Indian Muslim
बड़ा गौर से सुन रहा था जमाना, ,,,,,,,,,
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते, ,,,,,,,,,
महान स्वतन्त्रता सेनानी , ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जमीन जायदाद और आलीशान मकान के आराम को छोड़ कर ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध अहिंसात्मक आंदोलन खड़ा किया जिस कारण उन्हें जेल हुई , सीमांत क्षेत्र के होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने उसे 42 वर्ष जेल में कैद बा मशक्कत रखा और फिर 42 साल के बाद जेल से बाहर आ कर हिन्दू मुस्लिम को एकजुट कर पठान जिनके खून काफी गरम होते हैं , उन्हें अहिंसात्मक आंदोलन में शामिल किया और सीमांत क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार के कब्जे की जमीन खिसक गई, क्या हम कभी खान अब्दुल गफ्फार खान को याद करते हैं, ? क्या उनकी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी जीवनी को हम पढ़ते हैं?
जब भी संघर्ष और वह भी जेल में रहकर संघर्ष करने की बात आती है, तो हम या तो महात्मा गांधी को याद करते हैं या नेल्सन मंडेला को या फिर आंग सान सू की को। गांधी को छह-सात वर्ष तक जेल में रहना पड़ा, सू की को 15 वर्ष तक और नेल्सन मंडेला को 27 वर्ष तक। लेकिन यह सब खान अब्दुल गफ्फार खान के संघर्ष के सामने कुछ नहीं, जिन्होंने अपने जीवन के पूरे 42 साल ब्रिटिश राज और फिर पाकिस्तान की जेलों में गुजार दिए। जेल में उनके समान कष्ट और यातनाएं भी किसी ने नहीं झेलीं। सरहदी सूबे की जेलों में तो अक्सर पैरों में लोहे की बेड़ी बंधी रहती थी। बादशाह खां और सीमांत गांधी जैसी उपाधियों से नवाजे गए खान अब्दुल गफ्फार खां ने अपने भाई के साथ मिलकर कभी पठान सीमा प्रांत में खुदाई खिदमतगारों की एक बड़ी अहिंसक फौज खड़ी की थी। 1942 के आंदोलन में जब गांधी के नेतृत्व के बावजूद हिन्दुस्तानी अहिंसक नहीं रह सके, तब पठानों ने अपनी अहिंसा कायम रखी। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुजदिलों का नहीं और पठान एक बहादुर कौम है, वह अहिंसा का पालन करने में समर्थ हो सकी।
अहिंसा की शिक्षा बादशाह खां ने गांधी से नहीं, कुरान से ग्रहण की थी। वह उस दौर के बाकी लोगों से ज्यादा राष्ट्रवादी थे। राजेंद्र प्रसाद जब संविधान सभा के अध्यक्ष बने, तो उनके स्वागत में आठ भाषण दिए गए। इनमें सें सात ने अंग्रेजी में बोलना उचित समझा। अकेले बादशाह खान ही थे, जो हिन्दुस्तानी में बोले। बादशाह खान ने जीवन भर कांग्रेस का साथ दिया था। आजादी की लड़ाई में पठानों ने कांग्रेस को शक्तिशाली बनाया। पठान कांग्रेस के साथ इस वायदे पर थे कि हिन्दुस्तान के आजाद होने के साथ-साथ पठानों को भी आजादी मिलेगी। पर जब समय आया, तो पठानों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान के साथ कर दिया गया।
क्या कोई ऐसा भी स्वतंत्रता सेनानी हुए जिसने जीवन के 42 वर्ष ब्रिटिश सरकार के विरोध करने की कड़ी से कड़ी सजा जेल में काटी हो?
और फिर इतने दिनों बाद जेल से निकल कर हिम्मत नहीं हारा हो?
