ये वही नौजवान हैं जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर स्पिनिंग मेल में आग लगाईं थी देश का असल दुश्मन कौन ? पढ़ें कहानी नंबर ( एक)

 तुम्हे याद हो के न हो ( अहमद जावेद ), उर्दू दैनिक इन्किलाब दिनांक , 9/2/14)


ये 1998 की एक खनक शाम थी । फ़रवरी की कोई तारीख थी । समाजियात ( समाज शाष्त्र )के प्रोफ़ेसर और सोशलिस्ट नेता जगदीश नारायण चौधरी समता पार्टी के टिकट पे नार्थ बिहार की एक अहम सीट से लोक सभा के लिए मैदाने इन्तिखाब में थे । खबर मिली कि एक ख़ास असेम्बली क्षेत्र से बीजेपी के कार्यकर्ता उनसे नाराज हैं । उनके करीबी साथी की राये थी की गठबंधन दल के नाराज कार्यकर्ताओं की शिकायत दूर करने की कोशिश करनी चाहिए । प्रोफ़ेसर साहेब ने पहले तो झिड़क दिया ,लेकिन बाद में बहुत समझाने बुझाने पर उनसे मिलने को तैयार हुए । इकनोमिक के मशहूर प्रोफ़ेसर और आर एस एस की जेली तंजीम " स्वदेशी जागरण मंच " के राज स्त्रिये चीफ की रहनुमाई में हम वहां पहुंचे तो शाम हो गयी थी ।

उनहोंने बताया कि हम आपको सिंह के स्थानिये अभिभावक (गार्जियन )के पास ले चलते हैं , वह मिनट भर में बुल्वालेंगे । पहले तो हमारी हैरत की इन्तहा  न रही के हम शहर के जिस दौलतमंद तरीन ताज़ीर और मशहूर शख्स के सामने बैठे हैं । यही  आर एस एस का स्थानिये सरपरस्त आला है । एक बड़े से मगर निम् तारिक ( हलके सी अंधेरे ) कमरे में साहबे खाना के अलावा हम चार पांच लोग मौजूद थे ।उनके बुलावे पर चार पांच नौजवानों का एक ग्रुप आया । बड़े मियां ने बगैर किसी तम्हीद के उनसे पूछा ! प्रोफ़ेसर साहब आप ही से मिलने आये हैं , सुना है आप उनसे नाराज हैं । क्या शिकायत है आपको उनसे ?  इतना सुन्ना था कि वह फुट पड़े : श्रीमान ! इस स्वं सेवक का अपमान हुआ है जिसने संघ और पार्टी के लिए कभी अपनी जान को जान नहीं समझी , " ये वही नौजवान हैं जिसने अपनी जान पर खेल कर स्पिनिंग मेल में आग लगाईं थी " । हमें अपने कानों पर यकीन नहीं आ रहा था ! साहबे खाना की हालत थी के काटो तो बदन से खून न निकले । प्रोफ़ेसर साहब का ब्लड प्रेसर हाई हो रहा था । वह अपने घन्शेयाम नाम के एक दलित साथी की तरफ इशारा कर रहा था जिसको इन्तेखाबी मुहीम  के दौरान प्रोफ़ेसर साहेब के किसी करीबी आदमी ने गाड़ी से उतार दिया  था ।वह अभी और कुछ बोलता उससे पहले उनके " अभिभावक  " ने घबराकर मुदाखेलत की और उन लड़कों को एहसास होगेया के यहाँ और  लोग भी मौजूद हैं । लगभग बीस साल होने को आये , मेरे जेहन में " स्पिनिंग मेल " की वह आग बार बार भड़क उठती है , जो 6 दिसंबर 1992  की आधी  रात को लगाईं गयी थी और अगली सुबह दूर दूर तक ये बात प्रचारित करवा दी गयी थी के मुसलामानों ने मेल में आग लगा दी...........................................।
इसी मुद्दत में जब भी दहशतगर्दी से जुड़ी किसी वारदात में मुस्लिम नौजवानों की अन्धाधुन गिरफ्तारियों की खबर आती या किसी दंगे से पहले भी तशद्दुद (हिंसा ) की किसी वारदात की अफवाह फैलती ,मेरी निगाहों में घंशेयाम का चेहरा फिर जाता ।मैंने पहले भी इन्ही कालमों में कई बार इस वाकेया का जीकर किया है ।

मालेगांव बोम धमाकों में साध्वी प्रज्ञा सिंह और उसके साथियों की गिरफ्तारी हुई या गुजरात के शबरी आश्रम के स्वामी असीमानंद ने इकबाले जुर्म किया तो कम अज कम मुझे इस पर यकीन करने में देर नहीं लगी के मुल्क के तुल व अर्ज़ में त्वातर के साथ रोनुमा होने वाले उन बम धमाकों के पीछे आर एस एस का हाथ है जिनके लिए नाम निहाद ( कथित ) मुस्लिम दहशतगर्दों को जिम्मेदार करार दिया जा रहा था
इस आलेख का शेष भाग बाद में ।

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