव ,अजमेर और हैदराबाद के बम विस्फोटों में कुछ हिन्दू संगठनों का दोष साबित हो चुका है .जैसा के पुलिस हमेशा किया करती है ,इन विस्फोटों को लेकर भी शुरू में शक मुसलामानों पर ही हुआ था और कुछ मुसलमान युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था ....हैदराबाद में पुलिस ने उनकी पिटाई की थी ,लेकिन विस्तार से जांच होने पर खुलासा हुआ के इन विस्फोटों के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ था ........
हकीकत में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी इस समुदाय के लिए सबसे बड़ी चिंता का वषय थी .इसके समाधान के लिए एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला .इस प्रतिनिधिमंडल में हिन्दू भी शामिल थे .प्रधानमंत्री ने कार्रवाई का आश्वासन दिया और इसके बाद मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी कम हुई ,लेकिन मुस्लिम समुदाय अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है .और अभी भी अपने मुकदमों की सुनवाई का इन्तेजार में कई मुस्लिम युवक जेलों में बंद हैं ,जिस समय का इस्तेमाल वे पढाई में या अन्य किसी उपयोगी
काम में कर सकते थे उनका वह समय जेल में बीत रहा है .अगर जवाबदेही नाम की कोई चीज होती तो पुलिस इस तरह मनमानी नहीं करती .जब कोर्ट ने देख लिया के इनके खेलाफ मामला नहीं बनता ,तब जाकर युवकों की रिहाई हुई .तो फिर आखिर गलती किसने की ?अगर इस धारणा को खात्म्कारना है के मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी बिना किसी अपराध या बेवजह हुई तो दोषियों के खेलाफ कार्रवाई होनी चाहिए .हिन्दू और मुसलामानों के बीच बढ़ती दूरी को लेकर मैं ज्यादा चिंतित हूँ .सच्चाई यह है के इनके बीच सामाजिक लगाव नहीं .साथ ही आपसी समझबूझ की भी कमी ..संतोष की बात बस इतनी है के गुजरात नरसंहार के बाद कोई दूसरा बड़ा दंगा नहीं हुआ है ,लेकिन इसका ये मतलब नहीं के देश साम्प्रदाइक्तता पर काबू पाने में कामयाब हो गया है .असम ताज़ा उदहारण है .पिछले दिनों मैं केरल में था .वहाँ मैंने वामपंथियों को भी साम्प्रदाइक होते देखा .यह ऐसा राज्य है जहाँ हिन्दू और मुसलमानों की तरह मेलजोल की कीमत पर इसाई भी अपनी बांह फैला रहे हैं .हैरत की बात यह है के मजहबी वर्चस्व बढ़ने पर सर्वश्रेष्ठ आर्थिक विचारधारा भी विफल हो रही है .उत्तर प्रदेश में अनगिनत छोटे मोटे दंगे हुए हैं .मीडिया में इनकी खबरें नहीं आई हैं .सच्चाई यह है के जब तक दंगे का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आ जाता ,मीडिया में खबरें नहीं आती है .
दूसरी तरफ एक उदाहरण दिल्ली का है ,जहाँ 23 साल की लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खेलाफ सभी जाति धर्म के छात्र आगे आए बर्बरता का विरोध करने के सवाल पर वे एक हुए .और दूसरी तरफ एक गलत रास्ते से जुलूस निकलने पर तलवारें निकल आईं .सियासी तंजीमों को जब भी लगता है के इससे चुनावी या कोई और लाभ हो सकता है तो वे आग में भी घी डालने का काम करते हैं .बद्किश्मती से आजादी के 65 सालों बाद भी पंथनिरपेक्षता की जड़े मजबूत नहीं ही पाई हैं .इससे भी बड़ी समस्या ये है के समाज में सामंजस्य की भावना ही खत्म होती जा रही है .पंथनिरपेक्षता को बचाने का एक रास्ता है यह के इसे नुक्सान पहुंचाने वाले हर एक आदमी को सजा दी जाए ....लेकिन विवादित ढांचा गिराने वालों को अबतक सजा नहीं दी गई है ....इसी तरह मुस्लिम विरोधी दंगों के मामले में नरेंदर मोदी पर हाथ नहीं डाला गया है ....सहूलियत और वेयाओहारिकता आड़े आजाती है और दोषी खुले घूम रहे हैं .लेकिन कल्पना कीजिये मुसलामानों पर इसका क्या असर पड़ा है .भाजपा 1984 के दंगों में सिखों की हत्या के लिए कांग्रेस की आलोचना करती है और इसके जवाब में कांग्रेस गुजरात की घटनाओं की याद दिलाती है .बहस के लिहाज से दोनों घटनाएं अहम हैं ,लेकिन भारत की पंथनिरपेक्षता का क्या होगा ?
