"लंबित" या "मामलों की बकाया" जैसे शब्दों का इस्तमाल यह कहता है कि समस्या अस्थायी और अल्पकालिक है। उदाहरण के तौर पर, अगर न्यायपालिका एक साल धीमी चली है, तो संभवतः वह अगले साल तेजी से काम करके अपना निर्धारित कार्य पूरा कर सकती हैं।
लेकिन भारितीय न्यायपालिका की स्थिति ऐसी नहीं है। उसकी समस्याएं स्थायी हैं, प्रणालीगत हैं । 320 लाख मामलों की मौजूदा 'बकाया' दशकों से बनाया गया है -- न केवल न्यायाधीशों के व्यवहार द्वारा, बल्कि वकीलों, पुलिस, सरकार और आम जनता के विभिन्न व्यवहार द्वारा । एक मूल कारण है हमारे कानून और हमारे न्यायशास्त्र की संरचना । मामलों से निपटने की हमारी प्रणाली भारतीय लोगों के स्वभाव और संस्कृति के साथ बेमेल हैं।
क्या यह सब अगले महीने या साल भर में बदल सकता है ? क्या हमारे पास इन सभी कारकों को बदलने के कोई भी यथार्थवादी सुझाव या तरीके है? क्या सरकार में या न्यायपालिका में इन समस्याओं पर कोई भी अपना मन लगा रहा है ? जवाब है -- बिलकुल नहीं।
इसलिए, हमें इस "बकाया" का अस्थायी होने का नाटक बंद कर देना चाहिए। यह सब स्थायी है, और यह तेजी से बढ़ रहा है। बकाया के बोझ के नीचे न्यायपालिका ढह गई है, किसी ब्रिटिश युग की पुरानी इमारत की तरह।
हमें "लंबित" जैसे झुटे शब्दों का प्रयोग बंद करना छाहिये। अपनी समस्याओं के वास्तविक स्वरूप को नकारना बंद करना चाहिए। हमारी न्यायपालिका ध्वस्त हो गई है, हम गर्दन गहरी मल में हैं -- बिलकुल उसी तरह जैसे कि भारत के सारे शौचालय ध्वस्त हो गए हों। अगर हम सचमुच बदलाव चाहते हैं, तो हमें इस बात को स्वीकार करना ही होगा।
लेकिन भारितीय न्यायपालिका की स्थिति ऐसी नहीं है। उसकी समस्याएं स्थायी हैं, प्रणालीगत हैं । 320 लाख मामलों की मौजूदा 'बकाया' दशकों से बनाया गया है -- न केवल न्यायाधीशों के व्यवहार द्वारा, बल्कि वकीलों, पुलिस, सरकार और आम जनता के विभिन्न व्यवहार द्वारा । एक मूल कारण है हमारे कानून और हमारे न्यायशास्त्र की संरचना । मामलों से निपटने की हमारी प्रणाली भारतीय लोगों के स्वभाव और संस्कृति के साथ बेमेल हैं।
क्या यह सब अगले महीने या साल भर में बदल सकता है ? क्या हमारे पास इन सभी कारकों को बदलने के कोई भी यथार्थवादी सुझाव या तरीके है? क्या सरकार में या न्यायपालिका में इन समस्याओं पर कोई भी अपना मन लगा रहा है ? जवाब है -- बिलकुल नहीं।
इसलिए, हमें इस "बकाया" का अस्थायी होने का नाटक बंद कर देना चाहिए। यह सब स्थायी है, और यह तेजी से बढ़ रहा है। बकाया के बोझ के नीचे न्यायपालिका ढह गई है, किसी ब्रिटिश युग की पुरानी इमारत की तरह।
हमें "लंबित" जैसे झुटे शब्दों का प्रयोग बंद करना छाहिये। अपनी समस्याओं के वास्तविक स्वरूप को नकारना बंद करना चाहिए। हमारी न्यायपालिका ध्वस्त हो गई है, हम गर्दन गहरी मल में हैं -- बिलकुल उसी तरह जैसे कि भारत के सारे शौचालय ध्वस्त हो गए हों। अगर हम सचमुच बदलाव चाहते हैं, तो हमें इस बात को स्वीकार करना ही होगा।
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