आप अपनी बात जरूर रखें खुदा हाफिज
आपका :- फैजान तबरेजी
बड़ा गौर से सुन रहा था जमाना, ,,,,,,,,,
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते, ,,,,,,,,,
महान स्वतन्त्रता सेनानी , ख़ान अब्दुल ग़फ्फार ख़ान ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जमीन जायदाद और आलीशान मकान के आराम को छोड़ कर ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध अहिंसात्मक आंदोलन खड़ा किया जिस कारण उन्हें जेल हुई , सीमांत क्षेत्र के होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने उसे 42 वर्ष जेल में कैद बा मशक्कत रखा और फिर 42 साल के बाद जेल से बाहर आ कर हिन्दू मुस्लिम को एकजुट कर पठान जिनके खून काफी गरम होते हैं , उन्हें अहिंसात्मक आंदोलन में शामिल किया और सीमांत क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार के कब्जे की जमीन खिसक गई, क्या हम कभी खान अब्दुल गफ्फार खान को याद करते हैं, ? क्या उनकी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी जीवनी को हम पढ़ते हैं?
जब भी संघर्ष और वह भी जेल में रहकर संघर्ष करने की बात आती है, तो हम या तो महात्मा गांधी को याद करते हैं या नेल्सन मंडेला को या फिर आंग सान सू की को। गांधी को छह-सात वर्ष तक जेल में रहना पड़ा, सू की को 15 वर्ष तक और नेल्सन मंडेला को 27 वर्ष तक। लेकिन यह सब खान अब्दुल गफ्फार खान के संघर्ष के सामने कुछ नहीं, जिन्होंने अपने जीवन के पूरे 42 साल ब्रिटिश राज और फिर पाकिस्तान की जेलों में गुजार दिए। जेल में उनके समान कष्ट और यातनाएं भी किसी ने नहीं झेलीं। सरहदी सूबे की जेलों में तो अक्सर पैरों में लोहे की बेड़ी बंधी रहती थी। बादशाह खां और सीमांत गांधी जैसी उपाधियों से नवाजे गए खान अब्दुल गफ्फार खां ने अपने भाई के साथ मिलकर कभी पठान सीमा प्रांत में खुदाई खिदमतगारों की एक बड़ी अहिंसक फौज खड़ी की थी। 1942 के आंदोलन में जब गांधी के नेतृत्व के बावजूद हिन्दुस्तानी अहिंसक नहीं रह सके, तब पठानों ने अपनी अहिंसा कायम रखी। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुजदिलों का नहीं और पठान एक बहादुर कौम है, वह अहिंसा का पालन करने में समर्थ हो सकी।
अहिंसा की शिक्षा बादशाह खां ने गांधी से नहीं, कुरान से ग्रहण की थी। वह उस दौर के बाकी लोगों से ज्यादा राष्ट्रवादी थे। राजेंद्र प्रसाद जब संविधान सभा के अध्यक्ष बने, तो उनके स्वागत में आठ भाषण दिए गए। इनमें सें सात ने अंग्रेजी में बोलना उचित समझा। अकेले बादशाह खान ही थे, जो हिन्दुस्तानी में बोले। बादशाह खान ने जीवन भर कांग्रेस का साथ दिया था। आजादी की लड़ाई में पठानों ने कांग्रेस को शक्तिशाली बनाया। पठान कांग्रेस के साथ इस वायदे पर थे कि हिन्दुस्तान के आजाद होने के साथ-साथ पठानों को भी आजादी मिलेगी। पर जब समय आया, तो पठानों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान के साथ कर दिया गया।
क्या कोई ऐसा भी स्वतंत्रता सेनानी हुए जिसने जीवन के 42 वर्ष ब्रिटिश सरकार के विरोध करने की कड़ी से कड़ी सजा जेल में काटी हो?
और फिर इतने दिनों बाद जेल से निकल कर हिम्मत नहीं हारा हो?
आप अपनी बात जरूर रखें खुदा हाफिज
आपका :- फैजान तबरेजी
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