साम्प्रदैकता को वैधता मिलने पर मैं असहज महसूस कर रहा हूँ .अधिक से अधिक लोग उन्मादी बनते जा रहे हैं .यहाँ तक की पुलिस या दुसरे सुरक्षा बल भी इससे मुक्त नहीं हैं ,जबके अगर लोकतंत्र को जिन्दा रखना है तो नफरत आयर तरफदारी को मिटाना होगा .हैदरबाद में माहौल को साम्प्रदाइक बनाने के मकसद से अकबरुद्दीन ओवैसी ने जो भड़काऊ भाषण दिया,उसे सुनकर मई अचंभित हूँ .उसके समर्थन में भीड़ ने जो तालियाँ बजाएँ उससे उतना ही हैरान भी हूँ .भारत जैसे मुल्क में उनके लिए कोई जगह नहीं है ,कयोंके ऐसे लोग पंथनिरपेक्षता की जड़ को काट रहे हैं .सीमाएं चाहे जो भी हों ,भारत पंथनिरपेक्षता के पथ पर आगे बढ़ने को बेताब है इस असल बात से समझौता नहीं हो सकता
उपरोक्त लेख दैनिक जागरण के दिनांक 16.1.2013 में प्रकाशित अंक से लिया गया है
चोरी के सैकड़ों क्विंटल अनाज के खरीदार को पुलिस ने पकड़ा,पुलिस अगर गहराई से पूछ ताछ करेगी तो कई सफ़ेदपोश चेहरे के बेनकाब होने की संभावना जताई जारही,मगर स्थानिये पुलिस ऐसा करने के लिए तैयार है?
बारा चकिया (पूर्बी चंपारण ,बिहार)चकिया पुलिस ने दिनांक 15 .1.2013 को थाना के तेहत आने वाले मनीछपरा पंचायत के वार्ड नंबर निवासी एक वैक्ति को गिरफ्तार सरकारी चावल खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया,सूत्रों के अनुसार पुलिस ने सैकरों क्विंटल सरकारी अनाज बरामद की,आरोपी के ऊँची पहुँच और कई सफ़ेदपोश से संबंध रहने के कारण स्थानिये पुलिस पुरे मामले को दबाने की कोशिश में लगी है ,सूत्रों के अनुसार आरोपी प्रशाशन की मिलीभगत से सालों से बी पी एल , अन्तयोदय और मिड डे मील के अनाजों को सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से खरीदने का काम करता था ,लोगों का कहना है के पुलिस अगर कड़ाई से पूछ -ताछ करे तो सरकारी स्कूलों में होने वाले मीड डे मील चोरी की घटनाओं का प्रदाफ़ाश हो सकता है,पर सूत्रों की माने तो बारा चकिया पुलिस मामले को गंभीरता से लेने के मूड में नहीं,सूत्रों के अनुसार आरोपी वैक्ति के पंचायत में पिछले 10 सालों में मीड डे मील के अनाजों की कई चोरी की घटनाएं घटीं ,पर पुलिस ने गहनता से जांच करने की बजाये मामले को सूत्रहीन जान बुझकर करार देकर मामले की लीपा पोती करदी,वर्ना सूत्रों के अनुसार आरोपी बहूत पहले जेल की सलाखों में होता ....
आरोपी के बगल के एक उर्दू प्राथमिक विद्यालय दो दो बार मीड डे मील की चोरी की घटना बहूत कम अंतराल पे हुआ ,लेकिन स्थानिये पुलिस के मामले में जेयादा रुची न लेने के कारण मामले का खुलासा न हो सका,और आरोपी सालों से पुलिस की आखों से बचता रहा ,सूत्रों के अनुसार आरोपी से उसके पंचायत,और बगल के पंचायत में हुए तमाम मीड डे मील चोरी की घटनाओं के सम्बन्ध में पूछ ताछ करे तो मामले का खुलासा हो सकता है,और क्षेत्र के कई सफ़ेदपोश चेहरे बेनकाब होंगे ,लेकिन क्या पुलिस विभाग के आला अधिकारी ऐसा करने के लिए तैयार हैं
दलित के साथ जुल्म और नाइंसाफी की इससे बड़ी और क्या मिशाल हो सकती है ?
