IPC में जिस दंड-व्यवस्था का प्रावधान किया गया है,उसे मैं लोगों के लिए दमनकारी और जजोँ के विवेकाधिकार पर छोड़े गए मनमानी मानता हूँ।किस अपराध को लेकर कितना सजा होना चाहिए,उसका सीधा संबंध पीड़ित,समाज या राष्ट्र को हुए हानि से होना चाहिए।इसलिए मैंने QUANTUM OF LOSS=QUANTUM OF PUNISHMENT कहा है।हम इसका निर्णय लेने के लिए जजों के विवेकाधिकार पर नहीं छोड़ सकते कि कितना सजा देना है।धनंजय चट्टर्जी के केस में एक घड़ी की चोरी के लिए धारा 380 के तहत 7 साल की सजा को सुप्रीम कोर्ट तक ने बरकरार रखा।क्या एक घड़ी की चोरी से इतना ज्यादा हानि हो गया कि सात साल की सजा दिया जाए?किसी को किसी ने एक थप्पड़ लगा दिया और 1 साल का जेल।क्या एक थप्पड़ से इतनी हानि हो गई कि 1 साल का जेल आरोपी को मिलना चाहिए? सजा का निर्धारण के पीछे सामाजिक पूर्वाग्रह,प्रतिष्ठा की अवधारणा,लोगों का प्रचलित नजरिया आदि कार्य करती है,ना कि Quantum of loss।आरोप सिध्द हो जाने के बाद इस बात के लिए बहस होना चाहिए कि कितनी हानि हुई।फिर Quantum of loss के अनुसार ही quantum of punishment होना चाहिए।
भ्रष्टाचार के मामले में,Whistle blower (आवाज उठाने वाले) को झूठा फंसाने या प्रताड़ित करने के मामले में quantum of loss सबसे ज्यादा होता है।भ्रष्टाचार के कारण ही सिस्टम गड़बड़ है और इस कारण से ना सिर्फ गरीबी,बेरोजगारी,महंगाई जैसी समस्या बढ़ती है बल्कि सिस्टम गड़बड़ रहने से बलात्कार,हत्या,अपहरण,रंगदारी आदि जैसे सारे अपराध भी बढ़ते हैं।इसलिए सारी समस्या और अपराध का जड़ भ्रष्टाचार है।इसलिए भ्रष्टाचार में उम्रकैद की सजा होना चाहिए।लेकिन सात साल से ज्यादा सजा देने का कानूनी प्रावधान ही नहीं है और जमानत देकर अपराधियों को सुप्रीम कोर्ट तक छोड़ देती है।Whistle blower को झूठा फंसाने वाले या प्रताड़ित करने वाले को फाँसी होना चाहिए।एक तो झूठा फंसाने वाला या प्रताड़ित करने वाला व्यक्ति काफी भ्रष्ट है,जिसके खिलाफ एक Whistle blower बोलता है।ऊपर से आवाज को दबाने के लिए फंसाया या प्रताड़ित किया जाता है।Whistle blower को फंसाने वाला या प्रताड़ित करने वाला भ्रष्टाचार में लिप्त होने के साथ साथ समाज में एक दहशत पैदा करता है कि उसके खिलाफ कोई बोले नहीं और झूठे फंसाए जाने या प्रताड़ित किए जाने के डर से ही लोग किसी भी अपराध या भ्रष्टाचार के खिलाफ आगे नहीं आना चाहते।
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