Indian Muslim
* भारत का इतिहास :: आज़ादी और उलेमा-ए-हिन्द का किरदार *
मुजाहिद के लहू से ....हिन्द की ... तामीर होती है *
फ़िक्र थी जिनको अपने जाँ की ...वो महलों में रहते थे **
1857 की जबर्दस्त शिकस्त के बाद अंग्रेजों का भारत पर पूर्ण अधिपत्य हो गया...
कहीं से विरोध का कोई आगाज़ नहीं ..हारे हुए मुजाहिद अपने घावों की देखभाल में लगे ...
लेकिन कुछ सरफरोशों की जमात अभी ऐसी थी ..जिन्होंने मिटना सिखा था ..झुकना नहीं...
और अंग्रेजी हुकुमत के इन्ही बागियों ने 1866 में देवबंद मदरसे की स्थापना की जिसका मकसद ही था
हिन्दुस्तान की धरती को इल्म की दौलत से मालामाल करना और अंग्रेज जालिमों को खदेड़ कर मुल्क से
बाहर का रास्ता दिखाना।
इस किले की बुनियाद रखनी इतनी आसान नहीं थी कई सालों की परेशानियों और मशक्कत के बाद और
काफी कुर्बानियों के बाद ये वजूद में आ सका। मौलाना कासिम नानोवती ...शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन
...मौलाना अहमद हुसैन अमरोही... मौलाना फख्रुल हसन गंगोही... मौलवी मीर मोहम्मद सादिक साहब मद्रासी..
मौलवी अब्दुल कादिर साहब.. मौलवी फ़तेह मुहम्मद थानवी.. मौलाना निहाल अहमद साहब.. मौलाना अब्दुल
लतीफ़ साहब.. मौलाना कराम्तुल्लाह साहब देहलवी... वगैरह बहुत से उलमा के खुन पसीने से इस
दारुल उलूम को सींचा गया ...।
और धीरे धीरे आजादी की बुझी हुई राख को फिर से कुरेद कुरेद कर जलाने और एक एक शख्स के दिल में
आजादी की ज्वाला को भड़काने का काम शुरू किया गया..
एक बात गौर करने वाली है ...
आज के दौर में मुसलामानों पर ऊँगली उठाने वालों कट्टरपंथियों... ..
कान खोल कर सुन लो...और तवारीख के पन्नों को इमानदारी से पलट कर देख लो ...
आजादी के दीवाने इन्ही मुसलमान आलिमों के पास बैठते थे ..
इन्हीं से लड़ने का तरीका पूछते थे ...और इन्हीं के बताये रास्ते पर चल कर अपनी रणनीतियां बनाते थे ..
और ये भी सुन लो उस दौर में कोई मुसलमान... कोई हिन्दू नहीं था ...सब आजादी के मतवाले थे...
सब हिन्दुस्तानी थे ... वो तो बहुत बाद में अंग्रजों ने अपना आखिरी दाँव फेंका था ..और यहाँ के लोगों को
मजहब और धर्म के नाम पर बाँट कर ..हिन्दुस्तान को बर्बाद किया था ..जिसका खामियाजा हम आज तक
भुगत रहे हैं और ....खुदा जाने कब तक भुगतेंगे...!!!! !
आपका भाई हिन्दोस्तानी™
* भारत का इतिहास :: आज़ादी और उलेमा-ए-हिन्द का किरदार *
मुजाहिद के लहू से ....हिन्द की ... तामीर होती है *
फ़िक्र थी जिनको अपने जाँ की ...वो महलों में रहते थे **
1857 की जबर्दस्त शिकस्त के बाद अंग्रेजों का भारत पर पूर्ण अधिपत्य हो गया...
कहीं से विरोध का कोई आगाज़ नहीं ..हारे हुए मुजाहिद अपने घावों की देखभाल में लगे ...
लेकिन कुछ सरफरोशों की जमात अभी ऐसी थी ..जिन्होंने मिटना सिखा था ..झुकना नहीं...
और अंग्रेजी हुकुमत के इन्ही बागियों ने 1866 में देवबंद मदरसे की स्थापना की जिसका मकसद ही था
हिन्दुस्तान की धरती को इल्म की दौलत से मालामाल करना और अंग्रेज जालिमों को खदेड़ कर मुल्क से
बाहर का रास्ता दिखाना।
इस किले की बुनियाद रखनी इतनी आसान नहीं थी कई सालों की परेशानियों और मशक्कत के बाद और
काफी कुर्बानियों के बाद ये वजूद में आ सका। मौलाना कासिम नानोवती ...शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन
...मौलाना अहमद हुसैन अमरोही... मौलाना फख्रुल हसन गंगोही... मौलवी मीर मोहम्मद सादिक साहब मद्रासी..
मौलवी अब्दुल कादिर साहब.. मौलवी फ़तेह मुहम्मद थानवी.. मौलाना निहाल अहमद साहब.. मौलाना अब्दुल
लतीफ़ साहब.. मौलाना कराम्तुल्लाह साहब देहलवी... वगैरह बहुत से उलमा के खुन पसीने से इस
दारुल उलूम को सींचा गया ...।
और धीरे धीरे आजादी की बुझी हुई राख को फिर से कुरेद कुरेद कर जलाने और एक एक शख्स के दिल में
आजादी की ज्वाला को भड़काने का काम शुरू किया गया..
एक बात गौर करने वाली है ...
आज के दौर में मुसलामानों पर ऊँगली उठाने वालों कट्टरपंथियों...
कान खोल कर सुन लो...और तवारीख के पन्नों को इमानदारी से पलट कर देख लो ...
आजादी के दीवाने इन्ही मुसलमान आलिमों के पास बैठते थे ..
इन्हीं से लड़ने का तरीका पूछते थे ...और इन्हीं के बताये रास्ते पर चल कर अपनी रणनीतियां बनाते थे ..
और ये भी सुन लो उस दौर में कोई मुसलमान... कोई हिन्दू नहीं था ...सब आजादी के मतवाले थे...
सब हिन्दुस्तानी थे ... वो तो बहुत बाद में अंग्रजों ने अपना आखिरी दाँव फेंका था ..और यहाँ के लोगों को
मजहब और धर्म के नाम पर बाँट कर ..हिन्दुस्तान को बर्बाद किया था ..जिसका खामियाजा हम आज तक
भुगत रहे हैं और ....खुदा जाने कब तक भुगतेंगे...!!!!
आपका भाई हिन्दोस्तानी™
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