दलित जुल्म की एक मिशाल आपके सामने पेश है ,जो अंग्रेजों के जरिये ढाए गए जुल्म को भी फीका करदे
मामला बिहार के पूर्बी चंपारण से ज़ुरा हुआ है
उपरोक्त जिला के फेन्हरा ब्लॉक के बारा परसौनी पंचायत के एक ऊँची जाति के एक मुखिया ने अपने बेटे और भतीजी को बहाल कराने के लिए पहले एक दलित जाति के एक पंचायत शिक्षक श्री सुनील कुमार पासवान को एक साजिश के तहत शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों से मिलकर हटा दिया,वह भी इस प्रकार से के सुनील कुमार काम भी 6 सालों से उपर से काम भी करते रहे पर वेतन न मिला ,मगर बैक डोर से बहाल उची जाति के मुखिया के जरिये बहाल रिश्तेदारों के वेतन भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आई ,मगर श्री सुनील कुमार चुके दलित जाति से संबंध था सो इनका वेतन मिलता तो कैसे,सुनील कुमार दौरते रहे मगर न मुखिया ने इनकी सुनी न बिहार के सुशासन बाबू की वह सरकार जो दलितों और अल्पसंख्यकों के कल्याण के नाम पर सालों से हुकूमत स्थापित है ,बात जब न बनी 6 साल से भी जेयदा अर्से बीत गए,तब बिहार के मशहूर सौतंत्र पत्रकार सह मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद कौसर नदीम ने दलित सुनील कुमार को इन्साफ दिलाने के खातिर मोर्चा संभाला ,जनाब नदीम ने पुरे मामले को निष्पक्ष जांच कराने हेतु बिहार राज मानवाधिकार के अध्यक्ष श्री एस एन झा को पत्र लिखा ,
राज मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद जांच तो हुई ,पर साल बीत गए ,पर न जाने मावाधिकार आयोग भी आज तक फैसला न ले सका ,शायद ऐसे संस्थानों में भी कहीं बैठे बरी जाति कहीं सुनील कुमार पासवान के इन्साफ पाने की राह में रुकावट तो नहीं? ,ये सवाल उठने लगे हैं,कयोंके मामला इतना गंभीर ,और इन्साफ होने में इतनी देरी ? सवाल उठे भी क्यों नहीं ,जिस मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद वारिये अधिकारिओं ने जांच की ,गलत ढंग से बहाल लोगों को हटाया ,लेकिन उनके विरूद्ध आज तक एफ आई आर तक दर्ज न हुआ ,यानि ऊँची जाति के जालसाजों के साथ मरौअत और इमानदार दलितों के साथ न इंसाफी?अगर ये नाइंसाफी की मिशाल नहीं तो बिहार के सुशासन बाबू और उनके कर्ता धर्ता बताएं के ये किस बात की निशानी है .......
बात यहीं पर ख़त्म हो जाती तो कोई बात नहीं थी ,मगर अंधा कानून का ही शायद परिणाम था के मुखिया के बेटे ने एक समय में दो स्थानों पर सालों साल नौकरी भी करता रहा यानि के एक ही समय में वह डाक विभाग का मुलाजिम भी रहा और पंचायात शिक्षक भी ,जरा खुद सोंचिये के भला बगैर किसी आला अधिकारिओं की मिली भगत के संभव हो सकता था .........हम को तो कतई मुमकिन नहीं दिखता लेकिन आप लोग क्या सोंचते हैं?
मामले का सबसे मजेदार पहलू तो ये है के वारिये पदाधिकारी अपने को इस मामले में फंसता देख मुखिया के बेटे और भतीजी के वेतन भुगतान पर जब रोक लगाईं तो इन लोगों ने मुख्मंत्री के सेवा यात्रा में जाकर नाइंसाफी की गुहार लगाईं ,मगर सच्चाई सामने पहले ही आ चुकी थी सो वारिये पदाधिकारियों ने अब आगे साथ तो जरूर न दी मगर इन जालसाजों को बचाने में कोई कमी नहीं की ,मसलन प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी ने इन जालसाजों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुसंसा कर रख्खी है ,शायद ऊँची जाति और ऊँची पकड़ का ही नतीजा है के प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी के आदेश के बावजूद न तो जाल जालसाजों से रुपया ही वसूला जा सका है और न अब तक एफ आई आर ही दर्ज हो सका ,ऐसी सूरत में अब नीतीश किस मूह से कहते फिरेंगे के मैं दलित और अल्पसंख्यक प्रेमी हूँ?और हमारे प्रदेश में न्याय के साथ विकास भी हो रहा ?
