झूट के पैर नहीं होते ?
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जिसने भी ये मिसाल गढ़ी है उसे शायद भगवा ब्रिगेड से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। झूठ को सच कैसे बनाया जाये और सिर्फ बनाया ही नहीं जाए बल्कि उसको इस हद तक बोला जाए कि वो एक शाश्वत सत्य का रूप ले ले ये कारनामा सिर्फ इन्ही लोगों के बूते की बात है।
एक बानगी देखिये।
हापुड़ के नज़दीक का एक गाँव , उसमे रहने वाला एक गरीब परिवार , उस परिवार में एक युवा लड़की। कुछ लोगों ने परिवार की गरीबी पर तरस खाकर उस लड़की को एक मदरसे में हिन्दी और इंग्लिश पढ़ाने के लिए रखवा दिया। मदरसे में पढ़ाने वाला एक और टीचर। उस गरीब लड़की और लड़के में प्यार हो गया.यानि एक ऐसा लगाव जो धर्म और मज़हब नहीं देखता , उंच -नीच और सामाजिक बन्धन नहीं देखता। और हमारे देश में ये कोई अनहोनी है भी नहीं। ऐसा होता आया है और होता रहेगा।
आगे चलिए। लड़का लड़की को लेकर फरार हो जाता है। लड़की खामोश है। लड़का और लड़की दोनों साथ रहने लगते हैं। लड़की खामोश है। दोनों रज़ामंदी से शादी करने का फैसला कर लेते हैं। अब चूँकि हिंदुस्तान में पति का धर्म ही पत्नी का भी स्वाभाविक धर्म होता है इसलिए लड़की मुसलमान बन जाती है और दोनों निकाह कर लेते हैं। यहाँ भी सारा काम दोनों की मर्ज़ी से ही होता है और होना भी चाहिए। लड़की को अचानक पेट में तकलीफ शुरू होती है , डॉक्टर को दिखाया जाता है , और डॉक्टर ऑपरेशन की तजवीज़ करता है लिहाज़ा ऑपरेशन कर दिया जाता है। सब कुछ ठीक -ठाक और रज़ामंदी से चल रहा होता है।
अचानक कुछ हिन्दूवादी संगठनो को इसका पता चल जाता है और उन्हें लगता है कि उनका धर्म खतरे में पड़ गया है। लड़की के घर वालों पर दबाव बनाया जाता है और फिर शुरू होता है एक खतरनाक खेल अर्थात धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों की भावनाओं से खेलने का खेल।
बजरंग दल , हिन्दू शक्ति सेना , बीजेपी , और भी न जाने कितने जाने -अनजाने से संगठन इस खेल में कूद पड़े और लो जी शुरू हो गया भड़काऊ बयानों , पंचायतों , भाषणों और शक्ति प्रदर्शनों का सिलसिला। आरोप घड़े गए --जबरन धर्म परिवर्तन , सामूहिक दुष्कर्म , मानव अंगों की तस्करी (दावा किया गया कि लड़की की एक किडनी गायब है) , जबरन अंग-भंग ( लड़की के गर्भाशय-नली को निकालने का दावा किया गया ) , लव जिहाद (इस शब्द को घड़ने के लिए इसके रचयिता को प्रणाम करता हूँ ) और मदरसों को बताया गया दुष्कर्म के अड्डे।
हे भगवा ब्रिगेड आपको शत शत प्रणाम। आप अपनी चालों में कामयाब रहे। बधाई।
सबसे ज़्यादा अफ़सोस की बात तो ये है कि मीडिया ने भी इस अभियान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। शर्मनाक है ये सब।
हमारे देश में सबसे बड़ी कमी अगर कोई है तो वो है लोगों का अपनी बुद्धि को तिलांजलि देकर सुनी सुनाई या कही गई बातों पर विश्वास कर लेना। और इसमें पढ़े -लिखों में और जाहिलों में कोई भेद नहीं है।
क्या वाक़ई अब भी आप इस कथन पर विश्वास करते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते ?
Mohd Ayyub Mansoori
sach bat kahna b JIHAD h aur ap kalam k mujahid
Like112 August
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