4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना बिहार के पूर्बी चंपारण के बारा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की ......
Md Kaushar Nadeem shared a status.
बिहार के पूर्बी चंपारण के बरा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक 4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की www.biharbroadcasting.com......
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बिहार के पूर्बी चंपारण के बरा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक 4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की www.biharbroadcasting.com......
जालसाजों की चाँदी ? आरक्षी अधीक्षक पूर्बी चंपारण के आदेश देने के चौदह दिन बाद भी जालसाजी के एक मामले में दर्ज न हुई एफ आई आर ...
आरक्षी अधीक्षक पूर्बी चंपारण के आदेश के बावजूद जालसाजी के एक मामले में जालसाजों के खेलाफ अब तक कार्रवाई नहीं हुई है,सूत्रों के अनुसार उपरोक्त जिला के फेन्हरा थाना के गैबन्धी निवासी मुस्मात दुखनी कुंवर ने आरक्षी अधीक्षक पूर्बी चंपारण को लिखित शिकायत दिनांक 29/12/2012 को की थी के उसके नाम पर जारी इंद्रा आवास का रुपया फेन्हारा ब्लॉक के बारा परसौनी उतरी पंचायत के मुखिया और पंचायत सचिव ने जालसाजी कर रुपया गबन कर लिया है,सूत्रों के अनुसार मामला आरक्षी अधीक्षक पूर्बी चंपारण के संज्ञान में दिनांक 4/01/2012 को आया तो एफ आई आर के आदेश भी दिए,मगर न जाने अंदर की बात क्या है,के आज चौदह (14)दिन बीत जाने के बावजूद अब तक एफ आई आर न होने से कई तरह के सवाल पैदा होने लगा है .........यहाँ बता ते चले के दुखनी कुंवर के पत्र के अनुसार साल 2003-2004 में इंदरा आवास देने हेतु सरकार ने पैसा जारी किया पर उसे एक अठन्नी तक हाथ न लगी,सरकारी रिकॉर्ड में दिनांक 18/05/2004 को अंतिम भुगतान भी दिखाया गया है।
मुस्लिम नौजवानों के खेलाफ आतंकवाद का झूठा मुक़दमा
मुस्लिम नौजवानों के खेलाफ आतंकवाद का झूठा मुक़दमा
औरंगाबाद 9,जनवरी (यू एन आई ) रेयासत महाराष्ट्र के नांदेड जिला से दहशत गर्दी क्व इल्जामात के तेहत गिरफ्तार चार मुस्लिम नौजवानों की रिहाई को लेकर आज यहाँ जमिअत -उल -ओलेम (अरशद मदनी)के वकील ने सेसन कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के नक़ल पेश किया और कहा के पुलिस ने उन नौजवानों के खेलाफ दहशत गर्दी का झूठा मुक़दमा दर्ज किया है,जिसके बाद शेसन अदालत ने इस्तेगासा (अभियोजन)की भी बहस सुनी और जमनत के दरखास्त पर फैसला लेने की तारीख ..............तय की ,आरोपियों की पैरवी करने वाले वकील अधिवक्ता खिज्र पटेल ने अदालत के रूबरू सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया और कहा के प्रदेश की आतंकवाद निरोधक दस्ता ने कल आरोपियों के खेलाफ जो चार नये इल्जेमात (आरोप) लगाये हैं वह उनपर कानूनन लागु नहीं ही सकते ,कयोंके जांच एजेंसियों ने जिन धाराओं को आयेद (लागू) किया है उसका कोई सबूत नहीं है ........
उन्होंने अदालत को बताया के जांच एजेंसियों ने आरोपियों पे .... यू ए पी ए एक्ट की जो धारा लगाए हैं उसके मुताबिक़ आरोपियों का किसी संदिग्ध और प्रतिबंधित संगठन की सरगर्मी और कारवाईयों में भाग लेना जरुरी है लेकिन उपरोक्त मामलों में आरोपियों के खेलाफ ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है जिससे की ये साबित हो सके की आरोपियों का संबंध किसी संदिग्ध और प्रतिबंधित संगठन के कारवाईओं में भाग लिया हो ......सुप्रीम कोर्ट के दो मशहूर फैसलों बिनायेक सेन ,और डॉक्टर रमीज का जिक्र करते हुए बचाओ पक्ष के वकील ने अदालत को बताया के उन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा के किसी संदिग्ध संगठन का कार्यकर्ता होना इस बात का सबूत नहीं के आरोपियों उसके सरगर्मियों ,और कारवाईयों में भी शामील हों .....बचाओ पक्ष के दलील सुनने के बाद सरकारी वकील ने भी कुछ जवाज पेश किये और कहा के आरोपियों को अगर जमानत पर रिहा किया जाता है तो वह फरार हो सकते हैं या फिर उनकी रिहाई गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं .......वाजेह रहे के गुजिस्ता दिनों प्रदेश .... ए टी एस ने महाराष्ट्र के नांदेड (nander )जिला से चार मुस्लिम नौजवान आरोपियों में मुजम्मिल सादिक ,इरफ़ान ,और इल्यास को गैर कानूनी करवाई रोक थाम से सम्बंधित कानून के दफात 5,और खतरनाक हथियार रखने वाले कानून की धारा 5 के तहत गिरफ्तार किया था ,और उनपर इल्जाम लगाया था के विदेश से सम्बंधित लश्करे तैबा और हर्कतुल मुजाहेदीन नामी संगठनों से ईमेल और टेलीफोन के जरिये सम्पर्क बनाये हुए था .......और उनके पास से पुलिस ने दो रिवाल्वर भी जब्त किये थे ........
उर्दू दैनिक पिन्दार में दिनांक 10/01/2013 को प्रकाशित .........
एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं?.डी डी सी मोतिहारी ने दिए जाँच के आदेश
4/1/2013 को जब एस डी ओ बारा चकिया से जब पूछा गया के 20 दिन बीत जाने के बावजूद आगे की कार्रवाई हेतु सम्बंधित अधिकारी के पास नहीं पहुँच पाना कानूनन कितना बिहार के पूर्बी चंपारण के बारा चकिया के एस डी ओ ने ये कह कर सुशासन को कटघेरे में ला दिया है के जनता की फाइल , आवेदन जब तक चाहेगा चांप के और दबा के रखे गा ,यानी काम अपनी मर्जी से करेगा ,कानून के हिसाब से नहीं ,मामले के बारे में बताया जाता है के एक आवेदक ने जन्म प्रमाण पत्र बनाने हे तू आवेदन दिनांक 13 दिसंबर 2012 को एस डी ओ कार्यालय बारा चकिया में किया था , बीस दिनों बाद जब कल्यानपुर बी डीओ से पता किया तो बताया के अब तक उक्त आवेदन अब तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुंचा है ,साथ ही ये भी कहा के हमारे यहाँ जब किसी का आवेदन आता है तो हम उसको नहीं रोकते,उसी दिन उसको पंचायत सचिव के पास आगे की करवाई करने हेतु भेज देते हैं,लेकिन जब उनसे 20 दिन बीत जाने के बाद भी एस डी ओ कार्यालय से अबतक न आना कानून के हिसाब पूछा के कितना उचित है? ,तब बी डीओ ने कहा के जानते नहीं हैं एस डीओ ऑफीस के कर्मचारी कुछ लेन देने के लिए रोके रहता है ,लेकिन दिनांक उचित है ?तो एस डी साहब ने कहा के कानून हमको मत समझाइये ,जब कहा गया के आप खुद सोंचे 20 दिन तक आवेदन को रोके रखना आपको नहीं लगता के गलत है ?,तब उन्हों ने कहा के बिलकुल उचित है यानी जब तक जितने दिनों तक चाहेंगे जनता का आवेदन रोक के एस डी साहब अपने पास रखेंगे ,शायद लगता है एस डी ओ साहेब को कानून की परवाह नहीं।पूर्बी चंपारण के डी डी सी को जब दिनांक 8/1/2013 को पुरे मामले से औगत कराते हुए उनका मंतव लिया गया तो उन्हों ने इस इस पुरे प्रकरण की जांच कर करवाई करने की बात की ......
हजरत उमर रजिअल्लहो अन्हो ने एक मर्तबा चोर का हाथ इसलिए नहीं काटा था क्योंके कहत साली का दौर(अकाल का समय )था .......,चोरी न होने के कारण पर जब कंट्रोल नहीं था तो हाथ काटने का हुक्म(आदेश )कैसे दिया जाता .....यहाँ तो हर तरफ बलात्कार होने और करने के कारण का दरवाजा खुला हुआ है .....आस पास हर तरफ कारण खुले हुए है ऐसी सूरत में इस्लामी कानून का पहला काम सजा नहीं ,बलके उसको रोकना है ,इसलिए हिन्दुस्तान के मौजूदा समाज में सिर्फ इस्लामी सजा का मुताल्बा (मांग) करना ना काफी ,हम जब तक उन कारणों पर गौर नहीं करेंगे ,और सिर्फ आँख मुंद कर बे लेबासी ,मर्द की दादा गीरी .पुलिस का रवैया ,सरकारी बे तवज्जहि को सिर्फ जिम्मेदार मानते रहेंगे तो न हालात कंट्रोल होंगे और न रेप का मामला रुकेगा ....
अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी
जब से दिल्ली में 23 वर्षीये लड़की के साथ गैंग रपे का मामला पेश आया है ,हर तरफ से आवाज उठने लगी है ,उर्दू , हिंदी ,और अंग्रेजी मीडिया में खूब मजामीन (आर्टिकल )छप रहे हैं ,कोई आरोपी के गुप्तांग काटने की बात कर फेंकने की बात कर रहा ,तो कोई फांसी ,की सजा देने की बात कर रहा ,कोई इस्लामी कानून को लागू करने की बात कर रहा तो कोई दिल्ली में स्थित स्लम बस्तियों में गंवार मर्दों को इसका जिम्मेदार ठहरा रहा ,कोई हरयाना और पंजाब से आने वालों की जेहनियत को इसका जिम्मेदार मान रहा है तो कोई मुल्क और समाज में फहाशी ,उड़यानियत और खुलापन को इसका कारण मानकर पीड़ित औरत को ही जुर्म का दरवाजा खुला रखने वाला घोषित कर रहा है ,गर्ज के पूरा शहर ,पूरा मुल्क मोकम्मल (सम्पूर्ण )विरोध मार्च कर रहा है ,लेकिन ये प्रदर्शन किसके खेलाफ है ? प्रदर्शन क्यों हो रहा है ?और इसके पीछे मकसद क्या है ?अगर इसका मक्सद बलात्कारिओं(RAPISTS ) के बीच खौफ व दहशत पैदा करना है तो इसका नतीजा सुन्य आरहा है .क्यों के बीते दिनों में हमारे सामने अखबारों में जो रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं और जो मामले प्रकाश में सामने आये हैं ,उसके मुताबिक़ भिंडा में एक पच्चास साला एक आदमी को पकड़ा गया जो 2 कम उम्र लड़कियों के साथ रेप में संलिप्त था ,इंदौर में एक 17 साला लड़की की आबरू को चाक किया गया ,वर्दमान में तीन साल की लड़की की अस्मत कूट कर झाड़ी में खून में लथ पथ अवस्था में छोड़ दिया गया गुलबर्गा में 11 साल की लड़की का रेप हुआ इस तरह से और भी इस तरह की खबरें सामने आई ......यहाँ तक के रिपोर्ट के मुताबिक़ खुद इंडिया गेट और रायेसिना हिल पर हो रहे प्रदर्शन के बीच भी हवस के दरिन्दे सरापा एहतजाज बनी लड़कियों और औरतों को मौका पाते ही छेड़खानी से न चुके ......
1971 से रेप से सम्बंधित डिटेल के हवाले से बीते 40 सालों में 873.3% का इजाफा हुआ ,1971 में रेप का मामला 2,487 पेश आया तो बीते साल 24,206 पर पहुँच गया ,इस लिए प्रदर्शन से rapists के बीच खौफ पैदा करने की सोच रखना बेमाना (बेकार)है ......
अगर इसका मकसद सब्जबाग इन्कलाब के बाद मर्दों और औरतों के दरमयान पैदाकुर्दा कशमकश में हकूक के निस्वान (औरतों के अधिकार )के कथित संगठनों का मर्द समाज को कटघेरे में खड़ा करना है ,अगर इसका मकसद पुलिस और सरकार को इसकेलिए जिम्मेदार ठहराकर इनको निशाना बनाना है तो इन मकसद के लिए जद्दो जेहद (प्रोटेस्ट )से कोई लाभ नहीं होने वाला .,कयोंके ये मालमले को एकतरफा हल करने की कोशिश है ,जबके ये मामला कई रूपों में और परतों में फैला हुआ है ,इसके लिए पाएदार जद्दोजेहद इख्तेयार करना होगा ......आज हमारे समाज में सिर्फ रेप ही नहीं होता ,बलके रेप का खेल चलता है ,देश में औरतों और लड़कियों का अगवा बनिस्बत रेप से कहीं जेयादा है ......एक़्तेदार और सियासत की कुर्सियों पर बैठे सफ़ेद पोश के हुजूर में खुबसूरत लड़कियों का अगवा या बहला फुसलाकर पेश किया जाना समाज का ऐसा सच है के जिससे अगर पर्दा उठाया जाये तो इंसानियत काँप उठे .....अभी हाल ही में कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी राहुल गाँधी पर रेप का मुकदमा चला ,हलाके वह नाकाफी सबूत (सबूत की कमी )के कारण वह बड़ी हो गए ,मगर अन्दर की बात सामने न आ सकी .......हाल ही में IIBN -7 ने खुलासा किया के देश के दो वर्तमान MP और 6 मेंबर असेम्बली पर बलात्कार के मुक़दमे दर्ज हैं ....रिपोर्ट के मुताबिक़ कांग्रेस , BJP , SP ,BSP ने जान बुझकर ऐसे लोगों को टिकेट दिया जो रेप के आरोपी थे ......मुल्क के एक आला सियासी रहनुमा एन डी तिवारी का नाम इस मामले में काफी बदनाम रहा है ,रूपये आयर ताक़त के नाम पर कम उम्र लड़कियों के साथ जिस्मानी संबंध कायम करने के मामले में हिन्दुस्तान में सियासत और और एक्तेदार के कॉरिडोर को काफी बदनाम कर रख्खा है ......मुल्क में लड़कियों के खरीद फरोख्त बड़ी संख्या में होती है ....पुलिस के नाक के निचे से लड़कियों को बिहार,झारखण्ड ,बंगाल ,और नेपाल से खरीद कर अस्मत लुटाने की मंडी में
धकेल दिया जाता है .....इस हवाले से पुलिस का का किरदार काफी बदनाम रहा है .....कही दूर न जाएँ दिल्ली के दिल में स्थित और पुलिस पुलिस हेड कुआटर से करीब आई पी स्टेट थाना में आठ पुलिस वालों के खेलाफ मुक़दमा दर्ज है जिन पर इल्जाम है के पुलिस वालों ने एक लड़की का सामूहिक बलात्कार किया ,वह लड़की विगत आठ माह से इन्साफ के लिए भटकती फिर रही है ....दिल्ली पुलिस कमिशनर से इन्साफ की गुहार लगा रही है मगर आज तक इन पुलिस वालों के खेलाफ कारवाई शुरू नहीं हुई .......रेप की सियासत का तो मत पूछिए ,फिरकावाराना फसादात (दंगों)में अल्पसंख्यक लड़कियों का रेप बड़े पैमाने पर होता रहा है ,गुजरात में बिल्किश बानो समेत न जाने दोसेजाओं का रेप हुआ ,उनके साथ जुल्म और वहशत का नंगा नाच नचा गया ,खुद कश्मीर में हिन्दुस्तान की फ़ौज रेप में संलिप्त पाई गई है ....इंटरनेशनल people ट्रिब्यूनल ऑफ़ हुमन राइट्स और APDP ने जेंसी जेयादतियों में फ़ौज के अफसरान के बारहेरास्त मलौविश होने का इन्केसाफ किया .........जरी ......देश में हुए 30हजार से जेयादा छोटे और बड़े मामलों सम्प्रदैक दंगों में एक सर्वे के मुताबिक़ सत्तर हजार मुस्लिम औरतें सेक्सुअल और भेयानक रेप का शिकार हुईं .......तारीख और मुल्क का रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिये आज तक एक को भी इन्साफ नहीं मिला .......आज एक लड़की के रेप पर इतना हंगामा है ,होना चाहिए ,मगर क्या उन हजारों पाकीजा सिफत के रेपिस्टों को कैफारे किरदार तक पहुँचाया गया .....एक राम सिंह के जुर्म को इस कद्र तूल दिया जा रहा है ,मगर राम के नाम पर बलात्कार करने वाले हजारों बलात्कारिओं पर ख़ामोशी क्यों?दरअसल रेप के वारदात को बढ़ावा देने में समाज का किरदार किसी से कम नहीं है .......समाज ने औरत का मुकाम इस कद्र गिरा दिया है के औरत एक सेक्स की टूल और बिजिनस का सामान बनकर रह गई है .......हर प्रोडक्ट के इश्तेहार (advertisement )में औरत का जिस्म दिखाया जाता है ,यहाँ तक के साबून,सर्फ़,और सैम्फू पर अधनंगी औरतों के की तस्वीर लगाई जाती है जिसने औरत की हैसियत को और गिरा दिया है ,ऐसा लगता है के औरत के पास सिर्फ जिस्म है ,बाक़ी उसका इंसान होना ,उसकी अजमत और किरदार की बुलंदी कुछ भी नहीं है ,सिनेमा में औरतों का रेप होते या मर्दों के साथ रोमांस करते दिखाया जाता है ,,,शायद ही एक दो फिल्म हो जिसमे औरतों का दूसरा समाजी किरदार दी खाया गया हो
.वरना औरत मर्दों के बिस्तर ,समुन्दर के किनारे ,ऊँचे टीलों पर किस देती नजर आती है ....डेल्ही रेप वारदात के फ़ौरन बाद वेजारत बराए तरक्की इत्फाल व निसवां मोहतरमा कृष्णा तीरथ ने महिला मेंबर पार्लियामेंट के साथ एक मीटिंग में एलान किया के वह मरा हक्कुल बलुग लड़कों की प्रशिक्षण का राष्ट्रीय प्रोग्राम मून आकिद करेंगी ......जिसमे औरतों की इज्ज़त व एहतराम का दर्श दिया जायेगा ........ये और बड़ा अच्छा क़दम होता अगर प्रोग्राम में खूद औरतों को भी खूद की पहचान और एहतराम करने का दर्श दिया जाता ......पहले खूद की इज्ज़त करनी होती है तब जाकर कोई इज्ज़त करता है ....औरतों ने समाज के ठीकेदारों के बहलावे और फुसलावे में आकर अपना मुकाम कितना गिर रख्खा है .........
उनका लिबास जाहिर करता है के उनके पास सिर्फ दिखाने के लिए खुबसूरत जिस्म है ,बाकी सब कुछ बे मानी है ....उनका किरदार इस्तेहारों और फिल्मों में क्या होता है?हालांके सिर्फ जिस्म की नुमाइश रेप का सबब नहीं है क्योंके उपरोक्त वारदात में दो साला,और पांच साला बच्ची की जिस्म की नुनुमाइश की वजह से रेप नहीं हुआ ,बंद कमरे ,और घरों में रेप का वारदात जिस्म की नुमाइश की वजह से नहीं हॉट अलेकिन ये भी हकीकत है के नुमाइश सैतानी रगों में हिजान(जोश)पैदा करती है ,ये नुमाइश शैतान के इरादों को खोराक देती है ,ये नुमाइश इब्लिशी दरिंदों को ये फ़िक्र देती है के औरत खुबसूरत जिस्म सेवा कुछ नहीं .....रेप के मुजरिमों को रोकने के लिए सजा सख्त करने से कोई फ़ायदा नहीं होगा ,बलके असल जरुरत है सजा के खौफ को पैदा किया जाये .........
हजरत उमर रजिअल्लहो अन्हो ने एक मर्तबा चोर का हाथ इसलिए नहीं काटा था क्योंके कहत साली का दौर(अकाल का समय )था .......,चोरी न होने के कारण पर जब कंट्रोल नहीं था तो हाथ काटने का हुक्म(आदेश )कैसे दिया जाता .....यहाँ तो हर तरफ बलात्कार होने और करने के कारण का दरवाजा खुला हुआ है .....आस पास हर तरफ कारण खुले हुए है ऐसी सूरत में इस्लामी कानून का पहला काम सजा नहीं ,बलके उसको रोकना है ,इसलिए हिन्दुस्तान के मौजूदा समाज में सिर्फ इस्लामी सजा का मुताल्बा (मांग) करना ना काफी ,हम जब तक उन कारणों पर गौर नहीं करेंगे ,और सिर्फ आँख मुंद कर बे लेबासी ,मर्द की दादा गीरी .पुलिस का रवैया ,सरकारी बे तवज्जहि को सिर्फ जिम्मेदार मानते रहेंगे तो न हालात कंट्रोल होंगे और न रेप का मामला रुकेगा ....
दैनिक उर्दू पिन्दार दिनांक 31/12/2012 के अंक से लिया गया है
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